शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
(xxx)
शम्बूक तैल — 270 | रक्तमोक्षण में अपथ्य — 276
कर्णस्रावहर योग — 270 | तुम्बी-प्रयोग-विधि — 276
स्वर्जिका योग — 271 | जलौका-प्रयोग — 277
आम्रादि तैल — 271 | सिरावेध — 277
कर्णकीटहर योग (1) — 271 | त्रयोदशोऽध्यायः
कर्णकीटहर योग (2) — 271 | नेत्ररोगनाशक उपचार — 278
द्वादशोऽध्यायः | सेचन-विधि — 278
रोगानुसार रक्त-निर्हरण — 272 | वाताभिष्यन्द पर सेचन (1) — 278
रक्त-निर्हरण काल तथा लाभ — 272 | वाताभिष्यन्द पर सेचन (2) — 278
शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त का लक्षण — 272 | वाताभिष्यन्द पर सेचन (3) — 278
रक्तदुष्टि के लक्षण — 272 | रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (1) — 279
रक्तवृद्धि के लक्षण — 272 | रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (2) — 279
रक्तक्षय के लक्षण — 272 | नेत्रशूलनाशक योग — 279
वातदूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन-विधि — 279
पित्तदूषित रक्त के लक्षण — 273 | वातादि भेद से आश्च्योतन — 279
कफदूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन का धारण काल — 279
द्विदोष तथा त्रिदोष से दूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन के योग (1) — 279
विषदूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन के योग (2) — 279
शुद्ध रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन के योग (3) — 279
रक्तस्राव के योग्य रोग — 273 | पिण्डिकाविधान — 280
रक्तस्राव की विधियाँ — 274 | पिण्डी के योग (1) — 280
किनका रक्त नहीं निकालना चाहिये — 274 | पिण्डी के योग (2) — 280
रक्तस्रावण यन्त्र — 274 | पिण्डी के योग (3) — 280
शृंग आदि द्वारा रक्तस्रावण — 274 | पिण्डी के योग (4) — 280
रक्तस्राव के अयोग्य काल एवं रोगी — 274 | बिडालक-विधि — 280
रक्तस्रावकारक उपाय — 274 | बिडालक के योग (1) — 280
रक्तस्राव का समय — 274 | बिडालक के योग (2) — 280
रक्तातिस्राव परिहार — 275 | बिडालक के योग (3) — 281
रक्त की अतिप्रवृत्ति में चिकित्सा — 275 | बिडालक के योग (4) — 281
रक्तरोधन के उपाय — 275 | बिडालक के योग (5) — 281
अग्निदाह-विधि — 275 | बिडालक के योग (6) — 281
अधिक रक्तस्राव का निषेध — 275 | तर्पण-विधि — 281
रक्त का महत्त्व — 276 | तर्पण का निषेध — 281
रक्तस्रावजनित दोष का प्रतिकार — 276 | तर्पण-विधि — 281
रक्तस्राव का फल — 276 | तर्पण के पश्चात् कर्म — 282
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA | तर्पणकाल तथा सम्यक् तर्पण का लक्षण — 282
(xxxi)
अतितर्पण हीनतर्पण तथा उनका उपचार २८२ | रसाञ्जनादि रसक्रिया २८६
पुटपाक-विधि २८२ | गुडूची रसक्रिया २८६
पुटपाक के भेद २८२ | पुनर्नवा रसाञ्जन २८६
पुटपाक के योग २८२ | बब्बूल रसक्रिया २८६
अञ्जन-विधि २८३ | हिज्जल-रसक्रिया २८६
अञ्जन के भेद २८३ | कतक-रसक्रिया २८६
अञ्जन के अन्य तीन भेद २८३ | शिरोत्पात में रसक्रिया २८६
अञ्जन का निषेध २८३ | कृष्णसर्प वसाञ्जन २८७
गुटिकाञ्जन की मात्रा २८३ | लेखनाञ्जन २८७
रसरूप अञ्जन की मात्रा २८३ | कणा-अञ्जन २८७
चूर्णरूप अञ्जन की मात्रा २८४ | चूर्णाञ्जन (लेखन) २८७
शलाका-निर्माण-विधि २८४ | चूर्णाञ्जन (रोपण) २८७
अञ्जन प्रयोग विधि एवं काल २८४ | चूर्णाञ्जन (प्रसादन) २८७
चन्द्रोदयावर्ति २८४ | शलाका-निर्माण-विधि २८७
करञ्जवर्ति २८४ | प्रत्यञ्जन-विधि २८८
समुद्रफेनादिवर्ति २८४ | नयनामृताञ्जन २८८
दन्तवर्ति २८५ | सर्पविषनाशक अञ्जन २८८
नीलोत्पलवर्ति २८५ | नेत्र-प्रसादन-विधि २८८
कुसुमिकावर्ति २८५ | नेत्र-सिंचन-विधि २८८
रसाञ्जनवर्ति २८५ | नेत्र-रक्षा का महत्त्व २८८
धात्र्यादिवर्ति २८५ | ग्रन्थकार की प्रार्थना २८८
तुत्थादि-रसक्रिया २८५ | शुभकामना २८९
वटक्षीर-रसाञ्जन २८५ | ग्रन्थ की उपयोगिता २८९
अतिनिद्रानाशक योग २८५ | प्रतिसंस्कर्ता का निवेदन २८९
तन्द्रानाशक योग २८५ | अञ्जननिदानम् २९०
प्रबोधाञ्जन २८६ | रोग-परक सूची (अकारादि क्रमानुसार) २९७
दार्व्यादि रसक्रिया २८६
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पूर्वखण्डे
।। श्रीः।।
श्रीशाङ्ग्र्धरेण प्रणीता
शाङ्ग्र्धरसंहिता
'दीपिका' व्याख्यया विशेषवक्तव्यादिभिश्च विराजिता
पूर्वखण्डे
प्रथमोऽध्यायः
परिभाषा
मङ्गलाचरणम्
श्रियं स दद्याद् भवतां पुरारिर्यदङ्गतैजःप्रसरे भवानी।
विराजते निर्मलचन्द्रिकायां महौषधीव ज्वलिता हिमाद्रौ ॥ 1 ॥
टीकाकर्तुः मङ्गलाचरणम्
जयति साम्बशिवः सगणेश्वरः सकलरोगहरः सुखशान्तिदः।
चरकसुश्रुतसारसदाशया जयति शार्ङ्गधराभिधसंहिता॥
आयुर्वेदमहाम्भोधेः पारगं छिन्नसंशयम्।
लालचन्द्रं गुरुं नत्वा दीपिकां सन्तनोम्यहम्॥
पुर नामक असुर के विनाशक वे भगवान् शंकर आप सभी (प्राणियों) को श्री (कल्याण, मंगल, धन-धान्य) प्रदान करें, जिनकी शारीरिक कान्ति के विस्तार में हिमालय पर्वत पर निर्मल चाँदनी में प्रकाशमान दिव्य औषधी के सदृश भगवती भवानी (पार्वती) विशेष रूप से सुशोभित हो रही हैं।
वक्तव्य-मंगलाचरण का प्रयोग पाठकों के कल्याण के लिए करने की प्राचीन परम्परा है। आयुर्वेद का उपदेश प्राणिमात्र के कल्याण के लिए होता है। यहाँ शिव (कल्याण-स्वरूप देव) को पुर नामक (अमंगलकारक रोग) का विनाशक कहा गया है। ओषधियों के स्वामी चन्द्रमा के प्रकाश को चन्द्रिका (चाँदनी) कहा जाता है। इसमें रोगशान्ति की अतुलनीय शक्ति है। भवानी को यहाँ महौषधि (दिव्य औषधि) की उपमा दी गयी है। आयुर्वेद में दिव्यौषधियों के अलौकिक प्रभावों की चर्चाएँ सुप्रसिद्ध हैं। इस प्रकार उक्त मंगलाचरण द्वारा लोक-कल्याण की सर्वतोमुखी कामना की गयी है।
महर्षि आत्रेय ने भी यह संकेत किया है कि हिमालय प्रदेश उत्तम औषधियों का आकर (खजाना) है। देखें-‘हिमवान् औषधभूमीनाम्।’-च० सू० अ० 25.40। और भी-‘औषधीनां परा भूमिर्हिमवान् शैलसत्तमः।’-च०चि०अ० 1.38। चन्द्रमा की थोड़ी बहुत चाँदनी सदैव रहती ही है, परन्तु निर्मल चन्द्रिका तभी प्राप्त होती है, जब चन्द्रमा पूर्ण रहता है। तभी औषध द्रव्यों का संग्रह किया जाता है, तभी उनसे पूर्ण गुणों की भी प्राप्ति होती है, क्योंकि चन्द्रमा ही औषधियों का राजा है। उनमें अमृतत्व गुण इसी से प्राप्त होता है। अतएव वेद में कहा है-‘ओषधयः समवदन्त सोमेन सह राज्ञा। यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि’॥-शुक्लयजुर्वेद अ० 12 मं० 96। अर्थात् औषधियाँ अपने राजा चन्द्रमा से कहती हैं-‘विद्वान् चिकित्सक हमारा प्रयोग जिस रोगी के लिए करता है, हम उसे रोगों से मुक्त कर देती हैं।
ग्रन्थ का महत्त्व
प्रसिद्धयोगा मुनिभिः प्रयुक्ताश्चिकित्सकैर्ये बहुशोऽनुभूताः।
विधीयते शार्ङ्गधरेण तेषां सुसङ्ग्रहः सज्जनरञ्जनाय॥2॥
जो प्रसिद्ध अतएव उत्तम औषधयोग प्राचीन महर्षियों (चरक, सुश्रुत आदि) ने अपनी-अपनी संहिताओं में कहे हैं तथा जिन योगों का चिकित्सकों ने अनेक बार रोगियों पर अनुभव किया है, उन्हीं योगों का भली-भाँति संग्रह सज्जनों (परोपकारी पुरुषों) की प्रसन्नता के लिए श्रीशार्ङ्गधराचार्य ने अपनी इस संहिता में किया है।
2
शार्ङ्गधरसंहिता
[पूर्वखण्डे
वक्तव्य- उक्त पद्य द्वारा ग्रन्थकार ने यह प्रमाणित कर
दिया है कि यह ग्रन्थ प्राचीन आयुर्वेदज्ञ महर्षियों के महत्त्वपूर्ण
वचनों का संग्रह है। इसमें उन्हीं योगों का संग्रह किया गया
है, जिनको चिकित्सकों ने अनेक बार प्रयोग करते हुए उन्हें
सदैव सफल पाया और यह ग्रन्थ सज्जनों के मन को प्रसन्न
करने के लिए, न कि किसी प्रकार के अभिमान को प्रकट
करने के लिए लिखा गया है।
निदान के बाद चिकित्सा-निर्देश
हेत्वादिरूपाकृतिसात्म्यजातिभेदैः
समीक्ष्यातुरसर्वरोगान् ।
चिकित्सितं कर्षणबृंहणाख्यं
कुर्वीत वैद्यो विधिवत् सुयोगैः ॥ ३ ॥
चिकित्सक का परम कर्तव्य है कि वह निदान, पूर्वरूप,
रूप, उपशय तथा सम्प्राप्ति की संख्या, विकल्प आदि भेदों
की सहायता से रोगी के सभी रोगों (मूल रोग, सहयोगी रोग
तथा उसके उपद्रव-स्वरूप उत्पन्न अन्य रोग इन सभी) को
भली-भाँति बुद्धिपूर्वक देख (परीक्षा) कर शास्त्रोक्त विधि से
सद्यः फलप्रद उत्तम औषधयोगों द्वारा कर्षण (बढ़े हुए दोष
को घटाना) तथा बृंहण (घटे हुये दोष को बढ़ाकर सम
स्थिति पर लाना) विधि से चिकित्सा करे।
