सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ सिद्धान्त दर्पण
श्री भास्कराचार्य ने पाटी गणित (लीलावती) सम्पूर्ण शुद्ध लिखा है अतः
उसे बिना दुहराये मैं ग्रह गणित का आरम्भ करता हूँ जिससे प्राणियों का कल्याण
हो । १२ ।
सिद्धान्त दर्पणेऽस्मिन् सलोचना तां प्रतर्पणे निपुणाः ।
क्वापि क्वापि विशेषम् पश्यते गणितागम ग्रामात् । १३ ।
विद्वान् लोगों की तृप्ति के लिए सिद्धान्त दर्पण में विशेष बातें हैं जो अन्य
सिद्धान्त ग्रन्थों में नहीं है। उसे कृपा देखें ।
श्रुतिर्यज्ञ कर्म प्रवृत्तैव यज्ञ-
क्रियाः काल मासाद्य वैशद्यमापुः
इतः शास्त्रतः कालबोधो यतोऽङ्गे
श्रुते ज्योतिषं प्रोक्तमस्मान् मुनीन्द्रैः । १४ ।
वेद द्वारा लोग यज्ञकर्म में प्रवृत्त होते हैं । यज्ञ कर्म ठीक समय (मुहूर्त) में
ही फल दायक होते हैं । उस मुहूर्त का ज्ञान ज्योतिष शास्त्र द्वारा ही होता है
अतः मुनि लोग ज्योतिष को वेद का अंग कहते हैं ।
आम्नायाख्यपुंसः समजनि नयनं ज्योतिषं शब्द शास्त्रं
वक्त्रं श्रोत्रं निरुक्तं क्रमत इह भुजा नासिके कल्पशिक्षे ।
छन्दः पङ्न्द्वमस्माद् गुरुतर मखिलादंगतो वेदचक्षु
ज्योतिः शास्त्रं समस्तांगभृदपि न यतः कर्मठो नष्टदृष्टिः । १५ ।
वेदरूपी पुरुष के छः अंग हैं-(१) ज्योतिष आंख हैं, (२) व्याकरण रूपी मुंह,
(३) निरुक्त , कान, (४) कल्पशास्त्र, हाथ, (५) शिक्षाशास्त्र, नाक और (६) छन्द,
दोनों पैर । सबअंग होने पर भी बिना आंख लोग काम नहीं कर सकते अतः
ज्योतिष वेद का प्रधान अंग है ।
ज्योतिः सन्दर्भ सर्वङ्कष विषयदमति र्जातक प्रश्न यात्रा
तत्वज्ञ प्राज्ञ गोष्ठी प्रकट गुण घटोऽप्यस्तु लोकस्तुताज्ञः ।
अन्धा सिद्धान्त बोद्धधा न यदि स पुरुषः शोभते नो भतेजः
पुञ्ज व्याप्तापि लुप्तामृत किरणरुचिर्दर्श जातेव रात्रिः । १६ ।
सम्पूर्ण ज्योतिष शास्त्र में निष्णात होकर एवं जातक, प्रश्न, यात्रा आदि तत्व
जान कर विद्वान् मण्डली में ज्योतिषी प्रतिष्ठित हो सकता है, लेकिन यदि वह
गणित रूपी चक्षु से हीन है तो वह चन्द्रमाहीन रात्रि के समान शोभा हीन हो
जाता है । यद्यपि उसमें नक्षत्रों का प्रकाश रहता है ।
यत्र त्रुट्यादि कालः प्रलयचरमकः खेचराणां प्रचारः
प्रश्नाश्चैवोत्तराणि द्विविधगणितमध्यु द्भवो भूतराशेः ।