सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
३४० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।२७ § ८७१ -
§ ८७१. यद् बहुवक्तव्यं ध्यानमिति पृथग्व्यवस्थापितं तस्येदानीं भेदाभिधानं प्राप्तकालम् ।
तदुल्लङ्घ्य तस्य प्रयोक्तृस्वरूपकालनिर्धारणार्थमुच्यते—
उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ॥२७॥
§ ८७२. आद्यं त्रितयं संहननमुत्तमं वज्रर्षभनाराचसंहननं वज्रनाराचसंहननं नाराच-
संहननमिति । तत्तितयमपि ध्यानस्य साधनं भवति । मोक्षस्य तु आद्यमेव । तदुत्तमं संहननं यस्य
सोऽयमुत्तमसंहननः, तस्योत्तमसंहननस्येति । अनेन प्रयोक्तृनिर्देशः कृतः । अग्रं मुखम् । एकमग्रम-
स्येत्येकाग्रः । नानार्थालम्बनेन चिन्ता परिस्पन्दवती, तस्या अन्याशेषमुखेभ्यो व्यावत्र्य एकस्मिन्नग्रे
नियम एकाग्रचिन्तानिरोध इत्युच्यते । अनेन ध्यानस्वरूपमुक्तं भवति । मुहूर्तं इति कालपरिमाणम् ।
अन्तर्गंतो मुहूर्तादन्तर्मुहूर्तः । 'आ अन्तर्मुहूर्तात्' इत्यनेन कालावधिः कृतः । ततः परं २दुर्धरत्वादेकाग्र-
चिन्तायाः । चिन्ताया निरोधो यदि ध्यानं, निरोधश्चाभावः, तेन ध्यानमसत्खरविषाणवत्स्यात् ।
नैष दोषः; अन्यचिन्तानिवृत्त्यपेक्षयासदिति चोच्यते, स्वविषयाकारप्रवृत्तेः सदिति च; अभावस्य
भावान्तरत्वाद् हेत्वङ्गत्वादिभिरभावस्य वस्तुधर्मत्वसिद्धेश्च । अथवा नायं भावसाधनः, निरोधनं
विशेषार्थ—यहाँ यह प्रश्न होता है कि जब कि पाँच महाव्रतोंमें परिग्रहत्यागका उपदेश
दिया है, दश धर्मोंमें त्याग धर्मका उपदेश दिया है तथा नौ प्रकारके प्रायश्चित्तोंमें व्युत्सर्ग नामका
प्रायश्चित्त अलगसे कहा है ऐसी अवस्थामें पुनः व्युत्सर्ग तपका अलगसे कथन करना कोई मायने
नहीं रखता, क्योंकि इस प्रकार एक ही तत्त्वका पुनः-पुनः कथन करनेसे पुनरुक्त दोष आता है ।
समाधान यह है कि पाँच महाव्रतोंमें जो परिग्रह त्याग महाव्रत है उसमें गृहस्थसम्बन्धी उपधिके
त्यागकी मुख्यता है । त्यागधर्ममें आहारादि विषयक आसक्तिके कम करनेकी मुख्यता है, व्युत्सर्ग
प्रायश्चित्तमें परिग्रह त्याग धर्ममें लगनेवाले दोषके परिमार्जनकी मुख्यता है, और व्युत्सर्ग तपमें
वसतिकाम आदि बाह्य व मनोविकार तथा शरीर आदि अभ्यन्तर उपधिमें आसक्तिके त्यागकी
मुख्यता है, इसलिए पुनरुक्त दोष नहीं आता ।
§ ८७१. जो बहुवक्तव्य ध्यान पृथक् स्थापित कर आये हैं उसके भेदोंका कथन करना इस
समय प्राप्तकाल है तथापि उसे उल्लंघन करके इस समय ध्यानके प्रयोक्ता, स्वरूप और कालका
निर्धारण करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उत्तम संहननवालेका एक विषयमें चित्तवृत्तिका रोकना ध्यान है जो अन्तर्मुहूर्त काल तक
होता है ॥२७॥
§ ८७२. आदिके वज्रर्षभनाराचसंहनन, वज्रनाराचसंहनन और नाराचसंहनन ये तीन
संहनन उत्तम हैं । ये तीनों ही ध्यानके साधन हैं । मोक्षका साधन तो प्रथम ही है । जिसके ये
उत्तम संहनन होते हैं वह उत्तम संहननवाला कहलाता है उस उत्तम संहननवाले के । यहाँ इस
पदद्वारा प्रयोक्ताका निर्देश किया है । 'अग्र' पदका अर्थ मुख है । जिसका एक अग्र होता है वह
एकाग्र कहलाता है । नाना पदार्थोंका अवलम्बन लेनेसे चिन्ता परिस्पन्दवती होती है । उसे अन्य
अशेष मुखोंसे लौटाकर एक अग्र अर्थात् एक विषयमें नियमित करना एकाग्रचिन्तानिरोध कहलाता
है । इस द्वारा ध्यानका स्वरूप कहा गया है । मुहूर्त यह कालका विवक्षित परिमाण है । जो मुहूर्तके
भीतर होता है वह अन्तर्मुहूर्त कहलाता है । 'अन्तर्मुहूर्त काल तक' इस पद द्वारा कालकी अवधि
की गयी है । इतने कालके बाद एकाग्रचिन्ता दुर्धर होती है । शंका—यदि चिन्ताके निरोधका
नाम ध्यान है और निरोध अभावरूप होता है इसलिए गधेके सींगके समान ध्यान असत् ठहरता
१. 'ध्यानं निर्विषयं मनः ।' - सां० सू० ६, २५ । २.-दुर्धरत्वात् । चिन्ताया नि- ता०, ना० ।
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- ९।२९ § ८७६ ] नवमोऽध्यायः ३४१
निरोध इति । किं तर्हि । कर्मसाधनः, 'निरुध्यत इति निरोधः' । चिन्ता चासौ निरोधश्च चिन्ता-
निरोध इति । एतदुक्तं भवति — ज्ञानमेवापरिस्पन्दाग्निशिखावदवभासमानं ध्यानमिति ।
§ ८७३. तद्भेदप्रदर्शनार्थमाह—
आर्त्तरौद्रधर्म्यशुक्लानि ॥२८॥
§ ८७४. ऋतं दुःखम्, अर्दनमर्तिर्वा, तत्र भवमार्तम् । रुद्रः क्रूराशयस्तस्य कर्म तत्र भवं वा ५
रौद्रम् । धर्मो व्याख्यातः । धर्मादनपेतं धर्म्यम् । शुचिगुणयोगाच्छुक्लम् । तदेतच्चतुर्विधं ध्यानं
द्वैविध्यमश्नुते । कुतः । प्रशस्ताप्रशस्तभेदात् । अप्रशस्तमपुण्यास्रवकारणत्वात् । कर्मनिर्दहनसाम-
र्थ्यात्प्रशस्तम् ।
§ ८७५. किं पुनस्तदिति चेदुच्यते—
परे मोक्षहेतू ॥२९॥ १०
§ ८७७. तत्तार्तं चतुर्विधम् । तत्रादिविकल्पलक्षणनिर्देशार्थमाह—
आर्तममनोज्ञस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः ॥३०॥
§ ८७८. अमनोज्ञमप्रियं विषकण्टकशत्रुशस्त्रादि, तद्बाधाकारणत्वाद् 'अमनोज्ञम्' इत्युच्यते ।
तस्य संप्रयोगे, स कथं नाम मे न स्यादिति संकल्पश्चिन्ताप्रबन्धः स्मृतिसमन्वाहारः प्रथममार्त-
मित्याख्यायते ।
§ ८७९. द्वितीयस्य विकल्पस्य लक्षणनिर्देशार्थमाह—
विपरीतं मनोज्ञस्य ॥३१॥
§ ८८०. कुतो विपरीतम् । पूर्वोक्तात् । तेनैतदुक्तं भवति—मनोज्ञस्येष्टस्य स्वपुत्रदारधना-
देर्विप्रयोगे तत्संप्रयोगे संकल्पश्चिन्ताप्रबन्धो द्वितीयमार्तमवगन्तव्यम् ।
§ ८८१. तृतीयस्य विकल्पस्य लक्षणप्रतिपादनार्थमाह—
वेदनायाश्च ॥३२॥
§ ८८२. 'वेदना'शब्दः सुखे दुःखे च वर्तमानोऽपि आर्तस्य प्रकृतत्वाद् दुःखवेदनायां प्रवर्तते,
तस्या वातादिविकारजनितवेदनाया उपनिपाते तस्या अपायः कथं नाम मे स्यादिति संकल्प-
श्चिन्ताप्रबन्धस्तृतीयमार्तमुच्यते ।
§ ८८३. तुरीयस्यार्तस्य लक्षणनिर्देशार्थमाह—
निदानं च ॥३३॥
§ ८७७. आर्तध्यान चार प्रकारका है। उनमें से प्रथम भेदके लक्षणका निर्देश करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
अमनोज्ञ पदार्थके प्राप्त होनेपर उसके वियोगके लिए चिन्तासातत्यका होना प्रथम आर्त-
ध्यान है ॥३०॥
§ ८७८. विष, कण्टक, शत्रु और शस्त्र आदि जो अप्रिय पदार्थ हैं वे बाधाके कारण होनेसे
अमनोज्ञ कहे जाते हैं। उनका संयोग होनेपर वे मेरे कैसे न हों इस प्रकारका संकल्प चिन्ता प्रबन्ध
अर्थात् स्मृति समन्वाहार यह प्रथम आर्तध्यान कहलाता है ।
§ ८७९. अब दूसरे भेदके लक्षणका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मनोज्ञ वस्तुके वियोग होनेपर उसकी प्राप्तिकी सतत चिन्ता करना दूसरा आर्तध्यान
है ॥३१॥
§ ८८०. किससे विपरीत ? पूर्वमें कहे हुएसे । इससे यह तात्पर्य निकलता है कि मनोज्ञ
अर्थात् इष्ट अपने पुत्र, स्त्री और धनादिकके वियोग होनेपर उसकी प्राप्तिके लिए संकल्प अर्थात्
निरन्तर चिन्ता करना दूसरा आर्तध्यान जानना चाहिए ।
§ ८८१. अब तीसरे भेदके लक्षणका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वेदनाके होनेपर उसे दूर करनेके लिए सतत चिन्ता करना तीसरा आर्तध्यान है ॥३२॥
§ ८८२. वेदना शब्द यद्यपि सुख और दुःख दोनों अर्थोंमें विद्यमान है पर यहाँ आर्तध्यानका
प्रकरण होनेसे उससे दुःखवेदना ली गयी है। वातादि विकारजनित दुःख वेदनाके होनेपर उसका
अभाव मेरे कैसे होगा इस प्रकार विकल्प अर्थात् निरन्तर चिन्ता करना तीसरा आर्तध्यान कहा
जाता है ।
§ ८८३. अब चौथे आर्तध्यानके लक्षणका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
निदान नामका चौथा आर्तध्यान है ॥३३॥
- ९।३५ § ८८८ ] नवमोऽध्यायः ३४३
§ ८८४. भोगाकाङ्क्षातुरास्यानागतविषयप्राप्तिं प्रति मनःप्रणिधानं संकल्पश्चिन्ताप्रबन्ध-
स्तुरीयमार्तं निदानमित्युच्यते ।
§ ८८५. तदेतच्चतुर्विधमार्तं किंस्वामिकमिति चेदुच्यते—
तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् ॥३४॥
§ ८८६. अविरता असंयतसम्यग्दृष्ट्यन्ताः । देशविरताः संयतासंयताः । प्रमत्तसंयताः पञ्च-
दशप्रमादोपेताः क्रियानुष्ठायिनः । तत्राविरतदेशविरतानां चतुर्विधमप्यार्तं भवति; असंयमपरिणामो-
पेतत्त्वात् । प्रमत्तसंयतानां तु निदानवर्ज्यमन्यदार्तत्रयं प्रमादोदयोद्रेकात्कदाचित्स्यात् ।
§ ८८७. व्याख्यातमार्तं संज्ञादिभिः । द्वितीयस्य संज्ञाहेतुस्वामिनिर्द्धारणार्थमाह—
हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयोः ॥३५॥
§ ८८८. हिंसादीन्युक्तलक्षणानि । तानि रौद्रध्यानोत्पत्तेर्निमित्तीभवन्तीति हेतुनिर्देशो विज्ञा-
यते । तेन हेतुनिर्देशेनानुवर्तमानः 'स्मृतिसमन्वाहारः' अभिसंबध्यते । हिंसायाः स्मृतिसमन्वाहार
इत्यादि । तद्रौद्रध्यानमविरतदेशविरतयोर्वेदितव्यम् । अविरतस्य भवतु रौद्रध्यानं, देशविरतस्य