वक्तव्य- निदान आदि से सम्यक् परिचित होने के लिए
'माधवनिदान' का अवलोकन तथा मनन करें। विशेष जानकारी
के लिए चरक तथा सुश्रुत के निदानस्थान का परिशीलन
करें। यहाँ ग्रन्थकार ने रोग-चिकित्सा की अपेक्षा दोष-
चिकित्सा पर अधिक बल दिया है, क्योंकि दोषों की विषमता
को ही रोग कहते हैं और दोषों के समान रहने की स्थिति को
आरोग्य, नीरोग या स्वस्थ कहा जाता है। यथा-'रोगस्तु
दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता' ।-अ०हृ०सू०अ० 1.20। उक्त
सम्पूर्ण विषय को महर्षि आत्रेय ने इस प्रकार कहा है-'यस्तु
रोगमविज्ञाय कर्माण्यरभते भिषक्। अप्यौषधविधानज्ञस्तस्य
सिद्धिर्यदृच्छया' ।। च० सू०अ० 20.21। निष्कर्ष यह है कि
निदान-विधि से दोषों की स्थिति का भली-भाँति ज्ञान कर
लेने के बाद ही तदनुसार सिद्ध एवं सफल योगों द्वारा चिकित्सा
प्रारम्भ करनी चाहिये।
रोग का निदान करते समय यह भी निर्णय कर लेना
चाहिये कि यह दोषजनित है या आगन्तुक है, साध्य है या
असाध्य है। कर्षण तथा बृंहण चिकित्सा का वर्णन प्राचीन
संहिताओं में विस्तारपूर्वक किया गया है। आप उसका इन
सन्दर्भों को देखकर अनुशीलन करें-च० सू० अ० 21, 22,
23। सु० सू० अ० 15, सु० चि० अ० 1 श्लोक 11-13, सु०
उ० अ० 39 श्लोक 102-105। अ० सं० सू० अ० 24। अ०
हृ० सू० अ० 14।
दिव्यौषधियों के प्रभाव
दिव्यौषधीनां बहवः प्रभेदा
वृन्दारकाणामिव विस्फुरन्ति।
ज्ञात्वेति सन्देहमपास्य धीरैः
सम्भावनीया विविधप्रभावाः ॥ 4 ॥
देवताओं की विलक्षण शक्तियों के समान दिव्य
(लोकोत्तरशक्ति-सम्पन्न) औषधियों की भी अनन्त शक्तियाँ
स्फुरित होती (देखी जाती) हैं। यह जानकर तथा सन्देह को
छोड़कर अर्थात् विश्वासपूर्वक धीर (धैर्य-सम्पन्न) चिकित्सकों
को चाहिये कि वे उन औषधियों की विलक्षण शक्तियों की
सम्भावना किया करें।
वक्तव्य- आचार्य शार्ङ्गधर निदान के पश्चात् चिकित्सा
की दृष्टि से द्रव्यों के गुण-धर्मों की ओर संकेत कर रहे हैं।
सम्भवतः उनका दृष्टिकोण यह रहा है कि योग के बीच में
परिगणित द्रव्य प्रधान द्रव्य के गुण-धर्म को बढ़ाने में सहयोगी
होता है। यदि उसी द्रव्य का स्वतन्त्र प्रयोग किया जाता है, तो
वहाँ उसका विशेष महत्त्व होता है, क्योंकि सभी औषधियों
का राजा चन्द्रमा सबमें समान रूप से समय पर अमृत की
वर्षा किया करता है। यह तो संग्रहकर्त्ता तथा प्रयोगकर्त्ता की
योग्यता एवं अयोग्यता पर निर्भर है कि उसके द्वारा संगृहीत
द्रव्य अपने पूर्ण गुणों को दे या न दे। स्मरणीय है कि आज
भी अष्टवैद्यन् परम्परा में नारायण नम्बूदरीपाद की केरलप्रदेशीय
'एकौषधीयचिकित्सापद्धति' औषधियों के दिव्य प्रभाव
का डंका पीट रही है।
उक्त पद्य में दिव्य औषधियों की तुलना देवताओं के
साथ केवल उनकी शक्तिमत्ता दिखलाने के लिए ही की गयी
है। यही कारण है कि तुलसी आदि पौधे तथा पीपल आदि
वृक्ष देवता के रूप में अपने गुणों के कारण आज भी पूजे
जाते हैं। सन्देह अज्ञानमूलक होता है, अतः शास्त्राध्ययन द्वारा
उसे हटा देना चाहिये। देखें-सु० सू० अ० 40 श्लोक 19-20।
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चिकित्सा-विधि-निर्देश
प्रथमोऽध्यायः ] परिभाषा 3
चिकित्सा-विधि-निर्देश
स्वाभाविकागन्तुकायिकान्तरा रोगा
भवेयुः किल कर्मदोषजाः।
तच्छेदनार्थं दुरितापहारिणः
श्रेयोमयान् योगवरान्नियोजयेत् ॥5॥
स्वाभाविक, आगन्तुक, कायिक तथा मानसिक रोग
पूर्वजन्म-कृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप अथवा वात आदि
दोषों के कारण प्राणिमात्र में निश्चित रूप से होते हैं। उनको
नष्ट करने के लिए पापनाशक धर्मशास्त्रोक्त विविध प्रकार के
प्रायश्चित्त आदि का अथवा वात आदि दोषों को समभाव में
लाने के लिए उत्तमोत्तम (शास्त्रानुमोदित) योगों का प्रयोग
करे।
वक्तव्य- ऊपर चार प्रकार की व्याधियों का परिगणन
किया गया है। उनका परिचय इस प्रकार है- 1. स्वाभाविक-
स्वभाव (प्रकृति) के अनुसार होने वाली व्याधियाँ। जैसे-भूख,
प्यास, नींद, बुढ़ापा आदि। ध्यान दें, ये भी रोग हैं, क्योंकि
इनसे शरीर में पीड़ा होती है और इनकी चिकित्सा है-भोजन,
जलपान, शयन तथा रसायन-सेवन। इन उपचारों से
तात्कालिक लाभ होता है। 2. आगन्तुक- जो रोग बाहरी
कारणों-अभिघात, भूतावेश तथा जहरीले प्राणियों के दंश
आदि से उत्पन्न हों, उन्हें आगन्तुक कहते हैं। जैसे-चोट लगना,
मारण, मोहन, उच्चाटन, भूत-प्रेतबाधा, साँप, बिच्छू, बर्रे
आदि द्वारा डँसा जाना। 3. कायिक- काय=शरीर से सम्बन्धी
सभी रोग। जैसे-ज्वर, अतिसार आदि। इनकी उत्पत्ति मिथ्या
आहार-विहार के प्रयोग से तथा दूषित वात आदि दोषों से
होती है, अतएव इसे 'आन्तरिक' कहा गया है। इन रोगों की
परिधि में आने वाले रोग हैं-काम, क्रोध आदि तथा उन्माद,
अपस्मार आदि। इनमें पूर्वजन्म में किये गये पापों के फल
स्वरूप होने वाले रोग उक्त पापकर्मों के क्षय हो जाने पर
अथवा उनको दूर करने वाले उपवासादि प्रायश्चित्तों को करने
से उक्त रोगों का शमन हो जाता है। वात आदि दोषों के
प्रकुपित (विषम) हो जाने के कारण उत्पन्न होने वाले ज्वर
आदि रोग विधिपूर्वक उत्तम योगों द्वारा चिकित्सा करने से
शान्त हो जाते हैं। विशेष- देखें-सु० सू० अ० 1.23 से 27
तक।
ग्रन्थ की प्रामाणिकता
प्रयोगानागमात् सिद्धान् प्रत्यक्षादनुमानतः।
सर्वलोकहितार्थाय वक्ष्याम्यनतिविस्तरात् ॥6॥
प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम (शास्त्र) प्रमाण से सिद्ध
(सदैव सफलता को देने वाले) प्रयोगों का मैं (शार्ङ्गधर)
प्राणिमात्र के हित के लिए संक्षेप से वर्णन कर रहा हूँ।
वक्तव्य- आत्मा, मन तथा बुद्धि के सहयोग से जो
यथार्थज्ञान उत्पन्न होता है, उसे 'प्रत्यक्ष' कहते हैं। देखें-च०
सू० अ० 11.20। व्याप्तिग्रहण के अनन्तर जिस अव्यभिचारी
हेतु से हेतुमान् का ज्ञान होता है, उसे 'अनुमान' कहते हैं।
जैसे-धूम के दर्शन से अग्नि का अनुमान तथा गर्भ-दर्शन से
स्त्री-पुरुष के सहवास का अनुमान। देखें-च० सू० अ०
11.21-22। आगम शब्द का अर्थ है 'वेद' अथवा आप्त
(प्रामाणिक)। ऋषि-महर्षियों द्वारा रचित शास्त्र को भी आगम
कहते हैं, क्योंकि आप्त पुरुष रजोगुण तथा तमोगुण से मुक्त
होते हैं। अतएव उनका ज्ञान सर्वदा शुद्ध एवं सत्य होता है। वे
कभी असत्य भाषण नहीं करते। अतएव उनके रचित शास्त्र
आगम कोटि के माने जाते हैं। देखें-च० सू० अ० 11.27।
पूर्वखण्ड के अध्याय
प्रथमं परिभाषा स्याद् भैषज्याख्यानकं तथा।
नाडीपरीक्षाविधिरतस्तो दीपन-पाचनम् ॥7॥
ततः कलादिकाख्यानमाहारादिगतिस्तथा।
रोगाणां गणना चैव पूर्वखण्डोऽयमीरितः ॥8॥
इस शार्ङ्गधरसंहिता के पूर्वखण्ड में सात अध्याय हैं।
इसके पहले अध्याय में-परिभाषा (शास्त्र द्वारा निश्चित विषयों
का विवरण), दूसरे में-औषध योगों के सेवन का समय एवं
रस, गुण आदि का वर्णन, तीसरे में-नाड़ी-परीक्षा-विधि आदि
विषयों का वर्णन, चौथे में-दीपन, पाचन, लेखन, भेदन आदि
द्रव्यशक्तियों का वर्णन, पाँचवें में-कला, आशय आदि
शारीरिक विषयों का वर्णन, छठे में-आहार, पाक आदि की
गति का वर्णन और सातवें में-रोगों की गणना की गयी है।
मध्यमखण्ड के अध्याय
स्वरसः क्वाथफाण्टौ च हिमः कल्कश्च चूर्णकम्।
तथैव गुटिकालेहौ स्नेहः सन्धानमेव च॥9॥
धातुशुद्धी रसाश्चैव खण्डोऽयं मध्यमः स्मृतः।
मध्यमखण्ड में बारह अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय
में-स्वरस बनाने की विधि, उसके भेद एवं कुछ योग दिये
गये हैं। दूसरे में-क्वाथ बनाने की विधि, उसके भेद और कुछ
योग, तीसरे में-फाण्ट बनाने की विधि तथा उसके अनुरूप
कुछ योग, चौथे में-हिम निर्माण-विधि, तत्सम्बन्धित कुछ
योग, पाँचवें में-कल्क (चटनी) बनाने की विधि तथा कुछ
४ | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
| ४ | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे |
|---|
[बायाँ स्तम्भ]
योग, छठे में-चूर्ण बनाने का विधि, कुछ प्रसिद्ध चूर्णयोग, सातवें में-गुटिका (गोलियाँ) तथा कतिपय योग, आठवें में-अवलेह निर्माण-विधि, कुछ प्रसिद्ध च्यवनप्राश आदि अवलेह योग, नवें में-स्नेह (घी-तेल आदि) पाक-विधि तथा कुछ चिकित्सोपयोगी स्नेह योग, दसवें में-सन्धान-विधि, आसव, अरिष्ट, सिरका आदि के निर्माण की विधि तथा कुछ प्रसिद्ध आसव-अरिष्टयोग एवं परस्पर भेद-विवरण, ग्यारहवें में-विविध प्रकार की धातुओं के शोधन तथा मारण की विधि और बारहवें में-रस (पारद), गन्धक का शोधन-मारण तथा सिद्ध रसयोगों का वर्णन किया गया है।
