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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

३५८ सिद्धान्त दर्पण
सूर्य सिद्धान्ते- ग्रह नक्षत्र चरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः
ग्रहलोकमवाप्नोति पर्ययेणात्मवान्नरः । इति । ११० ।
ग्रह नक्षत्र तथा गोल का ज्ञान होने से व्यक्ति धनी होता है तथा मरने के
बाद ग्रह लोक में जाता है ।
सिद्धान्त शिरोमणै-दिव्य ज्ञान मतीन्द्रियं यदृषिभिर्ब्राह्म्यवशिष्ठादिभि
पारम्पर्य वशाद् रहस्य मवनीं नीतं प्रकाश्यं ततः
नैतद् वेषि कृतघ्न दुर्जन दुरा राराचिरा वासिनां
स्यादायुः सुकृतक्षयो मुनिकृतां सीमामिमामुज्झतः । इति । १११ ।
ग्रहज्ञान दिव्य और अतीन्द्रिय है । यह पहले ब्रह्मा ने कहा था उसके बाद
वशिष्ठ आदि ऋषियों के क्रम. से पृथ्वी पर इसका विस्तार हुआ । इस प्रकार
पवित्र ज्ञान को हिंसक, कृतघ्न, दुर्वृत्त तथा अधिक दिन ज्ञान न रख सकने वाले
व्यक्ति को नहीं देना चाहिये ।
ऋषि मुनियो का यह आदेश नहीं मानने से आयु तथा पुण्य का नाश होता
है ।
कृति प्रति निवृत्यौ मनु जवीययो यन्महा
प्रसाद परिपूरितोदर कराननाः पावनाः
पुनन्ति पतितान् पथि स्वतनु मारुतौ मद्द्दृशौ
दृशो र्वहतु मेऽन्वहं महमदो महान्तं महः । ११२ ।
जिसका महाप्रसाद हाथ में, मुंह या पेट में लेने से पुनः जन्म नहीं होता,
जिसके द्वारा मेरे जैसे पतित भी पावन हो जाते हैं, उस महाप्रभु का तेज सदा मेरी
दृष्टि में रह कर आनन्द दे ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
विंशोऽगमत्पाटित यन्त्रकथः प्रकाशः । ११३ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्रीचन्द्र शेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा बालको की शिक्षा के लिए सिद्धान्त दर्पण का यन्त्र
वर्णन सम्बन्धी २० वां प्रकाश समाप्त हुआ ।

एक विंशः प्रकाशः
वासना शेष रहस्य वर्णन
कृत्वा ग्रहाणां गोलानां गणितक्रम वर्णनम्
प्रत्युक्ति शेषमिषतो वासनादिक् प्रदर्श्यते । १ ।
ग्रह और गोल का वर्णन पूरा करने के बाद प्रश्नोत्तर रूप में वासना (गणितं
विधियों का रहस्य या तर्क) दिखाया जा रहा है ।
व्यक्षे क्षितिज वृत्तम् यत्तदुन्मण्डलान्यतः
स्वदेशे क्षितिजे सूर्योदयोऽस्मात् स्वनिरक्षयोः । २ ।
निरक्ष देश (विषुव वृत्त स्थान) के क्षितिज वृत्त को अन्य स्थानों पर उन्मण्डल
कहा जाता है । अपने अपने स्थान के क्षितिज वृत्त में ही सूर्योदय होता है । अपने
स्थान के क्षितिज और निरक्ष के क्षितिज (जो अपने स्थान का उन्मण्डल है) के
बीच
द्युरात्र वृत्तानुसृतेश्वरं सूर्योदयान्तरम्
द्युरात्र मण्डले यस्मात् क्षितिजादुपरि स्थिते । ३ ।
अहोरात्र वृत्त का खण्ड ही चर है । यह दोनों स्थान के सूर्योदयों में समय
का अन्तर है । सूर्य अहोरात्र वृत्त में अपने क्षितिज के ऊपर रहने पर
दिनं भवेदधः संस्थे ततो भवति यामिनी
तस्मात् समत्वं सततं द्युनिशो व्यक्ष देशके । ४ ।
दिन होता है । तथा नीचे रहने पर रात होती है । निरक्षवृत्त ही सबसे बड़ा
अहोरात्र वृत्त है । इसको सभी देशों का क्षितिज दो समान भागों में बांदता है ।
अतः सूर्य निरक्ष वृत्त में घूमने पर दिन और रात हर स्थान पर समान होते हैं ।
निरक्ष देश में दिन रात...सदा समान होते हैं ।
निरक्षोदयतः पूर्वं सौम्य गोले स्वदेशजः
उदयोऽस्तमयः पश्चाद् याम्य गोले विपर्ययः । ५ ।
विषुव रेखा से उत्तर-सूर्य रहने पर उत्तर के स्थानों में विषुव क्षेत्र से पहले
सूर्योदय तथा पीछे सूर्यास्त होता है । दक्षिणीगोल में इसका विपरीत होता है ।
क्षितिजोर्ध्वाधरः स्थित्वा दृक्वृत्तस्य च गोलयोः
सौम्ये महद्दिनं रात्रिस्तनुर्याम्ये तु वाम्यतः । ६ ।
इसका कारण है कि उत्तर गोल में उन्मण्डल अपने क्षितिज से ऊपर रहता
है, उन्मण्डल तक पहंचने (निरक्ष सूर्योदय) से पहले ही सूर्य अपने क्षितिज पर
आ जाता है । और अपने स्थान का सूर्योदय होता है। दक्षिण गोल में उन्मण्डल
अपने क्षितिज से नीचे होता है।

३६० सिद्धांत दर्पण
सार्द्धषट् षष्टि (६६।३०) भागेभ्यो देशे यत्र पलांशकाः
भवन्त्य ध्यधिकास्तत्र विशेषोऽपर उच्यते । ७ ।
जिसका स्थान का अक्षांश ६६ १/२ अंश से अधिक है वहां विशेष घटना
होती है । जिसके बारे में यहां कहा जा रहा है ।
लम्बाधिकोत्तर क्रान्ति र्यावत्तावत् सदादिनम्
याम्य क्रान्ति स्तथा यावत् तावत्तत्र निशानिशम् । ८ ।
सूर्य की उत्तर क्रान्ति जितने दिनों तक रहती है । तब तक यहां दिन होता
है तथा जब तक दक्षिण क्रान्ति होती है तब तक रात्रि (अर्थात् ६ मास का दिन
तथा उतनी ही रात्रि) ।
देवासुराणां क्षितिजं विषुवद् वलयं यतः
सौम्य याम्य ध्रुवौ तेषां मस्तकोर्ध्व स्थितौ ततः । ९ ।
विषुव वृत्त देव और असुरों का क्षितिज है । अतः उत्तर ध्रुव देवताओं का
तथा दक्षिण असुरों का ख स्वस्तिक है ।
उर्ध्वे भ्रमन्तं क्षितिजादुदग् दक्षिण गोल योः
सव्यगं सूर्यमीक्ष्यन्ते देवा दैत्या स्त्व सव्यगम् । १० ।
सूर्य उत्तर गोल में रहने पर देवता लोग उसे दक्षिणी क्षितिज पर घूमता हुआ
देखते हैं । सूर्य दक्षिण क्रान्ति होने पर असुर उसे उत्तरी क्षितिज पर घूमता हुआ
देखते हैं ।
अस्मादुत्तर गोलस्थे भानौ दिविषदां दिनम् ।
रात्रि रन्यत्र दैत्यानां वैपरी त्यादहर्निशम् । ११ ।
क्रान्ति वृत्त का आधा भाग (सायन मेष से सायन तुला आदि तक) विषुव
के उत्तर है । अतः वर्ष के आधे भाग में जब सूर्य उत्तरायण होता है, देवताओं
का दिन और असुरों की रात होती है । सूर्य दक्षिणी गोल में रहने पर इसका
उल्टा होता है ।
सुराणां दिन यामिन्यौ सौम्य याम्या यने इति ।
स्मृति र्दिनोन्मुखे रात्र्यमुखेऽर्कं समतातयोः । १२ ।
अतः स्मृतियों में कहा गया है सूर्य के उत्तर या दक्षिण अयन में रहने से सुरों
का दिन या रात होता है । दिनार्द्ध के बाद सूर्य क्षितिज से नीचे की दिशा में
जाने लगता है । तथा रात्रि अर्द्ध के बात ऊपर उठता है, या दिन की दिशा में
जाता है ।
निशाहर्दलयो र्भानो र्यदारोहा वरोहयो
स्यादारम्भस्ततः कृत्यं देवानां स्याद् द्युरात्रजम् । १३ ।