§ ८८४. भोगोंकी आकांक्षाके प्रति आतुर हुए व्यक्तिके आगामी विषयोंकी प्राप्तिके लिए
मनःप्रणिधानका होना अर्थात् संकल्प तथा निरन्तर चिन्ता करना निदान नामका चौथा
आर्तध्यान कहा जाता है ।
§ ८८५. इस चार प्रकारके आर्तध्यानका स्वामी कौन है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
यह आर्तध्यान अविरत, देशविरत और प्रमत्तसंयत जीवोंके होता है ॥३४॥
§ ८८६. असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तकके जीव अविरत कहलाते हैं, संयतासंयत जीव
देशविरत कहलाते हैं और पन्द्रह प्रकारके प्रमादसे युक्त क्रिया करनेवाले जीव प्रमत्तसंयत कहलाते
हैं । इनमें से अविरत और देशविरत जीवोंके चारों ही प्रकारका आर्तध्यान होता है, क्योंकि ये
असंयमरूप परिणामसे युक्त होते हैं। प्रमत्तसंयतोंके तो निदानके सिवा बाकीके तीन प्रमादकी
तीव्रतावश कदाचित् होते हैं।
विशेषार्थ—पुराण साहित्यमें मुनियों द्वारा निदान करनेके कई उदाहरण हैं पर इन
उदाहरणोंसे प्रमत्तसंयत अवस्थामें उन साधुओंने निदान किया ऐसा अर्थ नहीं लेना चाहिए । एक
तो भावलिंगी साधुके आगामी भोगोंकी आकांक्षा होती ही नहीं और कदाचित् होती है तो उस
समयसे वह भावलिंगी नहीं रहता ऐसा अर्थ यहाँ ग्रहण करना चाहिए ।
§ ८८७. संज्ञा आदिके द्वारा आर्तध्यानका व्याख्यान किया । अब दूसरे ध्यानकी संज्ञा,
हेतु और स्वामीका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
हिंसा, असत्य, चोरी और विषयसंरक्षणके लिए सतत चिन्तन करना रौद्रध्यान है। वह
अविरत और देशविरतके होता है ॥३५॥
§ ८८८. हिंसादिकके लक्षण पहले कह आये हैं । वे रौद्रध्यानकी उत्पत्तिके निमित्त होते हैं
इसलिए हेतुनिर्देश जाना जाता है । हेतुका निर्देश करनेवाले इन हिंसादिक के साथ अनुवृत्तिको
प्राप्त होनेवाले 'स्मृतिसमन्वाहार' पदका सम्बन्ध होता है। यथा - हिंसाका स्मृतिसमन्वाहार
आदि । यह रौद्रध्यान अविरत और देशविरतके जानना चाहिए । शंका—रौद्रध्यान अविरतके
१. -विधमार्तं ता० मु० ।
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अध्याय ९-१०: संवर, निर्जरा, शुक्लध्यान, केवलज्ञान एवं मोक्ष-सिद्धि उपसंहार
३४४ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।३६ ६ ८८९ –
कथम् । तस्यापि हिंसाद्यावेशाद्वित्तादिसंरक्षणतन्त्रत्वाच्च कदाचिद् भवितुमर्हति । तत्पुनर्नारका-
दीनामकारणं; सम्यग्दर्शनसामर्थ्यात् । संयतस्य तु न भवत्येव; तदारम्भे संयमप्रच्युतेः ।
§ ८८९. आह, 'परे मोक्षहेतू' उपदिष्टे । तत्राद्यस्य मोक्षहेतोर्ध्यानस्य भेदस्वरूपस्वामिनिर्देशः
कर्तव्य इत्यत आह—
आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय धर्म्यम् ॥३६॥
§ ८९०. विचयनं विचयो विवेको विचारणेत्यर्थः । आज्ञापायविपाकसंस्थानानां विचय
आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयः । 'स्मृतिसमन्वाहारः' इत्यनुवर्तते । स प्रत्येकं संबध्यते—आज्ञा-
विचयाय स्मृतिसमन्वाहार इत्यादि । तद्यथा—उपदेष्टुरभावान्मन्दबुद्धित्वात्कर्मोदयात्सूक्ष्मत्वाच्च
पदार्थानां हेतुदृष्टान्तोपरमे सति सर्वज्ञप्रणीतमागमं प्रमाणीकृत्य इत्थमेवेदं "नान्यथावादिनो जिनाः”
इतिगहनपदार्थश्रद्धानादर्थावधारणमाज्ञाविचयः । अथवा—स्वयं विदितपदार्थतत्त्वस्य सतः परं
प्रति पिपादयिषोः स्वसिद्धान्ताविरोधेन तत्त्वसमर्थनार्थं तर्कनयप्रमाणयोजनपरः स्मृतिसमन्वाहारः
सर्वज्ञाज्ञाप्रकाशनार्थत्वादाज्ञाविचय इत्युच्यते । जात्यन्धवन्मिथ्यादृष्टयः सर्वज्ञप्रणीतमार्गाद्विमुखा
मोक्षार्थिनः सम्यङ्मार्गापरिज्ञानात्सुदूरमेवापयन्तीति सन्मार्गापायचिन्तनमपायविचयः । अथवा—
मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्रेभ्यः कथं नाम इमे प्राणिनोऽपेयुरिति स्मृतिसमन्वाहारोऽपायविचयः ।
होओ देशविरतके कैसे हो सकता है ? समाधान - हिंसादिकके आवेशसे या वित्तादिके संरक्षणके
परतन्त्र होनेसे कदाचित् उसके भी हो सकता है । किन्तु देशविरतके होनेवाला वह रौद्रध्यान
नारकादि दुर्गत्तियोंका कारण नहीं है, क्योंकि सम्यग्दर्शन की ऐसी ही सामर्थ्य है । परन्तु संयतके
तो वह होता ही नहीं है, क्योंकि उसका आरम्भ होनेपर संयमसे पतन हो जाता है ।
§ ८८९. कहते हैं, अन्तके दो ध्यान मोक्षके हेतु हैं यह कह आये । उनमें से मोक्षके हेतुरूप
प्रथम ध्यानके भेद, स्वरूप और स्वामीका निर्देश करना चाहिए इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं-
आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान इनकी विचारणाके निमित्त मनको एकाग्र करना
धर्म्यध्यान है ॥३६॥
§ ८९०. विचयन करना विचय है । विचय, विवेक और विचारणा ये पर्याय नाम हैं।
आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान इनका परस्पर द्वन्द्व समास होकर विचय शब्दके साथ
षष्ठीतत्पुरुष समास है और इस प्रकार 'आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयः' पद बना है। 'स्मृति-
समन्वाहारः' पदकी अनुवृत्ति होती है। और उसका प्रत्येकके साथ सम्बन्ध होता है। यथा-
आज्ञाविचयके लिए स्मृतिसमन्वाहार आदि । स्पष्ट इस प्रकार है- उपदेश देनेवालेका अभाव
होनेसे, स्वयं मन्दबुद्धि होनेसे, कर्मोंका उदय होनेसे और पदार्थोंके सूक्ष्म होनेसे तथा तत्त्वके
समर्थनमें हेतु और दृष्टान्तका अभाव होनेपर सर्वज्ञप्रणीत आगमको प्रमाण करके 'यह इसी प्रकार
है, क्योंकि जिन अन्यथावादी नहीं होते' इस प्रकार गहन पदार्थके श्रद्धानद्वारा अर्थका अवधारण
करना आज्ञाविचय धर्म्यध्यान है । अथवा स्वयं पदार्थोंके रहस्यको जानता है और दूसरोंके प्रति
उसका प्रतिपादन करना चाहता है, इसलिए स्व-सिद्धान्तके अविरोधद्वारा तत्त्वका समर्थन करनेके
लिए उसके जो तर्क, नय और प्रमाणकी योजनारूप निरन्तर चिन्तन होता है वह सर्वज्ञकी आज्ञा-
को प्रकाशित करनेवाला होनेसे आज्ञाविचय कहा जाता है। मिथ्यादृष्टि जीव जन्मान्ध पुरुषके
समान सर्वज्ञप्रणीत मार्गसे विमुख होते हैं, उन्हें सन्मार्गका परिज्ञान न होनेसे वे मोक्षार्थी पुरुषोंको
दूरसे ही त्याग देते हैं इस प्रकार सन्मार्गके अपायका चिन्तन करना अपायविचय धर्म्यध्यान है।
अथवा, ये प्राणी मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रसे कैसे दूर होंगे इस प्रकार निरन्तर
१. विचारणमित्यर्थः मु० । विचारमित्यर्थः ता० । २. - द्वानमर्था-मु० ।
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- ९।३६ § ८९० ] नवमोऽध्यायः ३४५
कर्मणां ज्ञानावरणादीनां द्रव्यक्षेत्रकालभवभावप्रत्ययफलानुभवनं प्रति प्रणिधानं विपाकविचयः ।
लोकसंस्थानस्वभावविचयाय स्मृतिसमन्वाहारः संस्थानविचयः । उत्तमक्षमादिलक्षणो धर्म उक्तः ।
तस्मादनपेतं धर्म्यं ध्यानं चतुर्विकल्पमवसेयम् । तदविरतदेशविरतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां भवति ।
चिन्तन करना अपायविचय धर्म्यध्यान है। ज्ञानावरणादि कर्मोंके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और
भावनिमित्तक फलके अनुभवके प्रति उपयोगका होना विपाकविचय धर्म्यध्यान है। तथा लोकके ५
आकार और स्वभावका निरन्तर चिन्तन करना संस्थानविचय धर्म्यध्यान है। पहले उत्तम क्षमादि-
रूप धर्मका स्वरूप कह आये हैं। उससे अनपेत अर्थात् युक्त धर्म्यध्यान चार प्रकारका जानना
चाहिए। यह अविरत, देशविरत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत जीवोंके होता है।
विशेषार्थ—संसार, शरीर और भोगोंसे विरक्त होनेके लिए या विरक्त होनेपर उस भावको
स्थिर बनाये रखनेके लिए जो प्रणिधान होता है उसे धर्म्यध्यान कहते हैं। यह उत्तम क्षमादिरूप १०
धर्मसे युक्त होता है इसलिए इसे धर्म्यध्यान कहते हैं। यहाँ निमित्तभेदसे इसके चार भेद किये गये
हैं। यथा—आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय। आज्ञाविचय तत्त्वनिष्ठामें
सहायक होता है, अपायविचय संसार, शरीर और भोगोंसे विरक्ति उत्पन्न करता है। विपाक
विचयसे कर्मफल और उसके कारणोंकी विचित्रताका ज्ञान दृढ़ होता है और संस्थानविचयसे
लोककी स्थितिका ज्ञान दृढ़ होता है। १५
मूल टीकामें विपाकविचयके स्वरूपका निर्देश करते हुए जो द्रव्य, क्षेत्र और काल आदिके
निमित्तसे कर्मफलकी चर्चा की है उसका आशय यह है कि यद्यपि कर्मोंके उदय या उदीरणासे
जीवके औदयिक भाव और विविध प्रकारके शरीरादिककी प्राप्ति होती है पर इन कर्मोंका
उदय और उदीरणा बिना अन्य निमित्तके नहीं होती किन्तु द्रव्य, क्षेत्र आदिका निमित्त पाकर
ही कर्मोंका उदय और उदीरणा होती है। आगे इसी बातको विशेष रूपसे स्पष्ट करते हैं। २०
द्रव्यनिमित्त—मान लो एक व्यक्ति हँस खेल रहा है, वह अपने बाल-बच्चोंके साथ गप्पागोष्ठीमें