उत्तरखण्ड के अध्याय
स्नेहपानं स्वेदविधिरुर्वमनं च विरेचनम् ॥ १० ॥
ततस्तु स्नेहवस्तिः स्यात् ततश्चापि निरूहणम्।
ततश्चाप्युत्तरो वस्तिस्ततो नस्यविधिर्मतः ॥ ११ ॥
धूमपानविधिश्चैव गण्डूषादिविधिस्तथा।
लेपादीनां विधिः ख्यातस्तथा शोणितविस्रुतिः ॥ १२ ॥
नेत्रकर्मप्रकारश्च खण्डः स्यादुत्तरस्त्वयम्।
उत्तरखण्ड में तेरह अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय में-स्नेहपान-विधि, स्नेहपाक-विधि और कुछ स्नेहयोग; दूसरे में-स्वेदन (शरीर से पसीना निकालने की) विधि, स्वेदन के विविध भेद; तीसरे में-वमन (उलटी कराने की) विधि, वामक (वमनकारक) योगों का वर्णन, वमन के लक्षण; चौथे में-विरेचन (दस्त कराने की) विधि, विरेचक योगों का वर्णन, विरेचन के लक्षण; पाँचवें में-अनुवासनवस्ति, उसकी विधि; अनुवासन योग; छठे में-निरूहणवस्ति, उसकी विधि, निरूहण योग; सातवें में-उत्तरवस्ति (यह वस्ति पुरुषों के मूत्रमार्ग में और स्त्रियों की योनि में दी जाती है), उत्तरवस्ति-विधि, उत्तरवस्ति में प्रयुक्त होने वाले योग; आठवें में-नस्य (नाक द्वारा ली जाने वाली औषधि) विधि, विविध नस्य योग; नवें में-धूमपान-विधि तथा उसके विविध योग; दसवें में-गण्डूष (कुल्ले करने की) विधि, विविध गण्डूष योग, कवल-धारण-विधि, अनेक प्रकार के कवल योग; ग्यारहवें में-लेप का विधि, विविध प्रकार के रोगों में प्रयुक्त होने वाले लेपयोग; बारहवें में-रक्तस्राव-विधि, रक्त-परिचय, रक्तस्रावहर योग तथा तेरहवें में-नेत्ररोगों की चिकित्सा-विधि नेत्ररोग-नाशक विविध योग आदि दिये गये हैं।
[दायाँ स्तम्भ]
अध्यायों तथा श्लोकों की गणना
द्वात्रिंशत्सम्मिताध्यायैर्युक्तेयं संहिता स्मृता ॥ १३ ॥
षड्विंशतिशतान्यत्र श्लोकानां गणितानि च।
प्रस्तुत शार्ङ्गधरसंहिता में बत्तीस अध्याय हैं (पूर्वखण्ड में ७, मध्यमखण्ड में १२ और उत्तरखण्ड में १३) और श्लोकों की संख्या २६०० (छब्बीस सौ) है।
वक्तव्य- इसका स्पष्टीकरण आलेख में देखें।
मान-परिभाषा
न मानेन विना युक्तिर्द्रव्याणां जायते क्वचित् ॥ १४ ॥
अतः प्रयोगकार्यार्थं मानमत्रोच्यते मया।
मान (परिमाण, नाप या तौल) के बिना औषधद्रव्यों की युक्ति (प्रयोग या व्यवहार) कहीं भी नहीं की जा सकती है। इसलिये प्रयोग करने के लिए मेरे द्वारा यहाँ विविध मानों का वर्णन किया जा रहा है।
वक्तव्य- आयुर्वेदीय आर्षसंहिताओं में दिये गये मागध तथा कालिङ्ग मानों की तुलना आधुनिक मानों के साथ हो सके, इसके लिए उक्त प्राचीन मानों का परिचय यहाँ दिया जा रहा है। वैसे आर्षग्रन्थों में दिये गये इन आर्यमानों की सत्ता मुगलशासन काल में ही समाप्त हो चली थी। आज जिन नाप-तौलों का व्यवहार है, उनसे हमें प्राचीन मानों का समन्वयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिये। आचार्य भावमिश्र ने इस प्रकरण को शार्ङ्गधरसंहिता से प्रायः उद्धृत किया है-आप जरा मिला कर देखें-भा० प्र० निघण्टु मानपरिभाषा-प्रकरण।
मागधमान-परिभाषा
त्रसरेणुर्बुधैः प्रोक्तस्त्रिंशता परमाणुभिः ॥ १५ ॥
त्रसरेणुस्तु पर्यायेनाम्ना वंशी निगद्यते।
विद्वानों ने तीस परमाणुओं का एक त्रसरेणु स्वीकार किया है। 'त्रसरेणु' का ही पर्याय 'वंशी' कहा जाता है।
वक्तव्य- यद्यपि यहाँ तीस परमाणु परिमित एक परिमाण का नाम 'त्रसरेणु' है, तथापि इसका पारिभाषिक अर्थ इस प्रकार है-त्रस=चर या चल या चलायमान जो रेणु=धूल का कण। 'त्रसः च असौ रेणुः च=त्रसरेणुः'। इसका अन्यत्र परिचय इस प्रकार है-'जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः। प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते' ॥ -मनुस्मृति ८.१३२। तथा याज्ञवल्क्यस्मृति १.३६१।
प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 5
परमाणु-परिचय
जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः ।। 16 ।।
तस्य त्रिंशत्तमो भागः परमाणुः स कथ्यते ।
खिड़की या झरोखे में से भीतर की ओर आयी हुई सूर्य
की किरणों के प्रकाश में जो सूक्ष्म (छोटे से छोटे) धूलिकण
(उड़ते हुये-से) दिखलायी पड़ते हैं, उनमें से किसी एक का
तीसवाँ भाग परमाणु कहा जाता है।
वक्तव्य-पृथिवी, जल आदि के सबसे छोटे भाग को
'परमाणु' कहते हैं। यह अणु से भी परमलघु होता है, अतएव
इसे परमाणु कहते हैं। आत्मतत्त्व को भी 'अणोरणीयान्'
कहा गया है।
वंशी का मान
जालान्तरगतैः सूर्यकरैर्वंशी विलोक्यते ।। 17 ।।
जिसे ऊपर त्रसरेणु कहा गया है, उसे ही 'वंशी' भी कहा
जाता है। इस परिमाण को झरोखे के भीतर गयी हुई सूर्य-किरणों
द्वारा देखा जा सकता है।
वक्तव्य-चरक का पौतवमान 'वंशी' या 'ध्वंसी' से
प्रारम्भ होता है। खिड़की से भीतर की ओर आयी हुई
सूर्य-किरणों में जो उड़ते हुये धूल के कण दिखलायी देते हैं,
उन तीस परमाणुओं की एक 'वंशी' (त्रसरेणु) होती है, इसी
को 'ध्वंसी' भी कहते हैं। दूसरे आचार्य ध्वंसी का अर्थ धूल
करते हैं। देखें-च० क० अ० 12.87।
मरीचि आदि के मान
षड्वंशीभिर्मरीचिः स्यात् ताभिः षड्भिस्तु राजिका।
तिसृभी राजिकाभिश्च सर्षपः प्रोच्यते बुधैः ।। 18 ।।
छः त्रसरेणुओं की एक 'मरीचि' होती है; छः मरीचियों
की एक राजिका (राई) होती है और तीन राजिकाओं (राइयों)
का एक सर्षप (गौरसर्षप या पीली सरसों) होता है।
वक्तव्य-तेज धूप में बालू या अभ्रक के जो लघुतम
कण दूर से चमकते हुये दिखलायी देते हैं, उनको 'मरीचि'
कहते हैं। इसी से सम्बन्धित एक प्रसिद्ध शब्द है- मृग-
मरीचिका। इसका अर्थ होता है-मृगतृष्णा। यह मरीचि त्रसरेणु
या वंशी से छः गुना भारी होता है।
यव आदि के मान
यवोऽष्टसर्षपैः प्रोक्तो गुञ्जा स्यात् तच्चतुष्टयम्।
षड्भिस्तु रक्तिकाभिः स्यान्माषको हेमधान्यकौ ।। 19 ।।
आठ सर्षप (सरसों) का एक 'जौ' होता है, चार 'जौ'
की एक 'गुञ्जा' इसी को रत्ती (रक्तिका) या घुंघची भी कहते
हैं और छः रत्ती का एक 'माशा' होता है। इसके पर्याय हैं-
हेम तथा धान्यक।
वक्तव्य-गुञ्जा (घुंघची) वर्णभेद से लाल मुख वाली
तथा काले मुख वाली होती है। लोक-व्यवहार में दोनों को ही
रत्ती कहते हैं। वास्तव में लाल मुख वाली रत्ती (रक्तिका)
को ही सुनार तौल के लिए प्रयुक्त करते हैं। इसकी गणना
उपविषों में है। इसे बाहर से सुन्दर तथा भीतर से विषमयं
देखकर कवियों ने इसकी तुलना स्त्रियों के हृदयों से की है।
यह मान शार्ङ्गधराचार्य-सम्मत है, दूसरे आचार्य 5 रत्ती, 7
रत्ती अथवा 10 रत्ती का एक माशा मानते हैं।
शाण आदि के मान
माषैश्चतुर्भिः शाणः स्याद्धरणः स निगद्यते ।
टङ्कः स एव कथितस्तद्द्वयं कोल उच्यते ।। 20 ।।
क्षुद्रको वटकश्चैव द्रुङ्क्षणः स निगद्यते ।
चार माशा का एक 'शाण' होता है, उसे 'धरण' तथा
'टंक' भी कहते हैं। दो शाण का एक 'कोल' कहा जाता है।
इसी के पर्याय हैं-क्षुद्रक, वटक तथा द्रंक्षण।
कर्ष का मान तथा पर्याय
कोलद्वयं च कर्षः स्यात् स प्रोक्तः पाणिमानिका ।। 21 ।।
अक्षं पिचुः पाणितलं किञ्चित्पाणिश्च तिन्दुकम् ।
बिडालपदकं चैव तथा षोडशिका मता ।। 22 ।।
करमध्यो हंसपदं सुवर्णं कवलग्रहः ।
उदुम्बरं च पर्यायैः कर्ष एव निगद्यते ।। 23 ।।
दो कोल का एक 'कर्ष' होता है। इसके पर्याय हैं-
पाणिमानिका, अक्ष, पिचु, पाणितल, किञ्चित्, पाणि, तिन्दुक,
बिडालपदक, षोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवलग्रह
तथा उदुम्बर।
वक्तव्य-मानों के परिमाणों में समय-समय पर अन्तर
आये हैं, जिसका इतिहास साक्षी है। इसी प्रकार यहाँ दिये गये
कर्ष के पर्यायों में एक 'सुवर्ण' शब्द है। इस 'सुवर्ण' का
परिमाण विष्णु, मनु, याज्ञवल्क्य, सुश्रुत तथा कौटिल्य 16
माशा= 1 सुवर्ण मानते हैं। चरक, लीलावती, शार्ङ्गधर,
भावप्रकाश आदि में यह सुवर्ण शब्द 1 कर्ष=1 तोला का
पर्याय माना गया है। दीपिका व्याख्या युक्त (संवत् 1966 में
कलकत्ता से) प्रकाशित हनुमन्नाटक में 'सुवर्ण' शब्द का
परिचय देते हुये टीकाकार ने लिखा है-'सुवर्णं दशमाषकम्'।
6 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
इसके अनुसार श्रीराम ने जो अँगूठी सीताजी के लिए भेजी
थी, वह दस माशे की थी।
किञ्चित्पाणिश्च-कुछ टीकाकार इसे एक पद, शेष दो
पद मानते हैं। दो पद मानने वालों का पक्ष युक्तिसंगत तथा
व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है, क्योंकि किञ्चित् और पाणि:
ये दोनों पद स्वतन्त्र हैं। आचार्य वृन्द ने भी कर्ष के पर्यायों में
