सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकारः ११९
छाया कर्ण) से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर कर्ण वृत्ताग्रा होती है।
(मध्याह्न के अतिरिक्त दूसरे समय की)
किं वा मध्येष्टं कर्णा भ्यां क्रान्तिज्या गुणिता पृथक् ।
लम्ब ज्याप्ता च मध्याग्रा स्वेष्टाग्रा भवति क्रमात् । ४१ ।
अथवा क्रान्ति ज्या को अलग अलग स्थानों पर रख कर त्रिज्या (३४३८)
और इष्ट छायाकर्ण से अलग अलग गुणा कर दोनों जगह लम्बज्या से भाग देने
पर क्रमशः मध्याग्रा और कर्ण वृत्ताग्रा (इष्ट समयको) होती है ।
चलांश संस्कृते भानौ मेषादौ गोल उत्तरः
तुलादौ संस्थिते याम्यः पुरोक्तोऽप्यत्र कार्यतः । ४२ ।
सायन रवि मेषादि ६ राशियों में रहने पर उत्तर गोल तथा तुला आदि ६
राशि में रहने पर दक्षिण गोल में होता है।
सौम्य गोले यदार्काग्रा विषुवच्छायातोऽधिका
तत्तयोरन्तरं याम्य भुजः स्याच्छंकु मूलतः । ४३ ।
सूर्य उत्तर गोल में रहने पर कर्ण तृतीय अग्रा यदि विषुवत छाया से अधिक
हो तो दोनों का अन्तर दक्षिण बाहु होगा (यह दिनार्द्ध में १२ अंगुल शंकु के मूल
के दक्षिण होगा ) ।
न्यूना चेदन्तरं सौम्या बाहूर्याम्ये तु गोल के
अक्ष प्रभाग्रयो र्योगः सौम्योबाहु र्दिनार्धजः । ४४ ।
उत्तर गोल में सूर्य रहने पर जब कर्ण वृत्तीय अग्रा विषुवत् छाया से कम हो
तो इसको पलभा से घटाने पर भुज होगा तथा यह १२ अंगुल शंकु मूल से उत्तर
की तरफ होगा । सूर्य दक्षिण गोल में रहने पर पल भा और कर्ण वृत्ताग्रा का
हमेशा योग होता है और यह बाहु उत्तर दिशा में होता है । (यह पृथ्वी के उत्तरी
गोलार्द्ध के देशों जैसे भारत के लिए नियम है ।
सममण्डल रेखायां यदा विशति शंकुभा
तदा भार्कर्ण कालाः स्युः सममण्डलजा इति । ४५ ।
यदि शंकु छाया सममण्डल रेखा (पूर्वा पर रेखा) पर पड़े तो छाया, छायाकर्ण
तथा काल (काल सूचक सूर्य का क्षितिज से उन्नत या उर्ध्वाधर से नत कोण)
सभी सममण्डल में होते हैं । इस समय सूर्य की क्रांति अपने स्थान के अक्षांश
के बराबर होती है) ।
सममण्डलं भा न स्या द्ववो दक्षिण गोलगे
अक्षाधिकेऽपमे सौम्ये न स्यात् तत्राल्पके भवेत् । ४६ ।
सूर्य की उत्तर क्रांति अपने अक्षांश से (पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध के स्थानों
जैसे भारत के लिए) अधिक होने पर छाया हमेशा सममण्डल से दक्षिण होती