सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० सिद्धान्त दर्पण
बीत चुके । कलियुग में ४९७० वर्ष बीत चुके (ग्रन्थारम्भ के समय) ।
खाद्र्यंकं नागाब्धि नवाक्षि सप्त नवेन्दवो
(१९७२९४८९७०) ब्रह्म दिनादितोऽमी ।
याताः स्युरेतत् गणितोक्ति काले ख
खाभ्रखाभ्रभ्रकृताब्धिचन्द्रै । ४३ । (१४४००००००)।
इन सबको जोड़ने से ब्रह्म के दिना रम्भ से ग्रन्थ आरम्भ तक १९७२९४८९७०
वर्ष बीत चुके । १४,४०,००० द्वारा
कल्पाब्दसंख्या विहता भवन्ति ।
दण्डादयोऽण्डाधिपधस्र भुक्ताः । (१३।४२।३।४३।२७)।
कल्पाब्द, कार्यं त्विपदेव नैभ्यः
प्रयोजनं खेचर वासराब्दे । ४४ ।
कल्पाब्द संख्या में भाग देने से ब्रह्मा के वर्तमान दिन के दण्ड आदि निकलेंगे
(इनका मान १३।४२।३।४३।२७ । है) कल्प वर्ष का इतना ही प्रयोजन है, उसका
ग्रह दिन आदि निकालने में कोई उपयोग नहीं है ।
उत्पद्य विष्णोः सृजतो दिनादौ ग्रहक्षं गोलादिक मब्जयोनेः ।
त्रयं युगानां चरणत्रयञ्च सार्ध यतः कल्पमुखादद्यासीत् । ४५ ।
नारायण से उत्पन्न होकर ब्रह्मा ने अपने दिन के प्रारम्भ से ग्रह, नक्षत्र, गोल,
भूगोल, देव और दैत्य आदि की रचना शुरू की । इसमें उन्हें तीन महायुग, तीन
युग चरण (सत्य त्रेता तथा द्वापर), चौथे युगचरण (कलि) का आधा समय लगा ।
तत्खाभ्र खाब्ध्यं ग ख सप्त चन्द्रे (१७०६४०००)
रब्दैरवेः कल्प समा विहीनाः ।
सृष्ट्यब्दकाः खाद्रिनवाब्धि नाग-
नागाथबाणां कमुव (१९५५८८४९७०) स्त्विदानीम् । ४६ ।
सौर वर्षों में सृष्टि रचना का समय १,७०,६४,००० हुआ । इन्हें कल्पवर्ष में
घटाने से सृष्टि गताब्द १९५५८८४९७० हुआ ।
कले किल प्रान्त दल प्रवेशे लंकार्ध रात्रे विधिरर्क वारात् ।
प्रवर्तयामास खगभ्रमादि प्रमाणितं चैत्र सितादि कालम् । ४७ ।
(सृष्टि होने पर) कलियुग के शेषार्द्ध आरम्भ होने के समय लंका की आधी
रात को ग्रह नक्षत्र मण्डल को घुमा दिया उस दिन को रविवार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
कहा गया ।
तदादितः खेचरचक्र पर्या (यः) समं समाप्ता निशि तावति क्षणे
पुनः परे द्युर्गत सम्भवक्षणे तथा प्रवृत्तास्तत एव मन्वहम् । ४८ ।
इस प्रकार ग्रह नक्षत्र की गति आरम्भ होने पर, ब्रह्मा का दिन समाप्त होते