सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
त्रिप्रश्नाधिकारः ११३
छाया से सूर्य (स्पष्ट) लाने की विधि कहता हूँ। अपने देश का जो पलांश
(विषुव छाया है) उसी दिशा में मध्यान्ह सूर्य की छाया (नतांश) हो तो दोनों
(पलांश और नतांश) का अन्तर करते हैं।
दिग् भेदे इत्युति क्रान्तिस्तज्ज्या त्रिगुण (३४३८) ताड़िता
परमापक्रम ज्या (१३७७)प्ता भुजज्यास्या धनुः कलाः । २९ ।
दिशा भिन्न होने पर पलांश, और नतांश को जोड़कर सूर्य कान्ति निकालेंगे।
क्रान्ति की ज्या को त्रिज्या (३४३८) से गुणा कर परम क्रान्ति ज्या (१३७०) से
भाग देकर सूर्य का भुजज्या निकालेंगे। भुजज्या का चाप कला में निकालेंगे।
ग्राह्यास्ताः सायने ऽजादौ कर्यादौ भार्द्धतश्च्युता
तुलादौ भार्द्ध संयुक्ताश्चक्रादूनां मृगादिके । ३० ।
यह भुजांरा (भुज चाप कला) प्रथम पाद (मेषादि ३ राशि में) रहने पर वही
उस समय का सूर्य है। द्वितीय पाद (कर्क आदि ३ राशि) में रहने पर ६ राशि
से घटायेंगे, तृतीय पाद (तुला आदि ३ राशि) में रहने पर उसे ६ राशि में जोड़ेंगे
तथा चतुर्थ पाद (मकर आदि २ राशि में ) में रहने पर १२ राशि से घटायेगे।
ततो ऽयनांश लिप्ताद्यै वैपरीत्येन संस्कृताः
भवन्ति स्व दिनार्द्धार्क भुक्त स्फुट गृहादयः । ३१ ।
इस सायन रवि में विपरीत भाव से अयनांश संस्कार करने से (नक्षत्र का
आदि बिन्दु मेष ०° वसन्त क्रान्ति पात से आगे रहने पर अयनांश घटायेंगे) निरयन
मेष से स्फुट सूर्य राशि आदि मालूम होगी।
स्फुटाकर्कोनात् स्वमन्दो ज्ञात् फलं वामं स्फुटे रवौ
असकृद्धन हीनञ्चेत् स्यान्मध्यार्कः स्थिरत्व भाक् । ३२ ।
इस स्फुट रवि को अपने मन्दोच्च से घटाकर जो मन्द फल होगा उससे विपरीत
प्रकार से स्फुट रवि को संस्कार करने पर (मध्य) रवि आयेगा। बार बार क्रिया
करने पर मध्य रवि का मान स्थिर (ज्यादा शुद्ध) होगा।
सूर्य सिद्धान्तेः-स्वाक्षार्का पक्रम युतिर्दिक् साम्येऽन्तरमन्यया
स्यु र्नतांशारवेस्तेभ्यः साध्ये दोः कोटि मौर्विके । ३३ । इति
सूर्य सिद्धान्त से-मध्यान्ह काल की छाया और छाया कर्ण जानना (सूर्य की
क्रान्ति और अक्षांश से)- अपने स्थान का अक्षांश और मध्याह्न कालिक सूर्य की
क्रान्ति एक दिशा में हो तो जोड़ दें। और भिन्न दिशा में हो तो घटायें। यह
सूर्य का मध्यान्ह कालिक नतांश होगा। इसकी भुजज्या और कोटिज्या बनायें।
शंकुमानांगुलाभ्यस्ते दोर्ज्या त्रिज्ये यथाक्रमम् ।
कोटिज्यया विभज्यासौ छायाकर्णा वहर्दले । ३४ ।
शंकु के अंगुलात्मक मान (१२) को भुज (नतांश की भुजज्या) से गुणा कर
११४ सिद्धान्त दर्पण
कोटिज्ज्या से भाग देने पर मध्याह्न की छाया तथा शंकु को त्रिज्या से गुणा कर
कोटिज्ज्या से भाग देने पर मध्याह्न का छाया कर्ण ज्ञात होगा।
उन्मण्डलस्य खेटस्य क्रान्त्योरुत्तर याम्ययोः
क्षितिजोर्ध्वाधर स्थानो भवत्युद् वृत्तजोतरः । ३५ ।
उन्मण्डल पूर्व पश्चिम और उत्तर दक्षिण आकाशीय ध्रुवों से जाता वृहत् वृत्त
है जो निरक्ष (विषुव रेखा) पर क्षितिज होता है। उन्मण्डल का उत्तरी भाग उत्तरी
गोलार्द्ध (जैसे भारत) के क्षितिज वृत्त के ऊपर रहता है। उन्मण्डल के शंकु
(विषुवत वृत्त पर शंकु) दक्षिण क्रान्ति होने पर ऊपरी भाग में रहता है। (ग्रह की
स्थिति से उन्मण्डल पर लम्ब की लम्बाई को उन्मण्डल शंकु कहते हैं।
विषुवद् भापमज्याघ्नी कर्णा मोद् वृत्तना भवेत्
त्रिज्योन्मण्डल शंकुघ्नी चरज्या सच यष्टिका । ३६ ।
पलभा x क्रान्तिज्या
---------------- = उन्मण्डल शंकु ।
पलकर्ण
उन्मण्डल शंकु x त्रिज्या
--------------------- = यष्टि (भूकेन्द्र से ध्रुव की दिशा में
चरज्या पलभा की लम्बाई)
यष्टि रुद् वृत्त शंक्वाढ्या तदूनोत्तर याम्ययोः
गोलयो क्रमशः शंकुर्भवति स्वदिनार्द्धजः । ३७ ।
उत्तर या दक्षिण गोल में इस यष्टि में उन्मण्डल में जोड़ने या घटाने से मध्याह्न
शंकु अपने स्थान का होता है।
अथवा वक्षमाणान्त्य गुणितोद् वृत्त शंकुना
चरज्याप्ता भवेत् शंकु रुदग् दक्षिण काष्ठयोः । ३८ ।
अथवा अन्त्या (बाद में कही गयी) को उनमण्डल शंकु से गुणा कर चरज्या
से भाग देने पर मध्याह्न शंकु का मान निकलता है।
सूर्य सिद्धान्ते-नतांश भुज् कोटिज्ये दृग्ज्या शंकुज्यके मते ।
क्रान्तिज्या विषुवत् कर्ण हताप्ता शंकुजीवया । इति । ३९ ।
नतांश की ज्या और कोटिज्ज्या को क्रमशः दृग्ज्या तथा शंकुज्या कहते हैं।
क्रान्तिज्या को विषुवत छाया कर्ण (पल कर्ण) से गुणा कर शंकु (१२) से भाग
देने पर -
अग्रा माध्याह्निकी सैव सौम्य याम्या पमानुगा
स्वेष्ट कर्ण हता मध्यकर्णाप्ता ग्रिष्ट कालिकाः । ४० ।
मध्याह्न अग्रा होती है। क्रान्ति की दिशा के अनुसार यह दक्षिण या उत्तर
होती है। (दक्षिण क्रान्ति का दक्षिण के अनुसार मध्यान्ह अग्रा) मध्याग्रा को इष्ट
त्रिप्रश्नाधिकारः ११९
छाया कर्ण) से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर कर्ण वृत्ताग्रा होती है।
(मध्याह्न के अतिरिक्त दूसरे समय की)
किं वा मध्येष्टं कर्णा भ्यां क्रान्तिज्या गुणिता पृथक् ।
लम्ब ज्याप्ता च मध्याग्रा स्वेष्टाग्रा भवति क्रमात् । ४१ ।
