शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें(xxx)
शम्बूक तैल — 270 | रक्तमोक्षण में अपथ्य — 276
कर्णस्रावहर योग — 270 | तुम्बी-प्रयोग-विधि — 276
स्वर्जिका योग — 271 | जलौका-प्रयोग — 277
आम्रादि तैल — 271 | सिरावेध — 277
कर्णकीटहर योग (1) — 271 | त्रयोदशोऽध्यायः
कर्णकीटहर योग (2) — 271 | नेत्ररोगनाशक उपचार — 278
द्वादशोऽध्यायः | सेचन-विधि — 278
रोगानुसार रक्त-निर्हरण — 272 | वाताभिष्यन्द पर सेचन (1) — 278
रक्त-निर्हरण काल तथा लाभ — 272 | वाताभिष्यन्द पर सेचन (2) — 278
शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त का लक्षण — 272 | वाताभिष्यन्द पर सेचन (3) — 278
रक्तदुष्टि के लक्षण — 272 | रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (1) — 279
रक्तवृद्धि के लक्षण — 272 | रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (2) — 279
रक्तक्षय के लक्षण — 272 | नेत्रशूलनाशक योग — 279
वातदूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन-विधि — 279
पित्तदूषित रक्त के लक्षण — 273 | वातादि भेद से आश्च्योतन — 279
कफदूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन का धारण काल — 279
द्विदोष तथा त्रिदोष से दूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन के योग (1) — 279
विषदूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन के योग (2) — 279
शुद्ध रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन के योग (3) — 279
रक्तस्राव के योग्य रोग — 273 | पिण्डिकाविधान — 280
रक्तस्राव की विधियाँ — 274 | पिण्डी के योग (1) — 280
किनका रक्त नहीं निकालना चाहिये — 274 | पिण्डी के योग (2) — 280
रक्तस्रावण यन्त्र — 274 | पिण्डी के योग (3) — 280
शृंग आदि द्वारा रक्तस्रावण — 274 | पिण्डी के योग (4) — 280
रक्तस्राव के अयोग्य काल एवं रोगी — 274 | बिडालक-विधि — 280
रक्तस्रावकारक उपाय — 274 | बिडालक के योग (1) — 280
रक्तस्राव का समय — 274 | बिडालक के योग (2) — 280
रक्तातिस्राव परिहार — 275 | बिडालक के योग (3) — 281
रक्त की अतिप्रवृत्ति में चिकित्सा — 275 | बिडालक के योग (4) — 281
रक्तरोधन के उपाय — 275 | बिडालक के योग (5) — 281
अग्निदाह-विधि — 275 | बिडालक के योग (6) — 281
अधिक रक्तस्राव का निषेध — 275 | तर्पण-विधि — 281
रक्त का महत्त्व — 276 | तर्पण का निषेध — 281
रक्तस्रावजनित दोष का प्रतिकार — 276 | तर्पण-विधि — 281
रक्तस्राव का फल — 276 | तर्पण के पश्चात् कर्म — 282
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA | तर्पणकाल तथा सम्यक् तर्पण का लक्षण — 282