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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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३७२ सिद्धान्त दर्पण
द्विगुणान्त्यफलज्य (६००) नुसारा दशभिरंगुलै
दूरमन्दोच्च काष्ठायां दद्याद् विन्दुं कुमध्यतः । ९० ।
पृथ्वो केन्द्र से अन्त्यफल ज्या का दो गुणा (६०० कला) के अनुसार दस
अंगुल दूरी पर मन्दोच्च की दिशा में एक बिन्दु देंगे ।
दत्रचक्षिति मध्ये च निश्चलाग्र युगे गुणे
त्रिज्यान्त्य फलशिञ्जिन्योर्वगंयोगपद क्रमात् । ९१ ।
उस विन्दु से भूकेन्द्र तक एक रेखा खींचेगे । त्रिज्या और चन्द्र अन्त्य फल
की ज्या के वर्गों को जोड़कर कर उसका वर्गमूल निकालेंगे ।
द्वैगुण्या द्विकला ध्यार्थ रुद्रां (११५।२) गुल मिते पुनः
हत्वा सूचीं समाकृष्य तत्सूत्रस्य सरद्वयम् । ९२ ।
उसको दो से गुणा कर अंगुल करने के लिए पुनः ६० से भाग दें । फल
(११५।२) अंगुल होगा ।
२ x √त्रिज्या² - चन्द्रान्त्यज्या² = √३४३८ + ३००² x २
= २ x √१,१८,१९,८४४ + ९०,००० = २ x (३४५१।१४)
२ x (३४५१।१४) अंगुल
कला = ————————————————————— = (११५।२) अंगुल
६०
क्रमयोत्परितस्तां चेद्या रेखोत्पद्यते ततः
प्रतिमण्डल नामासौ मन्दोच्च कर्षणाद् भवा । ९३ ।
इतने अंगुल व्यासार्द्ध के वृत्त को प्रतिवृत्त कहा जायेगा (समद्विबाहु की सूइयों
को इतनी दूरी तक तानकर घुमाने में) । यह मन्दोच्च के आकर्षण से होता है ।
कक्षा वृत्त समैवास्यादोजपादान्तयो रसौ
युग्मान्त गेन्दु कक्षायाः षड्विंशति कलाधिका । ९४ ।
प्रतिमण्डल रेखा कक्षा के विषम पदान्त में कक्षा वृत्त से सम्पात् करता है
तथा उसके बराबर होता है । सम पदान्त में चन्द्र कक्षा से २६ कला अधिक होता
है ।
प्राक् पश्चिमान्तरं कक्षा प्रतिमण्डल रेखयोः
चक्रे शरां गुल विश्वलिप्ताशं (५।१३) केन्द्र जेविधोः । ९६ ।
चन्द्र के १२ राशि केन्द्र में कक्षा और प्रतिमण्डल का पूर्व और पश्चिम का
परम अन्तर (५।१३) अंगुल है ।
चक्रार्द्धे विश्व लिप्तो न पञ्चांगुल मितं (४।४७) यतः
स्व संख्यस्य ततो युक्ता तुंगा कर्षण भूरिता । ९७ ।
६ राशि केन्द्र में वही परमान्तर (४।४७) अंगुल होता है, (५' + १३" चक्र के