अथवा क्रान्ति ज्या को अलग अलग स्थानों पर रख कर त्रिज्या (३४३८)
और इष्ट छायाकर्ण से अलग अलग गुणा कर दोनों जगह लम्बज्या से भाग देने
पर क्रमशः मध्याग्रा और कर्ण वृत्ताग्रा (इष्ट समयको) होती है ।
चलांश संस्कृते भानौ मेषादौ गोल उत्तरः
तुलादौ संस्थिते याम्यः पुरोक्तोऽप्यत्र कार्यतः । ४२ ।
सायन रवि मेषादि ६ राशियों में रहने पर उत्तर गोल तथा तुला आदि ६
राशि में रहने पर दक्षिण गोल में होता है।
सौम्य गोले यदार्काग्रा विषुवच्छायातोऽधिका
तत्तयोरन्तरं याम्य भुजः स्याच्छंकु मूलतः । ४३ ।
सूर्य उत्तर गोल में रहने पर कर्ण तृतीय अग्रा यदि विषुवत छाया से अधिक
हो तो दोनों का अन्तर दक्षिण बाहु होगा (यह दिनार्द्ध में १२ अंगुल शंकु के मूल
के दक्षिण होगा ) ।
न्यूना चेदन्तरं सौम्या बाहूर्याम्ये तु गोल के
अक्ष प्रभाग्रयो र्योगः सौम्योबाहु र्दिनार्धजः । ४४ ।
उत्तर गोल में सूर्य रहने पर जब कर्ण वृत्तीय अग्रा विषुवत् छाया से कम हो
तो इसको पलभा से घटाने पर भुज होगा तथा यह १२ अंगुल शंकु मूल से उत्तर
की तरफ होगा । सूर्य दक्षिण गोल में रहने पर पल भा और कर्ण वृत्ताग्रा का
हमेशा योग होता है और यह बाहु उत्तर दिशा में होता है । (यह पृथ्वी के उत्तरी
गोलार्द्ध के देशों जैसे भारत के लिए नियम है ।
सममण्डल रेखायां यदा विशति शंकुभा
तदा भार्कर्ण कालाः स्युः सममण्डलजा इति । ४५ ।
यदि शंकु छाया सममण्डल रेखा (पूर्वा पर रेखा) पर पड़े तो छाया, छायाकर्ण
तथा काल (काल सूचक सूर्य का क्षितिज से उन्नत या उर्ध्वाधर से नत कोण)
सभी सममण्डल में होते हैं । इस समय सूर्य की क्रांति अपने स्थान के अक्षांश
के बराबर होती है) ।
सममण्डलं भा न स्या द्ववो दक्षिण गोलगे
अक्षाधिकेऽपमे सौम्ये न स्यात् तत्राल्पके भवेत् । ४६ ।
सूर्य की उत्तर क्रांति अपने अक्षांश से (पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध के स्थानों
जैसे भारत के लिए) अधिक होने पर छाया हमेशा सममण्डल से दक्षिण होती
११६ सिद्धान्त दर्पण
है । सूर्य की उत्तर क्रांति अक्षांश से कम या सूर्य दक्षिण गोलार्द्ध में रहने पर
छाया सममण्डल से उत्तर होती है ।
१. छाया सममण्डल (पूर्व पश्चिम रेखा) पर-सूर्य क्रान्ति अक्षांश के बराबर
२. छाया सममण्डल से दक्षिण-सूर्य क्रांति अक्षांश से अधिक । क्रान्ति और
अक्षांश दोनों उत्तर)
३. छाया सम मण्डल से उत्तर-सूर्य दक्षिण अक्षांश ।
लम्बज्या विषुवद् भघ्नी सौम्य क्रान्ति ज्योद् धृता
सममण्डल कर्णः स्यात् किं वाक्षज्यार्क (१२) ताड़िता । ४७ ।
सम मण्डलीय छाया कर्ण निकालने के लिए पलभा में लम्बज्या से गुणा
कर उत्तर क्रान्ति ज्या से भाग देते हैं । अथवा अक्षज्या में १२ से गुणा कर (अक्षांश
की ज्या) - - -
तत्क्रान्ति ज्योद् धृता किं वा दिनार्द्ध श्रवणा हता
अक्षप्रभा दिनार्द्धोग्रा हता कर्णः स एव हि । ४८ ।
उत्तर क्रान्ति की ज्या से भाग देते हैं । अथवा (सममण्डलीय छाया कर्ण
निकालने के लिए) पलभा में दिनार्द्ध (छाया सममण्डल में होने पर यह शंकु के
बराबर होगा ।) से गुणा कर दिनार्द्ध कालीन कर्ण-वृत्ताग्रा से भाग देते हैं । (दिनार्द्ध
कालीन छाया का अग्र विषुव छाया अग्र से जितना उत्तर या दक्षिण है उसे कर्ण
वृत्ताग्रा कहते हैं)
अक्ष कर्ण हृता सौम्य क्रान्ति ज्याक्ष प्रभो द् धृता
सममण्डल शंकुः स्यात् त्रिज्यावर्ग (११८१९८४४) जान्तरात् । ४९ ।
अक्षकर्ण (पल कर्ण) में उत्तर (सांम्य) क्रान्ति की ज्या से गुणा कर पल भा
(अक्षप्रभा) से भाग देने पर सममण्डल शंकु आता है । सममण्डल शंकु के वर्ग
को त्रिज्या वर्ग (१,१८,१९ ,८४४) से घटा कर
मूलं दृग् ज्या रविघ्ना सा शंकुभक्त भवेद् प्रभा
त्रिज्या सूर्य हतातेन (सममण्डल शंकुना) भक्ता प्रागु दिता श्रुताः ।५० ।
वर्गमूल निकालने पर दृग्ज्या निकलती है । दृग्ज्या में १२ से गुणा कर
(सममण्डल) शंकु से भाग देने पर सममण्डल छाया निकलती हैं । त्रिज्या में १२
से गुणा कर उससे ( सममण्डल शंकु से) भाग देने पर सममण्डल कर्ण होता
है ।
सारांश-सममण्डल छाया कर्ण = पलभा x लम्बज्या
——————————————
उत्तर क्रान्ति की ज्या
उत्तर अक्षांश की ज्या x १२ पल भा x दिनार्द्ध कर्ण
= —————————————————————————— = —————————————————————————
उत्तर क्रान्ति की ज्या दिनार्द्ध कालीन कर्णवृत्ताग्रा
त्रिप्रश्नाधिकारः ११७
उत्तर क्रान्ति की ज्या x पल कर्ण
सममण्डल शंकु = ----------------------------------------
पलभा
दृग्ज्या = √ त्रिज्या² - सममण्डल शंकु²
दृग् ज्या x १२
सममण्डल छाया = ------------------
सममण्डल शंकु
त्रिज्या x १२
सममण्डल कर्ण = ------------------
सममण्डल शंकु
सूर्य सिद्धान्ते -स शंकुः स्वाक्ष जीवाघ्नः
परक्रान्ति ज्या (१३७०) हृतः । इति ।
फलं छायार्क बाहुज्या तद् धनुर्भुज केन्द्रकम् । ५१ ।
सममण्डल शंकु x अक्षांश की ज्या
----------------------------------------- = सायन रविभुज ज्या
परम क्रान्ति की ज्या (१३७०)
ततः पूर्व वदानेयौ छायार्क स्फुट भास्करौ
अथोच्यते कोण शंकोः सिद्धयेऽग्रज्यकादिकम् । ५२ ।
सायन रवि भुजज्या से पहले की तरह चाप (कोण) निकाल कर स्पष्ट रवि*