तल्लीन है। इतनेमें अकस्मात् मकानकी छत टूटती है और वह उससे घायल होकर दुःखका वेदन
करने लगता है तो यहाँ उसके दुःखवेदनके कारणभूत असाता वेदनीयके उदय और उदीरणामें
टूट कर गिरनेवाली छतका संयोग निमित्त है। टूट कर गिरनेवाली छतके निमित्तसे उस व्यक्तिके
असातावेदनीयकी उदय-उदीरणा हुई और असातावेदनीयके उदय-उदीरणासे उस व्यक्तिको दुःखका २५
अनुभवन हुआ यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इसी प्रकार अन्य कर्मोंके उदय-उदीरणामें बाह्य
द्रव्य कैसे निमित्त होता है इसका विचार कर लेना चाहिए। कालनिमित्त—कालके निमित्त होने-
का विचार दो प्रकारसे किया जाता है। एक तो प्रत्येक कर्मका उदय-उदीरणा काल और दूसरा
वह काल जिसके निमित्तसे बीचमें ही कर्मोंकी उदय-उदीरणा बदल जाती है। आगममें अध्रुवोदय
रूप कर्मके उदय-उदीरणा कालका निर्देश किया है उसके समाप्त होते ही विवक्षित कर्मके उदय- ३०
उदीरणाका अभाव होकर उसका स्थान दूसरे कर्मकी उदय-उदीरणा ले लेती है। जैसे सामान्यसे
हास्य और रतिका उत्कृष्ट उदय-उदीरणाकाल छह महीना है। इसके बाद इनकी उदय-उदीरणा
न होकर अरति और शोककी उदय-उदीरणा होने लगती है। किन्तु छह महीनाके भीतर यदि
हास्य और रतिके विरुद्ध निमित्त मिलता है तो बीचमें ही इनकी उदय-उदीरणा बदल जाती है।
यह कर्मका उदय-उदीरणा काल है। अब एक ऐसा जीव लो जो निर्भय होकर देशान्तरको जा रहा ३५
है किन्तु किसी दिन मार्गमें ही ऐसे जंगल में रात्रि हो जाती है जहाँ हिंस्र जन्तुओंका प्राबल्य है
और विश्राम करनेके लिए कोई निरापद स्थान नहीं है। यदि दिन होता तो उसे रंचमात्र भी भय
न होता किन्तु रात्रि होनेसे वह भयभीत होता है इससे इसके असाता, अरति, शोक और भय
कर्मकी उदय-उदीरणा होने लगती है। यह कालनिमित्तक उदय-उदीरणा है। इसी प्रकार क्षेत्र,
४४
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भव और भावनिमित्तक उदय और उदीरणा जान लेनी चाहिए । कालप्राप्त कर्मपरमाणुओंके
अनुभव करनेको उदय कहते हैं और उदयावलिके बाहर स्थित कर्मपरमाणुओंको कषायसहित या
कषायरहित योग संज्ञावाले वीर्यविशेषके द्वारा उदयावलिमें लाकर उनका उदयप्राप्त कर्मपरमाणुओं
के साथ अनुभवन करनेको उदीरणा कहते हैं । इस प्रकार कर्मपरमाणुओंका अनुभवन उदय और
उदीरणा दोनोंमें लिया जाता है । यदि इनमें अन्तर है तो कालप्राप्त और अकालप्राप्त परमाणुओं-
का है । उदयमें कालप्राप्त कर्मपरमाणु रहते हैं और उदीरणामें अकालप्राप्त कर्मपरमाणु रहते हैं ।
सामान्य नियम यह है कि जहाँ जिस कर्मका उदय होता है वहाँ उसकी उदीरणा अवश्य होती है ।
फिर भी इनमें जो विशेषता है उसका यहाँ निर्देश करते हैं—मिथ्यात्वका उदय और उदीरणा
मिथ्यात्व गुणस्थानमें होती है । इतनी विशेषता है कि उपशम सम्यक्त्वके अभिमुख हुए जीवके
अन्तिम आवली प्रमाण कालमें मिथ्यात्वकी उदीरणा नहीं होती वहाँ मात्र उसका उदय होता है ।
एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रियजाति, आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त
और साधारण इन नौ प्रकृतियोंका मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं ।
अनन्तानुबन्धी चतुष्कका प्रारम्भके दो गुणस्थानोंमें ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं ।
सम्यङ्मिथ्यात्वका तीसरे गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है, अन्यत्र नहीं । अप्रत्याख्यान
चार, नरकगति, देवगति, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, दुर्भग, अनादेय और अयशस्कीर्ति
इन ग्यारह प्रकृतियोंका चौथे गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । नरकायु
और देवायुका चौथे गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । मात्र मरणके
समय अन्तिम आवलिकालमें उदीरणा नहीं होती । चार आनुपूर्वीयोंका प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ
गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है अन्यत्र नहीं । प्रत्याख्यानावरणचतुष्क, तिर्यंचगति,
उद्योत और नीचगोत्र इन सात प्रकृतियोंका संयतासंयत गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा
होती है आगे नहीं । तिर्यंच आयुका पाँचवें गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है । मात्र
मरणके समय अन्तिम आवलि कालके शेष रहनेपर उदय ही होता है उदीरणा नहीं । निद्रानिद्रा,
प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, सातावेदनीय और असातावेदनीय इन पाँच प्रकृतियोंका छठे गुणस्थान
तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । मात्र निद्रानिद्रादि त्रिकको उदीरणा वही करता
है जिसने इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण कर ली है । ऐसा जीव यदि उत्तर शरीरकी विक्रिया करता है या
आहारकसमुद्घातको प्राप्त होता है तो इन्हें प्राप्त होनेके एक आवलि कालपूर्वसे लेकर मूल शरीरमें
प्रवेश होने तक इन तीनकी उदीरणा नहीं होती । तथा देव, नारकी और भोगभूमियाँ जीव भी
इन तीनकी उदीरणा नहीं करते । आहारक शरीर और आहारक अंगोपांगको प्रमत्तसंयतमें ही
उदीरणा और उदय होता है, आगे पीछे नहीं । मनुष्यायुकी छठे गुणस्थानतक उदीरणा और १४वें
गुणस्थान तक उदय होता है । मात्र मरणके समय अन्तिम आवलि काल शेष रहने पर उदीरणा
नहीं होती । सम्यक्त्वप्रकृतिकी उदीरणा और उदय चौथेसे लेकर सातवें गुणस्थानतक वेदकसम्य-
ग्दृष्टिके होता है । मात्र कृतकृत्यवेदकके कालमें व द्वितीयोपशम सम्यक्त्वके उत्पत्तिकालमें एक
आवलि शेष रहनेपर उदय ही होता है उदीरणा नहीं । अन्तके तीन संहननोंकी उदीरणा व उदय
सातवें गुणस्थान तक ही होता है आगे नहीं । हास्यादि छहकी उदीरणा और उदय आठवें
गुणस्थान तक होता है आगे नहीं । इतनी विशेषता है कि देवोंके उत्पत्ति समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त
काल तक हास्य और रतिकी नियमसे उदीरणा होती है आगे भजनीय है । तथा नारकियोंके
उत्पत्तिसमयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त कालतक अरति और शोककी नियमसे उदीरणा होती है आगे
भजनीय है । तीन वेद और क्रोधादि तीन संज्वलनोंकी उदीरणा व उदय नौवेंके उपान्त्य भाग तक
ही होता है आगे नहीं । इतनी विशेषता है कि जो जिस वेदके उदयसे श्रेणि चढ़ता है उसके प्रथम
- ९।३८ § ८९४ ] नवमोऽध्यायः ३४७
§ ८९१. त्रयाणां ध्यानानां निरूपणं कृतम् । इदानीं शुक्लध्यानं निरूपयितव्यम् । तल्लक्ष्य-
माणचतुर्विकल्पम् । तत्राद्ययोः स्वामिनिर्देशार्थमिदमुच्यते—
शुक्ले चाद्ये पूर्वविदः ॥३७॥
§ ८९२. वक्ष्यमाणेषु शुक्लध्यानविकल्पेषु आद्ये शुक्लध्याने पूर्वविदो भवतः श्रुतकेवलिन
इत्यर्थः । 'च'शब्देन धर्म्यमपि समुच्चीयते । तत्र "व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिः" इति श्रेण्या- ५
रोहणात्प्राग्धर्म्यं, श्रेण्योः शुक्ले इति व्याख्यायते ।
§ ८९३. अवशिष्टे कस्य भवत इत्यत्रोच्यते—
परे केवलिनः ॥३८॥
§ ८९४. प्रक्षीणसकलज्ञानावरणस्य केवलिनः सयोगस्यायोगस्य च परे उत्तरे शुक्लध्याने
भवतः । १०
स्थितिमें एक आवलिकाल शेष रहनेपर उदीरणा नहीं होती । लोभसंज्वलनकी दसवें गुणस्थान तक
उदीरणा व उदय होता है । मात्र दसवें गुणस्थानके अन्तिम आवलि कालके शेष रहनेपर उदीरणा
नहीं होती, उदय होता है । वज्रनाराच और नाराच संहननकी ग्यारहवें गुणस्थान तक उदीरणा
और उदय होता है । निद्रा और प्रचलाकी बारहवें गुणस्थानमें एक समय अधिक एक आवलि
काल शेष रहने तक उदय व उदीरणा दोनों होते हैं, आगे बारहवें गुणस्थानके उपान्त्य समय १५
तक इनका उदय ही होता है । पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय इन चौदह
प्रकृतियोंका उदय तो बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समय तक होता है और उदीरणा बारहवें
गुणस्थानमें एक आवलि काल शेष रहने तक होती है । मनुष्यगति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक,
तैजस और कार्मण शरीर, छह संस्थान, औदारिक अंगोपांग, वज्रवृषभनाराच संहनन, वर्णादिक
चार, अगुरुलघु, उपघात, उच्छ्वास, दोनों विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, २०
अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, दुःस्वर, आदेय, यशकीर्ति, निर्माण और उच्चगोत्र इन
अड़तीस प्रकृतियोंकी तेरहवें गुणस्थान तक उदीरणा व उदय होता है आगे नहीं । तथा तीर्थंकर
प्रकृतिकी तेरहवें गुणस्थानमें ही उदीरणा व उदय होता है । इस प्रकार आज्ञा आदिके निमित्तसे
सतत चिन्तन करना धर्म्यध्यान है यह उक्त कथनका तात्पर्य है !