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६१
इस प्रकार अर्द्ध रात्रि से ही दिन का आरम्भ हो जाता है । अतः उत्तरायण
आरम्भ होने पर देवताओं के दिन का आरम्भ माना जाता है । और उस समय
देवताओं के दिनारम्भ कृत्य मनुष्य करने पर देवता गण प्रसन्न होते हैं ।
ब्रह्मयाति दूरगं भूमेः पश्येदा प्रलयं रविम्
दिनान्तेऽस्तमिते शेते तत्रेत्युक्तिः पुराविदाम् । १४ ।
भूमि से ब्रह्मा बहुत दूर रहने के कारण वह प्रलय होने तक सदा रवि को
देखते हैं । और उनका दिन रहता है । प्रलय होने पर सूर्य अस्त (वा नष्ट) होता
है तब ब्रह्मा की रात्रि होती है और वह शयन करते हैं ऐसा पुराणों में कहा है ।
अन्यस्य तदहः कर्तुमनेन सति भास्वतः
भ्रान्तिर्युग सहस्राभ्या मेका तस्यापि मन्यताम् । १५ ।
अन्यों का (देव, दानव और मनुष्यों का) दिन-रात एक ही सूर्य से होता है ।
ब्रह्मा की रात्रि समाप्त होने पर एक अन्य सूर्य का उदय होता है । (क्यों कि पिछला
सूर्य प्रलय में नष्ट हो जाता है )
दिनं स्याद्दर्शने भानोर्यतो रात्रि रदर्शने
पितॄणां तद्दिनं मासाशशि पृष्ठ निवासिनाम् । १६ ।
सूर्य का दर्शन होने से दिन तथा अदर्शन (छिप जाने) से रात्रि होती है ।
अतः पितृ लोक चन्द्र की सतह पर रहने के कारण एक चान्द्र मास उनका दिन
-रात होता है ।
मध्यन्दिनंस्याद्धशान्ति पूर्णिमान्ते निशादिनम्
सितेऽसिते पक्ष दले सायं प्रात रितः क्रमात् । १७ ।
अमान्त में पितरों का दिनार्द्ध तथा पूर्णान्त में उन लोगों का निशार्द्ध होता
है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी में उन लोगों की सन्ध्या तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी :
(आधा में) उनका सूर्योदय होता है ।
यत्रापमण्डलं प्राच्यां लगति क्षितिजे लवे
लग्नस्तद्राशि भागाद्यमस्त लग्नः परे कजे । १८ ।
पूर्व क्षितिज में क्रान्ति वृत्त का जो अंश लगता है वही उस समय का (उस
स्थान का) लग्न है । पश्चिम क्षितिज में क्रान्ति वृत्त का जो भाग लगता है वह
उस समय का अन्त लग्न है ।
क्षितिजद्वय मध्यस्थौ प्रदेशा दधरोर्द्धव गौ
पाताल मध्य लग्ना रूयौज्ञेयौ त्रिप्रश्न दर्शनात् । १९ ।
पूर्व और पश्चिम क्षितिज के बीच में नीचे और ऊपर की दिशा में क्रान्ति वृत्त
का जो अंश लगता है उसे क्रमशः चतुर्थ और दशम् लग्न कहते हैं । इसका ज्ञान
त्रिप्रश्नाधिकार से होता है ।

यात्यल्प कालेन ऋजु र्बहुना समयेन यत् । २० ।
Wait, line 3:
"यात्यल्प कालेन ऋजु र्बहुना समयेन यत् । २० ।"
Notice the space: "ऋजु" then "र्बहुना" (र् on बहुना with space). Exactly as printed!

Line 4-5:
क्रान्ति वृत्त का तिरछा स्थान जल्दी उदय और अस्त होता है किन्तु सरल
भाग (लम्बा होने के कारण) उदय और अस्त होने में अधिक समय लगता है ।

Line 6-7:
ततोन तुल्या उदया व्यक्षे चक्रांश्रयः पृथक्
Wait, "ततोन": is it "ततोन" or "ततो न"?
Looking at line 6: "ततोन" is joined! "ततोन तुल्या उदया व्यक्षे चक्रांश्रयः पृथक्"
Line 7:
"उद्यन्ति तिथिनाड़ी भिभाद्र्द्धे सर्वत्रखाग्निभिः (३०) । २१ ।"
Wait, look at "भिभाद्र्द्धे":
भ + ि = भि
भ + ा = भा
द + ् + र् + द् + ध + े = द्र्द्धे?
Look at it: "भिभाद्र्द्धे" -> 'भि' then 'भा' then 'द्र्द्धे' (द with halanta/

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६३
ग्रहाणां योजन गतेः साम्यं स्वीक्रियते यदि
तदागति क्रमात् कक्षाविस्तारः कर्तु मिष्यते । २७ ।
यदि ग्रहों की योजन गति समान मानी जाय तो उनकी कला गति के अनुसार
कक्षा का विस्तार करना होगा (कला गति कम होने पर बड़ी कक्षा होगी ।)
तथा सति न दृक् तुल्याः शैघ्रं परिधयो हि यत्
भवन्ति त्युदिता सूर्याद् बुद्धाद्याः क्रम मन्दगाः । २८ ।
ऐसा मानने पर भी ग्रहों की शीघ्र परिधि दृक् सिद्ध नहीं होती है ।
अतः मेरा मत है कि सूर्य से बुध शुक्र आदि क्रमशः मन्द कला गति वाले
ग्रहों की योजन गति भी क्रमशः कम होती जाती है ।
हानि वृद्धयुक्तिः शैघ्र फलानां बिम्ब बाणयोः
सिद्धान्तेऽनुक्त मप्यक्तं ज्ञादीनामर्क वेष्टनम् । २९ ।
प्राचीन सिद्धान्तों में भी ग्रहों का बिम्ब, शर और शीघ्र फल का कम अधिक
होना लिखा है अतः सिद्ध होता है, कि वे भी ग्रहों की सूर्य केन्द्रित कक्षा स्वीकार
करते हैं । पर स्पष्ट रूप से कहा नहीं है । मैने सिर्फ स्पष्ट रूप से कह दिया है ।
भुवः परित इन्द्वर्को मध्यमार्कात् बुधादयः
मध्यार्क सावन दिने यावद् यान्ति पुरोदितम् । ३० ।
पृथ्वी के चारों तरफ सूर्य और चन्द्र भ्रमण करते हैं तथा बुध आदि अन्य ग्रह
मध्यम सूर्य की परिक्रमा करते हैं । मध्यम रवि सावन दिन में इनकी दैनिक गति
पूर्व दिशा में होती है ।
स्वाभाविकोगतिः सैषां मन्दोच्चा कर्षणत् तु सा
कलाद्यैर्भिद्यते नित्यं दूर सामीप्य या नतः । ३१ ।
यही इन ग्रहों की स्वाभाविक गति है । जो कि मन्दोच्च के आकर्षण के कारण
होती है । पृथ्वी से ग्रह दूर या निकट होने से उनकी कलादि गति भिन्न भिन्न
होती है ।
नानाचार्य निरुक्तानां भगणानांविभेदतः
कैश्चित्कल्पादि कालस्य गणना सम्मता न यत् । ३२ ।
आचार्यों के अनुसार ग्रह और उच्च का भगण भिन्न भिन्न होने के कारण कुछ
गणक कहते हैं कि कल्प आदि काल की गणना भी ठीक नहीं है ।
तत् पाषण्डमतं यस्मात् सिद्धान्तोदित पर्यतैः
तदुक्त कुदिनातीव मध्यमेन्दु विवस्वताः । ३३ ।
किन्तु यह शास्त्र विरुद्ध और पाखण्ड है ( आर्य भट्ट मत की आलोचना)

