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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 473

३७६ सिद्धान्त दर्पण
तत्रानुलोमगं केन्द्र शीघ्रं तुंगस्य यद् गतिः
बहो मध्य गते भुक्तिः स्फुटा स्याद्भोः फलक्रमात् । ११७ ।
प्रतिमण्डल में शीघ्र केन्द्र को उल्टी दिशा में देंगे । शीघ्रोच्च की गति ग्रह
की मध्य गति से बहुत अधिक है । अतः शीघ्र फल के अनुसार ही स्फुट ग्रह
की गति होनी चाहिये । ग्रह का शीघ्र फल संस्कार करने से जिस प्रकार स्फुट
ग्रह होता है, उसी प्रकार गति में शीघ्र गतिफल का संस्कार करने से स्फुट गति
होती है ।
चक्रार्द्धे तत् समीपे च प्राग् गतेः सूर्यतो यतः
बहुगत्येर्ज्ञ सितयोः सूर्य भूमध्य संस्थितिः । ११८ ।
नीच स्थान में या उसके निकट के सूर्य की पूर्व गति से अधिक गतिशील
बुध और शुक्र की स्थिति सूर्य और पृथ्वी के बीच में होने के कारण उनकी वक्र
गति दीखती है ।
ततो वक्रागतिर्दृश्या भौमेज्यार्क भुवां पुनः
भास्वतो भिन्न दिक् स्थानान् मन्दगानां तथैव सा । ११९ ।
पुनः सूर्य से मन्द गतिवाले और पृथ्वी से सूर्य की भिन्न दिशा में स्थित
(सूर्य से भूगोल की दिशा में स्थित) मंगल, गुरु और शनि की चक्रार्द्ध में अर्थात्
पृथ्वी के निकट (नीच स्थान, या उसके पास) वक्र गति दीखती है ।
विस्तरेणोच्यते वक्रा वक्रा भुक्तिः सवासना,
कर्णयोजन संख्या या अंगुलत्वजुषः क्षितौ । १२० ।
अब युक्तिके साथ मार्गी और वक्री गति के बारे में विस्तार से कहा जा रहा
है। रवि का मध्यम कर्ण योजन के अनुपात अनुसार अंगुल मान की सम भूमि पर
कक्षा बनायेंगे ।
त्रयोदशा युतांशेन गजार्थ (५८) ङ्गुलकेन हि
सूत्रेण रचये वृत्तं रविकक्षेति सम्मतम् । १२१ ।
रवि के मध्यमकर्ण ७६,०८,२९४ का १३,००० वां भाग प्रायः ५८ होगा इसे
अंगुल मान कर (कक्षा योजन में है, १ अंगुल = १३,००० योजन) उतने व्यासार्द्ध
की रवि कक्षा बनायेंगे ।
मध्येन्यस्य महीबिन्दुं मध्यार्कं तस्य पश्चिमे
सप्ताशीत्य (८७) ङ्गुलेनैव कक्षा तत् परितोऽसृजः । १२२ ।
इस कक्षा के मध्य बिन्दु में पृथ्वी बिन्दु देकर उसके चारों तरफ मंगल कक्षा
८७ अंगुल व्यासार्द्ध (यहां भी १ अंगुल = १३,००० योजन) का बनायेंगे ।