'किञ्चित्' तथा 'पाणि:' को अलग-अलग स्वीकार किया
है। देखें-'किञ्चिच्च कर्षपर्यायः शुक्तिरर्धपलं तथा।
सान्निध्यान्मधुनो मानं व्योषादेर्मिलितस्य च'।। च० चि० अ०
12.50-52। कंसहरीतकी की टिप्पणी में श्रीजयदेव
विद्यालंकार ने इसे उद्धृत किया है।
कर्ष-मागधमान के अनुसार 96 रत्ती=1 रुपया का एक
तोला होता है।
आधा पल तथा पल का मान
स्यात् कर्षाभ्यामर्धपलं शुक्तिरष्टमिका तथा।
शुक्तिभ्यां च पलं ज्ञेयं मुष्टिराम्रं चतुर्थिका ।। 24 ।।
प्रकुञ्चः षोडशी बिल्वं पलमेवात्र कीर्त्यते ।
दो कर्ष (तोला) का एक 'अर्धपल' होता है। उसी को
शुक्ति तथा अष्टमिका भी कहते हैं। दो शुक्ति का एक 'पल'
होता है; ऐसा जानना चाहिये। 'पल' के पर्याय ये हैं-मुष्टि,
आम्र, चतुर्थिका, प्रकुञ्च, षोडशी तथा बिल्व।
प्रसृति आदि के मान
पलाभ्यां प्रसृतिर्ज्ञेया प्रसृतश्च निगद्यते ।। 25 ।।
प्रसृतिभ्यामञ्जलिः स्यात् कुडवोऽर्धशरावकः।
अष्टमानं च स ज्ञेयः कुडवाभ्यां च मानिका ।। 26 ।।
शरावोऽष्टपलं तद्वज्ज्ञेयमत्र विचक्षणैः ।
दो पल की एक 'प्रसृति' होती है और उसी को 'प्रसृत'
अथवा पसर भी कहते हैं। दो प्रसूत की एक 'अंजलि' होती
है। उसी को कुडव, अर्धशरावक तथा अष्टमान कहते हैं। दो
कुडव की एक 'मानिका' होती है। उसी को मान-विशेषज्ञ
'शराव' एवं 'अष्टपल' भी कहते हैं।
वक्तव्य-'अष्टपल' शब्द की सार्थकता यह है कि इस
मान में आठ पल होते हैं।
प्रस्थ तथा आढक के मान
शरावाभ्यां भवेत् प्रस्थश्चतुःप्रस्थैस्तथाढकम् ।। 27 ।।
भाजनं कंसपात्रं च चतुःषष्टिपलं च तत् ।
दो 'शराव' का एक 'प्रस्थ' होता है। चार प्रस्थ का एक
'आढक' होता है। यह चौंसठ पल का होता है। आढक के
पर्यायवाचक नाम ये हैं-भाजन और कंसपात्र।
द्रोण तथा शूर्प के मान
चतुर्भिराधकैर्द्रोणः कलशो नल्वणोन्मनौ ।। 28 ।।
उन्मानश्च घटो राशिर्द्रोणपर्यायवाचकाः ।
द्रोणाभ्यां शूर्पकुम्भौ च चतुःषष्टिशरावकाः ।। 29 ।।
चार आढक का एक 'द्रोण' होता है। द्रोण के पर्यायवाचक
नाम-कलश, नल्वण, उन्मन, उन्मान, घट तथा राशि हैं। दो
द्रोण का एक 'शूर्प' होता है, उसी को 'कुम्भ' भी कहते हैं।
'शूर्प' तथा 'कुम्भ' ये दोनों परिमाण में 64-64 शराव के
होते हैं।
द्रोणी तथा खारी के मान
शूर्पाभ्यां च भवेद् द्रोणी वाहो गोणी च सा स्मृता ।
द्रोणीचतुष्टयं खारी कथिता सूक्ष्मबुद्धिभिः ।। 30 ।।
चतुःसहस्रपलिका षण्णवत्यधिका च सा।
दो शूर्प की एक 'द्रोणी' होती है। उसी को 'वाह' तथा
'गोणी' भी कहा जाता है। तीक्ष्ण बुद्धि वाले विद्वानों ने चार
द्रोणी की एक 'खारी' कही है। इस एक 'खारी' में चार हजार
छियानबे (4096) पल होते हैं।
भार तथा तुला के मान
पलानां द्विसहस्रं च भार एकः प्रकीर्तितः ।। 31 ।।
तुला पलशतं ज्ञेया सर्वत्रैवैष निश्चयः ।
दो हजार पल का एक 'भार' होता है और एक सौ पल
की एक 'तुला' होती है। यही निश्चय सभी को स्वीकार है।
क्रमशः चतुर्गुण के मान
माषटङ्काक्षबिल्वानि कुडवः प्रस्थमाढकम् ।। 32 ।।
राशिर्गोणी खारिकेति यथोत्तरचतुर्गुणाः ।
माष (माशा), टंक, अक्ष, बिल्व, कुडव, प्रस्थ, आढक,
राशि, गोणी तथा खारी ये परिमाण क्रमशः उत्तरोत्तर चौगुने
होते हैं।
**वक्तव्य-**यहाँ तक जिस मान का वर्णन किया गया है,
उसे 'मागधमान' कहते हैं। यह मान बिहार प्रान्त में प्रचलित
होने के कारण 'मागधमान' कहा जाता है। सभी प्रकार के
मान विद्वानों द्वारा निर्धारित एवं आदृत होते हैं। उनमें से
किसी एक मान का विधिवत् प्रयोग करना तथा कराना चाहिये।
प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 7
द्रव आदि द्रव्यों का मान
गुञ्जादिमानमारभ्य यावत् स्यात् कुडवस्थितिः ।। ३३ ।।
द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां तावन्मानं समं मतम् ।
एक 'रत्ती' की तौल से लेकर 'कुडव' तक के सभी द्रव
(तरल, जलीय), आर्द्र (गीले औषधद्रव्य) तथा सूखे द्रव्यों
का मान सम (समान) ही होता है। अर्थात् निर्दिष्ट मात्रा के
बराबर ही द्रव्य या द्रव्यों का ग्रहण करना चाहिये।
द्विगुण मान-व्यवहार
प्रस्थादिमानमारभ्य द्विगुणं तद् द्रवार्द्रयोः ।। ३४ ।।
मानं तथा तुलायास्तु द्विगुणं न क्वचित् स्मृतम् ।
प्रस्थ आदि (प्रस्थ मान है आदि में जिसके, अर्थात्-
शराव के मान से प्रारम्भ कर द्रव तथा आर्द्र=गीले, हरे अथवा
जो भली-भाँति सूखे न हों) द्रव्यों को परिमाण में दूना लेना
चाहिये, किन्तु जिस द्रव्य को तुला-परिमाण में लेने को कहा
गया हो, उसे कहीं भी दूने परिमाण में नहीं लिया जाता है।
वक्तव्य-उपर्युक्त 33 तथा 34 श्लोकों द्वारा जिस विषय
का प्रतिपादन किया गया है, वह कुछ सन्दिग्ध-सा प्रतीत
होता है, क्योंकि महर्षि आत्रेय ने रत्ती या प्रस्थ आदि मानों
का उल्लेख न करके केवल सूखे द्रव्यों की तुलना में द्रव
(जलीय) तथा आर्द्र (गीले) द्रव्यों को ही दूना लेने की
आज्ञा दी है। यथा-‘शुष्कद्रव्येष्विदं मानमेवमादिप्रकीर्तितम् ।
द्विगुणं तद् द्रवेष्विष्टं तथा सद्योद्धृतेषु च।।-च० क० अ०
12.98। महर्षि सुश्रुत ने भी इसी विषय का समर्थन इस प्रकार
किया है-‘शुष्काणां त्विदं मानम्, आर्द्रद्रवाणां च द्विगुणम्'
इति।-सु० चि० अ० 31.7। यही कारण है कि कविराज
गंगाधरराय ने भी आयुर्वेदीयपरिभाषा नामक लघुकाय ग्रन्थ
में कहा है-‘तत्तु न सम्यक्, युक्तिविरोधात् च'। यह विचारणीय
विषय है।
कुडवमान-मापक पात्र
मृद्वृक्षवेणुलोहादेर्भाण्डं यच्चतुरङ्गुलम् ।। ३५ ।।
विस्तीर्णं च तथोच्चं च तन्मानं कुडवं वदेत् ।
मिट्टी, वृक्ष (लकड़ी), बाँस, लोहा (ताँबा, पीतल, काँच)
आदि से बना हुआ वह पात्र, जो चार अंगुल चौड़ा तथा उतना
ही ऊँचा हो, उसमें जितना द्रव-द्रव्य समा सके, वह 'कुडव'
होता है, अर्थात् इस नाप से निर्मित पात्र को 'कुडवपात्र'
कहते हैं।
वक्तव्य-इस प्रकार के परिमाणमापक पात्र 'द्रव्यमान'
के अन्तर्गत आते हैं। आचार्य शार्ङ्गधर ने छोटे मानों के पात्रों
का परिमाण नहीं बतलाया है और न आगे इससे बड़े मानों के
परिमाणों का ही उल्लेख किया है। इस संकेत से आप अपनी
बुद्धि से छोटे तथा बड़े मानों की कल्पना स्वयं कर सकते हैं।
इस प्रकार के पात्र द्रव-द्रव्यों को नापने के उपयोग में लाये
जाते हैं। दूध, तेल आदि द्रव पदार्थ बेचने वालों के पास इस
प्रकार नापने के अनेक पात्र आपको दिखलायी देंगे।
इस प्रकार के पात्रों से सभी द्रव-द्रव्यों का समान रूप से
व्यवहार करना सम्भव नहीं होता है, क्योंकि सभी द्रव्यों का
गुरुत्व परस्पर भिन्न होता है। ध्यान दें-यदि एक कुडवपात्र
में 16 तोला दूध आता है, तो मधु उससे डेढ़ गुना अधिक
आयेगा और घी उससे भी कुछ अधिक आयेगा। इन
व्यवहारोचित विषयों का ज्ञान आप अपने अध्ययनकाल में
गुरुजनों से प्राप्त करें।
योग-नामकरण-विधि
यदौषधं तु प्रथमं यस्य योगस्य कथ्यते ।। ३६ ।।
तन्नाम्नैव स योगो हि कथ्यतेऽत्र विनिश्चयः ।
जिस योग के आरम्भ में सर्वप्रथम जिस औषध द्रव्य का
नाम होता है, वह औषधयोग उसी औषधद्रव्य के नाम से
कहा जाता है। शार्ङ्गधरसंहिता में प्रायः यही निश्चय किया
गया है।
वक्तव्य-प्रस्तुत संहिता में अधिकांश योग ऐसे ही हैं,
जैसा कि ऊपर कहा गया है; किन्तु कुछ योग ऐसे भी प्राप्त हैं,
जो उक्त प्रकार से किये गये निश्चय के विपरीत हैं, जैसे-
सुदर्शन चूर्ण, ज्वरघ्नीगुटिका, नारायणतैल, लोकनाथरस,
लघुलॉकनाथरस आदि। इसका समर्थन हम शास्त्रीय दृष्टि से
इस प्रकार करते हैं-‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति'। आचार्य
शार्ङ्गधर ने उक्त निश्चय प्राचीन संहिताओं में दिये गये
योगनाम-निर्धारण प्रकार को देखकर ही किया होगा, क्योंकि
उनमें भी अधिकांश योगों के नाम उक्त सिद्धान्त पर ही रखे
गये हैं; कुछ स्वतन्त्र-रूप से भी हैं। यह सामान्य-विशेष का
सिद्धान्त सभी क्षेत्रों में देखा जाता है।
मात्रा-विचार
स्थितिर्नास्त्येव मात्रायाः कालमग्निं वयो बलम् ।। ३७ ।।
प्रकृतिं दोषदेशौ च दृष्ट्वा मात्रां प्रकल्पयेत् ।
मात्रा का कोई निश्चित परिमाण नहीं है और न किया ही
जा सकता है। इसलिये काल (समय), अग्नि (जठराग्नि,
को देखकर मात्रा की कल्पना (निर्धारण) करनी चाहिये।
8 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
तथा पाचनशक्ति), वय (बालक, युवा तथा वृद्ध), बल
(शारीरिक तथा मानसिक), प्रकृति (स्वभाव), दोष (वात,
पित्त तथा कफ) तथा देश (आनूप, जांगल तथा साधारण)
को देखकर मात्रा की कल्पना (निर्धारण) करनी चाहिये।