३६४ सिद्धान्त दर्पण
किन्तु प्राचीन सिद्धान्तों से उक्त मध्यम सूर्य और चन्द्र भगण से कल्प सावन दिन
के अनुसार-
अद्यावध्यर्य्य भटस्य कालात् शक्रशताब्दतः (१४००)
कलाभेदोऽपि नोलब्धस्तत् कथं प्राक् कृति र्मृषा । ३४ ।
आर्यभट्ट से १४०० वर्ष बीत जाने पर भी वर्तमान मध्यम सूर्य और चन्द्र में
कला भेद भी नहीं दीखता है । अतः प्राचीन आचार्यों का शास्त्र भ्रान्त कैसे कहा
जा सकता है ।
स्थिरत्वात् मन्द तुंगस्य भानोर्मध्य गति र्जनैः
भूच्छायादि समालोकात् पञ्चषाब्दैः प्रतीय ताम् । ३५ ।
रवि मन्दोच्च की स्थिरता (बहुत कम गति होने के कारण) तथा रवि मध्यम
गति को भू छाया आदि देखकर ५-६ वर्षों में ही जाना जा सकता है ।
चन्द्र तत्तुं गयो र्नित्यं चलनाद् भगणास्तयोः
न शक्यन्ते नृभिर्ज्ञातुं बिना सिद्धान्त दर्शनात् । ३६ ।
किन्तु चन्द्र का मन्दोच्च तेज चलने के कारण उसके उच्च की गति या मध्यम
चन्द्र गति को बिना सिद्धान्त के नहीं जाना जा सकता है ।
ज्ञायतां तत् विशेषोऽपि बहु प्रमण दर्शिभिः
मध्योच्चाभ्यं शनेर्भेदं शताब्दैज्ञायते कथम् । ३७ ।
बार बार चन्द्र का वेध करने पर ही उसका गति भेद जाना जा सकता है ।
शनि की गति अत्यन्त कम होने के कारण १०० वर्ष के भीतर उसकी मध्य और
मन्दोच्च गति में अन्तर नहीं किया जा सकता है ।
तस्माद्रवीन्दु भगणा वर्ष मास दिनानि च
लंकाद्धं रात्रः सर्वांदिरिति सिद्धान्त वाग् ध्रुवा । ३८ ।
इन कारणों से रवि और चन्द्र का भगणं, वर्ष, मास और दिन आदि की
गणना कल्प से करना असत्य नहीं, उचित है । अतः सिद्धान्त वचन भी सत्य
है ।
चन्द्रोच्च पात भौमादौ विसंवादो यदीक्ष्यते
तत्सर्वं स्थूल दृष्ट्योक्तं युग पर्ययवादतः । ३९ ।
चन्द्र के उच्च और पात की भगण तथा मंगल आदि के भगण में जो अन्तर
दीखता है वह युग आदि के कारण दीखता है । युग भगण आदि स्थूल गणना
के लिये है । सूक्ष्म गणना कल्प भगण से ही हो सकती है ।
मतिमान् भास्कराचार्यः प्रमेदं युगपर्ययैः
ग्रहाणां वीक्ष्यतत् संख्या कल्पे पूर्णामकल्पयत् । ४० ।

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६५
बुद्धिमान भास्कराचार्य ने युग भगण गणना में त्रुटि होने के कारण कल्प में
पूर्ण अखण्ड भगण की कल्पना की ।
सृष्टि कालस्य च त्यागमकृत्वा कल्प वक्त्रतः ।
कालस्य गणनाञ्चक्रे लंका मंध्यार्य मोदयात् । ४१ ।
उन्होंने सृष्टि काल का त्याग कर कल्प आरम्भ से ही गणना आरम्भ की ।
कल्प आरम्भ उनके मत से लंका की अर्द्धरात्रि नहीं, मध्यम सूर्योदय से हुआ ।
कृताहर्गण संख्यया अल्पत्वा द्रविचन्द्रयोः
कलिवक्तात् स्वकालान्तं भागाद्याधिक्यपाततः । ४२ ।
कलियुग के प्रारम्भ से अपने समय तक के अहर्गण की कल्पना करने पर
उसकी संख्या अत्यन्त कम होने के कारण उससे रवि और चन्द्र निकालने पर
अंशादि का मान अधिक लगा (भास्कर को)
खाभ्र खाक्यैहृते त्वादि सिद्ध बीज कलोज्झनात्
सिद्धान्त मास्य वात्पीय समये कृतवां स्तयोः । ४३ ।
अतः उन्होंने सिद्धान्त शिरोमणि के ‘खाभ्रखाक्यैहताः कल्पयाताः समाः’
इत्यादि श्लोकों द्वारा सिद्ध बीच कला को घटाया । इससे उन्होंने अपने समय
के रवि और चन्द्र के लिए श्रेष्ठ सिद्धान्त कर दिया ।
इत्थमन्यग्रहाणाञ्च निर्माय भगणावलिम्
स्व स्वबीजैर्युतो नानां तेषां दृक् सिद्धि मैक्षतः । ४४ ।
इसी प्रकार उन्होंने अन्य ग्रहों का भी भगण आदि स्थिर कर अपने बीज को
जोड़कर या घटाकर सभी ग्रहों को दृक् सिद्ध किया ।
सिद्धान्त सिद्धि रर्केन्दोर्बीजेनापि यदिप्सिता
स्वपर्याया स्थिरत्वं हि सतेना विष्कृतं स्वयम् । ४५ ।
बीज संस्कार कर रवि और चन्द्र स्फुट किया । इससे लगा कि उनका रचित
भगण आदि निश्चित नहीं है । (नहीं तो संस्कार की आवश्यकता नहीं होती ।)
अधुनैतन्मध्यमयोः सिद्धान्त नीतयोर्यतः
दृक् सिद्धिर्भाति तस्योक्ता दृश्यते महदन्तरम् । ४६ ।
वर्तमान सिद्धान्त (सिद्धान्त दर्पण) द्वारा जिस प्रकार रवि और चन्द्र का साधन
किया जाता है, वह अच्छी प्रकार दृक् सिद्ध होता है । पर भास्कर की रीति से
करने पर बहुत अन्तर पड़ता है ।
यदि तत् पूर्व समये कश्चित्तत् सदृशः सुधीः
अकारिष्यत दृक् सिद्धिं कल्पितैः कल्प पर्ययैः । ४७ ।
यदि उनके पहले किसी ने भगण की कल्पना कर ग्रहों की दृक् सिद्धि की

