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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 609 में से

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पृष्ठ 220

त्रिप्रश्नाधिकारः १२३
योग (बाद में दिया गया है) से आकाश मध्य में गत और गम्य (एष्य) नक्षत्र से
मध्य लग्न (१० म लग्न) निकाल कर उसमें अयनांश का संस्कार करें । सायन
दशम लग्न के निरक्ष उदयासु द्वारा भुक्त घटी आदि निकालें । रात्र्यर्द्ध कालिक
सायन रवि की भोग्य घटी निकाले । इन दोनों (रवि और दशम लग्न में उदित
नक्षत्र) के बीच की राशियों की उदय घटी उसमें (रवि की भोज्य घटी) में जोड़ते
हैं ।
प्रोज्झ्यार्क द्युदलञ्च शिष्टघटिका रात्रौगताः स्युर्दिन
सार्द्धेनाथ युता भवन्त्युदयतः सूर्य्यस्य ता निर्गताः
इत्थं मध्य भ भोग्य काल तपना क्रान्तर्क्ष भुक्तान्तर
क्षेत्राणाञ्च युतिः दिनार्द्ध रहिता स्यादेष्य कालोनिशः । ८७ ।
योगफल से रवि का दिनार्द्ध घटाते हैं । शेष फल रात की बीती घटी आदि
होगी । योगफल में रवि का दिनार्द्ध जोड़ने से सूर्योदय से रात की इष्ट घटी
निकलती है । इस प्रकार मध्य की भोग्य घटी, सूर्य की राशि की घटी और दोनों
के बीच की की राशियों की उदय घटी आदि जोड़कर उससे रवि का दिनार्द्ध
घटाने से और कितनी रात बाकी है । यह मालूम होगा ।
कालाद् यद्यपि लग्न सिद्धि रुदिता भूयोऽत्र कौतूहलात्
याम्यो दिग्वलयोर्द्ध्वगो डुवशतो दृक् दृक् (२२) चलांश स्फुटाः
ये प्रागुत्कल देशजा निगदिता लग्नात्पदीया न्यहं
वक्ष्ये भुक्त पलान्यतः प्रमुदिताः स्युर्योग तारा विदः । ८८ ।
दिन और रात्र के समय से लग्न निकालने की विधि कही जा चुकी है ।
अब २२ अंश अयनांश के लिए उड़ीसा याम्योत्तर वृत्त पर रात में नक्षत्र देख कर
उस समय कौन लग्न स्फुट (दीख) हो रहा है । यह कहा जाता है । यह जानने
से प्रत्यक्ष ज्योतिषी (प्रयोग या वेध करने वाले) अत्यन्त प्रसन्न होंगे तथा अनेकों
का कौतूहल शान्त होगा ।
यन्नक्षत्र गतार्क वासवदले यः स्याद्विलग्नः स्फुटः
तस्मिन् भे गगनाईगे सहिभवेत् तत्सप्तमोऽस्तं व्रजेत् ।
विष्णो (२२) खार्द्धगतेऽङ्गलग्न जपलान्यम्भोधिन्न्दा (९७) घने
तस्मात् खाकृतयः (२२०) प्रचेतसि (२४)
वृषाद् व्योमाष्ट ने त्राणि (२८०) च । ८९ ।
जिस नक्षत्र में रवि के रहने पर दिनार्द्ध निकाला जाता है । उस दिनार्द्ध के
बराबर इष्ट समय (दोपहर को) को नक्षत्र आकाश मध्य (याम्योत्तर) में होता है ।
उस समय (दिनार्द्ध के समय के) लग्न (उदय लग्न) की सप्तम राशि अस्त लग्न
होती है ।
श्रवण (२२) से आरम्भ कर जो नक्षत्र याम्योत्तर वृत्त पर आता है । उस समय