सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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उच्चोन्मुखी भवेत् सैवा कर्षण प्रमितिर्मता
चन्द्रग्रहोक्त कर्णादेः संवादोऽत्रापि चिन्त्यतम् । १०५ ।
यह कर्ण रेखा उच्च की दिशा में होती है । वही उच्च आकर्षण का असल
मान है, जिसको अन्त्यफल या अन्त्यज्या कहते हैं । चन्द्र स्फुट के इस परिलेख
से बिम्ब और कर्ण की दृक् सिद्धि तथा चन्द्र ग्रहण के बारे में भी विचार किया
जा सकता है ।
दृश्यश्चक्रान्त गस्याणु र्बिम्बश्चक्रार्द्ध गस्यतु
पृथुर्बाहु फलाभाव स्तत्र कोटि फलं महत् । १०६ ।
उच्च स्थान के ग्रह का बिम्ब बड़ा होता है । ६ राशि और १२ राशि केन्द्र
(उच्च से दूरी पर) बाहु फल नहीं होता है और कोटिफल सर्वाधिक होता है ।
केन्द्र स्यौज पदान्तस्थ ग्रहस्य मृदुदोः फलम् ।
महत्कोटिफलाभावस्तत्र बिम्ब समोभवेत् । १०७ ।
केन्द्र (उच्च से कोणीय दूरी) ओज पदान्त (विषम पद के अन्त ९०° तथा
२७०° पर) में रहने पर मन्दफल सर्वाधिक तथा कोटिफल शून्य होता है । इन
स्थानों पर ग्रह बिम्ब मध्यम होता है । अर्थात् उच्च और नीच बिम्बों के योग का
आधा होता है ।
चक्रे दूरस्थिते भूमेश्चक्रार्द्धे निकटस्थिते
प्राग् गते न्यूनताधिक्यं भवेत् खेटस्य बिम्बवत् । १०८ ।
उच्च स्थान का ग्रह पृथ्वी से दूर रहने के कारण तथा नीच स्थान पर अति
निकट रहने के कारण उच्च स्थान के ग्रह की पूर्व गति सबसे कम तथा नीच
स्थान पर सबसे अधिक होती है, जिस प्रकार ग्रह का बिम्ब छोटा बड़ा होता है ।
तन्नक्रादौ मन्द केन्द्रे गतेः फल मृणाभिधम्
क कर्यादौ तद् धनं प्रोक्तम् साम्येऽपि गतिवर्त्मनः । १०९
गति समान होने पर भी केन्द्र मकर आदि ३ राशियों में रहने गति फल ऋण
तथा कर्क आदि ६ राशियों में धन होता है ।
सिद्धान्त शिरोमणौ- यथा भवेत्तैलिक यन्त्र मध्ये
काष्ठभ्रमो गोभ्रमतो विलोमः
नीचोच्च वृत्ते भ्रमणं तथा न्यत्
स्याद् गच्छतोऽपि प्रतिमण्डलेन । इति । ११० ।
तेल की घानी में जिस प्रकार बैल की गति की उल्टी दिशा में तेल पेरने
वाले काठ की गति होती है, उसी प्रकार नीच उच्च वृत्तों में भ्रमण करते हुये ग्रह
की गति उच्च से विपरीत दिशा में होती है ।