३६६ सिद्धान्त दर्पण
होती
तदैवदृग् विसंवादो भासकरोक्तेर्नसंभवेत्
स्वपूर्व काल संवादा ध्यतः स्यादन्तर ग्रहः । ४८ ।
तो भास्कर की उक्ति (भगण मान) और दर्शन (वास्तविक स्थिति) में इतना
अन्तर नहीं होता । उनसे (५१६) पूर्व ब्रह्म गुप्तं के कल्प भगण के आधार पर गणना
में भेद आते देख कर
आचार्यः कल्पभगणान् यदाहेष महान् गुणः
प्रवृत्ति दिन मासादि संख्या भेदस्तु दूषणम् । ४९ ।
अपना अलग कल्प भगण कहा यह उनका महान् गुण है। लेकिन उन्होंने
कल्पादि के लंका के सूर्योदय से ग्रहविचार आरम्भ किया तथा सावन, चान्द्र
दिन, मास आदि की अलग संख्या दी वह उनका दोष है ।
तथाप्येष निजेकाले लिखित्वा दृक् समान् ग्रहान्
महोपकार मकरोत् मादृशा मल्प संविदाम् । ५० ।
तथापि उन्होंने अपने समय का दृक् सिद्ध ग्रह गणित लिखकर मेरे समान
कम ज्ञान वाले लोगों का बहुत उपकार किया है ।
आर्यभट्ट शतानन्द भास्कराणां स्वकालजैः
तत्तन्मतमानीतैः कामभट्टादि सम्मतैः । ५१ ।
आर्यभट्ट, शतानन्द और भास्कर आदि ने जो अपने समय का ग्रह (स्थिति)
निकाला तथा काम भट्ट आदि के द्वारा गणित समान किया गया
ग्रहैः स्वानीत खेटानां कृत्वा संवादमात्मनः
कालेनाहं दृष्टि सिद्धान् सृष्टवान् भगणानसून । ५२ ।
इन सभी को मैने अपने समय में अपनी रीति में निकाले गये ग्रहों से तुलना
की है और उनके अनुसार दृक् सिद्ध भगण लिखे हैं ।
तिथि भादौ घटी भेदो भाग भेदो कुजादिषु
भविष्यत्ययुताब्दान्तं नैतेभ्य इति मे मतः । ५३ ।
अतः मेरी धारणा है कि आज से अयुत (१०,०००) वर्ष बाद भी मेरी गणना
आज ही के समान दृक् सिद्ध होगी । तिथि नक्षत्र आदि में, या मंगल आदि ग्रहों
के स्पष्ट राशि अंश में कोई भेद नहीं होगा ।
त्रिकाल ज्ञान हीनत्वात् ना दृशां चिरकालतः
अंशादिभिः प्रमेदश्चेत् साक्षात्कार्यः प्रमातृभिः । ५४ ।
मैं त्रिकालज्ञ नहीं हूँ अतः चिरकाल तक मेरा सिद्धान्त स्थिर नहीं रह सकता
है । अतः एक अयुत वर्ष से अधिक समय के बाद स्पष्ट ग्रह के अंशों में भेद आने

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६७
पर उसका संशोधन करना पड़ेगा ।
तदा मयोक्त पूर्वेषु भगणेष्वपि विपर्ययात् ।
देया हेया वाथमाणा हानि वृद्धयनुसारतः । ५५ ।
मेरे कहे गये भगण के अनुसार यदि ग्रह स्थिति वास्तव से कम या अधिक
आती है तो उसमें कुछ जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
वेद तत्वानि (२५४) पञ्चेषु सिन्धवो (४५५) नव खाद्रयः । (७०९ )
रामत्वं का (१६३) समुद्रांगं रुद्राः (११६४) समेन्दु भास्कराः (१२१७) । ५६ ।
संशोधन के लिये मंगल के भगण में (२५४) जोड़ना या (४५५) घटाना
पड़ेगा । (कल्प भगण में) बुध भगण में (७०९) जोड़ना या (१६३) घटाना पड़ेगा ।
गुरु भगण में (११६४) जोड़ना या (१२१७) घटाना पड़ेगा
द्विशैल रस मेदिन्य (१६७२) श्चन्द्राष्ट गुण बाहवः । २३८१)
शराग्नि रस ने त्राणि (२६३५) खनन्द गगनाऽग्नयः (३०९०) । ५७ ।
शुक्र भगण में (१६७२) जोड़ना या (२३८१) घटाना पड़ेगा । शनि भगण में
(२६३५) जोड़ना या (३०९०) घटाना पड़ेगा ।
एवं दशविधा भेदा धनर्णत्वेन सम्मताः
भौमादेः कल्पिताः कल्प भगणानां विशुद्धये । ५८ ।
इस प्रकार भौम आदि के कल्प भगणों में संशोधन के लिये (यदि १०,०००
वर्ष बाद राशि अंश कम या अधिक हों) लिखित कल्प भागणों में इन दस राशियों
को जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
अत्रतु प्रथमो भेदो द्विगुणःक्वचिदिष्यते
ततो द्वि त्रिवेदघ्न स्तुर्यः पञ्चगुणावधि । ५९ ।
यहां दिया हुआ प्रथम भेद २ गुणा भी हो सकता है । तृतीय भेद, २, ३ या
४ गुणा भी हो सकता है । चतुर्थ भेद ५ गुणा तक हो सकता है ।
तथैवाष्टमपक्षः स्यात् सप्तमो दिग् गुणावधिः
अन्यो द्वित्रिगुणो ग्राह्य स्त्रयस्त्रिंशद् भिदा इति । ६० ।
इसी प्रकार ८ वां भेद २, ३, ४ या ५ गुणा हो सकता है । अन्या का २ या
३ गुणा तक होगा । इस प्रकार इन भेदों की संख्या ३३ हुयी ।
एषामन्योन्य योगाच्च ये स्तुस्ते भास्कर स्यमे
संवादात्काल योग्राह्या स्त्रिंश लिप्तान्तरा दपि । ६१ ।
भास्कर के समय और मेरे समान के बीच दृकसिद्धि में यदि ३० कला का
भी अन्तर पड़े तो यह योग वियोग करना पड़ेगा ।