(सायन) निकाला जा सकता है । अब कोण शंकु निकालने के लिए अग्रज्या
आदि के बारे में कहा जाता है । ( उत्तर दक्षिण से ४५° पूर्व या पश्चिम ४ बिन्दुओं
को कोण कहते हैं । कोण वृत्त २ होने पर भी ४ माने जाते हैं ।
सूर्य सिद्धान्ते-स्वक्रान्तिज्या त्रिजीवा (३४३८) घ्नी लम्ब ज्याप्ताग्रमौर्विका
स्वेष्ट कर्णहता भक्ति त्रिज्य याग्रांगुलात्मिका । ५३ । इति ।
क्रान्ति ज्या x त्रिज्या
मध्य अग्रा = -----------------------
लम्बज्या
मध्य अग्रा x इष्ट कर्ण
कर्ण वृत्ताग्रा = ------------------------
त्रिज्या
खमध्यात् कोण रेखास्थ सूर्यात् क्षितिज गामिनी
कोटिज्या कोण शंकुत्वेनोच्यते तद् विलोमगा । ५४ ।
ख मध्य (zenith) से क्षितिज के कोणीय बिन्दुओं के वृत्त (कोण वृत्त) पर*
जब सूर्य आता है तब सूर्य से क्षितिज वृत्त पर लम्ब को कोण शंकु कहते हैं ।
उस समय ख स्वस्तिक से रवि तक का कोण वृत्त का अंश सूर्य का नतांश या
क्षितिज से रवि तक का वृत्तांश उन्नतांश है । इस उन्नतांश की ज्या या नतांश
की कोटिज्या कोण शंकु का मान होता है ।
या विदिक् तत्र या छाया कोण छायेति सा मता
सौम्या पमे स्वाक्ष समे न स्यातां कोण शंकु मे । ५५ ।
सूर्य के विपरीत दिशा में १२ अंगुल शंकु की उस समय (सूर्य के कोणवृत्त
११८ सिद्धान्त दर्पण
पर रहने के समय) जो छाया हो उसे कोण छाया कहते हैं। अपने (उत्तर) अक्षांश
के समान सूर्य की उत्तर क्रान्ति होने पर कोण शंकु की छाया नहीं होती ।
यदि मध्याह्न गो भानु र्दक्षिण स्यां ततस्तदा
कोण शंकु स्तदाग्नेयां नैऋत्यां प्राक् पराह्वयोः । ५६ ।
यदि मध्याह्न सूर्य दक्षिण नत होता है तो पूर्वाह्न कोण शंकु को आग्नेय (पूर्व
दक्षिण कोण) तथा अपराह्न कोण शंकु को नैऋत्य (पश्चिम दक्षिण कोण) शंकु
कहते हैं ।
स न तश्चेदुत्तरस्यां तदेशानमरुद्दिशाः ।
कोण शंकुप्रभाकर्णैः कोणारूयं साध्यता नतम् । ५७ ।
मध्याह्न सूर्य उत्तर नत होने पर पूर्वाह्न तथा अपराह्न के कोणों को क्रमशः
ईशान और वायव्य कोण शंकु कहा जाता है । यह जानने पर कोण वृत्तीय शंकु
की छाया और कर्ण की सहायता से कोण वृत्तीय नतांश निकाला जा सकता है ।
त्रिज्या वर्गाद्धंतो (५९,०९,९,९२२) ऽग्रज्या वर्गोनात् कृत वज्वभि (१४४)
निघ्ना वर्गदल (७२) युक् पलभा वर्ग भाजितात् । ५८ ।
त्रिज्यावर्ग के आधे से अग्रज्या वर्ग घटा कर शंकु (१२) के वर्ग से गुणा करें
तथा फल को शंकु (१२) वर्ग के आधे और पल भा वर्ग के योग से भाग दें ।
लब्धं तत्करणी नाम कर्म भूमौ निधायताम्
पुनर ग्रज्य कार्क (१२) घ्न विषुवच्छायाताड़िता । ५९ ।
प्राप्त लब्धि (फल) को करणी कहा जाता है । उसे अलग रखें पुनः अग्रज्या
को १२ और पल-भा से गुणा कर
द्व्यद्रयाप्ते (७२) द्ये नाक्षभा वर्गे णोद्धताक्ष फलं भवेत्
तद् वर्ग करणी योगात् मूलं अक्षफलो नयुक् । ६० ।
उसे पलभावर्ग और ७२ के भोग से भाग देते हैं । राशि को फल या अक्षफल
कहते हैं । अक्षफल का वर्ग करणी में जोड़कर उसका वर्गमूल निकालने पर जो
आता है उसे मूल कहते हैं । मूल को अक्षफल में जोड़ते या घटाते हैं ।
क्रमतः कोण शंकुः स्याद्दक्षिणोत्तर गोलयोः
सूर्यसिद्धान्ते-तत्रिज्या वर्ग विश्लेषान्मूलं दृग्ज्या भिधीयते । ६१ ।
यदि कोण शंकु उत्तर या दक्षिण गोल (पूर्वा पर रेखा से) में हो, (सूर्य सिद्धान्त
के अनुसार) त्रिज्या वर्ग से कोण शंकु का वर्ग घटाकर वर्गमूल निकालने से
दृग्ज्या ( कोणशंकुज्या ) आती है ।
सारांश - करणी = १२² (त्रिज्या²/२ - अग्रज्या²) / (१२²/२ + पलभा²)
त्रिप्रश्नाधिकारः ११९
अक्षफल या फल = (अग्रज्या x १२ x पलभा) / (७२ + पलभा²)
मूल = √(करणी + अक्षफल²)
कोण शंकु = अक्षफल ± मूल (पूर्वा पर रेखा से सूर्य उत्तर होने पर योग नहीं तो घटावे)
स्वशंकुता विभज्याप्ते दृक् त्रिज्ये द्वादश हते
छाया कर्णे तु कोणेषु यथा स्वं देशकालयोः । इति । ६२ ।
कोण छाया = (दृग् ज्या x १२) / कोण शंकु,
कोण छाया कर्ण = (त्रिज्या x १२) / कोण शंकु
(सूर्य सिद्धान्त उद्धरण समाप्त)
संस्कृतस्यायनांशैर्य्या भास्वतो बाहु मौर्यिका
सान्तवापक्रम जीवा (१३७०) घ्नी लम्बज्याप्तोदयज्यका । ६३ ।
औदयिक अग्रा = (सायन रवि केन्द्रज्या x परम क्रान्तिज्या) / लम्बज्या
यत्रोदयज्या भूरामसिद्धा (२४३१) स्तत्रायनान्तगः ।
विदिक्षूदयमस्तञ्च यात्यर्को विषुवे पुनः । ६४ ।
समदिवस में जब सायन सूर्य की केन्द्र भुजज्या (२४३१) होती है । (४५° अंश की ज्या = २४३१) तब अयनान्तर में रह कर रवि कौण वृत्त पर उदय (पूर्वाह्न में) तथा अस्त (अपराह्न में ) होता है ।
सर्वत्र पूर्वापरयोः समेध्वैः परितो भ्रमन्
कोणस्थे प्राङ् नतं यावत् तावत् प्रत्यङ् नतं रवौ । ६५ ।
रवि विषुव में रहने पर मेरु तक सभी स्थानों में पूर्वापर रेखा (या आकाश वृत्त) के समानान्तर रहने के कारण पूर्वाह्न के कोण वृत्त का नतांश जितना होता है उतना ही अपराह्न के कोण वृत्त का नतांश होता है ।
क्रान्तिभा घटि का ग्राह्यं सर्वं पूर्वं दिनार्द्ध जात्
भानो संसाध्य तत्काल प्रभवात् पुनरानयेत् । ६६ ।