§ ८९१. तीन ध्यानोंका कथन किया, इस समय शुक्लध्यानका कथन करना चाहिए, उसके २५
आगे चार भेद कहनेवाले हैं उनमें-से आदिके दो भेदोंके स्वामीका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्के होते हैं ॥३७॥
§ ८९२. आगे कहे जानेवाले शुक्लध्यानके भेदोंमें-से आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्
अर्थात् श्रुतकेवलीके होते हैं । सूत्रमें 'च' शब्द आया है उससे धर्म्यध्यानका समुच्चय होता है । ३०
'व्याख्यानसे विशेष ज्ञान होता है' इस नियमके अनुसार श्रेणि चढ़नेसे पूर्व धर्म्यध्यान होता है और
दोनों श्रेणियोंमें आदिके दो शुक्लध्यान होते हैं ऐसा व्याख्यान करना चाहिए ।
§ ८९३. शेषके दो शुक्लध्यान किसके होते हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शेषके दो शुक्लध्यान केवलीके होते हैं ॥३८॥
§ ८९४. जिसके समस्त ज्ञानावरणका नाश हो गया है ऐसे सयोगकेवली और अयोगकेवलीके ३५
पर अर्थात् अन्तके दो शुक्लध्यान होते हैं ।
१. 'व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षणम् ।'—परि० शे०, पृ० ८ । पा० म० मा०; पृ० ५७,
१३०, १५४ । वक्खाणओ विसेसो न हि संदेहादलक्खणया ।।'—वि० भा० गा०, ३४७ ।
§ ८९५. यथासंख्यं तद्विकल्पप्रतिपादनार्थमिदमुच्यते—
पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरतक्रियानिवर्तीनि ॥३९॥
§ ८९६. पृथक्त्ववितर्कमेकत्ववितर्कं सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति व्युपरतक्रियानिवर्ति चेति चतुर्विधं
शुक्लध्यानम् । वक्ष्यमाणलक्षणमपेक्ष्य¹ सर्वेषामन्वर्थत्व²मवसेयम् ।
§ ८९७. तस्यालम्बनविशेषनिर्धारणार्थमाह—
त्र्येकयोगकाययोगायोगानाम् ॥४०॥
§ ८९८. 'योग' शब्दो व्याख्यातार्थः 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इत्यत्र । उक्तैश्चतुर्भिः
शुक्लध्यानविकल्पैस्त्रियोगादीनां चतुर्णां यथासंख्येन नाभिसंबन्धो वेदितव्यः । त्रियोगस्य पृथक्त्व-
वितर्कम्, त्रिषु योगेष्वेकयोगस्यैकत्ववितर्कम्, काययोगस्य सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति, अयोगस्य व्युपरत-
क्रियानिवर्ति ।
§ ८९९. तत्राद्ययोर्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
एकाश्रये सवितर्कवीचारे पूर्वे ॥४१॥
§ ९००. एक आश्रयो ययोस्ते एकाश्रये । ³उभेऽपि परिप्राप्तश्रुतज्ञाननिष्ठेनारभ्येते, इत्यर्थः ।
वितर्कश्च वीचारश्च वितर्कवीचारौ, सह वितर्कवीचाराभ्यां वर्तेत इति सवितर्कवीचारे । पूर्वे
पृथक्त्वैकत्ववितर्के इत्यर्थः ।
§ ८९५. अब क्रमसे शुक्लध्यानके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति ये चार शुक्ल-
ध्यान हैं ॥३९॥
§ ८९६. पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति ये
चार शुक्लध्यान हैं। आगे कहे जानेवाले लक्षणकी अपेक्षा सबका सार्थक नाम जानना चाहिए।
§ ८९७. अब उसके आलम्बन विशेषका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वे चार ध्यान क्रमसे तीन योगवाले, एक योगवाले, काययोगवाले और अयोगके होते
हैं ॥४०॥
§ ८९८. 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इस सूत्रमें योग शब्दका व्याख्यान कर आये हैं। पूर्वमें
कहे गये शुक्लध्यानके चार भेदोंके साथ त्रियोग आदि चार पदोंका क्रमसे सम्बन्ध जान लेना
चाहिए। तीन योगवालेके पृथक्त्ववितर्क होता है। तीन योगोंमें-से एक योगवालेके एकत्ववितर्क
होता है। काययोगवालेके सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यान होता है और अयोगीके व्युपरतक्रियानिवर्ति
ध्यान होता है।
§ ८९९. अब इन चार भेदोंमें-से आदिके दो भेदोंके सम्बन्धमें विशेष ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
पहलेके दो ध्यान एक आश्रयवाले, सवितर्क और सवीचार होते हैं ॥४१॥
§ ९००. जिन दो ध्यानोंका एक आश्रय होता है वे एक आश्रयवाले कहलाते हैं। जिसने
सम्पूर्ण श्रुतज्ञान प्राप्त कर लिया है उसके द्वारा ही ये दो ध्यान आरम्भ किये जाते हैं। यह उक्त
कथनका तात्पर्य है। जो वितर्क और वीचारके साथ रहते हैं वे सवितर्कवीचार ध्यान कहलाते हैं।
सूत्रमें आये हुए पूर्व पदसे पृथक्त्ववितर्क और एकत्ववितर्क ये दो ध्यान लिये गये हैं।
१. -क्षणमुपेत्य सर्वे-मु० । २. -मन्वर्थमव-मु० । ३. उभयेऽपि आ०, दि० १, दि० २, ना० ।
- ९।४४ § ९०६ ] नवमोऽध्यायः ३४९
§ ९०१. तत्र यथासंख्यप्रसङ्गेऽनिष्टनिवृत्त्यर्थमिदमुच्यते—
अवीचारं द्वितीयम् ॥४२॥
§ ९०२. पूर्वयोर्यद् द्वितीयं तदवीचारं प्रत्येतव्यम् । एतदुक्तं भवति—आद्यं सवितर्कं
सवीचारं च भवति । द्वितीयं सवितर्कमवीचारं चेति । ५
§ ९०३. अथ वितर्कवीचारयोः कः प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
वितर्कः श्रुतम् ॥४३॥
§ ९०४. विशेषेण तर्कणमूह्नं वितर्कः श्रुतज्ञानमित्यर्थः ।
§ ९०५. अथ को वीचारः ।
वीचारोऽर्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्तिः ॥४४॥
§ ९०६. अर्थो ध्येयो द्रव्यं पर्यायो वा । व्यञ्जनं वचनम् । योगः कायवाङ्मनःकर्मलक्षणः । १०
संक्रान्तिः परिवर्तनम् । द्रव्यं विहाय पर्यायमुपैति पर्यायं त्यक्त्वा द्रव्यमित्यर्थसंक्रान्तिः । एकं श्रुत-
वचनमुपादाय वचनान्तरमालम्बते तदपि विहायान्यदिति व्यञ्जनसंक्रान्तिः । काययोगं त्यक्त्वा
योगान्तरं गृह्णाति योगान्तरं च^१ त्यक्त्वा काययोगमिति योगसंक्रान्तिः । एवं परिवर्तनं वीचार
इत्युच्यते^२ । तदेतत्सामान्यविशेषनिर्दिष्टं चतुर्विधं धर्म्यं शुक्लं च पूर्वोदितगुप्त्यादिबहुप्रकारोपायं
संसारनिवृत्तये मुनिर्ध्यातुमर्हति कृतपरिकर्मा । तत्र द्रव्यपरमाणुं भावपरमाणुं वा ध्यायन्नाहितवित- १५
§ ९०१. पूर्व सूत्रमें यथासंख्यका प्रसंग होनेपर अनिष्ट अर्थकी निवृत्ति करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
दूसरा ध्यान अवीचार है ॥४२॥
§ ९०२. पहलेके दो ध्यानोंमें जो दूसरा ध्यान है वह अवीचार जानना चाहिए । अभिप्राय
यह है कि पहला शुक्लध्यान सवितर्क और सवीचार होता है तथा दूसरा शुक्लध्यान सवितर्क २०
और अवीचार होता है ।
§ ९०३. अब वितर्क और वीचारमें क्या भेद है यह दिखलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
वितर्कका अर्थ श्रुत है ॥४३॥
§ ९०४. विशेष रूपसे तर्कणा करना अर्थात् ऊहा करना वितर्क अर्थात् श्रुतज्ञान कहलाता है । २५
§ ९०५. अब वीचार किसे कहते हैं यह बात अगले सूत्र द्वारा कहते हैं—
अर्थ, व्यञ्जन और योगकी संक्रान्ति वीचार है ॥४४॥
§ ९०६. अर्थ ध्येयको कहते हैं । इससे द्रव्य और पर्याय लिये जाते हैं । व्यञ्जनका अर्थ
वचन है तथा काय, वचन और मनकी क्रियाको योग कहते हैं । संक्रान्तिका अर्थ परिवर्तन है ।
द्रव्यको छोड़कर पर्यायको प्राप्त होता है और पर्यायको छोड़कर द्रव्यको प्राप्त होता है । यह अर्थ- ३०
संक्रान्ति है । एक श्रुतवचनका आलम्बन लेकर दूसरे वचनका आलम्बन लेता है और उसे भी
त्यागकर अन्य वचनका आलम्बन लेता है । यह व्यञ्जन-संक्रान्ति है । काययोगको छोड़कर दूसरे
योगको स्वीकार करता है और दूसरे योगको छोड़कर काययोगको स्वीकार करता है । यह योग-
संक्रान्ति है । इस प्रकारके परिवर्तनको वीचार कहते हैं । सामान्य और विशेष रूपसे कहे गये
इस चार प्रकारके धर्म्यध्यान और शुक्लध्यानको पूर्वोक्त गुप्ति आदि बहुत प्रकारके उपायोंसे युक्त ३५
होनेपर संसारका नाश करनेके लिए जिसने भले प्रकारसे परिकर्मको किया है ऐसा मुनि ध्यान
१. -न्तरं त्यक्त्वा मु० । २. इत्युच्यते । संक्रान्तौ सत्यां कथं ध्यानमिति चेत् ध्यानसंतानमपि ध्यानमुच्यते
इति न दोषः । तदेतत्सामान्य-मु०, दि० १, दि० २, आ० ।
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३५० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।४४ § ९०६ –
कंसामर्थ्यः ^१अर्थव्यञ्जने कायवचसी च पृथक्त्वेन संक्रामता मनसापर्याप्तबालोत्साहवदव्यवस्थितेना-
निशितेनापि शस्त्रेण चिरात्तरुं छिन्दन्निव मोहप्रकृतीरुपशमयन्क्षपयंश्च पृथक्त्ववितर्कवीचारध्यान-
भाग्भवति । स एव पुनः समूलतूलं ^३ मोहनीयं निर्दिधक्षन्नन्तगुणविशुद्धियोगविशेषमाश्रित्य बहु-
राणां ज्ञानावरणसहायीभूतानां प्रकृतीनां बन्धं निरुन्धन् स्थितिह्रासक्षयौ च कुर्वन् श्रुतज्ञानोपयोगो^५
५ निवृत्तार्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्तिः अविचलितमनाः क्षीणकषायो वैडूर्यमणिरिव निरुपलेपो ध्यात्वा पुनर्न
निवर्तत इत्युक्तमेकत्ववितर्कम् । एवमेकत्ववितर्कशुक्लध्यानवैश्वानरनिर्दग्धघातिकर्मेन्धनः प्रज्वलित-
केवलज्ञानगभस्तिमण्डलो मेघपञ्जरनिरोधनिर्गत इव घर्मरश्मिर्वा भासमानो भगवांस्तीर्थकर इतरो