३६८ सिद्धान्त दर्पण
तिथ्यादौ ग्रहमादौ च चन्द्र मन्दोच्च पातयोः
सर्वोपादेयता हेतो स्तद् विशेषं ब्रुवे पुनः । ६२ ।
तिथि नक्षत्र आदि निकालने में तथा ग्रहण आदि में चन्द्र मन्दोच्च और पात
की सर्वोपयोगिता के कारण उसके संशोधन के बारे में कह रहा हूं ।
ख चतुर्नव सप्तैश वसु नाग कृता इति (४८,८१,१७,९४०)
उक्त पूर्वान्मया चन्द्रमन्दोच्च भगण ब्रजात् । ६३ ।
पहले चन्द्र मन्दोच्च का कल्प भगण (४८,८१,१७,९४०) कहा गया गया है ।
कालान्तरे सुसाध्यस्य तुंगस्येक्षण सिद्धितः
अधिकं न्यूनता वापि भवता तेत्तदाप्यमो । ६४ ।
बहुत काल के बाद उसमें अच्छी तरह उच्च साधन करने पर यदि उससे
वास्तविक मान अधिक या कम दिखायी दे तो दिये गये मान में
ग्राह्या दृक् सिद्धये भेदा द्विसप्त रस भूमयः (१६७२)
चन्द्राद्रिगुणपक्षा (२३८१) वा किं वाग्नीषु ख सागराः । ४०५३) । ६५ ।
१६७२, २३८१ या ४०५३ जोड़ेगे या घटायेंगे (जिस मान से गणना और दृष्टि
में समानता है ।)
तत्पात भगणानान्तु शंकानास्ति विपर्यये
तथाप्यब्दा युतेऽतीते भेदो भागाधिका यदि । ६६ ।
चन्द्रपात भगणं में एक अयुत (१०,०००) वर्ष के बाद परिवर्तन अवश्य होगा ।
गणना और दृष्टि में एक अंश का अन्तर हो
भावीतद् व्यद्रिष्ट चन्द्रा (१६७२) स्तेषु दृश्यनुसारतः
क्रान्ति पातस्य भगणेष्व भ्रगो गगनाग्नयः । (३०९०) । ६७ ।
तो भगण में १६७२ जोड़ेंगे या घटायेंगे । क्रान्ति पात का भगण में (३०९०)
खाद्रिद् व्यर्थाः (५२७०) खधृत्यंगा (६१८०) न्यभ्रषड् गुणदन्तिनः । (८३६०)
एतेद्विघ्ना स्त्रिनिघ्नाश्च दिग्गजांक निशाकराः । (१९,८१०) । ६८ ।
(५,१७०) (६१८०), (८,३६०) इसका दो गुणा (१६,७२०) ३ गुणा (२५, ०८०)
(१९८१०) या (२८,१७०) जोड़ेगे या घटायेंगे । (कल्प में क्रान्ति पात भगण
६,४०,१७० है)
खाद्रिचन्द्राष्ट पक्षाश्च (२८,१७०) यो ज्यात्याज्या तथापि चेत्
दृक् सिद्धिर्न तदा भानो व्यत्यया भावनिश्चयात् । ६९ ।
यदि इसके बाद भी क्रान्ति पात स्पष्ट नहीं होते तो सूर्य की छाया द्वारा क्रान्ति
साधन करेंगे ।

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६९
गणितागत सूक्ष्मार्क छायाक्रान्तिर सम्मिताः
अयनांशादयो ग्राह्या विशेषोऽत्रेति कीर्त्तितः । ७० ।
सूक्ष्म गणित द्वारा सूर्य तथा छाया द्वारा सूर्य निकाल कर (त्रिप्रश्नाधिकार
विधि से) दोनों का अन्तर निकालेंगे । जो कि वास्तविक अयनांश होगा ।
यदा प्रजापतिः खेटान् सृष्टा जादौन्यवीविशन्
ततो द्विद्यु (२२) ब्दतः कुम्भराश्यादौ निदधे गुरुम् । ७१ ।
(वाराह मिहिर की वृहत्संहिता के अनुसार) जब सृष्टि का आरम्भ हुआ उस
समय वृहस्पति मेष राशि के आरम्भ में था । अतः वह २२ वर्ष बाद कुम्भ राशि
में निश्चय रहा होगा । (मध्यम मान से १ वर्ष में एक राशि)
तदादि प्रभवस्तस्मात् प्रवृत्तोऽब्दागुरौ पुनः
मेषादि निष्ठे शुक्लाद्या इति सांहितिकोवितः । ७२ ।
उससे प्रभव नामक गुरुवर्ग आरम्भ हुआ । पुनः वृहस्पति मेषादि में रहने से
उस वर्ष का नाम शुक्ल आदि हो सकता है ।
राशि द्वय युतिः प्रोक्ता मया मध्य वृहस्पतौ
तत्पर्यय विपर्यास सम्भविष्यति पण्डितैः । ७३ ।
अतः प्रभव से आरम्भ होने वाला गुरु वर्ष निकालने के लिए मध्यम वृहस्पति
में २ राशि जोड़ा जाता है । भविष्य में वृहस्पति साधन में यदि भगण परिवर्तन
के कारण अन्तर हो तो पण्डितों द्वारा
भगणां पञ्चनिःशेषाः कल्प्यास्तत् खरदावलिं
सृष्टेर्विश्वावसु (३९) मुखा कपिलाख्या (५१) दिरेववा । ७४ ।
गुरु भगण में ५ से भाग दिया जायेगा । क्योंकि गुरु वर्ष ६० होते हैं और ५
वर्ष में एक-एक सम्वत्सर होने के कारण ५ से भाग देने पर १२ सम्वत्सर होंगे ।
सृष्टि आरम्भ से विश्वावसु (३९), कपिल (पिंगल) (५१)
शुक्ला (३) दिर्वा वृषा (१५) दिर्वा विजया (२७) दिरथापि वा
लेख्याः स्वकाल सिद्धिना मब्दानामविरोधतः । ७५ ।
शुक्ल (३) वृष (१५) या विजय (२७) आदि संवत्सर ही होगा । क्योंकि ६०
को ५ से भाग देने पर प्रत्येक १२ संवत्सर के आरम्भ में इन्हीं में से कोई वर्ष होगा ।
अपने देश में प्रचलित अब्द का नाम लिखना चाहिये ।
किन्तु खाब्ध्यष्ट सप्तार्थ द्वयब्धिषड् गुण पर्ययाः (३६,४२,५७,८४०)
शुक्लाद्य ब्द गणाः सर्व पक्षतः साधवो मताः । ७६ ।
वृहस्पति की भगण संख्या (३६,४२,५७,८४०) मानने वाले लोगों के लिए
शुक्ल से ही सम्वत्सर आरम्भ करना चाहिये ।