वक्तव्य—मात्रा-निर्धारण करने के लिए संहिताकार ने
जिन मानकों का विचार करने का संकेत किया है, ये सब
विचार औषध मात्रा तथा आहार मात्रा के लिए ही हैं। एक
बात इस प्रसंग में और भी विचारणीय है—औषध-निर्माणकाल
में जिस द्रव्य का परिगणन एक ही योग में दो बार हो जाता है,
उस द्रव्य को दूना ले लिया जाता है किन्तु जब चिकित्सक
किसी रोगी के लिए अनेक योगों को मिलाकर एक योग की
कल्पना करता है, उस समय भी उसे यह विचार कर लेना
चाहिये कि उक्त योगों में कौन-कौन से द्रव्य समान हैं और
इन्हें परस्पर मिला देने से वे-वे द्रव्य कहीं आवश्यकता से
दूने, तिगुने तो नहीं हो गये हैं? इस ओर भी चिकित्सक को
अवश्य ध्यान देना चाहिये, क्योंकि यह भी मात्रा-निर्धारण
क्षेत्र का ही एक महत्त्वपूर्ण अंग है।
कालिंग-मान
यतो मन्दाग्नयो ह्रस्वा हीनसत्त्वा नराः कलौ ।। ३८ ।।
अतस्तु मात्रा तद् योग्या प्रोच्यते सुज्ञसम्मता।
क्योंकि कलियुग में मनुष्य मन्दाग्नि (पाचन शक्ति की
कमी) वाले, ह्रस्व (छोटे कद वाले) और हीनसत्त्व (थोड़ी
मानसिक शक्ति) वाले होते हैं। इसलिये औषध तथा आहार
द्रव्यों की वही मात्रा उनके सेवन करने योग्य होती है, जिसे
विद्वान् चिकित्सक तत्काल बतलाते हैं।
वक्तव्य—प्राचीन आयुर्वेदीय संहिताएँ जिस समय लिखी
गयी हैं उसी समय के पुरुषों की क्षमता के अनुसार सामान्य
मात्राओं का निर्देश किया गया है। जैसे-शिलाजीत का प्रयोग
करने की मात्रा आचार्य पुनर्वसु ने बतलायी है-'पलमधर्धपलं
कर्षो मात्रा तस्य त्रिधा मता'।- च० चि० अ० 1.3.55। इसका
विशेष व्याख्यान 'चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन' से प्रकाशित
चरक संहिता में देखें। आज सामान्य मानव के लिए पल=4
तोला, अर्धपल=2 तोला और कर्ष=1 तोला की मात्रा
व्यावहारिक नहीं है। शास्त्रज्ञ तथा कर्माभ्यास-निपुण
चिकित्सक मात्रा-निर्धारण में स्वयं चतुर होते हैं।
यवो द्वादशभिर्गौरसर्षपैः प्रोच्यते बुधैः ।। ३९ ।।
यवद्वयेन गुञ्जा स्यात् त्रिगुञ्जो वल्ल उच्यते।
माषो गुञ्जाभिरष्टाभिः सप्तभिर्वा भवेत् क्वचित् ।। ४० ।।
स्याच्चतुर्माषकैः शाणः स निष्कष्टङ्क एव च।
गद्याणो माषकैः षड्भिः कर्षः स्याद् दशमाषकः ।। ४१ ।।
चतुष्कर्षैः पलं प्रोक्तं दशशाणमितं बुधैः।
चतुष्पलैश्च कुडवं प्रस्थाद्याः पूर्ववन्मताः ।। ४२ ।।
बारह गौरसर्षपों (पीली सरसों) का एक 'जौ' होता है,
ऐसा कालिंग देश के विद्वान् कहते हैं। दो 'जौ' की एक
'गुञ्जा' (रत्ती) होती है, तीन गुञ्जा (रत्ती) का एक 'वल्ल'
होता है और गुञ्जा का अथवा कहीं-कहीं सात गुञ्जा का एक
'माशा' होता है। चार 'माशा' का एक 'शाण' होता है, उसी
को 'निष्क' तथा 'टंक' भी कहते हैं। छः 'माशा' का एक
'गद्याण' होता है और दस माशा का एक 'कर्ष' होता है। चार
'कर्ष' का एक 'पल' होता है, वह दस 'शाण' के बराबर
होता है। चार 'पल' का एक 'कुडव' होता है। प्रस्थ, आढक
आदि शेष सभी मान मागधमान के समान ही होते हैं।
वक्तव्य—यह 'कालिंगमान' है। इसमें दो मानों का नाम
'मागधमान' से अधिक दिया है। वे मान हैं-वल्ल और
गद्याण। इनका परिमाण ऊपर दिया जा चुका है। इस
'कालिंगमान' के अनुसार कर्ष (तोला) 10 माशा का स्वीकार
किया गया है और यह 10 माशा 70 या 80 रत्ती का होता है,
जब कि मागधमान में 1 कर्ष=12 माशा=96 रत्ती का माना
जाता है। इस प्रकार तुलनात्मक दृष्टि से मागधमान ज्येष्ठ एवं
श्रेष्ठ है, जैसा कि अगले पद्य में कहा गया है। आचार्य शार्ङ्गधर
ने अन्यत्र मागधमान को मान्यता दी है, केवल 'चन्द्रप्रभावटी'
के निर्माण में उन्होंने मागधमान को महत्त्व दिया है। देखें-शा०
सं० म० खं० अ० 7। तदनुसार 4 शाण का 1 कर्ष होता है।
शेष विवेचन 'चन्द्रप्रभावटी' के वक्तव्य में देखें।
द्विविध-मान
कालिङ्गं मागधं चैव द्विविधं मानमुच्यते।
कालिङ्गान्मागधं श्रेष्ठं मानं मानविदो विदुः ।। ४३ ।।
इति मान परिभाषा।
मान दो प्रकार के कहे जाते हैं—1. कालिंग (उड़ीसा
प्रदेश के विद्वानों द्वारा स्वीकृत) मान तथा 2. मागध
(बिहारप्रान्तीय) मान। मान-विषय-विशेषज्ञ विद्वान्
कालिंगमान की तुलना में मागधमान को श्रेष्ठ (मात्रा में बड़ा)
मानते हैं।
वक्तव्य—श्रेष्ठ शब्द का तात्पर्य यहाँ यह है कि जिस मान
प्रथमोऽध्यायः ] परिभाषा 9
का व्यवहार अधिक लोग करते हैं, उसे श्रेष्ठ कहा गया है।
यहाँ श्रेष्ठ का तात्पर्य उत्तम अर्थवाचक कदापि नहीं है।
प्राचीनकाल में मान-भेद
वैजयन्ती-कोषकार ने प्रयोग-भेद से तथा द्रव्य-भेद से
समस्त प्रकार के मानभेदों को इस प्रकार तीन भागों में विभक्त
किया है-'पाय्यं हस्तादिभिर्मानं, द्रुवयं कुडवादिभिः। पौतवं
तुलया प्रोक्तम्' । -वै० कोष।
- पौतवमान-तुला (तराजू) द्वारा पदार्थों के भार का जो
मान लिया जाता है, उसे पौतवमान (Measures of
weight) कहते हैं। - द्रुवयमान-विभिन्न प्रकार के द्रव पदार्थों के आयतन को
जिससे नापा या तौला जाता है उसे द्रुवयमान (Meas-
ures of capacity) कहते हैं। - पाय्यमान-वस्त्र आदि लम्बाई, ऊँचाई, नीचाई, वाले
पदार्थों को जो हाथ आदि नापों द्वारा नापा जाता है, उसे
पाय्यमान (Measures of length) कहते हैं।
कतिपय प्राचीन पौतवमान
(1) विष्णूक्त पौतवमान
8 त्रसरेणु = 1 लिक्षा
3 लिक्षा = 1 राजिका
3 राजिका = 1 श्वेतसर्षप
6 श्वेतसर्षप = 1 यव
3 यव = 1 गुञ्जा
5 गुञ्जा = 1 माषक
12 माषक = 1 अक्षार्ध
16 माषक = 1 सुवर्ण
2 गुञ्जा = 1 रौप्यमाषक
16 रौप्यमाषक = 1 धरण
16 माषक = 1 ताम्रिक कर्ष
(2) मनूक्त पौतवमान
8 त्रसरेणु = 1 लिक्षा
3 लिक्षा = 1 राजसर्षप
3 राजसर्षप = 1 श्वेतसर्षप
6 श्वेतसर्षप = 1 यवमध्यम
3 मध्यमयव = 1 गुञ्जाकृष्णल
5 कृष्णलगुञ्जा = 1 माषक
16 माषक = 1 सुवर्ण
4 सुवर्ण = 1 पल
10 पल = 1 धरण
2 कृष्णल = 1 रौप्यमाषक
16 रौप्यमाषक = 1 रौप्यधरण
16 माषक = 1 कार्षापण
10 रौप्यधरण = 1 शतमान (रजत)
4 सुवर्ण = 1 निष्क (रजत)
(3) याज्ञवल्क्योक्त पौतवमान
8 त्रसरेणु = 1 लिक्षा
3 लिक्षा = 1 राजसर्षप
3 राजसर्षप = 1 श्वेतसर्षप
6 श्वेतसर्षप = 1 यवमध्यम
3 मध्यमयव = 1 कृष्णल (रत्ती)
5 कृष्णल = 1 माषक
16 माषक = 1 सुवर्ण
4-5 सुवर्ण = 1 पल
2 कृष्णल = 1 रौप्यमाषक
16 रौप्यमाषक = 1 धरण
10 धरण = 1 शतमान (रजत)
4 सुवर्ण = 1 निष्क (पल)
(4) सुश्रुतोक्त पौतवमान
12 मध्यमधान्य = 1 सुवर्णमाषक
माष
16 सुवर्णमाषक = 1 सुवर्ण
19 निष्पावमध्यम = 1 धरण
2½ धरण = 1 कर्ष
4 कर्ष = 1 पल
4 पल = 1 कुडव
4 कुडव = 1 प्रस्थ
4 प्रस्थ = 1 आढक
4 आढक = 1 द्रोण
100 पल = 1 तुला
20 तुला = 1 भार
(5) कौटिल्योक्त पौतवमान
16 धान्यमाष = 1 सुवर्णमाषक
10 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
10 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
अथवा
5 रत्ती = 1 सुवर्णमाषक
16 सुवर्णमाषक = 1 सुवर्ण या कर्ष
4 कर्ष = 1 पल
88 श्वेतसर्षप = 1 रौप्यमाषक
16 रौप्यमाषक = 1 धरण
20 शैव्य = 1 धरण
(सेम के बीज)
(हीरा की तौल में प्रयुक्त मान)
(6) लीलावती-ग्रन्थोक्त पौतवमान¹
2 यव = 1 गुञ्जा
3 गुञ्जा = 1 वल्ल
8 वल्ल = 1 धरण
2 धरण = 1 गद्याणक
14 वल्ल = 1 घटक
5 गुञ्जा = 1 माषक
16 माषक = 1 कर्ष
4 कर्ष = 1 पल
1 कर्ष = 1 सुवर्ण (तोला)
(7) यवन-प्रचारित मान²
36 रत्ती = 1 टंक
72 टंक = 1 सेर
40 सेर = 1 मन
(8) आलमगीरशाह-प्रचारित मान³
192 घटक = 1 सेर
5 सेर = 1 घटिका (घड़ी)
8 घटिका = 1 मन
(9) शार्ङ्गधरोक्त पौतवमान⁴
30 परमाणु = 1 त्रसरेणु या वंशी
6 वंशी = 1 मरीचि
6 मरीचि = 1 राजिका
3 राजिका = 1 सर्षप
8 सर्षप = 1 यव
4 यव = 1 गुञ्जा=1 रत्ती
6 रत्ती = 1 माषक=1 माशा
4 माषक = 1 शाण
2 शाण = 1 कोल
2 कोल = 1 कर्ष=1 तोला
2 कर्ष = 1 शुक्ति=2 तोला
2 शुक्ति = 1 पल=4 तोला⁵
2 पल = 1 प्रसूति=8 तोला
2 प्रसूति = 1 अञ्जलि=16 तोला
2 अञ्जलि = 1 मानिका=32 तोला
2 शराव = 1 प्रस्थ=64 तोला
4 प्रस्थ = 1 आढक=256 तोला
4 आढक = 1 द्रोण=1024 तोला
2 द्रोण = 1 शूर्प=2048 तोला
2 शूर्प = 1 द्रोणी=4096 तोला
4 द्रोणी = 1 खारी=16384 तोला
200 पल = 1 भार=8000 तोला
20 पल = 1 तुला=400 तोला
शार्ङ्गधरोक्त मानों का चतुर्गुण सूत्र
4 माशा = 1 टंक
4 टंक = 1 कर्ष
4 कर्ष = 1 पल
4 पल = 1 कुडव
4 कुडव = 1 प्रस्थ
4 प्रस्थ = 1 आढक
4 आढक = 1 द्रोण
4 द्रोण = 1 द्रोणी
4 द्रोणी = 1 खारी
(10) कालिङ्गोक्त पौतवमान
12 गौरसर्षप = 1 यव
2 यव = 1 गुञ्जा