वा केवली लोकेश्वराणामभिगमनीयोऽर्चनीयश्चोत्कर्षेणायुषः पूर्वकोटीं देशोनां विहरति । स
यदान्तर्मुहूर्तशेषायुष्कस्तत्तुल्यस्थितिवेदद्यनामगोत्रश्च भवति तदा सर्वं वाङ्मनसयोगं बादरकाययोगं
१० च परिहाय्य सूक्ष्मकाययोगालम्बनः सूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिध्यानमास्कन्दितुमर्हतीति । यदा पुनरन्त-
र्मुहूर्तशेषायुष्कस्ततोऽधिकस्थितिशेषकर्मत्रयो भवति सयोगी तदात्मोपयोगातिशयस्य सामायिक-
सहायस्य विशिष्टकरणस्य महासंवरस्य लघुकर्मपरिपाचनस्याशेषकर्मरेणुपरिशातनशक्तिस्वाभा-
व्याद्दण्डकपाटरप्रतरलोकपूरणानि स्वात्मप्रदेशविसर्पणतश्चतुर्भिः समयैः कृत्वा पुनरपि तावद्भिरेव
समयैः समुपहृतप्रदेशविसरणः समीकृतस्थितिशेषकर्मचतुष्टयः पूर्वशरीरप्रमाणो भूत्वा सूक्ष्मकाय-
१५ करनेके योग्य होता है । जिस प्रकार अपर्याप्त उत्साहसे युक्त बालक अव्यवस्थित और भौथरे शस्त्रके
द्वारा भी चिरकालमें वृक्षको छेदता है उसी प्रकार चित्तके सामर्थ्यको प्राप्तकर जो द्रव्यपरमाणु
और भावपरमाणुका ध्यान कर रहा है वह अर्थ और व्यंजन तथा काय और वचनमें पृथक्त्व
रूपसे संक्रमण करनेवाले मनके द्वारा मोहनीय कर्मकी प्रकृतियोंका उपशमन और क्षय करता हुआ
पृथक्त्ववितर्क वीचारध्यानको धारण करनेवाला होता है। पुनः जो समूल मोहनीय कर्मका दाह
२० करना चाहता है, जो अनन्तगुणो विशुद्धिविशेषको प्राप्त होकर बहुत प्रकारकी ज्ञानावरणकी
सहायीभूत प्रकृतियोंके बन्धको रोक रहा है, जो कर्मोंकी स्थितिको न्यून और नाश कर रहा है,
जो श्रुतज्ञानके उपयोगसे युक्त है, जो अर्थ, व्यंजन और योगकी संक्रान्तिसे रहित है, निश्चल
मनवाला है, क्षीण कषाय है और वैडूर्यमणिके समान निरुपलेप है वह ध्यान करके पुनः नहीं
लौटता है । इस प्रकार उसके एकत्ववितर्क ध्यान कहा गया है । इस प्रकार एकत्ववितर्क शुक्लध्यान
२५ रूपी अग्निके द्वारा जिसने चार घातिया कर्मरूपी ईंधनको जला दिया है, जिसके केवलज्ञानरूपी
किरणसमुदाय प्रकाशित हो गया है, जो मेघमण्डलका निरोध कर निकले हुए सूर्यके समान भास-
मान हो रहा है ऐसे भगवान्, तीर्थंकर, केवली या सामान्य केवली इन्द्रोंके द्वारा आदरणीय और
पूजनीय होते हुए उत्कृष्ट रूपसे कुछ कम पूर्व कोटि काल तक बिहार करते हैं । वह जब आयुमें
अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहता है तथा वेदनीय, नाम और गोत्र कर्मकी स्थिति आयुकर्मके बराबर
३० शेष रहती है तब सब प्रकारके वचनयोग, मनोयोग और बादरकाययोगको त्यागकर तथा सूक्ष्म
काययोगका अवलम्बन लेकर सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानको स्वीकार करते हैं, परन्तु जब उन
सयोगी जिनके आयु अन्तर्मुहूर्त शेष रहती है और शेष तीन कर्मोंकी स्थिति उससे अधिक शेष
रहती है तब जिन्हें सातिशय आत्मोपयोग प्राप्त है, जिन्हें सामायिकका अवलम्बन है, जो विशिष्ट
करणसे युक्त हैं, जो कर्मोंका महासंवर कर रहे हैं और जिनके स्वल्पमात्रामें कर्मोंका परिपाचन हो
३५ रहा है ऐसे वे अपने आत्मप्रदेशोंके फैलनेसे कर्मरजको परिशातन करनेकी शक्तिवाले दण्ड, कपाट,
प्रतर और लोकपूरण समुद्घातको चार समयोंके द्वारा करके अनन्तर प्रदेशोंके विसर्पणका संकोच
१. -सामर्थ्यादर्थ-मु० । २. मनसा पर्याप्त- मु० । ३. समूलतलं मु०, दि० १, दि० २, आ० । ४. -शुद्धियोग
-मु० । ५. -योगे निवृत्ता-मु० ।
- ९।४५ § ९०८ ] नवमोऽध्यायः ३५१
योगेन सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानं ध्यायति । ततस्तदनन्तरं समुच्छिन्नक्रियानिवर्तिध्यानमारभते ।
समुच्छिन्नप्राणापानप्रचारसर्वकायवाङ्मनोयोगसर्वप्रदेशपरिस्पन्दक्रियाव्यापारत्वात् समुच्छिन्न-
क्रियानिवर्तीत्युच्यते । तस्मिन्समुच्छिन्नक्रियानिवर्तिनि ध्याने सर्वबन्धास्रवनिरोधसर्वशेषकर्मशातन-
सामर्थ्योपपत्तेरयोगिकेवलिनः संपूर्णयथाख्यातचारित्रज्ञानदर्शनं सर्वसंसारदुःखजालपरिष्वङ्गोच्छेद-
जननं साक्षान्मोक्षकारणमुपजायते । स पुनरयोगकेवली भगवांस्तदा ध्यानातिशयाग्निनिर्दग्धसर्व- ५
मलकळङ्कबन्धनो निरस्तकिट्टधातुपाषाणजात्यकनकवल्लब्धात्मा परिनिर्वाति । तदेतद् द्विविधं
तपोऽभिनवकमास्रवनिरोधहेतुत्वात्संवरकारणं प्राक्तनकर्मरजोविधूनननिमित्तत्वान्निर्जराहेतुरपि
भवति ।
§ ९०७. अत्राह सम्यग्दृष्टयः किं सर्वे समनिर्जरा आहोस्वित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्य-
त्रोच्यते— १०
सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्त-
मोहक्षपकक्षीणमोहजिनाः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः ॥४५॥
§ ९०८. त एते दश सम्यग्दृष्ट्यादयः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः । तद्यथा—भव्यः पञ्चेन्द्रिय-
संज्ञी पर्याप्तकः पूर्वोक्तकाललब्ध्यादिसहायः परिणामविशुद्ध्या वर्धमानः क्रमेणापूर्वकरणादिसोपान-
पङ्क्त्योत्प्लवमानो बहुतरकर्मनिर्जरो भवति । स एव पुनः प्रथमसम्यक्त्वप्राप्तिनिमित्तसन्निधाने १५
सति सम्यग्दृष्टिर्भवन्नसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनश्चारित्रमोहकर्मविकल्पाप्रत्याख्याना-
करके तथा शेष चार कर्मोंकी स्थितिको समान करके अपने पूर्व शरीरप्रमाण होकर सूक्ष्म काय-
योगके द्वारा सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानको स्वीकार करते हैं। इसके बाद चौथे समुच्छिन्न क्रिया-
निवर्ति ध्यानको आरम्भ करते हैं। इसमें प्राणापानके प्रचाररूप क्रियाका तथा सब प्रकारके
काययोग, वचनयोग और मनोयोगके द्वारा होनेवाली आत्मप्रदेश परिस्पन्द रूप क्रियाका उच्छेद २०
हो जानेसे इसे समुच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यान कहते हैं। इस समुच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यानमें सब
प्रकारके कर्मबन्धके आस्रवका निरोध हो जानेसे तथा बाकीके बचे सब कर्मों के नाश करनेकी
शक्तिके उत्पन्न हो जानेसे अयोगिकेवलीके संसारके सब प्रकारके दुःखजालके सम्बन्धका उच्छेद
करनेवाला सम्पूर्ण यथाख्यातचारित्र, ज्ञान और दर्शनरूप साक्षात् मोक्षका कारण उत्पन्न होता है।
वे अयोगिकेवली भगवान् उस समय ध्यानातिशयरूप अग्निके द्वारा सब प्रकारके मल-कलंकबन्धन- २५
को जलाकर और किट्ट धातु व पाषाणका नाशकर शुद्ध हुए सोनेके समान अपने आत्माको प्राप्तकर
परिनिर्वाणको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यह दोनों प्रकारका तप नूतन कर्मोंके आस्रवके निरोधका
हेतु होनेसे संवरका कारण है और प्राक्तन कर्मरूपी रजके नाश करनेका हेतु होनेसे निर्जराका भी
हेतु है।
§ ९०७. यहाँ कहते हैं कि सब सम्यग्दृष्टि क्या समान निर्जरावाले होते हैं या कुछ विशेषता ३०
है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत, अनन्तानुबन्धिवियोजक, दर्शनमोहक्षपक, उपशमक, उपशान्त-
मोह, क्षपक, क्षीणमोह और जिन ये क्रमसे असंख्यगुण निर्जरावाले होते हैं ॥४५॥
§ ९०८. सम्यग्दृष्टि आदि ये दश क्रमसे असंख्येयगुण निर्जरावाले होते हैं। यथा—जिसे
पूर्वोक्त काललब्धि आदिकी सहायता मिली है और जो परिणामोंकी विशुद्धि द्वारा वृद्धिको प्राप्त हो ३५
रहा है ऐसा भव्य पञ्चेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तक जीव क्रमसे अपूर्वकरण आदि सोपान पंक्तिपर चढ़ता
हुआ बहुतर कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला होता है। सर्वप्रथम वह ही प्रथम सम्यक्त्वकी प्राप्तिके
निमित्त मिलनेपर सम्यग्दृष्टि होता हुआ असंख्येयगुण कर्मनिर्जरावाला होता है। पुनः वह ही
३५२ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।४५ § ९०८ –
वरणक्षयोपशमनिमित्तपरिणामप्राप्तिकाले विशुद्धिप्रकर्षयोगात् श्रावको भवन् ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो
भवति । स एव पुनः प्रत्याख्यानावरणक्षयोपशमकारणपरिणामविशुद्धियोगाद् विरतव्यपदेशभाक्
सन् ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनरनन्तानुबन्धिक्रोधमानमायालोभानां वियोजनपरो
भवति यदा तदा परिणामविशुद्धिप्रकर्षयोगात्ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनर्दर्शन-
५ मोहप्रकृतित्रयतृणनिचयं निर्दधक्षन् परिणामविशुद्ध्यतिशययोगाद्दर्शनमोहक्षपकव्यपदेशभाक्१
पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । एवं सः क्षायिकसम्यग्दृष्टिर्भूत्वा श्रेण्यारोहणाभिमुखश्चारित्र-
मोहोपशमं प्रति व्याप्रीयमाणो विशुद्धिप्रकर्षयोगादुपशमकव्यपदेशमनुभवन् पूर्वोक्तादसंख्येयगुण-
निर्जरो भवति । स एव पुनरशेषचारित्रमोहोपशमनिमित्तसंनिधाने परिप्राप्तोपशान्तकषाय-