३७० सिद्धान्त दर्पण

  • एतद् भगण जेष्बिन्दु (१५) लिसोनेजस्य संम्प्रति
    दृक् साम्यात्पदकं लेखं ध्रुव गत्यादि संगतम् । ७७ ।
    इस भगण से जो मध्यम वृहस्पति आयेगा उससे १५ कला घटाने पर वह
    आकाश में प्रत्यक्ष होगा । इसमें ध्रुव गति आदि जोड़कर पदक आदि लिखना
    होगा ।
    भाविद् व्यब्दीश (११४२) वर्षान्ते मतद्वयज गीष्पतेः
    समत्वं भविता तत्र कार्ये दृक् सिद्धि रुत्तमैः । ७८ ।
    (११४२) वर्ष बाद उल्लिखित मत और पारम्परिक मत के अनुसार गुरु साधन
    कर देखेंगे कि दोनों मत से एक ही मान आता है, कि नहीं । उस समय सूक्ष्म
    बुद्धि वाले दृक् सिद्धि करेंगे ।
    शास्त्रस्यास्य विसंवादे धर्मगोप्ताच्युतेन चेत्
    सम्भव्यो ग्रन्थकृत्कश्चिद्रहस्य तत्कृतेह्लादः । ७९ ।
    ज्योतिष शास्त्र की गणना में त्रुटि होने पर धर्मरक्षक भगवान इस शास्त्र का
    संस्कारक उत्पन्न करते हैं । उसी को यह गोपनीय शास्त्र ज्ञात होता है । अन्य
    लोग यह रहस्य नहीं समझ सकते ।
    कलाद्या दशधा भुक्तिर्ग्रहाणां या पुरोदिता
    क्रमाद्दश गुणैकादिदिन संख्या हताथसा । ८० ।
    ‘ग्रहों की गति कला आदि १० भागों में पहले दी गयी है, इस दैनिक गति
    को क्रमशः १०,१० से गुणा कर दिन संख्या से गुणा करेगें ।
    अन्ततः क्रमषष्ठांशै र्विवरान्त समन्विता
    ततो द्व्र्यादि नन्दान्त गुणिता खरखादिभिः । ८१ ।
    फल को अंतिम स्थान (सबसे छोटे विभाग ) से ६० से भाग देकर शेष को
    वहीं रखेंगे, और भागफल को अगले विभाग की राशि में जोड़ेगे । यही क्रिया
    उस राशि और क्रमशः अगली राशियों में करेंगे । गुणनफल को पुनः २,३,---९
    संख्याओं से गुणा कर ६० से भाग देकर
    विपरादि गृहान्तानां स्वहारै र्विहृता क्रमात्
    फलयुक् शेष संस्थानैः सिद्धं यद् भादि पंचकम् । ८२ ।
    विपरा आदि स्थान में फलों को जोड़ेंगे । यह राशि आदि ५ स्थानों की
    संख्या होगी ।
    तत्कोष्ठकेषु संलेख्यं स संख्या पद काक्षया
    कर्मेद भगणैः खेटा नयनात्सुकरं मतम् । ८३ ।
    इसको कोष्ठक (Column) में लिखकर रखेंगे । इन्हीं संख्याओं को पदक

कहते हैं । भगण के अनुपात से इष्ट सावन दिन का ग्रह निकालने की तुलना में
यह विधि सरल है ।
योक्ता परिधिनैर्मान्द्य शैघ्यः स्पष्टीकृतिः फलैः
भूगोल एव सातुल्या न तु लोकान्त रेष्वपि । ८४ ।
मन्दफल और शीघ्र फल संस्कार से ग्रहों को स्पष्ट करने की विधि पृथ्वी के
लोगों की दृष्टि से ही ठीक है । अन्य ग्रहों से देखने पर वैसी ग्रह स्थिति नहीं
होगी ।
अन्य खेटेषु लोकेषु दृक् सिद्धयै तत् प्रमाणतः
रवि कर्मानुसारेण सोन्नेयो फल वासना । ८५ ।
अन्य ग्रहों के लोगों को जिस स्थिति में ग्रह दिखाई देंगे उसे स्पष्ट करने के
लिए उस ग्रह की दूरी तथा अन्य ग्रहों का रवि कर्ण से साधन करना होगा ।
मन्दफल और शीघ्र फल करने का यही रहस्य है ।
सिद्धान्त शिरोमणौ-भूमेर्मध्ये खलु भवलयस्य मध्यं यतः स्याद्
यस्मिन् वृत्ते भ्रमति खचरो, नास्यं मध्यं कुमध्ये
भूस्थो द्रष्टा नहि भ वलये मध्य तुल्यं प्रपश्येत्
तस्मात्तज्ज्ञैः क्रियत इहतद्दोः फलं मध्यखेटे । इति । ८६ ।
नक्षत्र मण्डल के केन्द्र में भूगोल का केन्द्र है लेकिन वह ग्रह कक्षा का केन्द्र
नहीं है । अतः पृथ्वी की सतह से देखने पर अपने मध्य समान स्थिति में नहीं
दिखायी देगा । अतः ज्ञाता लोग मध्यम ग्रह का भुजफल (मन्द या शीघ्र) संस्कार
कर ग्रह स्पष्ट करते हैं ।
स्फुटीकृतः न भोगानां साक्षात्कर्तु समक्षितौ
साष्टादश कलाद्र्यर्था (५७।१८) स्थूल सूत्रेण शीतगोः । ८७ ।
ग्रहों को स्फुट करने के लिए तथा उनकी वास्तविक स्थिति देखने के लिए
समभूमि के एक अंश की अंगुल परिधि के हिसाब से (५७।१८) अंगुल व्यासार्द्ध
का चन्द्र का कक्षावृत्त बनायेंगे ।
कक्षावृत्तं लिखेदादौ भगणांशांगुलां गितम्
पूर्वोत्तरादि क्रमतो राशि चिह्नान्यजादितः । ८८ ।
कक्षा वृत्त का परिमाण ३६ अंगुल होगा । उसमें मेष आदि १२ राशियों को
पूर्व से उत्तर दिशा की तरफ क्रम से चिह्नित करेगा ।
ह्रस्वान्तद् व्यंगुल व्यासं भूगोल विलिखेद विधोः
मेषादिस्थं स्वमन्दोच्चं कल्पयित्वाल्पदूरगम् । ८९ ।
मध्य में २ अंगुल व्यास का भूगोल बनाय

३७२ सिद्धान्त दर्पण
द्विगुणान्त्यफलज्य (६००) नुसारा दशभिरंगुलै
दूरमन्दोच्च काष्ठायां दद्याद् विन्दुं कुमध्यतः । ९० ।
पृथ्वो केन्द्र से अन्त्यफल ज्या का दो गुणा (६०० कला) के अनुसार दस
अंगुल दूरी पर मन्दोच्च की दिशा में एक बिन्दु देंगे ।
दत्रचक्षिति मध्ये च निश्चलाग्र युगे गुणे
त्रिज्यान्त्य फलशिञ्जिन्योर्वगंयोगपद क्रमात् । ९१ ।
उस विन्दु से भूकेन्द्र तक एक रेखा खींचेगे । त्रिज्या और चन्द्र अन्त्य फल
की ज्या के वर्गों को जोड़कर कर उसका वर्गमूल निकालेंगे ।
द्वैगुण्या द्विकला ध्यार्थ रुद्रां (११५।२) गुल मिते पुनः
हत्वा सूचीं समाकृष्य तत्सूत्रस्य सरद्वयम् । ९२ ।
उसको दो से गुणा कर अंगुल करने के लिए पुनः ६० से भाग दें । फल
(११५।२) अंगुल होगा ।
२ x √त्रिज्या² - चन्द्रान्त्यज्या² = √३४३८ + ३००² x २
= २ x √१,१८,१९,८४४ + ९०,००० = २ x (३४५१।१४)
२ x (३४५१।१४) अंगुल
कला = ————————————————————— = (११५।२) अंगुल
६०
क्रमयोत्परितस्तां चेद्या रेखोत्पद्यते ततः
प्रतिमण्डल नामासौ मन्दोच्च कर्षणाद् भवा । ९३ ।
इतने अंगुल व्यासार्द्ध के वृत्त को प्रतिवृत्त कहा जायेगा (समद्विबाहु की सूइयों
को इतनी दूरी तक तानकर घुमाने में) । यह मन्दोच्च के आकर्षण से होता है ।
कक्षा वृत्त समैवास्यादोजपादान्तयो रसौ
युग्मान्त गेन्दु कक्षायाः षड्विंशति कलाधिका । ९४ ।
प्रतिमण्डल रेखा कक्षा के विषम पदान्त में कक्षा वृत्त से सम्पात् करता है
तथा उसके बराबर होता है । सम पदान्त में चन्द्र कक्षा से २६ कला अधिक होता
है ।
प्राक् पश्चिमान्तरं कक्षा प्रतिमण्डल रेखयोः
चक्रे शरां गुल विश्वलिप्ताशं (५।१३) केन्द्र जेविधोः । ९६ ।
चन्द्र के १२ राशि केन्द्र में कक्षा और प्रतिमण्डल का पूर्व और पश्चिम का
परम अन्तर (५।१३) अंगुल है ।
चक्रार्द्धे विश्व लिप्तो न पञ्चांगुल मितं (४।४७) यतः
स्व संख्यस्य ततो युक्ता तुंगा कर्षण भूरिता । ९७ ।
६ राशि केन्द्र में वही परमान्तर (४।४७) अंगुल होता है, (५' + १३" चक्र के