3 गुञ्जा = 1 वल्ल
7 गुञ्जा = 1 माष
अथवा
8 गुञ्जा = 1 माष
1-3. देखें-'लीलावती' परिभाषा-प्रकरण।
4. इनके पर्यायवाची शब्द मूल ग्रन्थ में देखें।
5. तोला में 5 का भाग देने से लब्धि छटांक और इनमें 16 का भाग देने से सेर प्राप्त होंगे।
प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 11
4 माष = 1 शाण | 32 बिन्दु = 1 शुक्ति=2 तोला
6 माष = 1 गद्याण | 64 बिन्दु = 1 पाणिशुक्ति=4 तोला²
10 माष = 1 कर्ष | 1 कुडव = 16 तोला³
4 कर्ष = 1 पल | ( 2 ) यूनानी द्रुवयमान
4 पल = 1 कुडव | 4½ माशा = 1 चम्मच
( 11 ) यूनानी पौतवमान | 12½ तोला = 1 पियाली
2 खशखश = 1 खर्दल=1 राई | 20 तोला = 1 पियालंह
4 खर्दल = 1 उरुज्जह=1 चावल | ( 3 ) दाशमिक द्रुवयमान
4 उरुज्जह = 1 शईरह=1 जौ | (Metric system)
2 शईरह = 1 सुर्ख=1 रत्ती | 1 डेसीलीटर = 1/10 लिटर
4½ माशा = 1 मिस्काल | 1 सेण्टीलीटर = 1/100 लिटर
20 किरात = 1 दीनार | 1 मिलीलीटर = 1/1000 लिटर
20 माशा = 1 इस्तार | 1 डेकालीटर = 10 लिटर
33½ माशा = 1 औकिय्यह | 1 हेक्टोलीटर = 100 लिटर
2 सुर्ख = 1 किरात | 1 किलोलिटर = 1000 लिटर
6 सुर्ख = 1 दांग | ( 1 ) आयुर्वेदीय पाय्यमान
8 सुर्ख = 1 माशा | आयुर्वेद में पौतवमान की भाँति अन्य (द्रुवय, पाय्य)
3½ माशा = 1 दिरहम=1 ड्राम | मानों का विस्तृत वर्णन उपलब्ध नहीं होता है, तथापि इसमें
90 मिस्काल = 1 रतल तिब्बी | उक्त कार्य का निर्वाह करने के लिए जिन मानवाचक शब्दों
2 रतल तिब्बी = 1 मन तिब्बी | का प्रयोग किया जाता है, वे इस प्रकार हैं-
64 तोला = 1 सेर आलमगीरी | 1 अंगुल = 8 जौ ¾ इंच⁴
84 तोला = 1 सेर शाही | 12 अंगुल = 1 वितस्ति=9 इंच⁵
( 12 ) दाशमिक पौतवमान | 21 अंगुल = 1 अरत्नि=16 ½ इंच
(Metric system) | 2 वितस्ति = 1 हस्त=18 इंच⁶
1 ग्राम = लगभग 1 माशा | 1 व्याम = 4 हस्त=6 फीट
1 डेसीग्राम = 1/10 ग्राम | 4 हाथ = 1 दण्ड
1 सेंटीग्राम = 1/100 ग्राम | 2000 दण्ड = 1 कोश
1 मिलीग्राम = 1/1000 ग्राम |
1 डेकाग्राम = 10 ग्राम |
1 हेक्टोग्राम = 100 ग्राम | 2. देखें-सु० चि० अ० 40.28 तथा वृद्धहारीतसंहिता।
1 किलोग्राम = 1000 ग्राम | 3. शार्ङ्गधरसंहिता के अनुसार 4 अंगुल चौड़े, 4 अंगुल ऊँचे मिट्टी,
( 1 ) आयुर्वेदीय द्रुवयमान | पत्थर, बाँस आदि के पात्र में आने योग्य द्रव पदार्थ।
1 बिन्दु = 1 बूँद¹ | 4. धागे में पिरोये हुये 8 जौ की लम्बाई।
8 बिन्दु = 1 शाण= ½ तोला | 5. इसके अन्तर्गत-प्रादेश, ताल, गोकर्ण मान भी होते हैं।
| देखें-अमरकोष।
| 6. कुहनी से कानी उंगली के छोर तक की नाप (अमरकोष)।
- तर्जनी अंगुली के दो पर्वों को किसी द्रव पदार्थ में डुबाकर उठाने | अथवा कुहनी से बीच की उंगली के छोर तक की नाप (हलायुध
से उससे गिरी हुई 1 बूँद। देख-अ० ह० सू० 20.9 | कोष)।
12 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
12 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
( २ ) दाशमिक पाय्यमान (Measures of length)
1 मीटर = 39.37 इंच
1 डेसीमीटर = 1/10 मीटर
1 सेंटीमीटर = 1/100 मीटर
1 मिलीमीटर = 1/1000 मीटर
1 डेकामीटर = 10 मीटर
1 हेक्टोमीटर = 100 मीटर
1 किलोमीटर = 1000 मीटर
नवीन तथा प्राचीन द्रव्य
नवान्येव हि योज्यानि द्रव्याण्यखिलकर्मसु।
विना विडङ्गकृष्णाभ्यां गुडधान्याज्यमाक्षिकैः ॥ ४४ ॥
सभी प्रकार के व्यवहारों में नवीन (ताजे) द्रव्यों का ही उपयोग करना चाहिये, किन्तु निम्नलिखित द्रव्यों को ताजा न लें-वायविडंग, पीपल, गुड, धनियाँ, आज्य (घी) और माक्षिक (मधु या शहद)।
वक्तव्य-यह सूत्र रूप में दिया गया निर्देश विचारणीय है-यहाँ उपर्युक्त पुराने द्रव्यों का प्रयोग औषधयोगों के लिए ही निर्दिष्ट है, शेष कार्यों में इनको नया लिया ही जाता है। नया गुड़, घी, मधु, तथा धनियाँ ये प्रतिदिन बड़े आदर के साथ प्रयुक्त होते हैं। शास्त्र का भी निर्देश है कि भोजन तथा बृंहण कार्यों के लिए इन्हें नया ही लें। भावमिश्र ने 'धान्य' का अर्थ 'धनियाँ' न करके अन्न किया है। नया मधु पुष्टिकारक तथा सर होता है और वही पुराना हो जाने पर मल-संग्राहक, रूक्ष, मेदनाशक तथा दस्तावर हो जाता है। घी एक वर्ष पुराना, गुड़ तीन साल पुराना लेने की परम्परा है। चिकित्सा की दृष्टि से पुराने से पुराना घी अच्छा माना गया है, परन्तु औषधसिद्ध घी साल भर के बाद प्रभावहीन हो जाता है और औषधसिद्ध तैल पुराने उत्तम होते हैं। विशेष-देखें-सुश्रुत सू० अ० 36.7-9।
गीले द्रव्यों का प्रयोग
गुडूची कुटजो वासा कूष्माण्डश्च शतावरी।
अश्वगन्धा सहचरी शतपुष्पा प्रसारिणी ॥ ४५ ॥
पटोलं च तथा निम्बो बला नागबला तथा।
पथ्या पुनर्नवा चैव विदारी चेन्द्रवारुणी ॥ ४६ ॥
पलङ्कषा तथा छत्रा केतकी चेति विंशतिः।
प्रयोक्तव्याः सदैवार्द्रा द्विगुणा नैव कारयेत् ॥ ४७ ॥
(शुष्का यदि च गृह्यन्ते क्रियन्ते द्विगुणा न च।)
गिलोय (गुरूच), कुटज (कुरैया की छाल), अडूसा की पत्तियाँ, कूष्माण्ड (पेठा), शतावरी (शतावर की जड़ें), असगन्ध, सहचरी (कटसरैया), शतपुष्पा (पूर्ववर्ती सभी टीकाकारों ने इसका पर्याय 'सौंफ' लिखा है, वास्तव में यह 'सोया' है। इसके गुण-धर्मों पर ध्यान दें), गन्धप्रसारिणी, परबल की पत्ती, नीम की छाल, बला (बरियारा), नागबला (कंघी), पथ्या (हरड़), पुनर्नवा, विदारीकन्द, इन्द्रायण (इनारू का फल), पलंकषा (गुग्गुलु), छत्रा (छत्ता), केवड़ा का फूल-इन बीस द्रव्यों को सदैव गीले (सरस) या हरे लेकर प्रयोग में लाना चाहिये, किन्तु इनकी मात्रा को दूना नहीं किया जाता। कभी-कभी व्यवहार में ऐसा भी देखा जाता है कि ये द्रव्य सूखे तो ले लिये जाते हैं, किन्तु मात्रा में दूने नहीं लिये जाते।
वक्तव्य-यहाँ 'विंशतिः' शब्द प्रायिक वचन है। इस प्रकार के द्रव्यों की संख्या बीस से भी अधिक देखी जा सकती है, आप संहिता ग्रन्थों का परिशीलन करें। वहाँ यद्यपि इस प्रकार का स्वतन्त्र विचार नहीं किया गया है, तथापि प्रसंगानुसार यह निर्देश तो किया ही गया है, इस योग में किस द्रव्य को किस प्रमाण में कैसा (हरा, गीला या सूखा) लेना चाहिये।
सूखे तथा गीले द्रव्यों का विचार
शुष्कं नवीनं यद् द्रव्यं योज्यं सकलकर्मसु ॥ ४८ ॥
आर्द्रं च द्विगुणं युञ्ज्यादेष सर्वत्र निश्चयः।
चूर्ण, क्वाथ आदि सभी कार्यों में सूखे, किन्तु नवीन (ताजे-गुणवान्) द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये। उनके न मिलने पर ताजे (हरे-गीले) द्रव्यों का प्रयोग किया जा सकता है, किन्तु वे आर्द्र (गीले) द्रव्य परिमाण में दूने लेने होंगे। यह सिद्धान्त सर्वत्र मान्य होता है।
वक्तव्य-यहाँ 'नवीन' शब्द 'प्रत्यग्रोऽभिनवो नव्यः' का पर्याय मात्र नहीं है, अपितु भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में इसकी क्या कालावधि है, इसके लिए देखें-इसी अध्याय के 54वें श्लोक के उत्तरार्ध से 57वें श्लोक के पूर्वार्ध तक के श्लोकों के आशय को। नवीन शब्द का एक आशय यह भी है कि वे द्रव्य सड़े, गले, घुने तथा किसी प्रकार से विकार युक्त न हो गये हों।
अनुक्त परिभाषा
कालेऽनुक्ते प्रभातं स्यादङ्गेऽनुक्ते जटा भवेत् ॥ ४९ ॥
प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 13
भागोऽनुक्ते तु साम्यं स्यात् पात्रेऽनुक्ते च मृन्मयम्।
द्रवेऽनुक्ते जलं ग्राह्यं तैलेऽनुक्ते तिलोद्भवम् ।। ५० ।।
(दुग्धे सर्पिषि मूत्रे च ग्राह्यं गोसम्भवं बुधैः।)
यदि ग्रन्थकार द्वारा औषध सेवन करने का समय-निर्देश
न किया गया हो, तो प्रातःकाल समझ लेना चाहिये। यदि
औषधद्रव्य के पत्र, पुष्प, मूल, त्वचा, निर्यास (गोंद) आदि
का संकेत न किया गया हो, तो उसकी जड़ का ग्रहण करना
चाहिये। यदि किसी औषधयोग के द्रव्यों का अलग-अलग
मान=परिमाण न कहा गया हो, तो सभी द्रव्यों को समभाग में
लेना चाहिये। यदि क्वाथ, अवलेह आदि का निर्माण करने
के लिए किसी पात्र-विशेष का उल्लेख न किया गया हो, तो
मिट्टी के पात्र का ग्रहण करना चाहिये। औषध-निर्माण के
लिए अथवा औषध सेवन करने के लिए जहाँ किसी द्रव
(तरल पदार्थ) का उल्लेख न किया गया हो, वहाँ जल का
ग्रहण करना चाहिये। यदि तिल, सरसों, तीसी (अलसी),
बादाम आदि का नाम-निर्देश न किया गया हो तो वहाँ तिलों
के तेल का प्रयोग करना चाहिये। जहाँ किसी विशेष प्राणी के
दूध, घी, मल, मूत्र का निर्देश न किया गया हो, वहाँ ये सभी
द्रव्य गाय से ही लेने चाहिये।
