सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाल वर्णनम ७
प्राणादिकोऽसौ व्यवहार योग्यो मूर्त्तो न तद् योग्यतया स्थितोयः
त्रुट्यादि कोऽमूर्त्त इतीरितोऽयं शीघ्रेरितात्यन्त सताग्र सूच्या । २५ ।
काल के प्राण आदि रूप मूर्त हैं । अत दैनन्दिन व्यवहार में आते हैं । जिस
काल का व्यवहार में नहीं लाया जाय वह त्रुटि आदि-अमूर्त काल हैं ।
स्या द्यावतोद्यन्नलिनीदलस्य वेधस्त्रुटिः सैव शतेन (१००) तासाम् ।
एको लवस्तत्पर नामकोऽसौ त्रिंश (३०) ल्लवैरेक निमेष भक्तः । २६ ।
एक कोमल कमल पत्र को तेज छुरी से काटने में जितना समय लगता है
उसे त्रुटि कहते हैं । १०० त्रुटि को एक लव या तत्पर कहते हैं। एक निमेष ३०
लवों में विभक्त है (निमेष = पलक झपकाना)
तैरूच्यतेऽष्टोदश (१८) भिश्च काष्ठा
सार्द्धान्विता स्याद् गुरुवर्ण कालः ।
तैः खेन्दुभिः (१०) प्राण उदीरि तस्तद्-
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