वासना शेष रहस्य वर्णन ३७३
अन्त में) इस स्थान के निकट उच्च और नीच जनित आकर्षण अधिक होता है ।
अत्रोच्चस्य पुरस्थत्वात् कक्षातः प्रतिमण्डलम्
पूर्वाकृष्ट मतः कक्षा मिथुनान्त स्थितो विधुः । ९८ ।
मन्दोच्च पूर्व में रहने पर प्रतिमण्डल कक्षा से पूर्व की तरफ आकृष्ट होता है
। कक्षा में चन्द्र मिथुन राशि के अन्त में रहने पर
प्रतिमण्डल चापान्ते कक्षा चापान्त गस्त्वयम्
प्रतिवृत्त त्रिराश्यन्ते तिष्ठत्येवं गृहान्तरात् । ९९ ।
प्रतिवृत्त में धनुराशि के अन्त में रहेगा । कक्षा में राशि के अन्त में रहने पर
धनु प्रति वृत्त में मिथुन राशि के अन्त में रहेगा ।
पूर्वाकर्ष वशात्कक्षा सौम्यस्थेऽजादि भार्द्धके
प्रत्यङ्मुखे मध्यगादूनः स्याद्वि स्फुट ग्रहः । १०० ।
ग्रह को उच्च अपनी तरफ (पूर्व दिशा में) खींचने के कारण कक्षा के उत्तर
में स्थित मेष आदि ६ राशियों में स्फुट ग्रह मध्य ग्रह से कम तथा
कक्षामध्यस्थ तौल्यादि भदले प्राङ्मुखे पुनः
मध्यमादधिकः स्पष्टश्चक्रार्द्धयोः समः । १०१ ।
कक्षा के दक्षिण में स्थित तुला आदि ६ राशियों में मध्य ग्रह से स्पष्ट ग्रह
अधिक होता है । मेष और तुला के आदि में स्फुट ग्रह तथा मध्यम ग्रह समान
होते हैं ।
भूमध्याद्रचये द्रेखां मण्डलद्वय भेदिनीम्
स्पष्ट मध्य ग्रहादेकां स्पृष्ट स्पष्टखगां पराम् । १०२ ।
भू केन्द्र से मध्य ग्रह तथा स्फुट ग्रह तक एक-एक रेखा खींचते हैं । ये रेखायें
कक्षा और प्रतिवृत्त दोनों मण्डलों को काटती हुई जायेंगी ।
तयो संज्ञायते यावत् प्रतिवृत्त कलान्तरम् ।
तस्माद् बाहुफलं तिर्यग् द्वितीया यातु रेखिका । १०३ ।
प्रतिवृत्त में इन दोनों रेखाओं के बीच जितना अन्तर (कला आदि में ) होगा
वही मन्द भुजफल है । यह तिर्यक् होता है (मध्य रेखा की दिशा नहीं, उससे
लम्ब दिशा में ) ।
वृत्तयोरन्तरगता तदूर्ध्वे कोटिजं फलम्
दोः कोटि फल वर्गैक्य मूलं या कर्णरेखिका । १०४ ।
दोनों वृत्त के अन्तर में भू केन्द्र से स्पष्ट ग्रह तक रेखा कोटि या कोटिफल
होता है । भुजवर्ग और कोटिवर्ग के योग का वर्गमूल कर्ण रेखा होती है ।

३७४ सिद्धान्त दर्पण
उच्चोन्मुखी भवेत् सैवा कर्षण प्रमितिर्मता
चन्द्रग्रहोक्त कर्णादेः संवादोऽत्रापि चिन्त्यतम् । १०५ ।
यह कर्ण रेखा उच्च की दिशा में होती है । वही उच्च आकर्षण का असल
मान है, जिसको अन्त्यफल या अन्त्यज्या कहते हैं । चन्द्र स्फुट के इस परिलेख
से बिम्ब और कर्ण की दृक् सिद्धि तथा चन्द्र ग्रहण के बारे में भी विचार किया
जा सकता है ।
दृश्यश्चक्रान्त गस्याणु र्बिम्बश्चक्रार्द्ध गस्यतु
पृथुर्बाहु फलाभाव स्तत्र कोटि फलं महत् । १०६ ।
उच्च स्थान के ग्रह का बिम्ब बड़ा होता है । ६ राशि और १२ राशि केन्द्र
(उच्च से दूरी पर) बाहु फल नहीं होता है और कोटिफल सर्वाधिक होता है ।
केन्द्र स्यौज पदान्तस्थ ग्रहस्य मृदुदोः फलम् ।
महत्कोटिफलाभावस्तत्र बिम्ब समोभवेत् । १०७ ।
केन्द्र (उच्च से कोणीय दूरी) ओज पदान्त (विषम पद के अन्त ९०° तथा
२७०° पर) में रहने पर मन्दफल सर्वाधिक तथा कोटिफल शून्य होता है । इन
स्थानों पर ग्रह बिम्ब मध्यम होता है । अर्थात् उच्च और नीच बिम्बों के योग का
आधा होता है ।
चक्रे दूरस्थिते भूमेश्चक्रार्द्धे निकटस्थिते
प्राग् गते न्यूनताधिक्यं भवेत् खेटस्य बिम्बवत् । १०८ ।
उच्च स्थान का ग्रह पृथ्वी से दूर रहने के कारण तथा नीच स्थान पर अति
निकट रहने के कारण उच्च स्थान के ग्रह की पूर्व गति सबसे कम तथा नीच
स्थान पर सबसे अधिक होती है, जिस प्रकार ग्रह का बिम्ब छोटा बड़ा होता है ।
तन्नक्रादौ मन्द केन्द्रे गतेः फल मृणाभिधम्
क कर्यादौ तद् धनं प्रोक्तम् साम्येऽपि गतिवर्त्मनः । १०९
गति समान होने पर भी केन्द्र मकर आदि ३ राशियों में रहने गति फल ऋण
तथा कर्क आदि ६ राशियों में धन होता है ।
सिद्धान्त शिरोमणौ- यथा भवेत्तैलिक यन्त्र मध्ये
काष्ठभ्रमो गोभ्रमतो विलोमः
नीचोच्च वृत्ते भ्रमणं तथा न्यत्
स्याद् गच्छतोऽपि प्रतिमण्डलेन । इति । ११० ।
तेल की घानी में जिस प्रकार बैल की गति की उल्टी दिशा में तेल पेरने
वाले काठ की गति होती है, उसी प्रकार नीच उच्च वृत्तों में भ्रमण करते हुये ग्रह
की गति उच्च से विपरीत दिशा में होती है ।

: wait, is it रवीन्दोः or रवीन्द्वोः?
Look closely:
र (ra)
वी (vee)
न्दोः (ndoḥ) -> wait, is there a व subjoined to न्द?
In line 2: रवीन्द्वौ -> न्द्व has a distinct loop below.
In line 11: under न्द, there is NO व! It is just 'रवीन्दोः'!
Wait, let me look really closely at line 11:
र - वी - न्दोः. Yes, just न्द with o matra and visarga: रवीन्दोः.