व्यपदेशः पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनश्चारित्रमोहक्षपणं प्रत्यभिमुखः परिणाम-
१० विशुद्ध्या वर्द्धमानः क्षपकव्यपदेशमनुभवन्पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स यदा निःशेष-
चारित्रमोहक्षपणकारणपरिणामाभिमुखः क्षीणकषायव्यपदेशमास्कन्दन्पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो
भवति । स एव द्वितीयशुक्लध्यानानलनिव्दग्धघातिकर्मनिचयः सन् जिनव्यपदेशभाक् पूर्वोक्ताद-
संख्येयगुणनिर्जरो भवति ।
चारित्र मोहनीय कर्मके एक भेद अप्रत्याख्यानावरण कर्मके क्षयोपशम निमित्तक परिणामोंकी प्राप्तिके
१५ समय विशुद्धिका प्रकर्ष होनेसे श्रावक होता हुआ उससे संख्येयगुण निर्जरावाला होता है। पुनः
वह ही प्रत्याख्यानावरण कर्मके क्षयोपशम निमित्तक परिणामोंकी विशुद्धिवश विरत संज्ञाको प्राप्त
होता हुआ उससे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही जब अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान,
माया और लोभकी विसंयोजना करता है तब परिणामोंकी विशुद्धिके प्रकर्षवश उससे असंख्येयगुण
निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही दर्शनमोहनीयत्रिकरूपी तृणसमूहको भस्मसात् करता हुआ
२० परिणामोंकी विशुद्धिके अतिशयवश दर्शनमोह क्षपक संज्ञाको प्राप्त होता हुआ पहलेसे असंख्येयगुण
निर्जरावाला होता है। इस प्रकार वह क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर श्रेणिपर आरोहण करनेके सम्मुख
होता हुआ तथा चारित्र मोहनीयके उपशम करनेके लिए प्रयत्न करता हुआ विशुद्धिके प्रकर्षवश
उपशमक संज्ञाको अनुभव करता हुआ पहले कही गयो निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता
है। पुनः वह ही समस्त चारित्रमोहनीयके उपशमके निमित्त मिलनेपर उपशान्तकषाय संज्ञाको
२५ प्राप्त होता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही
चारित्रमोहनीयकी क्षपणाके लिए सम्मुख होता हुआ तथा परिणामोंकी विशुद्धिसे वृद्धिको प्राप्त
होकर क्षपक संज्ञाको अनुभव करता हुआ पहले कही गयो निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला
होता है। पुनः वह ही समस्त चारित्रमोहनीयकी क्षपणाके कारणोंसे प्राप्त हुए परिणामोंके
अभिमुख होकर क्षीणकषाय संज्ञाको प्राप्त करता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येय गुण
३० निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही द्वितीय शुक्लध्यान रूपी अग्निके द्वारा घातिकर्म समूहका
नाश करके जिन संज्ञाको प्राप्त होता हुआ पहले कही गयो निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला
होता है।
विशेषाथ—यहाँ मुख्य रूपसे गुणश्रेणि निर्जराके दस स्थानोंका निर्देश किया गया है।
असंख्यात गुणितक्रम श्रेणिरूपसे कर्मोंकी निर्जरा होना गुणश्रेणिनिर्जरा है। यह गुणश्रेणि निर्जरा
३५ सर्वदा नहीं होती किन्तु उपशमना और क्षपणाके कारणभूत परिणामोंके द्वारा ही गुणश्रेणि रचना
होकर यह निर्जरा होतो है। गुणश्रेणि रचना दो प्रकारको होती है—एक तो गलितावशेष गुणश्रेणि
रचना और दूसरी अवस्थित गुणश्रेणि रचना । यह कहाँ किस प्रकारकी होती है इसे लब्धिसार
क्षपणासारसे जान लेना चाहिए । यहाँ इतना ही विशेष वक्तव्य है कि यहाँ जो दस स्थान बतलाये
१.-भाक् तेष्वेव पूर्वो-मु० ।
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- ९।४६ § ९१० ] नवमोऽध्यायः ३५३
§ ९०९. आह सम्यग्दर्शनसंनिधानेऽपि यद्यसंख्येयगुणनिर्जरत्वात्परस्परतो न साम्यमेषां किं
तर्हि श्रावकवदमी विरतादयो गुणभेदान्न निर्ग्रन्थतामर्हन्तीति । उच्यते, नैतदेवम् । कुतः । यस्माद्
गुणभेदादन्योऽन्यविशेषेऽपि नैगमादिनयव्यापारात्सर्वेऽपि हि भवन्ति—
पुलाकबकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातका निर्ग्रन्थाः ॥४६॥
§ ९१०. उत्तरगुणभावैनापेतमनसो व्रतेष्वपि क्वचित्कदाचित्परिपूर्णतामपरिप्राप्नुवन्तोऽ- ५
विशुद्धपुलाकसादृश्यात्पुलाका इत्युच्यन्ते । नैर्ग्रन्ध्यं प्रति स्थिता अखण्डितव्रताः शरीरोपकरणविभू-
षानुवर्तिनोऽविविक्तपरिवारा³ मोहशबलयुक्ता बकुशाः । शबलपर्यायवाची बकुशशब्दः । कुशीला
द्विविधाः—प्रतिसेवनाकुशीलाः कषायकुशीला इति । अविविक्तपरिग्रहाः परिपूर्णोभयाः कथंचिदुत्तर-
गुणैर्विराधिनः प्रतिसेवनाकुशीलाः । वशीकृतान्यकषायोदयाः संज्वलनमात्रतन्त्राः कषायकुशीलाः ।
उदकदण्डराजिवदनभिव्यक्तोदयकर्मणः ऊर्ध्वं मुहूर्तादुद्भिद्यमानकेवलज्ञानदर्शनभाजो निर्ग्रन्थाः । १०
प्रक्षीणघातिकर्माणः केवलिनो द्विविधाः स्नातकाः । त एते पञ्चापि निर्ग्रन्थाः । चारित्रपरिणामस्य
प्रकर्षाप्रकर्षभेदे सत्यपि नैगमसंग्रहादिनयापेक्षया सर्वेऽपि ते निर्ग्रन्था इत्युच्यन्ते ।
हैं उनमें उत्तरोत्तर गुणश्रेणिनिर्जराके लिए असंख्यातगुणा द्रव्य प्राप्त होता है किन्तु आगे-आगे
गुणश्रेणिका काल संख्यातगुणा हीन-हीन है। अर्थात् सम्यग्दृष्टिको गुणश्रेणि निर्जरामें जो अन्तर्मुहूर्त
काल लगता है उससे श्रावकको संख्यात गुणा हीन काल लगता है पर सम्यग्दृष्टि गुणश्रेणि द्वारा १५
जितने कर्मप्रदेशोंकी निर्जरा करता है उससे श्रावक असंख्यात गुणे कर्मपरमाणुओंकी निर्जरा करता
है। इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिए।
§ ९०९. कहते हैं सम्यग्दर्शनका सान्निध्य होनेपर भी यदि असंख्येयगुण निर्जराके कारण
ये परस्परमें समान नहीं हैं तो श्रावकके समान ये विरत आदिक भी केवल गुणभेदके कारण
निर्ग्रन्थपनेको नहीं प्राप्त हो सकते हैं, इसलिए कहते हैं कि यह बात ऐसी नहीं है क्योंकि यतः २०
गुणभेदके कारण परस्पर भेद होनेपर भी नैगमादि नयकी अपेक्षा वे सभी होते हैं—
पुलाक, बकुश, कुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातक ये पाँच निर्ग्रन्थ हैं ॥४६॥
§ ९१०. जिनका मन उत्तरगुणोंकी भावनासे रहित है, जो कहीं पर और कदाचित् व्रतोंमें
भी परिपूर्णताको नहीं प्राप्त होते हैं वे अविशुद्धपुलाक (तुच्छ धान्य) के समान होनेसे पूलाक कहे
जाते हैं। जो निर्ग्रन्थ होते हैं, व्रतोंका अखण्ड रूपसे पालन करते हैं, शरीर और उपकरणोंकी शोभा २५
बढ़ानेमें लगे रहते हैं, परिवारसे घिरे रहते हैं और विविध प्रकारके मोहसे युक्त होते हैं वे बकुश
कहलाते हैं। यहाँ पर बकुश शब्द 'शबल' (चित्र-विचित्र) शब्दका पर्यायवाची है। कुशील दो
प्रकारके होते हैं—प्रतिसेवनाकुशील और कषायकुशील। जो परिग्रहसे घिरे रहते हैं, जो मूल और
उत्तरगुणोंमें परिपूर्ण हैं लेकिन कभी-कभी उत्तरगुणोंकी विराधना करते हैं वे प्रतिसेवनाकुशील
कहलाते हैं। जिन्होंने अन्य कषायोंके उदयको जीत लिया है और जो केवल संज्वलन कषायके ३०
अधीन हैं। वे कषायकुशील कहलाते हैं। जिस प्रकार जलमें लकड़ीसे की गयी रेखा अप्रकट रहती
है उसी प्रकार जिनके कर्मोंका उदय अप्रकट हो और जो अन्तर्मुहूर्तके बाद प्रकट होनेवाले केवल-
ज्ञान और केवलदर्शनको प्राप्त करते हैं वे निर्ग्रन्थ कहलाते हैं। जिन्होंने चार घातिया कर्मोंका नाश
कर दिया है ऐसे दोनों प्रकारके केवली स्नातक कहलाते हैं। ये पाँचों ही निर्ग्रन्थ होते हैं। इनमें
चारित्ररूप परिणामोंकी न्यूनाधिकताके कारण भेद होनेपर भी नैगम और संग्रह आदि नयोंकी ३५
अपेक्षा वे सब निर्ग्रन्थ कहलाते हैं ।
१. -भावनोपेत-मु० । २. शुद्धाः पुलाक-मु० । ३. -वारा मोहछेदशवल-आ०, दि० १ । -वारानु मोहसवल
-दि० २ । ४. -विरोधिनः मु० ।
४५
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३५४ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।४७ § ९११ -
§ ९११. तेषां पुलाकादीनां भूयोऽपि विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिङ्गलेश्योपपादस्थानविकल्पतः साध्याः ॥ ४७ ॥
§ ९१२. त एते पुलाकादयः संयमादिभिरष्टभिरनुयोगैः साध्या व्याख्येयाः । तद्यथा—पुलाक-
बकुशप्रतिसेवनाकुशीला द्वयोः संयमयोः सामायिकच्छेदोपस्थापनयोर्वर्तन्ते । कषायकुशीला
द्वयोः संयमयोः परिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययोः पूर्वयोश्च । निर्ग्रन्थस्नातका एकस्मिन्नेव यथा-
ख्यातसंयमे सन्ति ।
§ ९१३. श्रुतं—पुलाकबकुशप्रतिसेवनाकुशीला उत्कर्षेणाभिन्नाक्षरदशपूर्वधराः । कषाय-
कुशीला निर्ग्रन्थाश्चतुर्दशपूर्वधराः । जघन्येन पुलाकस्य श्रुतमाचारवस्तु । बकुशकुशीलनिर्ग्रन्थानां
श्रुतमष्टौ प्रवचनमातरः । स्नातका अपगतश्रुताः केवलिनः ।
§ ९१४. प्रतिसेवना—पञ्चानां मूलगुणानां रात्रिभोजनवर्जनस्य च पराभियोगाद् बला-
दन्यतमं प्रतिसेवमानः पुलाको भवति । बकुशो द्विविधः—उपकरणबकुशः शरीरबकुशश्चेति ।