मध्यह्न के पहले सूर्य से क्रान्ति छाया, समय, अग्र आदि निकालते हैं । दिनार्ध के समय स्थूल तथा क्रम से सूक्ष्म होने से इस प्रकार बार बार निकालने से फल ठीक होता है ।
अभीष्ट कालत श्च्छाया छायातः काल उच्यते
यज्ज्ञाजन्मयज्ञादौ सलग्नाः स्युर्ग्रहाः स्फुटाः । ६७ ।
१२० सिद्धान्त दर्पण
अब समय द्वारा छाया और छाया द्वारा समय निकालने की विधि बतायी
जाती है । यह जानने से जन्म और यज्ञ आदि समय के समय लग्न और ग्रह
स्फुट किया जा सकता है ।
इष्ट काल नतासुभ्यो डोत्क्रमज्या प्रसाध्यते
सा नतोत्क्रम जीवेति ज्ञेया वासर भागयोः । ६८ ।
इष्ट नतकाल से उत्क्रम ज्या निकालते हैं । नतकाल पूर्वार्द्ध या अपराह्न दिन
का कौन सा भाग है, नतांश ३ राशि का उतना ही भाग होगा जिसकी उत्क्रम
ज्या निकालते हैं ।
त्रिज्या चरज्या हीनाढ्या दक्षिणोत्तर गोलयो
अन्त्या नतोत् क्रम ज्योना सोन्नतज्या विधीयते । ६९।
उत्तर गोल में त्रिज्या और चरज्या का योग तथा दक्षिण गोल में उन दोनों
का अन्तर अन्त्या होती है (पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध के देशों के लिए ) अन्त्या से
नत उत्क्रमज्या घटाने पर उन्नत ज्या होती है । इस का एक अन्य नाम इष्ट अन्त्या
है ।
स्वाहोरात्रार्द्धकर्णेन गुणिता सात्रिज्यया
विभक्ता चेद् भवेच्छेदो लम्बज्याघ्नः स भाजितः । ७० ।
इष्ट अन्त्या को उस दिन की द्युज्या (अहोरात्र वृत्त का कर्ण अर्थात् त्रिज्या)
से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर छेद या इष्ट हृति होती है । इष्ट हृति (छेद)
को लम्बा ज्या से गुणा कर ।
त्रि भज्यया भवेत् शंकुस्तद् वर्ग परि शोधितात्
त्रिज्या वर्गात् पदं दृग्ज्या छाया कर्णे तु पूर्ववत् । ७१ ।
त्रिज्या से भाग देने पर शंकु (महाशंकु) होती है । त्रिज्या वर्ग से शंकु वर्ग
घटा कर वर्गमूल निकालने से दृग्ज्या होती है । इस दृग्ज्या से पहले की तरह
छाया और कर्ण निकालते हैं ।
सूर्य सिद्धान्ते - अभीष्ट छायया व्यस्तात्रिज्या तत्कर्ण भाजिता
दृग्ज्या तद् वर्ग संशुद्धात् त्रिज्यावर्गाच्च यत्पदम् । ७२ ।
छाया से समय निकालने की विधि -इष्ट छाया को त्रिज्या (३४३८ ) से
गुणा कर छाया कर्ण से भाग देने पर दृग्ज्या होती है । त्रिज्या वर्ग से दृग्ज्या का
वर्ग घटा कर उसका वर्ग मूल निकालते हैं ।
शंकु स त्रिभ जीवाघ्नः स्वलम्बज्याविभाजितः । इति ।
किं वाक्षक कर्ण गुणितः सूर्याः (१२) सच्छेदं संज्ञकः । ७३ ।
यह (वर्ग मूल ) (महा) शंकु होता है । शंकु को त्रिज्या से गुणा कर लम्बज्या
से भाग देने पर अथवा पल कर्ण से गुणा कर १२ से भाग देने पर फल हृति (इष्ट
त्रिप्रश्नाधिकारः १२१
हृति) या छेद होता है ।
सा त्रिज्या घ्नो द्यु जीवाप्त उन्नतज्या तयोनिता
स्वान्त्या नतोत्क्रमज्या स्यात् तस्या पश्चात् नतासवः । ७४ ।
इस हृति को त्रिज्या से गुणा कर द्युज्या से भाग देने पर उन्नतज्या (अन्त्या)
होती है । अन्त्या से उत्क्रमज्या घटाने पर नत उत्क्रमज्या होती है । इसको असु
बनाते हैं ।
स्व वासर दले प्राणास्तदूनाश्चोन्नतासवः
रसो (६) द् धृता विनाड्य स्युः प्राक् पश्चिम कपालयोः । ७५ ।
इन असुओं में ६ से भाग देने पर विनाड़ी होती है । अपने के पूर्वार्द्ध में होने
पर यह गत विनाड़ी तथा अपराह्न में गम्य विनाड़ी होती है ।
प्रदर्श्यते विशेषोऽत्रे यद्यल्पा सप्तविंशते
भवेत् नतोत्क्रम ज्या तदन्त्या वर्गात्परित्यजेत् । ७६ ।
नत उत्क्रमज्या २७ से कम होने पर अलग विधि है ।
अन्त्या (त्रिज्या + चरज्या) के वर्ग से
उन्नत ज्याकृतिं शेषान्मूलं त्रिज्यान्त्य जीवयो
योगाद्धैन हतं भज्यादन्त्यया स्युर्नतासवः । ७७ ।
इष्ट अन्त्या (उन्नतज्या) का वर्ग घटाकर शेष का मूल निकालते हैं । मूल
को त्रिज्या और अन्त्या के योग से आधे से गुणा कर अन्त्या से भाग देते हैं ।
फल नतासु हुआ ।
नतोत्क्रमगुण स्त्रि ज्याधिक श्चेत् त्रिज्ययोज्झित
शेषात् क्रमगुणात् चापा त्रिज्या चापा (५४००) न्वितोऽ सवः । ७८ ।
नतउत्क्रम ज्या त्रिज्या से अधिक होने पर उससे त्रिज्या घटाकर शेष (क्रमज्या)
का चाप निकालेंगे । इसको त्रिज्या चाप (५४०० कला) में जोड़ने पर नत असु
होगा ।
एवं न तासव स्त्रि ज्या धनुषो (५४००) यदि चाधिकाः ।
तदा तदूनिताः शेषात् क्रमज्या त्रिज्ययान्विता । ७९ ।
नत असु ५४०० असु से अधिक होने पर उससे ५४०० असु घटाकर शेष की
क्रमज्या निकालेंगे । उसमें त्रिज्या जोड़ने से नत उत्क्रमज्या होगी ।
स्यान्नतोत्क्रम जीवाथ प्राक् सिद्धा ये नतासवः
स्वाहोरात्रासु गुणिताः सूक्ष्माश्चक्रासुभि (२१६००) र्हताः । ८० ।
नत असु को अपने अहोरात्र (सावन दिन) के असु से गुणा कर चक्र असु
(२१६००) से भाग देने पर सूक्ष्म नतासु आता है ।
१२२ सिद्धान्त दर्पण
छायार्क स्या प्यथा प्रातः सममण्डल शंकुतः
वक्ष्या नयनं स्वाग्रा गुणिता लम्बमौर्विका । ८१ ।
अग्रातथा समशंकु से सायन रवि का साधन-अब कर्णवृत्तीय अग्रा तथा
समसण्डल शंकु से सायन रवि निकालने की विधि बताता हूँ । इष्ट कर्ण वृत्ताग्रा
को लम्बज्या से गुणा कर-
इष्ट कर्णाङ् गुलैर्भक्ता क्रान्तिज्यातो भुजज्य का
ततः प्राग्वत् पदैश्छाया सूर्येऽशै रायनेः स्फुटः । ८२ ।