वक्तव्य-प्रायः ग्रन्थकार इस प्रकार की सामान्य बातों
को चर्चा नहीं किया करते, ऐसी परिस्थिति में ऐसे वचनों का
बड़ा महत्त्व होता है। निघण्टु-ग्रन्थों में प्रायः यह देखा जाता
है कि किसी औषधद्रव्य के कौन-से अंग (अवयव) के क्या
गुण हैं, लिखा रहता है, कहीं नहीं भी मिलता। ऐसे अवसरों
पर इस परिभाषा का प्रयोग होता है। मृन्मय-इसे अनेक
सम्पादकों टीकाकारों ने 'मृण्मय' लिखा है जो व्याकरण की
दृष्टि से अशुद्ध है। द्रवेऽनुक्ते-द्रव पदार्थों का प्रयोग किसी न
किसी प्रकार से चिकित्सा-क्षेत्र में होता ही है। अनुपान,
सहपान आदि में तो विशेष रूप से देखा ही जाता है। ऐसे
संदिग्ध अवसरों पर जल का प्रयोग शास्त्र द्वारा अनुमोदित है।
तिलोद्भवम्-तिलों से उत्पन्न तेल वास्तविक तेल है, शेष
तो आकार की साम्यता होने के कारण तेल कहे जाते हैं।
जितने 'तिलहन' द्रव्य हैं, उन सबसे तेल निकाला जाता है।
ध्यान दें-'तिलहन' नाम में भी तिल शब्द की ही प्रधानता है।
प्राणिज द्रव्यग्रहण-विधि
(जङ्गमानां वयःस्थानां रक्तरोमनखादिकम्।। ५१।।
क्षीरमूत्रपुरीषाणि जीर्णाहारे च संहरेत्।)
रक्त (खून), रोम (लोम तथा केश), नख (नाखून) आदि
(अस्थि, माँस, वसा तथा शुक्र) द्रव्य युवा पशुओं के शरीर
से ही ग्रहण करने चाहिये। यदि दूध, मूत्र, मल इनका ग्रहण
करना हो तो उन पशुओं का जब आहार पच जाये तभी ग्रहण
करना चाहिये।
वक्तव्य-उक्त पद्य सु० सू० अ० 36.16 से लेकर यहाँ
ग्रन्थ की क्षति-पूर्ति की गयी है। आज भी वैज्ञानिक पद्धति
वाले रक्त का ग्रहण 18 वर्ष से 40 वर्ष तक की अवस्था वाले
स्त्री-पुरुषों से ही करते हैं। दूध आदि का ग्रहण आहार के पच
जाने पर करना चाहिये, किन्तु देखा जाता है कि गो-पालनकर्ता
चारा सामने रखकर गाय को दुहते हैं, ऐसा दूध उक्त सिद्धान्त
के विरुद्ध है। संहरण (संग्रह) भी दो प्रकार का होता है-एक
तो द्रव्य को लेकर तत्काल प्रयोग कर लेना और दूसरा लेकर
रख देना।
पुनरुक्त द्रव्य का मान
एकम्प्यौषधं योगे यस्मिन् यत् पुनरुच्यते ।। ५२ ।।
मानतो द्विगुणं प्रोक्तं तद् द्रव्यं तत्त्वदर्शिभिः ।
यदि एक द्रव्य किसी योग में दो बार कहा गया हो, तो
औषध-निर्माण में कुशल विद्वान् उस द्रव्य को दुगुना कर
लेते हैं।
वक्तव्य-यहाँ किसी योग के द्रव्यों को समभाग में लेने
की आज्ञा ग्रन्थकार ने दी हो, वहाँ तो आप उस पुनरुक्त द्रव्यों
को दूना ले लेंगे और जहाँ पहली बार वह द्रव्य दूसरे द्रव्यों के
साथ दूसरे परिमाण में परिगणित हो और दूसरी बार दूसरे
परिमाण वाले द्रव्यों के बीच में परिगणित हो तो वहाँ उसका
वही-वही परिमाण होगा। इसका सावधानीपूर्वक विचार
कर लें।
लाल एवं सफेद चन्दन का विचार
चूर्णस्नेहासवा लेहाः प्रायशश्चन्दनान्विताः ।। ५३ ।।
कषायलेपयोः प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम्।
चूर्ण, स्नेह (घी, तेल, वसा तथा मज्जा), आसव तथा
अवलेह इनके निर्माण में प्रायः सफेद चन्दन का और कषाय
(क्वाथ) एवं लेप आदि में लाल चन्दन का प्रयोग करना
चाहिये।
वक्तव्य-लाल तथा सफेद चन्दन के गुण-धर्मों का
विचार कर युक्ति-विशेषज्ञ चिकित्सक इन उपर्युक्त नियमों में
परिवर्तन भी कर सकता है। यह अनुमति 'प्रायः' शब्द का
प्रयोग करके ग्रन्थकार ने दी है।
पाठ भेद—यद्यपि शार्ङ्गधरसंहिता अधिकांश संस्करणों
14 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
में 'प्रायशश्चन्दनान्विताः' पाठ प्राप्त होता है, परन्तु इसका
एक पाठभेद है-'साध्या धवलचन्दनैः'। इस पाठ से
'सफेदचन्दन' की कामना तो पूर्ण हो जाती है, किन्तु 'प्रायः'
शब्द का गौरवपूर्ण भाव समाप्त हो जाता है ऐसा कुछ टीकाकारों
का मत है। इसके लिए उन्हें श्लोक के उत्तरार्ध में पठित प्रायः
शब्द का प्रयोग कर ही लेना चाहिये।
चूर्णादि में गुणहीनता का विचार
गुणहीनं भवेद् वर्षादूर्ध्वं तद्रूपमौषधम् ।। ५४ ।।
मासद्वयात् तथा चूर्णं हीनवीर्यत्वमाप्नुयात्।
हीनत्वं गुटिकालेहौ लभेते वत्सरात् परम् ।। ५५ ।।
हीनाः स्युर्घृततैलाद्याश्चतुर्मासाधिकात् तथा।
ओषध्यो लघुपाकाः स्युर्निर्वीर्या वत्सरात् परम् ।। ५६ ।।
पुराणाः स्युर्गुणैर्युक्ता आसवा धातवो रसाः।
एक वर्ष के बाद प्रत्येक वानस्पतिक औषधद्रव्य जैसे
लाये थे, वैसे ही यदि पड़ा हो, तो वह गुणहीन हो जाता है,
अर्थात् वह अपने रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव से
रहित हो जाता है। तद्रूप का एक अर्थ यह भी है यदि उन काष्ठ
औषध द्रव्यों का वास्तविक रूप बदलकर किसी रासायनिक
योग के साथ प्रयोग कर लिया जाता है, तो उनके गुणों में
चिरस्थायिता आ जाती है। दो मास के बाद चूर्ण (पीसे हुये
काष्ठ द्रव्य) शक्तिहीन हो जाते हैं। एक वर्ष के पश्चात् गोली
तथा अवलेह के रूप में बनाकर रखे गये काष्ठ औषधद्रव्य
तथा एक वर्ष चार मास (अर्थात् 16 मास) के बाद काष्ठ
औषधों के योग से तैयार किये गये घी, तेल, तथा वसा आदि
हीनवीर्य हो जाते हैं। लघुपाकी (शीघ्र पक जाने वाले
औषधद्रव्य जैसे-बरसाती घास, आदि) औषधियाँ भी एक
वर्ष के बाद शक्ति रहित हो जाती हैं, किन्तु आसव, अरिष्ट,
तथा लोह आदि धातुओं की भस्में तथा रस (पारद-गन्धक
के योग से निर्मित) औषधयोग जितने अधिक पुराने होते हैं,
उतने अधिक गुणवान् होते जाते हैं।
वक्तव्य-जहाँ जिन द्रव्यों की गुणहीनता की जो अवधि
कहीं गयी है, वह प्रयोगात्मक दृष्टि से क्रमशः अपने गुण,
वीर्य आदि से हीन होती देखी जाती है। 'चतुर्मासाधिकात्
तथा'-यद्यपि प्रसंगानुसार इसका अर्थ सोलह मास से अधिक
होता है, किन्तु कुछ विद्वान् इसका अर्थ 'वर्षाऋतु के चार
मास बीतने पर' ऐसा अर्थ करते हैं। व्याकरण की दृष्टि से यह
अर्थ प्राप्त नहीं होता है, परन्तु चूर्ण आदि बनाने के बाद बीच
में जब भी वर्षा ऋतु आ जाती है, उसका दुष्प्रभाव तो पड़ता
ही है। घी, तेल के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत प्राप्त होते हैं।
तो भी ताजा घी का प्रयोग करने का जहाँ निर्देश है, वहाँ
सालभर के भीतर का ही लेना चाहिये। पुराने घी की जहाँ
प्रशंसा है, उसका वर्णन हम यथास्थान करेंगे। तेल पुराने
अच्छे माने जाते हैं। जौ, गेहूँ, तिल, तथा माष आदि अन्न नये
ही लिये जाते हैं। कहीं-कहीं इनको पुराना ग्रहण करने की भी
चर्चा है। आसव-अरिष्ट पुराने होने पर उनकी मादकता क्रमशः
कम हो जाती है और लाभ की दृष्टि से उनमें कमी नहीं आती
है। अतएव उन्हें अच्छा कहा गया है। विशेष-देखें-सु० सू०
अ० ३६ सम्पूर्ण।
गुणहीनता का निर्णय
(विगन्धेनापरामृष्टमविपन्नं रसादिभिः ।। ५७ ।।
नवं द्रव्यं पुराणं वा ग्राह्यमेव विनिर्दिशेत्।)
जिस औषधद्रव्य में दुर्गन्ध (द्रव्य की स्वाभाविक गन्ध
से विपरीत गन्ध) उत्पन्न न हुई हो, जिसके अपने स्वाभाविक
रस, गुण आदि नष्ट न हो गये हों, वह द्रव्य यदि नया हो
अथवा पुराना ही हो, तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिये।
वक्तव्य-उक्त पद्य (सु० सू० अ० 36.15) में नये तथा
पुराने द्रव्यों के ग्रहण के सम्बन्ध में यह तो बतलाया गया है
कि वे द्रव्य कैसे होने चाहिये, किन्तु यह नहीं कहा गया है,
कि किन द्रव्यों को नया लें और किन द्रव्यों को पुराना।
इसका विचार महर्षि सुश्रुत ने इस प्रकार किया है-'चिकित्सा
के लिए सभी नये द्रव्यों का ही प्रयोग करना चाहिये। केवल
मधु, घी, गुड़, पिप्पली और वायविडंग को एक वर्ष पुराना
लेना चाहिये।' इस प्रसंग में कुछ टीकाकारों का मत है, कि
'धनियाँ' भी पुराना ही लेना चाहिये, किन्तु लोकव्यवहार में
ये सभी द्रव्य नये ही लिये जाते हैं। देखें-सु० सू० अ०
36.8-9।
भेषज-भण्डार
(प्लोतमृद्भाण्डफलकशङ्कुविन्यस्तभेषजम् ।। ५८ ।।
प्रशस्तायां दिशि शुचौ भेषजागारमिष्यते।)
प्लोत (साफ-सुथरे वस्त्रों के टुकड़े), मिट्टी के पात्र,
फलक (लकड़ी की पट्टियाँ), तथा शंकु (नुकीली कील)
आदि में औषध द्रव्यों को जहाँ सुरक्षित रखते हैं, उसे
औषध-भंडारगृह कहते हैं। इस भंडारगृह को पूर्व दिशा की
ओर पवित्र स्थान पर बनवाना चाहिये।
प्रथमोऽध्यायः ] परिभा॒षा 15
वक्तव्य-प्लोत शब्द से थैला, बोरा या कपड़े की गठरी
का, मृद्भाण्ड शब्द से चीनी मिट्टी के मर्तबान, बोयाम,
काँच या शीशा के जार, बरनी, शीशी, बोतल आदि का,
फलक शब्द से लकड़ी की टाँड, आलमारी, बक्सा आदि का
तथा न्यङ्कु शब्द से खूँटी, छत पर लटका हुआ कुंडा आदि का
ग्रहण करना चाहिये। इन्हीं में औषधद्रव्यों को भरकर,
सँभालकर लटकाकर यथायोग्य रखें, क्योंकि यह भेषजागार
