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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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१२० सिद्धान्त दर्पण
अब समय द्वारा छाया और छाया द्वारा समय निकालने की विधि बतायी
जाती है । यह जानने से जन्म और यज्ञ आदि समय के समय लग्न और ग्रह
स्फुट किया जा सकता है ।
इष्ट काल नतासुभ्यो डोत्क्रमज्या प्रसाध्यते
सा नतोत्क्रम जीवेति ज्ञेया वासर भागयोः । ६८ ।
इष्ट नतकाल से उत्क्रम ज्या निकालते हैं । नतकाल पूर्वार्द्ध या अपराह्न दिन
का कौन सा भाग है, नतांश ३ राशि का उतना ही भाग होगा जिसकी उत्क्रम
ज्या निकालते हैं ।
त्रिज्या चरज्या हीनाढ्या दक्षिणोत्तर गोलयो
अन्त्या नतोत् क्रम ज्योना सोन्नतज्या विधीयते । ६९।
उत्तर गोल में त्रिज्या और चरज्या का योग तथा दक्षिण गोल में उन दोनों
का अन्तर अन्त्या होती है (पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध के देशों के लिए ) अन्त्या से
नत उत्क्रमज्या घटाने पर उन्नत ज्या होती है । इस का एक अन्य नाम इष्ट अन्त्या
है ।
स्वाहोरात्रार्द्धकर्णेन गुणिता सात्रिज्यया
विभक्ता चेद् भवेच्छेदो लम्बज्याघ्नः स भाजितः । ७० ।
इष्ट अन्त्या को उस दिन की द्युज्या (अहोरात्र वृत्त का कर्ण अर्थात् त्रिज्या)
से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर छेद या इष्ट हृति होती है । इष्ट हृति (छेद)
को लम्बा ज्या से गुणा कर ।
त्रि भज्यया भवेत् शंकुस्तद् वर्ग परि शोधितात्
त्रिज्या वर्गात् पदं दृग्ज्या छाया कर्णे तु पूर्ववत् । ७१ ।
त्रिज्या से भाग देने पर शंकु (महाशंकु) होती है । त्रिज्या वर्ग से शंकु वर्ग
घटा कर वर्गमूल निकालने से दृग्ज्या होती है । इस दृग्ज्या से पहले की तरह
छाया और कर्ण निकालते हैं ।
सूर्य सिद्धान्ते - अभीष्ट छायया व्यस्तात्रिज्या तत्कर्ण भाजिता
दृग्ज्या तद् वर्ग संशुद्धात् त्रिज्यावर्गाच्च यत्पदम् । ७२ ।
छाया से समय निकालने की विधि -इष्ट छाया को त्रिज्या (३४३८ ) से
गुणा कर छाया कर्ण से भाग देने पर दृग्ज्या होती है । त्रिज्या वर्ग से दृग्ज्या का
वर्ग घटा कर उसका वर्ग मूल निकालते हैं ।
शंकु स त्रिभ जीवाघ्नः स्वलम्बज्याविभाजितः । इति ।
किं वाक्षक कर्ण गुणितः सूर्याः (१२) सच्छेदं संज्ञकः । ७३ ।
यह (वर्ग मूल ) (महा) शंकु होता है । शंकु को त्रिज्या से गुणा कर लम्बज्या
से भाग देने पर अथवा पल कर्ण से गुणा कर १२ से भाग देने पर फल हृति (इष्ट