इष्ट छाया कर्ण (के अंगुल में लम्बाई) से भाग देने पर क्रान्ति ज्या होती है ।
उसे (त्रिज्या से गुणा कर परमक्रान्ति की ज्या से भाग देकर ) पहले की भांति
रवि की सायन भुजज्या निकालेंगे । वर्ष की किस तीन राशि में सायन रवि है ।
इसके आधार पर सायन स्फुट रवि निकालते हैं । (अयनांश का विपरीत संस्कार
करने से निरयन स्फुट होता है ) ।
त्रिभजीवा (३४३८) र्क (१२) गुणिता समबिम्ब
त्रिप्रश्नाधिकारः १२३
योग (बाद में दिया गया है) से आकाश मध्य में गत और गम्य (एष्य) नक्षत्र से
मध्य लग्न (१० म लग्न) निकाल कर उसमें अयनांश का संस्कार करें । सायन
दशम लग्न के निरक्ष उदयासु द्वारा भुक्त घटी आदि निकालें । रात्र्यर्द्ध कालिक
सायन रवि की भोग्य घटी निकाले । इन दोनों (रवि और दशम लग्न में उदित
नक्षत्र) के बीच की राशियों की उदय घटी उसमें (रवि की भोज्य घटी) में जोड़ते
हैं ।
प्रोज्झ्यार्क द्युदलञ्च शिष्टघटिका रात्रौगताः स्युर्दिन
सार्द्धेनाथ युता भवन्त्युदयतः सूर्य्यस्य ता निर्गताः
इत्थं मध्य भ भोग्य काल तपना क्रान्तर्क्ष भुक्तान्तर
क्षेत्राणाञ्च युतिः दिनार्द्ध रहिता स्यादेष्य कालोनिशः । ८७ ।
योगफल से रवि का दिनार्द्ध घटाते हैं । शेष फल रात की बीती घटी आदि
होगी । योगफल में रवि का दिनार्द्ध जोड़ने से सूर्योदय से रात की इष्ट घटी
निकलती है । इस प्रकार मध्य की भोग्य घटी, सूर्य की राशि की घटी और दोनों
के बीच की की राशियों की उदय घटी आदि जोड़कर उससे रवि का दिनार्द्ध
घटाने से और कितनी रात बाकी है । यह मालूम होगा ।
कालाद् यद्यपि लग्न सिद्धि रुदिता भूयोऽत्र कौतूहलात्
याम्यो दिग्वलयोर्द्ध्वगो डुवशतो दृक् दृक् (२२) चलांश स्फुटाः
ये प्रागुत्कल देशजा निगदिता लग्नात्पदीया न्यहं
वक्ष्ये भुक्त पलान्यतः प्रमुदिताः स्युर्योग तारा विदः । ८८ ।
दिन और रात्र के समय से लग्न निकालने की विधि कही जा चुकी है ।
अब २२ अंश अयनांश के लिए उड़ीसा याम्योत्तर वृत्त पर रात में नक्षत्र देख कर
उस समय कौन लग्न स्फुट (दीख) हो रहा है । यह कहा जाता है । यह जानने
से प्रत्यक्ष ज्योतिषी (प्रयोग या वेध करने वाले) अत्यन्त प्रसन्न होंगे तथा अनेकों
का कौतूहल शान्त होगा ।
यन्नक्षत्र गतार्क वासवदले यः स्याद्विलग्नः स्फुटः
तस्मिन् भे गगनाईगे सहिभवेत् तत्सप्तमोऽस्तं व्रजेत् ।
विष्णो (२२) खार्द्धगतेऽङ्गलग्न जपलान्यम्भोधिन्न्दा (९७) घने
तस्मात् खाकृतयः (२२०) प्रचेतसि (२४)
वृषाद् व्योमाष्ट ने त्राणि (२८०) च । ८९ ।
जिस नक्षत्र में रवि के रहने पर दिनार्द्ध निकाला जाता है । उस दिनार्द्ध के
बराबर इष्ट समय (दोपहर को) को नक्षत्र आकाश मध्य (याम्योत्तर) में होता है ।
उस समय (दिनार्द्ध के समय के) लग्न (उदय लग्न) की सप्तम राशि अस्त लग्न
होती है ।
श्रवण (२२) से आरम्भ कर जो नक्षत्र याम्योत्तर वृत्त पर आता है । उस समय
१२४ सिद्धान्त दर्पण
किस लग्न का कितना उत्कल (मध्य) में बीतता है यह लिखा जा रहा है ।
(२२) श्रवण-मेष ९४ पल, (२३) घनिष्ठा-मेष-२३० पल (२४) शतभिषा
वृष- २८० पल
प्राग् भाद्रे (२५) ऽब्धि दृशो (२४) ब्रजन्ति मिथुनात्
तस्माद् अहिर्बुध्न्यमे (२६) वेदाद्रिक्षतयो (१७४)ऽथ
कर्कटतनोः पौष्णे (२७) नवाम्भोधयः । (४९)
अश्विन्या (१) स्वरवासवा (१८७)
श्रयममे (२) ऽङ्गार्थ शिवनो (२५६) आग्निमे (३)
सिंहा दद्रि रसा (६७) स्वरघना (१७७)
श्चन्द्रो (१) स्त्रियालोचने (२) । ९० ।
भाद्र पद- मिथुन १७४ पल (२७) रेवती कर्क ४९ पल (१) अश्विनी कर्क
(१८७) पल (२) भरणी-कर्क २५६ पल (३) कृत्तिका सिंह ६७ पल (४)
रोहिणी-सिंह (१७७) पल (५) मृगशिरा-कन्या २ पल
रौद्रे (६) ऽस्याः करिमार्गणा (५८) अदितिभे (
त्रिप्रश्नाधिकारः १२५
यत् प्रश्नोत्तर विस्तरेण गणितं दिग्देश कालास्मये
तद् व्याख्या सहितं यतोऽस्ति हि मयातत् प्रोज्झि वाग् गौरवात् । ९३ ।
भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में इस त्रिप्रश्नाधिकार में बहुत प्रकार से
भुज, कोटि, कर्ण द्वारा अनेक प्रकार की घटनाओं का वर्णन किया है तथा प्रश्नोत्तर
द्वारा अनेक सन्देहों का निराकरण किया है । यह सब वासना भाष्य सहित सिद्धान्त
शिरोमणि में रहने के कारण मैं इस ग्रन्थ में विस्तार भय से पुनः नहीं लिखा रहा
हूँ ।
सिद्धान्त्यचयादलम्भि मय कायो यो विशेषो दृशा
तुल्यस्तल्लिखितं मदिष्ट मिहतत् तत्सांगता सिद्धये
सर्वग्रन्थ कृति र्वभूव गणिते गोलान्विते हृद्गते
क्षेत्राणा मुपपत्तयो हि सुलभा स्तत् किं वचो विस्तरैः । ९४ ।
अन्य ग्रन्थों की तुलना में जिन विषयों पर मेरा स्वतन्त्र विचार है । और जिन
घटनाओं (ग्रह स्थिति) को मैंने अपनी आंखों से देखा है, इस प्रकार के अनेक
विषयों की इस ग्रन्थ में विशेष चर्चा की गयी हैं । हृदय में गोल तथा गणित का
दृढ़ ज्ञान होने से ग्रन्थ आसानी से समझा जा सकता है, और गणित आदि नियमों
की उपपत्ति (प्रमाण) कठिन नहीं होगी। अतः उपपत्ति आदि लिखकर ग्रन्थ का
कलेवर बढ़ाना मैंने आवश्यक नहीं समझा ।
यत्राष्टाब्धि कलाढ्य नन्दकु (१९।४८) लवेरक्षः समक्षीकृतौ
व्यक्षात् सार्ध रसैर्क्ष कैः (२७६।३०) ख खं भुजै (२००) भूमध्य रेखांकतः