है। इसमें सभी आवश्यक औषधद्रव्यों आदि का संग्रह करके
रखा जाता है। देखें-सु० सू० अ० 38.81।
भेषज-भण्डार-स्वरूप
(धूमवर्षानिलक्लेदैः सर्वर्तुष्वनभिद्रुते ।। 59 ।।
ग्राहयित्वा गृहे न्यस्येद् विधिनौषधसङ्ग्रहम्।)
जिस घर में धुआँ, वर्षा, अनिल (दूषित वायु) तथा
क्लेद (गीलापन) का अहितकर प्रभाव औषधद्रव्यों पर न
पड़ सके, उस घर में विधिपूर्वक संग्रह किये गये उन औषधद्रव्यों
को रखना चाहिये।
वक्तव्य-संग्रह करके रखी हुई प्रत्येक वस्तु की
समय-समय पर देख-रेख भी करते रहना चाहिये, नहीं तो वे
काम में लाने योग्य नहीं रह जातीं। इनमें उपयुक्त धुआँ आदि
को प्रधान कारण माना गया है। वर्षानिल-इस पद का
टीकाकारों ने भिन्न-भिन्न अर्थ किया है-वर्षा के कारण
औषधद्रव्य सड़ जाते हैं, वर्षानिल = बरसाती हवा के कारण
उनमें बुकनी या फफूंदी लग जाती है, अथवा अनिल = दूषित
वायु के कारण उनका प्रभाव कम हो जाता है। इस प्रकार ये
सभी अर्थ प्रकरणोचित हैं।
विशेष-यह पाठ सुश्रुतसंहिता से लिया गया है। देखें-सु०
सू० अ० 38.81।
उचित-अनुचित द्रव्य
व्याधेरयुक्तं यद् द्रव्यं गणोक्तमपि तत् त्यजेत् ।। 60 ।।
अनुक्तमपि यद् युक्तं योजयेत् तत्र तद् बुधः।
बुद्धिमान् चिकित्सक का प्रमुख कर्तव्य है कि वह गण
में कहे गये भी उस द्रव्य का ग्रहण न करे, जो द्रव्य रोगी के
रोग का शमन करने में उपयुक्त न हो और जो द्रव्य उस गण
में नहीं कहा गया हो, किन्तु रोग-शमन में उपयोगी हो तो भी
उस द्रव्य का ग्रहण कर लेना चाहिये।
वक्तव्य-आयुर्वेदीय संहिताओं में अनेक प्रकार के
औषधद्रव्यों के गणों का उल्लेख मिलता है, जिनका संग्रह
सामान्य दृष्टि से किया गया था, किन्तु यहाँ उक्त निर्देश विशेष
परिस्थिति के लिए किया गया है। अतः शास्त्रोक्त क्वाथ,
चूर्ण, आसव, अरिष्ट, तथा अवलेह आदि के योगों में कहे गये
उस-उस अनुपयोगी द्रव्य या द्रव्यों को निकालकर उपयोगी
द्रव्यों को मिला लेने की अनुमति ग्रन्थकार चिकित्सक को दे
रहा है।
स्थानभेद से औषधद्रव्यों का विचार
आग्नेया विन्ध्यशैलाद्याः सौम्यो हिमगिरिर्मतः ।। 61 ।।
अतस्तदौषधानि स्युरनुरूपाणि हेतुभिः ।
अन्येष्वपि प्ररोहन्ति वनेषूपवनेषु च ।। 62 ।।
गृह्णीयात् तानि सुमनाः शुचिः प्रातः सुवासरे।
आदित्यसम्मुखो मौनी नमस्कृत्य शिवं हृदि ।। 63 ।।
विन्ध्याचल, सह्याद्रि आदि पर्वत श्रेणियाँ आग्नेय
(अग्निगुण-प्रधान) अर्थात् उष्ण प्रभाव वाली होती हैं और
हिमगिरि (हिमालय) सौम्य (सोमगुण युक्त) होता है, अर्थात्
शीत प्रभाव वाला होता है। इसलिये उक्त प्रकार की पर्वत
श्रेणियों में पैदा होने वाली औषधियाँ अपने-अपने स्थान में
उत्पन्न होने के कारण से तदनुरूप गुणों वाली होती हैं। अर्थात्
विन्ध्य आदि पर्वत श्रेणियों में पैदा होने वाली उष्णगुण-प्रधान
तथा हिमालय परिसर में पैदा होने वाली शीतगुण-प्रधान
औषधियाँ होती हैं। इसके अतिरिक्त स्थानों (समतल प्रदेशों)
में, वनों तथा उपवनों (बगीचों) में भी औषधियाँ उगती या
उगायी जाती हैं। उक्त सभी प्रकार की औषधियों को चिकित्सक
प्रसन्नचित्त होकर, मनसा, वाचा पवित्र होकर, प्रातःकाल,
शुभवार (दिन) में, सूर्य की ओर मुख करके मौन धारण कर
तथा हृदय में शिव जी को प्रणाम कर ग्रहण करे।
वक्तव्य-विन्ध्याचल आदि पर्वत आग्नेय और हिमालय
सौम्यगुण-प्रधान है। उक्त स्थानों पर होने वाली औषधियाँ
तदनुरूप होती हैं, ऐसा जो कहा गया है, वह सामान्य वचन
है। उदाहरणस्वरूप आप 'वत्सनाभ' विष का परिचय देखें।
यह हिमालयप्रदेश में 10 से 14 हजार फुट की ऊँचाई पर पैदा
होता है। यह हिमालय के अनुरूप न होकर उष्णवीर्य होता है।
ऐसी विशेषताएँ सामान्य वचनों के बीच में सर्वत्र मिलती
ही हैं।
वनेषूपवनेषु च-'वनेषु' प्राकृतिक वनों में, जहाँ वृक्ष,
लता, गुल्म आदि स्वयं पैदा हो जाते हैं। उपवनेषु-ये वे
बगीचे हैं जिन्हें 'भैषज्योद्यान' कहा जाता है। इस प्रकार के
16 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
उपवन आयुर्वेदीय शिक्षा देने की दृष्टि से महाविद्यालयों,
विश्वविद्यालयों की भूमि पर लगाये जाते हैं। औषध-ग्रहण या
संग्रहण की विधि तन्त्रशास्त्र में भी देखी जाती है। यहाँ 'प्रातः'
शब्द का अर्थ सूर्योदय के पूर्व भी लिया जा सकता है और
'आदित्यसम्मुखः' का अर्थ पूर्वाभिमुख भी देखा जाता है।
सुवासरे का अर्थ है-शुभ दिन में। ज्योतिःशास्त्र के अनुसार
तिथि, वार, चन्द्र तथा नक्षत्र जिस दिन अनुकूल हों, उसे
'सुवासर' कहा जाता है। इसके लिए मुहूर्तचिन्तामणि का
नक्षत्र-प्रकरण देखें। मौनी शब्द से औषधिग्रहण के मन्त्र का
मन ही मन जप करने का यह संकेत मिलता है। नमस्कृत्य
शिवं हृदि-शिव संसार का कल्याण करने वाले देव हैं और
इन्हीं का एक नाम 'मृत्युञ्जय' है। चिकित्सा का मूल लक्ष्य
मृत्यु को जीतना ही है। अतएव औषधिग्रहण काल में इन्हें
प्रणाम करने का निर्देश किया है।
त्रिविध देश-लक्षण
(बहूदकनगोऽनूपः कफमारुतरोगवान्।
जाङ्गलोऽल्पाम्बुशाखी च पित्तासृङ्मरुतोत्तरः ।। 64 ।।
संसृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः ।)
जिस देश में जल अधिक बरसता हो; झील, नदी, नाले,
तथा कुएँ, आदि अधिक हों तथा नग अर्थात् पेड़, पहाड़
अधिक हों और कफ एवं वात दोष के कारण होने वाले रोग
जहाँ अधिक होते हों, वह 'आनूप देश' है। जिस देश में जल
तथा वृक्ष (अनूप देश की अपेक्षा) कम हों और पित्त, रक्त
तथा वात दोष सम्बन्धी रोग अधिक मात्रा में होते हों, वह
'जांगल देश' है। उक्त दोनों (आनूप तथा जांगल) देशों के
लक्षणों से युक्त लक्षण जिसमें दिखलायी दें, वह 'साधारण
देश' माना जाता है।
वक्तव्य-औषध-संग्रह, रोग-निर्णय, तथा साध्यासाध्य-
विचार आदि के अवसर पर इन देशों का भी सहारा लिया
जाता है। इस दृष्टि से समस्त भूमण्डल का विचार किया जा
सकता है। इनका विशेष विवरण देखें-च० वि० अ० 3..
47-48। च० क० अ० 1.8। अत्रिसंहिता। सु० सू० अ० 36
तथा राजनिघण्टु में।
द्रव्यग्रहण-निर्देश
साधारणधराद्रव्यं गृह्णीयादुत्तराश्रितम् ।। 65 ।।
(द्रव्याणि तत्र जायन्ते तद्गुणानि विशेषतः ।)
साधारण भूमि (देश) में उत्पन्न उस औषधद्रव्य को
ग्रहण करना चाहिये, जो उत्तर दिशां की ओर उत्पन्न हुआ हो,
क्योंकि वहाँ (उस ओर) जो द्रव्य उत्पन्न होते हैं, वे विशेष
रूप से अपने-अपने गुणों से युक्त होते हैं।
वक्तव्य-'उत्तराश्रितम्' इसका महत्त्व ऊपर 61वें पद्य
में इस प्रकार वर्णित है-'सौम्यो हिमगिरिर्मतः' अर्थात् उत्तर
दिशा सौम्यगुण से समृद्ध होती है। महर्षि सुश्रुत ने अपनी
संहिता में इस पद्य को दिया है, जिसका पूर्वार्ध भिन्न है।
देखें-सु० सू० अ० 36.14।
निन्दित भेषज द्रव्य
वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः ।। 66 ।।
जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसिद्धदाः ।
वल्मीक (वामी या दीमकों से बनाया गया मिट्टी का
टीला) पर उत्पन्न या उससे घिरी हुई, कुत्सित (निन्दित,
गन्दे) स्थान में पैदा हुई, अनूपदेशज, श्मशान भूमि (जहाँ
मरे हुये पुरुषों को जलाया अथवा गाड़ दिया जाता है, उस
स्थान) पर, ऊषर (बंजर भूमि अथवा नमक या रेह के कणों
से व्याप्त) भूमि पर तथा मार्ग के बीच में या उसके
अगल-बगल में उत्पन्न हुई अर्थात् जो पथिकों के पैरों से
कुचल दी गयी हो और जो कीड़ों से खायी गयी हो, जो आग
से जल गयी हो एवं हिम (बर्फ या पाला या ओला) से
व्याप्त हो, ऐसी ओषधियाँ कार्य में सिद्धि नहीं देती हैं। अतः
ऐसी औषधियों का संग्रह नहीं करना चाहिये।
वक्तव्य-आप ध्यान दें कि ग्रन्थकार ने इस प्रकार की
औषधियों के संग्रह का निषेध क्यों किया है? वल्मीक के
भीतर जहरीले सर्प रहते हैं। उनके स्पर्श या दंश से वे दूषित
हो सकती हैं। कुत्सित शब्द स्वयं ही औषधि की अयोग्यता
का संकेत कर रहा है। अनूपदेशज औषधियाँ कफवर्धक तथा
वातकारक होती हैं। श्मशान-प्रदेश में उत्पन्न औषधियाँ भूत-प्रेत
तथा चिता-धूम से दूषित होती हैं। मार्गज औषधियाँ अपने
स्वरूप में प्राप्त नहीं हो पाती हैं। शेष स्पष्ट है। तात्पर्य यह है
कि सम्पूर्ण गुणसम्पन्न औषधद्रव ही कार्य (चिकित्सा) में
सिद्धि प्रदान कर सकते हैं।
ऋतुभेद से औषधद्रव्य-संग्रह
शरद्यखिलकार्यार्थ ग्राह्यं सरसमौषधम् ।। 67 ।।
विरेक-वमनार्थं च वसन्तान्ते समाहरेत् ।
सभी कार्यों (चूर्ण, गुटिका, लेप, अवलेह, आसव, तथा
अरिष्ट आदि) के लिए शरद् ऋतु (आश्विन-कार्तिक मासों) में