तत्रोपकरणबकुशो बहुविशेषयुक्तोपकरणाकांक्षी । शरीरसंस्कारसेवी शरीरबकुशः । प्रतिसेवना-
कुशीलो मूलगुणानविराधयन्नुत्तरगुणेषु कांचिद्विराधनां प्रतिसेवते । कषायकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातकानां
प्रतिसेवना नास्ति ।
§ ९१५. तीर्थमिति सर्वे सर्वेषां तीर्थकराणां तीर्थेषु भवन्ति ।
§ ९१६. लिङ्गं द्विविधं—द्रव्यलिङ्गं भावलिङ्गं चेति । भावलिङ्गं प्रतीत्य सर्वे पञ्च निर्ग्रन्था
लिङ्गिनो भवन्ति । द्रव्यलिङ्गं प्रतीत्य भाज्याः ।
§ ९११. अब उन पुलाक आदिके सम्बन्धमें पुनरपि ज्ञान प्राप्त करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
संयम, श्रुत, प्रतिसेवना, तीर्थ, लिंग, लेश्या, उपपाद और स्थानके भेदसे इन निर्ग्रन्थोंका
व्याख्यान करना चाहिए ॥४७॥
§ ९१२. ये पुलाक आदि संयम आदि आठ अनुयोगोंके द्वारा साध्य हैं अर्थात् व्याख्यान
करने योग्य हैं । यथा—पुलाक, बकुश और प्रतिसेवना कुशील सामायिक और छेदोपस्थापना इन
दो संयमोंमें रहते हैं । कषायकुशील पूर्वोक्त दो संयमोंके साथ परिहारविशुद्धि और सूक्ष्मसाम्पराय
इन दो संयमोंमें रहते हैं । निर्ग्रन्थ और स्नातक एक मात्र यथाख्यात संयममें रहते हैं ।
§ ९१३. श्रुत—पुलाक, बकुश और प्रतिसेवनाकुशील उत्कृष्ट रूपसे अभिन्नाक्षर दश
पूर्वधर होते हैं । कषायकुशील और निर्ग्रन्थ चौदह पूर्वधर होते हैं । जघन्य रूपसे पुलाक श्रुत
आचार वस्तुप्रमाण होता है । बकुश, कुशील और निर्ग्रन्थोंका श्रुत आठ प्रवचनमातृका प्रमाण
होता है । स्नातक श्रुतज्ञानसे रहित केवली होते हैं ।
§ ९१४. प्रतिसेवना—दूसरोंके दबाववश जबरदस्तीसे पाँच मूलगुण और रात्रिभोजन
वर्जन व्रतमें से किसी एककी प्रतिसेवना करनेवाला पुलाक होता है । बकुश दो प्रकारके होते हैं,
उपकरणबकुश और शरीरबकुश । उनमें से अनेक प्रकारकी विशेषताओंको लिये हुए उपकरणोंको
चाहनेवाला उपकरणबकुश होता है तथा शरीरका संस्कार करनेवाला शरीरबकुश होता है ।
प्रतिसेवना कुशील मूलगुणोंकी विराधना न करता हुआ उत्तरगुणोंकी विराधनाकी प्रतिसेवना
करनेवाला होता है । कषायकुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातकोंके प्रतिसेवना नहीं होती ।
§ ९१५. तीर्थ—ये सब निर्ग्रन्थ सब तीर्थंकरोंके तीर्थोंमें होते हैं ।
§ ९१६. लिंग—लिंग दो प्रकारका है, द्रव्यलिंग और भावलिंग । भावलिंगकी अपेक्षा
पाँचों ही साधु निर्ग्रन्थ लिंगवाले होते हैं । द्रव्यलिंग अर्थात् शरीरकी ऊँचाई, रंग व पीछी आदि-
की अपेक्षा उनमें भेद है ।
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Here is the line-by-line transcription of the Sanskrit text, Hindi translation, and footnotes from the image:
– ९।४७ § ९१९ ] नवमोऽध्यायः ३५५
§ ९१७. लेश्याः—पुलाकस्योत्तरास्तिस्रः बकुशप्रतिसेवनाकुशीलयोः षडपि$^१$। कषायकुशी-
लस्य चतस्र उत्तराः । सूक्ष्मसांपरायस्य निर्ग्रन्थस्नातकयोश्च शुक्लैव केवला । अयोगा अलेश्याः ।
§ ९१८. उपपादः—पुलाकस्योत्कृष्ट उपपाद उत्कृष्टस्थितिदेवेषु सहस्रारे । बकुशप्रतिसेवना-
कुशीलयोर्द्वाविंशतिसागरोपमस्थितिषु आरणाच्युतकल्पयोः । कषायकुशीर्लानिर्ग्रन्थयोस्त्रयस्त्रिंश-
त्सागरोपमस्थितिषु सर्वार्थसिद्धौ । सर्वेषामपि जघन्यः सौधर्मकल्पे द्विसागरोपमस्थितिषु । स्नात-
कस्य निर्वाणमिति ।
§ ९१९. स्थानम्—असंख्येयानि संयमस्थानानि कषायनिमित्तानि भवन्ति । तत्र सर्वजघ-
न्यानि लब्धिस्थानानि पुलाककषायकुशीलयोः । तौ युगपदसंख्येयानि स्थानानि गच्छतः । ततः
पुलाको व्युच्छिद्यते । कषायकुशीलस्ततोऽसंख्येयानि स्थानानि गच्छत्येकाकी । ततः कषायकुशील-
प्रतिसेवनाकुशीलबकुशा युगपदसंख्येयानि स्थानानि गच्छन्ति । ततो बकुशो व्युच्छिद्यते । ततोऽ- १०
प्यसंख्येयानि स्थानानि गत्वा प्रतिसेवनाकुशीलो व्युच्छिद्यते । ततोऽप्यसंख्येयानि स्थानानि गत्वा
कषायकुशीलो व्युच्छिद्यते । अत ऊर्ध्वमकषायस्थानानि निर्ग्रन्थः प्रतिपद्यते । सोऽप्यसंख्येयानि
स्थानानि गत्वा व्युच्छिद्यते । अत ऊर्ध्वमेकं स्थानं गत्वा स्नातको निर्वाणं $^२$प्राप्नोतीत्येतेषां संयम-
लब्धिरनन्तगुणा भवति ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां नवमोऽध्यायः समाप्तः ।
§ ९१७. लेश्या—पुलाकके आगेकी तीन लेश्याएँ होती हैं। बकुश और प्रतिसेवना कुशील- १५
के छहों लेश्याएँ होती हैं। कषायकुशीलके अन्तकी चार लेश्याएँ होती हैं । सूक्ष्मसाम्पराय कषाय-
कुशीलके तथा निर्ग्रन्थ और स्नातकके केवल शुक्ल लेश्या होती है और अयोगी लेश्यारहित
होते हैं ।
§ ९१८. उपपाद—पुलाकका उत्कृष्ट उपपाद सहस्रार कल्पके उत्कृष्ट स्थितिवाले देवोंमें
होता है । बकुश और प्रतिसेवना कुशीलका उत्कृष्ट उपपाद आरण और अच्युत कल्पमें बाईस २०
सागरकी स्थितिवाले देवोंमें होता है। कषायकुशील और निर्ग्रन्थका उत्कृष्ट उपपाद सर्वार्थसिद्धिमें
तैंतीस सागरकी स्थितिवाले देवोंमें होता है। इन सभीका जघन्य उपपाद सौधर्म कल्पमें दो सागर
की स्थितिवाले देवोंमें होता है । तथा स्नातक मोक्ष जाते हैं ।
§ ९१९. स्थान—कषायनिमित्तक असंख्यात संयमस्थान होते हैं । पुलाक और कषाय-
कुशीलके सबसे जघन्य लब्धिस्थान होते हैं । वे दोनों असंख्यात स्थानोंतक एक साथ जाते हैं । २५
इसके बाद पुलाककी व्युच्छित्ति हो जाती है । आगे कषायकुशील असंख्यात स्थानोंतक अकेला
जाता है । इससे आगे कषायकुशील, प्रतिसेवना कुशील और बकुश असंख्यात स्थानोंतक एक
साथ जाते हैं । यहाँ बकुशकी व्युच्छित्ति हो जाती है । इससे भी असंख्यात स्थान आगे जाकर
प्रतिसेवना कुशीलकी व्युच्छित्ति हो जाती है। पुनः इससे भी असंख्यात स्थान आगे जाकर कषाय
कुशीलकी व्युच्छित्ति हो जाती है । इससे आगे अकषाय स्थान हैं जिन्हें निर्ग्रन्थ प्राप्त होता है । ३०
उसकी भी असंख्यातस्थान आगे जाकर व्युच्छित्ति हो जाती है । इससे आगे एक स्थान जाकर
स्नातक निर्वाणको प्राप्त होता है । इनकी संयमलब्धि अनन्तगुणी होती है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धिनामक तत्त्वार्थवृत्तिका नौवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
१. षडपि । कृष्णलेश्यादित्रितयं तयोः कथमिति चेदुच्यते-तयोरुपकरणासक्तिसंभवादात्तंर्ध्यानं कदाचित्संभवति,
आर्तध्यानेन च कृष्णादिलेश्यात्रितयं संभवतीति । कषाय-मु० । २. प्राप्नोति तेषां मु० । ३५
अथ दशमोऽध्यायः
§ ९२०. आह, अन्ते निर्दिष्टस्य मोक्षस्येदानीं स्वरूपाभिधानं प्राप्तकालमिति । सत्यमेवम् ।
मोक्षप्राप्तिः केवलज्ञानावाप्ति¹पूर्विकेति केवलज्ञानोत्पत्तिकारणमुच्यते—
मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् ॥ १॥
§ ९२१. इह वृत्तिकरणं न्याय्यम् । कुतः । लघुत्वात् । कथम्² । एकस्य ‘क्षय’शब्दस्या-
करणाद् विभक्त्यन्तरनिर्देशस्य चाभावात् ‘च’ शब्दस्य चाप्रयोगाल्लघु सूत्रं भवति ‘मोहज्ञानदर्शना-
वरणान्तरायक्षयात्केवलम्’ इति । सत्यमेतत्, क्षयक्रमप्रतिपादनार्थो वाक्यभेदेन निर्देशः क्रियते ।
प्रागेव मोहं क्षयमुपनीयान्तर्मुहूर्तं क्षीणकषायव्यपदेशमवाप्य ततो युगपज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायाणां
क्षयं कृत्वा केवलमवाप्नोति इति । तत्क्षयो³ हेतुः केवलोत्पत्तेरिति हेतुलक्षणो विभक्तिनिर्देशः कृतः ।
कथं प्रागेव मोहः क्षयमुपनीयते इति चेदुच्यते—भव्यः सम्यग्दृष्टिः परिणामविशुद्ध्या वर्धमानोऽ-
संयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तगुणस्थानेषु कस्मिंश्चिन्मोहस्य सप्त प्रकृतीः क्षयमुपनीय
क्षायिकसम्यग्दृष्टिर्भूत्वा क्षपकश्रेण्यारोहणाभिमुखोऽधःप्रवृत्तकरणमप्रमत्तस्थाने प्रतिपद्यापूर्वकरण-
प्रयोगेणापूर्वकरणक्षपकगुणस्थानव्यपदेशमनुभूय तत्राभिनवशुभाभिसन्धितानूतनपापप्रकृतिस्थित्यनु-
§ ९२०. कहते हैं कि अन्तमें कहे गये मोक्षके स्वरूपके कथनका अब समय आ गया है ।
यह कहना सही है तथापि केवलज्ञानकी उत्पत्ति होने पर ही मोक्षकी प्राप्ति होती है इसलिए पहले
केवलज्ञानकी उत्पत्तिके कारणोंका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मोहका क्षय होनेसे तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मका क्षय होनेसे केवल-
ज्ञान प्रकट होता है ॥१॥
§ ९२१. इस सूत्रमें समास करना उचित है क्योंकि इससे सूत्र लघु हो जाता है । शंका—
कैसे ? प्रतिशंका—क्योंकि ऐसा करनेसे एक क्षयशब्द नहीं देना पड़ता है और दूसरो विभक्तिके
निर्देशका अभाव हो जानेसे ‘च’ शब्दका प्रयोग नहीं करना पड़ता है इसलिए सूत्र लघु हो जाता