सिद्धं योजनकैः स्वदेश विवरं तत्रासिता दौशल-
ल्लोलेला कमला विलास्यल मलं कुर्यान् मदीयं मनः । ९५ ।
उत्तर अक्षांश (१९।४८) अर्थात् विषुवत् रेखा से (२७६ १/२) योजन उत्तर
तथा भारतीय मध्य रेखा से (२००) योजन पूर्व देशान्तर पर स्थित नीलाचल पर्वत
(पुरी) में चञ्चल नेत्र और हास्य वाली लक्ष्मी जी के साथ क्रीड़ा करते हुए श्री
जगन्नाथ मेरा मनोरथ पूर्ण करें ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृते गणिते ऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
त्रिप्रश्नवान् मुनिमतः शमितः प्रकाशः । ९६ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणना
तथा दृश्य में समता के लिए तथा बालबोध के लिखे सिद्धान्त दर्पण में तीन प्रश्नों
के मुनिमत से विचार सहित सातवां प्रकाश समाप्त हुआ है ।
अष्टमः प्रकाशः
चन्द्र ग्रहण वर्णनम्
स्मार्त्ताः सांहितिकाः पुराणनिपुणा स्तन्तेक्षका वैदिकाः
स्नानाङ्गा जाप मोह दान कृतिनां यस्मिन्ननन्तं फलम् ।
प्रा चुर्येश्च महाचमत्कृति करो लोकस्य तिथ्यादिके
विश्वासावह मिन्दु तिग्म महसो र्वक्ष्याम्यहं तं ग्रहम् । १ ।
ग्रहण के समय स्नान, जप होम और दानादि से अनन्त फल होता है। ऐसा
वैदिक तान्त्रिक, व पौराणिक, संहिताकार तथा स्मार्त लोगों का मत है। ग्रहण
की शुद्धता के कारण लोग चमत्कृत होते हैं, तथा तिथियों पर विश्वास करते
हैं। अतः इसके महत्व के कारण अब मैं ग्रहण (चन्द्र और सूर्य) का वर्णन करता
हूँ।
पक्षान्त साधित विपात विधोर्भुजांशा
विश्वा (१३) ल्पका यदितदा ग्रहसम्भवोऽस्य
तस्माद् विधौ शिखितमोन्यतरान्तिकस्थे
चिन्त्यो ग्रहेऽग्निकु (१३) लवा वधि पूर्णिमान्ते । २ ।
पूर्णिमान्त में चन्द्र राहु या चन्द्र केतु का साधन कर चन्द्र से राहु या चन्द्र से
केतु का अन्तर करें। इस चन्द्र (अन्तर) का भुजांश १३ से कम होने पर चन्द्र ग्रहण
की सम्भावना रहती है। अर्थात् पूर्णिमान्त चन्द्र का राहु या केतु से १३ अंश से
कम अन्तर होने पर ही चन्द्रग्रहण हो सकता है।
सूर्य ग्रहे धृति (१८) लवान्त समान्त जेऽङ्गे
ग्रस्तो मतोऽन्तिक वशात् शिखिनाच गुणिते
प्रत्यक् पुरोनत गुणांश (३) युतो न सूक्ष्म ।
दर्शान्त कालिक सुधाकर दिक् शरस्य । ३ ।
इसी प्रकार अमान्त (अमावस्या के अन्त ) में चन्द्र और चन्द्रपात का साधन
कर चन्द्रमा से पात (राहु या केतु) का अन्तर १८ अंश से कम होने पर सूर्य ग्रहण
की सम्भावना रहती है।
(पृथ्वी केन्द्र से) अमान्त निकालते हैं। इस अमान्त काल के चन्द्रमा की
पश्चिम नत नाड़ी का १/३ अमान्त काल से घटाने पर इस संस्कृत दर्शान्त काल में
पुनः स्फुट चन्द्र का साधन करते हैं।
तत्काल वित्रिभ तनूनत बाहुजीवा
षष्ठ्यंश कस्य च युते र्वियुते च शेषात्
दिक् साम्य भेद धनुषः क्रमशः स्फुटेषौ
न्युने कृताग्नित (३४) इन ग्रह सम्भवः स्यात् । ४ ।
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १२७
पुनः दर्शान्त काल का वित्त्रिभ (दशम) लग्न निकालते हैं। उसकी नतज्या
का १/६० कर इस स्फुट चन्द्र (दर्शान्त काल के) में जोड़ते हैं, जब चन्द्र और
नत एक दिशाओं में हो, या भिन्न दिशा में होने पर घटाते हैं। इसका परिमाण
भी ३४ से कम होने पर सूर्य ग्रहण की सम्भावना रहती हैं।
तत्क्वापि याम्यनति भूरितयोत्तरक्षौ
सार्द्धांशिके (१।३०) ऽपिस भवेदपि निःशरत्वे
न क्वाप्यथो नयन मण्डलगेऽपवर्ते
स स्याद् विपात शशिदोष्ण नगांश (७) तोऽल्पे । ५ ।
(इति ग्रहण सम्भवः) कभी कभी याम्य नति (याम्योत्तर वृत्त में नति) उत्तर
(१° ३०') अंश से कम हो तो सूर्य ग्रहण हो सकता है। जब दृग्वृत्र क्रान्ति वृत्त
होता है। तब चन्द्र से उसके पात (राहु या केतु) के अन्तर का भुजांश ७ अंश
से कम होने पर भी सूर्य ग्रहण हो सकता है।
पर्वान्त संस्कृति रवीन्दु शमीकृतीन
भू भा विधू प्रमिति बाणपि धान कालैः
स लम्ब नावति दिग् वलनां गुलाद्यै
शास्त्रान्तरादिह विशेष मवेत सन्तः । ६ ।
अन्य सिद्धान्तो से भिन्न विधि से इस ग्रन्थ में स्फुट अमान्त के लिए लम्बन
संस्कार, रवि और चन्द्र का राशि तथा अंशादि समीकरण, सूर्य, चन्द्र और छाया
का परिमाण, चन्द्र का ग्रास परिमाण, स्थिति, विमर्द आदि काल, वास्तव स्फुट
लम्बन, स्फुट नति, दिग्वलन और परिलेख आदि का वर्णन हुआ है। यह उपयोगी
होने के कारण इसे विद्वान लोग गलत न समझें।
राका मयो स्ववसिति प्रभवोद्यमध्ये
सिद्धे विधौ तपन भार्द्ध दिवाकराभ्याम्
न्यूनेऽधिकेऽन्तरपराः प्रथमेन्दु सूर्य
भुक्त्यन्तरे विहृता विघटी फलेन । ७ ।
अमान्त और पूर्णान्त समय निकाल कर उस समय चन्द्र और रवि स्फुट करेंगे
(पर्व के कारण चन्द्रमा में केवल मन्द फल संस्कार होगा) चन्द्र राशि से सूर्य
राशि का अन्तर (अमान्त में) तथा पूर्णान्त समय में सूर्य राशि में ६ राशि जोड़कर
अन्तर निकालेंगे। अन्तर राशि अंश आदि की परा (१/६० विकला) बनाकर उसमें
चन्द्र और सूर्य की गति का अन्तर (कला में) से भाग देंगे) फल पल (विघटी)
आदि होगा।
तिथ्यन्त्य आढ्य वियुतः सम पर्वकालः
स्तात्कालिकार्क भदलञ्च रविश्च सूक्ष्मः ।
· १२८ सिद्धान्त दर्पण
वेद्भूः शशी समकला विवितौ भवेतां