Line 12:
अन्तरं यावदेतावद् भवतु स्फुटयो रवि । ११३ ।
Wait, is there visarga on रवि?
Look at "रवि": र - वि . There is no visarga. It is just "रवि । ११३ ।".

Line 13:
दोनों स्थानों (उच्च से ९०° तथा २७०° पर) पर प्रतिवृत्त सामान्य वक्र होने

Line 14:
के कारण भूकेन्द्र से मध्यम रवि या चन्द्र की दूरता स्पष्ट रवि या चन्द्र दूरता के

Line 15:
ही बराबर होगी ।

Line 16:
तत्रार्केन्द्वोर्मध्यकर्णौ (७६०८२९४।४८७०५)
Wait, let's look at the first word:
त - त्रा -

३७६ सिद्धान्त दर्पण
तत्रानुलोमगं केन्द्र शीघ्रं तुंगस्य यद् गतिः
बहो मध्य गते भुक्तिः स्फुटा स्याद्भोः फलक्रमात् । ११७ ।
प्रतिमण्डल में शीघ्र केन्द्र को उल्टी दिशा में देंगे । शीघ्रोच्च की गति ग्रह
की मध्य गति से बहुत अधिक है । अतः शीघ्र फल के अनुसार ही स्फुट ग्रह
की गति होनी चाहिये । ग्रह का शीघ्र फल संस्कार करने से जिस प्रकार स्फुट
ग्रह होता है, उसी प्रकार गति में शीघ्र गतिफल का संस्कार करने से स्फुट गति
होती है ।
चक्रार्द्धे तत् समीपे च प्राग् गतेः सूर्यतो यतः
बहुगत्येर्ज्ञ सितयोः सूर्य भूमध्य संस्थितिः । ११८ ।
नीच स्थान में या उसके निकट के सूर्य की पूर्व गति से अधिक गतिशील
बुध और शुक्र की स्थिति सूर्य और पृथ्वी के बीच में होने के कारण उनकी वक्र
गति दीखती है ।
ततो वक्रागतिर्दृश्या भौमेज्यार्क भुवां पुनः
भास्वतो भिन्न दिक् स्थानान् मन्दगानां तथैव सा । ११९ ।
पुनः सूर्य से मन्द गतिवाले और पृथ्वी से सूर्य की भिन्न दिशा में स्थित
(सूर्य से भूगोल की दिशा में स्थित) मंगल, गुरु और शनि की चक्रार्द्ध में अर्थात्
पृथ्वी के निकट (नीच स्थान, या उसके पास) वक्र गति दीखती है ।
विस्तरेणोच्यते वक्रा वक्रा भुक्तिः सवासना,
कर्णयोजन संख्या या अंगुलत्वजुषः क्षितौ । १२० ।
अब युक्तिके साथ मार्गी और वक्री गति के बारे में विस्तार से कहा जा रहा
है। रवि का मध्यम कर्ण योजन के अनुपात अनुसार अंगुल मान की सम भूमि पर
कक्षा बनायेंगे ।
त्रयोदशा युतांशेन गजार्थ (५८) ङ्गुलकेन हि
सूत्रेण रचये वृत्तं रविकक्षेति सम्मतम् । १२१ ।
रवि के मध्यमकर्ण ७६,०८,२९४ का १३,००० वां भाग प्रायः ५८ होगा इसे
अंगुल मान कर (कक्षा योजन में है, १ अंगुल = १३,००० योजन) उतने व्यासार्द्ध
की रवि कक्षा बनायेंगे ।
मध्येन्यस्य महीबिन्दुं मध्यार्कं तस्य पश्चिमे
सप्ताशीत्य (८७) ङ्गुलेनैव कक्षा तत् परितोऽसृजः । १२२ ।
इस कक्षा के मध्य बिन्दु में पृथ्वी बिन्दु देकर उसके चारों तरफ मंगल कक्षा
८७ अंगुल व्यासार्द्ध (यहां भी १ अंगुल = १३,००० योजन) का बनायेंगे ।

वासना शेष रहस्य वर्णन ३७७
प्राग् भागे निजकक्षायां न्यसेद् बिम्बं महीभुवः
सूर्य भूमंगलस्यूत सूत्राग्रे बहु दूरतः । १२३ ।
इस कक्षा की पूर्व दिशा में मंगल को रखेंगे । पृथ्वी, रवि और मंगल के
केन्द्र से एक रेखा खींचकर बहुत दूर में
प्रकल्पां तारकां काञ्चित् प्राच्यं कौतत्समं कुजम्
दृष्ट्वा चक्राङ्कगं याम्य भाग मूर्ध्वं विचार्य च । १२४ ।
पूर्व दिशा में एक तारा की कल्पना कर उसे रखेंगे । पृथ्वी के अति निकट
में मंगल रखकर उसे उसी तारा की दिशा में रखेंगे । यह कक्षा के दक्षिण भाग
में होगा और इस भाग को ऊर्ध्व मानकर
मध्यार्कं दक्षिणं नीत्वा हर्गंत्यां गुल मानया
तथा भौमं सकक्षञ्च सार्धा (५) शोनांगुलात्मना (४८) । १२५ ।
दैनिक एक अंगुल गति से मध्यम रवि को दक्षिण भाग की तरफ चलायेंगे ।
कक्षा सहित मंगल को ४८ अंगुल गति से
स्वगत्यो तरणं कुर्यात्तारा सूत्रात् सयाम्यगः ।
षष्ठ्यंशकै र्द्वादशभ (१२) दृश्यतेऽन्तरितः स्फुटः । १२६ ।
उत्तर दिशा में चलायेंगे । ऐसा करने से स्फुट मंगल तारा सूत्र से १२ षष्ठ
यंश कला दक्षिण दिशा में खिसकेगा ।
भूमि सूर्यान्तराद्धं यद् भूमि भौमान्तर श्रवः
ततः सिद्ध कला दृश्या साक्षाद् वक्रा गति र्भुवि । १२७ ।
पृथ्वी से मंगल कर्ण (दूरी) सूर्य कर्ण दूरी या अन्तर का आधा होगा और
पृथ्वी से मंगल की वक्र गति २४ कला (१२ कला की दूनी) दीखेगी ।
चक्रे कुजार्कयोरेक दिङ् गतिर्नग दिक् (१०७) कला
भौमयाम्य गतिः सूर्य कर्ण (५८) घ्नी निजकर्म (१४५) हृत् । १२८ ।
उद्य स्थान से रवि और मंगल की एक दिशा में स्थिति के कारण १०७ कला
मंगल दक्षिण गति को सूर्य कर्ण (५८) से गुणा कर अपने कर्ण १४५ (सूर्य कक्षा
व्यासार्द्ध ५८ मंगल कक्षा व्यासार्द्ध ८७) से भाग देने पर (१०७ x ५८)/१४५ =
४३)।
रामाब्धि (४३) कलिका साक्षाद् ऋज्यो भवति तद् गतिः
इत्थमन्य ग्रहाणाञ्च द्रष्टव्या विविधा बुधैः । १२९ ।
४३ कला मंगल की मार्गी गति होगी । यह उक्त चित्र में स्पष्ट प्राप्त होता है।
इसी प्रकार उदाहरणों से अन्य ग्रहों की भी मार्गी और वक्री गति प्रत्यक्ष देखी जा
सकती है ।