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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 356 में से

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पृष्ठ 43

प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 7
द्रव आदि द्रव्यों का मान
गुञ्जादिमानमारभ्य यावत् स्यात् कुडवस्थितिः ।। ३३ ।।
द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां तावन्मानं समं मतम् ।
एक 'रत्ती' की तौल से लेकर 'कुडव' तक के सभी द्रव
(तरल, जलीय), आर्द्र (गीले औषधद्रव्य) तथा सूखे द्रव्यों
का मान सम (समान) ही होता है। अर्थात् निर्दिष्ट मात्रा के
बराबर ही द्रव्य या द्रव्यों का ग्रहण करना चाहिये।
द्विगुण मान-व्यवहार
प्रस्थादिमानमारभ्य द्विगुणं तद् द्रवार्द्रयोः ।। ३४ ।।
मानं तथा तुलायास्तु द्विगुणं न क्वचित् स्मृतम् ।
प्रस्थ आदि (प्रस्थ मान है आदि में जिसके, अर्थात्-
शराव के मान से प्रारम्भ कर द्रव तथा आर्द्र=गीले, हरे अथवा
जो भली-भाँति सूखे न हों) द्रव्यों को परिमाण में दूना लेना
चाहिये, किन्तु जिस द्रव्य को तुला-परिमाण में लेने को कहा
गया हो, उसे कहीं भी दूने परिमाण में नहीं लिया जाता है।
वक्तव्य-उपर्युक्त 33 तथा 34 श्लोकों द्वारा जिस विषय
का प्रतिपादन किया गया है, वह कुछ सन्दिग्ध-सा प्रतीत
होता है, क्योंकि महर्षि आत्रेय ने रत्ती या प्रस्थ आदि मानों
का उल्लेख न करके केवल सूखे द्रव्यों की तुलना में द्रव
(जलीय) तथा आर्द्र (गीले) द्रव्यों को ही दूना लेने की
आज्ञा दी है। यथा-‘शुष्कद्रव्येष्विदं मानमेवमादिप्रकीर्तितम् ।
द्विगुणं तद् द्रवेष्विष्टं तथा सद्योद्धृतेषु च।।-च० क० अ०
12.98। महर्षि सुश्रुत ने भी इसी विषय का समर्थन इस प्रकार
किया है-‘शुष्काणां त्विदं मानम्, आर्द्रद्रवाणां च द्विगुणम्'
इति।-सु० चि० अ० 31.7। यही कारण है कि कविराज
गंगाधरराय ने भी आयुर्वेदीयपरिभाषा नामक लघुकाय ग्रन्थ
में कहा है-‘तत्तु न सम्यक्, युक्तिविरोधात् च'। यह विचारणीय
विषय है।
कुडवमान-मापक पात्र
मृद्वृक्षवेणुलोहादेर्भाण्डं यच्चतुरङ्गुलम् ।। ३५ ।।
विस्तीर्णं च तथोच्चं च तन्मानं कुडवं वदेत् ।
मिट्टी, वृक्ष (लकड़ी), बाँस, लोहा (ताँबा, पीतल, काँच)
आदि से बना हुआ वह पात्र, जो चार अंगुल चौड़ा तथा उतना
ही ऊँचा हो, उसमें जितना द्रव-द्रव्य समा सके, वह 'कुडव'
होता है, अर्थात् इस नाप से निर्मित पात्र को 'कुडवपात्र'
कहते हैं।
वक्तव्य-इस प्रकार के परिमाणमापक पात्र 'द्रव्यमान'
के अन्तर्गत आते हैं। आचार्य शार्ङ्गधर ने छोटे मानों के पात्रों
का परिमाण नहीं बतलाया है और न आगे इससे बड़े मानों के
परिमाणों का ही उल्लेख किया है। इस संकेत से आप अपनी
बुद्धि से छोटे तथा बड़े मानों की कल्पना स्वयं कर सकते हैं।
इस प्रकार के पात्र द्रव-द्रव्यों को नापने के उपयोग में लाये
जाते हैं। दूध, तेल आदि द्रव पदार्थ बेचने वालों के पास इस
प्रकार नापने के अनेक पात्र आपको दिखलायी देंगे।
इस प्रकार के पात्रों से सभी द्रव-द्रव्यों का समान रूप से
व्यवहार करना सम्भव नहीं होता है, क्योंकि सभी द्रव्यों का
गुरुत्व परस्पर भिन्न होता है। ध्यान दें-यदि एक कुडवपात्र
में 16 तोला दूध आता है, तो मधु उससे डेढ़ गुना अधिक
आयेगा और घी उससे भी कुछ अधिक आयेगा। इन
व्यवहारोचित विषयों का ज्ञान आप अपने अध्ययनकाल में
गुरुजनों से प्राप्त करें।
योग-नामकरण-विधि
यदौषधं तु प्रथमं यस्य योगस्य कथ्यते ।। ३६ ।।
तन्नाम्नैव स योगो हि कथ्यतेऽत्र विनिश्चयः ।
जिस योग के आरम्भ में सर्वप्रथम जिस औषध द्रव्य का
नाम होता है, वह औषधयोग उसी औषधद्रव्य के नाम से
कहा जाता है। शार्ङ्गधरसंहिता में प्रायः यही निश्चय किया
गया है।
वक्तव्य-प्रस्तुत संहिता में अधिकांश योग ऐसे ही हैं,
जैसा कि ऊपर कहा गया है; किन्तु कुछ योग ऐसे भी प्राप्त हैं,
जो उक्त प्रकार से किये गये निश्चय के विपरीत हैं, जैसे-
सुदर्शन चूर्ण, ज्वरघ्नीगुटिका, नारायणतैल, लोकनाथरस,
लघुलॉकनाथरस आदि। इसका समर्थन हम शास्त्रीय दृष्टि से
इस प्रकार करते हैं-‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति'। आचार्य
शार्ङ्गधर ने उक्त निश्चय प्राचीन संहिताओं में दिये गये
योगनाम-निर्धारण प्रकार को देखकर ही किया होगा, क्योंकि
उनमें भी अधिकांश योगों के नाम उक्त सिद्धान्त पर ही रखे
गये हैं; कुछ स्वतन्त्र-रूप से भी हैं। यह सामान्य-विशेष का
सिद्धान्त सभी क्षेत्रों में देखा जाता है।
मात्रा-विचार
स्थितिर्नास्त्येव मात्रायाः कालमग्निं वयो बलम् ।। ३७ ।।
प्रकृतिं दोषदेशौ च दृष्ट्वा मात्रां प्रकल्पयेत् ।
मात्रा का कोई निश्चित परिमाण नहीं है और न किया ही
जा सकता है। इसलिये काल (समय), अग्नि (जठराग्नि,