सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाल वर्णनम् ५
स्थानं भूभग्रहादे ग्रहण खगयुति ज्या धनुष्कयन्त्र-
क्षेत्रायं गद्यते सद्रणक गणवरै रेश सिद्धान्त उक्तः । १७ ।
श्रेष्ठ ज्योतिषी सिद्धान्त उसे कहते हैं जिस ग्रन्थ में त्रुटि से लेकर प्रलय पर्यन्त
समय की चर्चा है, जिसमें ग्रह गति, प्रश्न, और उनका उत्तर है, जिसमें (पाटी
और बीज) दो प्रकार का गणित हो, जिसमें सृष्टि चर्चा, पृथ्वी नक्षत्र आदि की
कक्षा, ग्रहण और ग्रह योग की आलोचना और ज्या, धनु आदि यन्त्र और क्षेत्रफल
आदि की चर्चा हो।
श्रेष्ठं सर्वश्रुतानां श्रुत मिति कृतिभि ज्योतिर्षं तत्र सारः
सिद्धान्तस्तत्र गोल स्तदवगति कृतो वर्त्तते यत्र मर्त्यः ।
विद्वत्पूज्यः सदेशः सकल कलुषहृद् धर्म शम्र्माश्रयः स्याद् -
यत्रास्ते नैष तस्मिन् पशु चरित परे पाप जो यन्त्रतापः । १८ ।
शास्त्रज्ञ धार्मिक लोग कहते हैं-सभी शास्त्रों में ज्योतिष श्रेष्ठ हैं। ज्योतिष में
सिद्धान्त और सिद्धान्त में भी गोल श्रेष्ठ हैं। जहां गोल जानने वाले विद्वान् रहते
हैं उस देश की विद्वान् पूजा करते हैं, वहां पापनहीं रहता, धर्म और सुख उस
देश में आश्रय लेते हैं। जहाँ गोलज्ञ विद्वानों का अभाव वहां पशुप्रवृत्ति (आहार,
निद्रा, भय और मैथुन) बढ़ जाते हैं। अतः पाप जनित कुप्रभाव उस देश को नष्ट
कर देते हैं।
यशश्च तुर्वर्ग फलप्रदं श्रुतं पवित्रमेतत्पठनीय मेवतत्
अहर्पति प्राह रह स्यनित्यतः प्रदेयमेतत्प्रवणाय साधवे । १९ ।
यह शास्त्र यश और चतुर्वर्ग फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देता है,
पवित्र और पठनीय भी है अतः सूर्य ने (सूर्यांश पुरुष ने मयासुर को सूर्य सिद्धान्त
का उपदेश दिया था) इस शास्त्र को गोपनीय कहा जिसे केवल सज्जन और
विनयी पुरुष ही पढ़े।
पूर्वार्द्धे कालमहर्गण भगण खग ज्यादि विस्पष्टतेषु
त्रिप्रश्न प्रग्रहोहु ग्रहसमिदुदयास्तेन्दु शृंगातिपातान् ।
अन्त्ये भागेऽनुपयोगोत्तर विविध मत व्यक्ति सृष्टयन्तगोल
क्ष्मा कक्षा यन्त्र वर्षा च्युतुनुति कुतुका न्यत्र पश्यन्तु सन्तः । २० ।
इस ग्रन्थ के पूर्वार्द्ध में काल परिमाण, अहर्गण, भगण, ग्रह आनयन ज्या
कोटिज्या आदि, स्पष्ट, शर, त्रिप्रश्न, ग्रहण, ग्रहयुति, नक्षत्र, युति, उदय और
अस्त, चन्द्र शृंगोन्नति और अति पात है।
उत्तरार्द्ध में प्रश्न, उत्तर, नानामत चर्चा, सृष्टि और उसका लय, गोल, पृथ्वी,
कक्षा, यन्त्र, देश-विदेश, जगन्नाथ स्तुति और कौतुक पंजिका की आलोचना है।
इसे सज्जन लोग देखें।