किञ्चोच्यते क्वचन पर्वणि तद्विशेषः । ८ ।
इस चल आदि समय को चन्द्र सूर्य से कम होने पर पर्वान्त समय में जोड़ेंगे
तथा ६ राशि युक्त रवि से अधिक होने पर घटायेंगे । तब पर्वान्त (दर्शान्त या
पूर्णान्त) समय स्फुट होगा । इस समय में पुनः चन्द्र और रवि को स्फुट किया
जायेगा तथा फिर उसके अनुसार पर्वान्त रवि चन्द्र स्फुट होगा । बार बार स्फुट
करने पर जब चन्द्र और सूर्य की कला (पूर्णिमा में सूर्य में ६ राशि जोड़कर)
समान हो जाय तब शुद्ध पर्वान्त निकलेगा । इसके बाद ही ग्रहण के लिए अन्य
साधन होगा ।
सूर्यस्य दोर्गति फलो उदयान्तरञ्च
यद्येकदा त्रितयमे तदृणं धनं स्यात् ।
तत्रोदयान्तर भुजान्तर के सुधांशो-
र्भास्वत् गतेः फलयुते र्विकला स्ततस्ताः । ९ ।
एक ही समय सूर्य का मन्दफल, गतिफल तथा उदयान्तर फल तीनों धन
या ऋण होने पर चन्द्र के उदयान्तर और भुजान्तर फल के योग से सूर्य गति फल
की विकला को जोड़ेंगे ।
शीतांशुदोः फल कला गुणिता विभक्ता
स्तद् व्यास योजन चयेन (४४४) च पूर्णिमायांन्
दर्शेंहतास्तु रवि योजनकै (७२,०००) र्विलिप्ता
लब्धाश्च ताः पुनरिनेन्दु गतान्तराप्ताः । १० ।
इस योगफल को चन्द्रमा के मन्द फल कला से गुणा करेंगे । पूर्णिमा के
समय इस गुणन फल में चन्द्रमा के बिम्ब व्यास योजन (४४४) से भाग देंगे ।
अमावास्था में गुणन फल में रवि बिम्ब व्यास योजन से भाग देकर विकला आदि
लब्धि निकालेंगे । इस विकला फल को सूक्ष्म रवि और चन्द्रमा के गति अन्तर
से भाग देगें ।
दण्डादि कै रिह फलैः समपर्व युक्ति-
मूनं पुरोदित फल त्रितयर्णतायाम् ।
स्व त्वेमाद् भवति दृक् सममत्रकार्या
सूर्याब्धयोः समकलोकृति रुक्त पूर्वा । ११ ।
लब्धि दण्ड आदि फल को सम पर्व काल होने पर पूर्व काल से घटायेंगे
और ऋण होने पर (मन्दफल, उदयान्तर और गतिफल तीनों ऋण होने पर) पर्व
काल में जोड़ेंगे) इससे दृक् सम पर्व काल होगा। समपर्वकाल और दृक् सम
पर्वकाल के अन्तर में सूर्य और चन्द्रमा की गति निकाल कर दृक् सम पर्व काल
का रवि और चन्द्र स्फुट होगा ।
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १२९
द्विसप्तति सहस्र (७२,०००) योजनामितार्क बिम्बायति
महापुरुष वाच्योत्यनुजगा वथर्वा श्रुतिः ।
मथैवदनुसारतो नयनगोचरक्षं ग्रह
प्रमाण परिधिग्रहादि क मकशमलं कल्प्यते । १२ ।
अथर्व वेद में ॐ (महापुरुष) का अर्थ निरूपण के प्रसंग में सूर्य बिम्ब का
व्यास (७२,०००) योजन कहा है । इस उक्ति के आधार पर मैने वेध और गणना
कर अन्य ग्रहों का बिम्बमान, ग्रहों की परिधि तथा ग्रहण में पृथ्वी और छाया
आदि का परिणाम शुद्ध रूप से निकाला है ।
विवस्वद् विष्कम्भद्विरस विधु (१६२) भागः समुदितो
विधोर्बिम्ब व्यासः कृत कृत चतुर्योजन (४४४) मित
भुवं प्राङ् निर्दिए (१६००) स च सवितुरर्धाम्बुधि (४५) लवो
लवो ऽन्तरीक्षे वक्ष्येऽहं श्रवण मथ भानो शशभृतः । १३ ।
चन्द्र व्यास = ७२,००० / १६२ = ४४४ से कुछ अधिक योजन
पृथ्वी व्यास = ७२,००० / ४५ = १६०० योजन
पृथ्वी का व्यास १६०० योजन प्राचीन ज्योतिषियों ने भी माना है ।
अब मैं इन व्यासों का आकाश में कलात्मक मान कहता हूँ ।
भू मध्यात् स्वदला वधि ग्रह पतेः कर्णारूय मार्गश्रुतु-
र्नन्द द्विद्विप्रपूर्ण तर्क धरणीभृद् (७६,०८,२९४) योजनो मध्यमः
शीताशोः शर पुष्कर क्षिति धर स्तम्बेरमा म्भोध्यो (४८,७०५)
मध्यस्य श्रुति योजनान्य पतयोः स्पष्टा भवेन्मन्दजा । १४ ।
पृथ्वी केन्द्र से सूर्य केन्द्र की मध्यम दूरी (७६,०८,२९४) योजन (सूर्य कर्ण),
तथा पृथ्वी केन्द्र से चन्द्र केन्द्र की मध्यम दूरी (४८,७०५) योजन (चन्द्र कर्ण)
है । इससे मन्द स्पष्ट कर्ण भीनिकाला जा सकता है ।
भास्वन्मण्डल योजनाभि (७२,०००) गुण मुपक्षाक्षि (२२१३) भक्तानते
दिग्व्यास कला (३२।३२) भवन्ति सवितुर्मध्य निशास्वामि नः ।
तान्येवर्तु (६) पञ्चकरिभि (८५) र्भक्तानि चन्मण्डल-
व्यास स्थायिकला (३१।२०) भवन्ति धरणी छाया कलाश्चन्द्र वत् । १५ ।
सूर्य का मध्य कोणीय बिम्ब = ७२,००० / २२१३ = ३२।३२।६ कला आदि
चन्द्रमा का मध्यम कोणीय बिम्ब = ४४४ x ६ / ८५ = ३१।२० कला
चन्द्र बिम्ब की कला की तरह भू छाया की बिम्ब कला भी निकलेगी (६।८५)
१३० सिद्धान्त दर्पण
से गुणा कर) क्यों कि चन्द्र ग्रहण के समय उसकी स्थिति चन्द्र गोल पर होती
है ।
मन्द कोटि फल युक्त दुनिता
नक्र कर्कि मुखमन्द केन्द्र के ।
त्रिज्यका भवति संस्कृता तया
वर्जिता द्विगुणित त्रिमौर्विका (६८७६) । १६ ।
(सूर्य या चन्द्र का ) मन्द केन्द्र मकर आदि ६ राशि में रहने पर त्रिज्या में
मन्द कोटिफल जोड़ेंगे । तथा कर्क आदि ६ राशि में रहने पर घटायेंगे । प्राप्त फल
को त्रिज्या को दो गुणा (६८७६) से घटा कर-
शेष केण बिहता त्रिभज्यका
वर्गः (११८,१९,८४४) फल कलात्मकः स्फुटः
मन्दकर्ण इन चन्द्रमाः क्षिते-
र्मध्यतोऽन्य स सदा रवे र्भवेत् । १७ ।
शेष से त्रिज्या के वर्ग में भाग देंगे । फल लिप्तादि रवि और चन्द्र का स्फुट
मन्द कर्ण होगा । इस विधि से यदि मंगल आदि ग्रहों का मन्द कर्ण निकाला
जाय तो वह सूर्य केन्द्र से उन ग्रहों की केन्द्रिक दूरी होगी ।
मन्द कर्ण हत योजना श्रुतिस्त्रि ज्या किल हृता भवेद् स्फुटः
मध्य कर्णहत बिम्ब लिप्तिका स्पष्ट कर्ण विहृताः परिस्फुटाः । १८ ।
कलात्मक स्फुट मन्द कर्ण को मध्य योजन कर्ण से गुणा कर त्रिज्या से भाग
देने पर वह योजनात्मक स्फुट मन्दकर्ण होगा । मध्यम बिम्ब कला को मध्य योजन
से गुणा कर स्फुट योजन से भाग देने पर स्फुट बिम्ब कला होगी ।
सिद्धान्त शिरोमणौ-मन्द श्रुतिर्द्राक् श्रुतिवत् प्रसाध्या
तया त्रिभज्या द्विगुणा विहीना (६८७६) त्रिज्याकृतिः
(१,१८ ,१९,८४४) शेष हृतास्फुटास्या लिप्ता श्रुतिस्तिग्म रुचे र्विधाश्च । १९ ।
(सिद्धान्त शिरोमणि से उद् धृत) शीघ्र कर्ण की तरह मन्द कर्ण निकालें ।
त्रिज्या के २ गुणा से उसे घटाकर शेष से त्रिज्या के वर्ग में भाग दें ।
कलात्मक फल चन्द्र या सूर्य का मन्द कर्ण होगा । यह भूकेन्द्र से सूर्य या
चन्द्र की दूरी का मान है (कला में) ।
लिप्ता श्रुतिघ्न स्त्रिगुणेन भक्तः
स्पष्टो भवेद् योजन कर्णएवम्
बिम्ब रवे द्विं द्विशरर्तु (६५२२) संख्या
नीन्दोः ख नागाम्बुधि (४८०) योजनानि । इति । २० ।
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३१
स्फुट योजन कर्ण = $\frac{पलात्मक कर्ण x मध्य योजन कर्ण}{त्रिज्या}$
सूर्य बिम्ब (६५२२) योजन तथा चन्द्र बिम्ब (४८०) योजन है (भास्कराचार्य
के मत से, इस ग्रन्थ के अनुसार नहीं )
भास्करोक्त मृदु कर्ण साधनं यद्यपि स्फुटतमं तथाप्यहंम्
प्राहकोटिफलं तो भुजान्त बिम्बमध्य समतार्थ मेव हि । २१ ।
भास्करा चार्य मत से भी स्फुट कर्ण का साधन सूक्ष्म मान देता है । तथापि
मैंने कोटिफल से स्फुट कर्ण का साधन किया है । क्योंकि मन्दोच्च और स्फुट ग्रह
तीन राशि होने पर कोटि और मन्दस्फुट कर्ण समान होते हैं ।
मध्यमार्क शशि बिम्बजाः कलाः
सूक्ष्मतत् प्रथम भुक्ति ताड़िताः ।
मध्यभुक्ति (५९/८-७९०।३५) विहृताः स्वमण्डल
द्वन्द्व विस्तृतिरदः फलानिवा । २२ ।
मध्यम रवि और चन्द्र बिम्ब कला को उनकी दैनिक सूक्ष्मकला से गुणा कर
उनकी दैनिक मध्यम गति से भाग देने पर क्रमानुसार रवि और चन्द्र की स्पष्ट
बिम्बकला आयेगी ।
किं वा बिम्बा स्त्रिगुणा (३४३८) गुणिता योजनै स्वैर्भिंनानां
स्वश्रुत्याप्ताः स्फुटतरकला भानु भू भा विधूताम्
यद्वा भास्वद् गतिफल ख रुद्रांश युक्तो (११०) नितास्तु
मध्याः (३२।३२) स्पष्टाः स्युरिन कलिकाः कर्कि नक्रादि केन्द्रे । २३ ।
अथवा योजनात्मक बिम्ब व्यास की त्रिज्या से गुणा कर स्पष्ट कर्ण योजना
से भाग देने पर रवि, चन्द्र या भू भा (पृथ्वी की छाया) बिम्ब व्यास का कलात्मक
स्फुट मान आयेगा ।
सूर्य का कलात्मक स्फुट बिम्ब व्यास
= $\frac{मध्य बिम्बकलाव्यास + सूर्य गतिफल}{११०}$
मध्यकेन्द्र २ य तथा ३ य पाद में रहने पर योग (गतिफल का) या प्रथम
और ४र्थ पाद में रहने पर घटाव होगा ।
मध्यं मानं (३१।२०) गद्विफलं कला पञ्चविंशां शकस्य
त्यागाद् योगात् स्फुट विधु मिटर्नक्र कर्क्यादिके स्यात्
रुद्रा (११) घ्नीवा स्फुट रवि गतिः खाक्षि भक्तार्कमान
सप्तोनेन्दु स्फुट गतिकला स्तत्व (२५) भक्ता स्वमानम् । २४ ।
१३२ सिद्धान्त दर्पण
इसी प्रकार स्पष्ट चन्द्र बिम्ब व्यास की कला
मध्य चन्द्र व्यास कला ± चन्द्रगति फल
= -------------------------------------------
२५
सूर्य चन्द्र का स्पष्ट बिम्ब कला के लिए एक और सूत्र है-
दैनिक स्पष्ट रवि गति x ११
स्पष्ट रवि बिम्ब व्यास कला = ------------------------------
२२
दैनिक स्पष्ट चन्द्र गति -७
स्पष्ट चन्द्र बिम्ब व्यास कला = ----------------------------
२५
भूव्यास (१६००) निघ्नः स्फुट सूर्य कर्णे
भूव्यास हीनार्क तन (७०,४००) विभक्तः
फलंतदामूल शिखान्त दैर्घ्यं सुचो
निभायाः पृथिवी प्रभायाः । २५ ।
पृथ्वी सूच्याकार छाया, की लम्बाई स्पष्ट सूर्य कर्ण x भू व्यास
(पृथ्वी केन्द्र से) = ----------------------------
सूर्य व्यास - भूव्यास
सिद्धान्त शिरोमणौ-भूव्यास हीनं रवि
बिम्ब मिन्दु कर्णाहतं भास्कर कर्णभक्तन्
भू विस्तृति लब्ध फलेन हीना भवेत्
कुमाविस्तृति रिन्दुमार्गे । २६ । इति
चन्द्र गोल (कक्षा) में भूभाव्यास
(रवि व्यास - भूव्यास) चन्द्रव्यास
= भू छाया - -------------------------------
रवि व्यास
तन्मानलिप्ताः शशिवत् प्रसाध्याः किं
वानागांशः (७) शशि भृद् गतैर्यः
सोऽष्टाद्रि (७८) निघ्नेषुमनु (१४५)
धृतार्क गत्यूनितः स्यात्तमसः प्रमाणम् । २७ ।
चन्द्रमा की तरह भूछाया व्यास का भी (चन्द्र कला में ) कलात्मक मान
निकाला जाता है । (क्योंकि चन्द्र कला में ही चन्द्र ग्रहण के समय इसका उपयोग
है ) ।
भू भांव्यास (चन्द्र कक्षा में ) कला
दैनिक चन्द्र स्पष्ट गति दैनिक स्पष्ट रवि गति x ७८
= ------------------------ - ------------------------------
७ १४५
भू भा विधुं चन्द्र इनं विधते यदा तदैव ग्रहणं भयोः स्यात् ।
पातारूय राहोर्रुज सन्ति कर्णात् तस्या सुर ग्रास इति प्रशस्तिः । २८ ।
पृथ्वी छाया में चन्द्रमा का बिम्ब आने पर चन्द्र ग्रहण तथा चन्द्रबिम्ब द्वारा
सूर्य ढकने के कारण सूर्य ग्रहण होता है । सूर्य, चन्द्र तथा भू भा (पृथ्वी की