है । यथा—‘मोहज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयात्केवलम्’ । समाधान—यह कहना सही है तथापि
क्षयके क्रमका कथन करनेके लिए वाक्योंका भेद करके निर्देश किया है। पहले ही मोहका क्षय
करके और अन्तर्मुहूर्त कालतक क्षीणकषाय संज्ञाको प्राप्त होकर अनन्तर ज्ञानावरण, दर्शनावरण
और अन्तराय कर्मका एक साथ क्षय करके केवलज्ञानको प्राप्त होता है । इन कर्मोंका क्षय केवल-
ज्ञानकी उत्पत्तिका हेतु है ऐसा जानकर ‘हेतुरूप’ विभक्तिका निर्देश किया है। शंका—पहले ही
मोहके क्षयको कैसे प्राप्त होता है ? समाधान—वृद्धिको प्राप्त होता हुआ असंयत सम्यग्दृष्टि, संयता-
संयत, प्रमत्तसंयत, और अप्रमत्तसंयत इन चार गुणस्थानोंमें-से किसी एक गुणस्थानमें मोहनीयकी
सात प्रकृतियोंका क्षय करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर क्षपकश्रेणिपर आरोहण करनेके लिए
सम्मुख होता हुआ अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें अधःप्रवृत्तकरणको प्राप्त होकर अपूर्वकरणके प्रयोग
द्वारा अपूर्वकरणक्षपकगुणस्थान संज्ञाका अनुभव करके और वहाँपर नूतन-परिणामोंकी विशुद्धिवश
१. –ज्ञानाप्ति–आ० । २. कथम् ? क्षय–मु० । ३. तत्क्षयहेतुः केवलोत्पत्तिरिति मु०, ता० ।
- १०।२ § ९२३ ] दशमोऽध्यायः ३५७
भागो विवर्धितशुभकर्मानुभवोऽनिवृत्तिकरणप्राप्त्याऽनिवृत्तिबादरसांपरायक्षपकगुणस्थानमधिरुह्य
तत्र कषायाष्टकं नष्टं कृत्वा नपुंसकवेदनाशं समापाद्य स्त्रीवेदमुन्मूल्य नोकषायषट्कं पुंवेदे प्रक्षिप्य
क्षपयित्वा पुंवेदं क्रोधसंज्वलने, क्रोधसंज्वलनं मानसंज्वलने, मानसंज्वलनं मायासंज्वलने, माया-
संज्वलनं$^१$ च लोभसंज्वलने क्रमेण बादरकृष्टिविभागेन विलयमुपनीय लोभसंज्वलनं तनूकृत्य सूक्ष्म-
सांपरायक्षपकत्वमनुभूय निरवशेषं मोहनीयं निर्मूलकषायं कषित्वा क्षीणकषायतामधिरुह्यावतारित- ५
मोहनीयभार उपान्त्यप्रथमे समये निद्राप्रचले प्रलयमुपनीय पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शना-
वरणानां पञ्चानामन्तरायाणां$^२$ चान्तमन्ते समुपनीय$^३$ तदनन्तरं ज्ञानदर्शनस्वभावं केवलपर्यायम-
प्रतर्क्यविभूतिविशेषमवाप्नोति ।
§ ९२२. आह कस्माद्धेतोर्मोक्षः किंलक्षणश्चेत्यत्रोच्यते—
बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ॥ २ ॥ १०
§ ९२३. मिथ्यादर्शनादिहेत्वभावादभिनवकर्मभावः पूर्वोदितनिर्जराहेतुसंनिधाने चार्जित-
कर्मनिरासः । ताभ्यां बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यामिति हेतुलक्षणविभक्तिनिर्देशः । ततो भवस्थिति-
हेतुसमीकृतशेषकर्मविस्थस्य$^४$ युगपदात्यन्तिकः$^५$ कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः प्रत्येत्यव्यः । कर्माभावो
द्विविधः—यत्नसाध्योऽयत्नसाध्यश्चेति । तत्र चरमदेहस्य नारकतिर्यग्देवायुषामभावो न यत्नसाध्यः
असत्त्वात् । यत्नसाध्य इत ऊर्ध्वमुच्यते—असंयतसम्यग्दृष्ट्यादिषु चतुर्षु गुणस्थानेषु कस्मिंश्चि- १५
पापप्रकृतियोंकी स्थिति और अनुभागको कृश करके तथा शुभकर्मोंके अनुभागकी वृद्धि करके अनिवृत्ति-
करणकी प्राप्ति द्वारा अनिवृत्तिबादरसाम्पराय क्षपकगुणस्थानपर आरोहण करके तथा वहाँ आठ
कषायोंका नाश करके तथा नपुंसकवेद और स्त्रीवेदका क्रमसे नाश करके, छह नोकषायका पुरुषवेद
में संक्रमण द्वारा नाश करके तथा पुरुषवेदका क्रोधसंज्वलनमें, क्रोधसंज्वलनका मानसंज्वलनमें,
मानसंज्वलनका मायासंज्वलनमें और मायासंज्वलनका लोभसंज्वलनमें क्रमसे बादरकृष्टिविभागके २०
द्वारा संक्रमण करके तथा लोभसंज्वलनको कृश करके, सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकत्वका अनुभव करके,
समस्त मोहनीयका निर्मूल नाश करके, क्षीणकषाय गुणस्थानपर आरोहण करके, मोहनीयके
भारको उतारकर क्षीणकषाय गुणस्थानके उपान्त्य समयमें निद्रा और प्रचलाका नाश करके तथा
अन्तिम समयमें पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय कर्मोंका अन्त करके
तदनन्तर ज्ञानदर्शनस्वभावरूप केवल पर्यायको प्राप्त होता है । २५
§ ९२२. कहते हैं कि किस कारणसे मोक्ष प्राप्त होता है और उसका लक्षण क्या है यह
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बन्ध-हेतुओंके अभाव और निर्जरासे सब कर्मोंका आत्यन्तिक क्षय होना ही मोक्ष है ॥२॥
§ ९२३. मिथ्यादर्शनादिक हेतुओंका अभाव होनेसे नूतन कर्मोंका अभाव होता है और पहले
कही गयी निर्जरारूप हेतुके मिलनेपर अर्जित कर्मोंका नाश होता है। इन दोनोंसे 'बन्धहेत्वभाव- ३०
निर्जराभ्याम्' यह हेतुपरक विभक्तिका निर्देश है। जिसने भवस्थितिके हेतुभूत आयुकर्मके बराबर
शेष कर्मोंकी स्थितिको कर लिया है उसके उक्त कारणोंसे एक साथ समस्त कर्मोंका आत्यन्तिक
वियोग होना मोक्ष है ऐसा जानना चाहिए। कर्मका अभाव दो प्रकारका है—यत्नसाध्य और अय-
त्नसाध्य । इनमें से चरम देहवालेके नरकायु, तिर्यंचायु और देवायुका अभाव यत्नसाध्य नहीं होता,
क्योंकि उसके उनका सत्त्व नहीं उपलब्ध होता । यत्नसाध्य अभाव इससे आगे कहते हैं—असंयत- ३५
१. –लनं लोभ–मु० । २. –याणामन्त–मु० । ३. समुपगमय्य तद–मु०, ता० । ४. –वस्थितस्य मु०, ता० ।
५. –दात्यतीकृतकृ–मु० ।
३५८ सर्वार्थसिद्धौ [ १०।२ § ९२३ -
तत्सप्रकृतिकक्षयः क्रियते । निद्रानिद्राप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्धिनरकगतितिर्यग्गत्येकद्वित्रिचतुरिन्द्रिय-
जातिनरकगतितिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्यातोपोद्योतस्थावरसूक्ष्मसाधारणसंज्ञिकानां षोडशानां कर्म-
प्रकृतीनामनिवृत्तिबादरसांपरायस्थाने युगपत्क्षयः क्रियते । ततः परं तत्रैव कषायाष्टकं नष्टं
क्रियते । नपुंसकवेदः स्त्रीवेदश्च¹ क्रमेण तत्रैव क्षयमुपयाति । नोकषायषट्कं च सहैकेनैव प्रहारेण
५ विनिपातयति । ततः पुंवेदसंज्वलनक्रोधमानमायाः क्रमेण तत्रैवात्यन्तिकं ध्वंसमास्कन्दन्ति । लोभ-
संज्वलनः सूक्ष्मसांपरायान्ते यात्यन्तम् । निद्राप्रचले क्षीणकषायवीतरागच्छद्मस्थस्योपान्त्यसमये
प्रलयमुपव्रजतः । पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शनावरणानां पञ्चानामन्तरायाणां च तस्यैवान्त्य-
समये प्रक्षयो भवति । अन्यतरवेदनीयदेवगत्यौदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसकार्मणशरीरपञ्चबन्धन-
पञ्चसंघातसंस्थानषट्कौदारिकवैक्रियिकाहारकशरीराङ्गोपाङ्गषट्संहननपञ्चप्रशस्त वर्णपञ्चाप्रशस्त-
१० वर्णगन्धद्वयपञ्चप्रशस्तरसपञ्चाप्रशस्तरसस्पर्शाष्टकदेवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातोच्छ्वा-
सप्रशस्ताप्रशस्तविहायोगत्यपर्याप्तप्रत्येकशरीरस्थिरास्थिरशुभाशुभदुर्भगसुस्वरदुःस्वरानादेयायशः-
कीर्तिनिर्माणनामनीचैर्गोत्राख्या द्वासप्ततिप्रकृतयोऽयोगकेवलिन उपान्त्यसमये विनाशमुपयान्ति ।
अन्यतरवेदनीयमनुष्यायुर्मनुष्यगतिपञ्चेन्द्रियजातिमनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यत्रसबादरपर्याप्तकसुभगा-
देययशःकीर्तितीर्थंकरनामोच्चैर्गोत्रसंज्ञिकानां त्रयोदशानां प्रकृतीनामयोगकेवलिनश्चरमसमये व्यु-
१५ च्छेदो भवति ।
सम्यग्दृष्टि आदि चार गुणस्थानोंमेंसे किसी एक गुणस्थानमें सात प्रकृतियोंका क्षय करता है ।
पुनः निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, नरकगति, तिर्यंचगति, एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति,
त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यंचगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप,
उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण नामवाली सोलह कर्मप्रकृतियोंका अनिवृत्तिबादरसाम्पराय
२० गुणस्थानमें एक साथ क्षय करता है। इसके बाद उसी गुणस्थानमें आठ कषायोंका नाश करता
है । पुनः वहींपर नपुंसकवेद और स्त्रीवेदका क्रमसे क्षय करता है । तथा छह नोकषायोंको एक
ही प्रहारके द्वारा गिरा देता है। तदनन्तर पुरुषवेद संज्वलनक्रोध, संज्वलनमान और संज्वलनमाया
वहाँपर क्रमसे अत्यन्त क्षयको प्राप्त होते हैं। तथा लोभसंज्वलन सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानके
अन्तमें विनाशको प्राप्त होता है। निद्रा और प्रचला क्षीणकषाय वीतरागछद्मस्थगुणस्थानके
२५ उपान्त्य समयमें प्रलयको प्राप्त होते हैं। पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय
कर्मोंका उसी गुणस्थानके अन्तिम समयमें क्षय होता है। कोई एक वेदनीय, देवगति, औदारिक
शरीर, वैक्रियिक शरीर, आहारक शरीर, तैजसशरीर, कार्मण शरीर, पाँच बन्धन, पाँच संघात,
छह संस्थान, औदारिक शरीर अंगोपांग, वैक्रियिकशरीर अंगोपांग, आहारक शरीर अंगोपांग,
छह संहनन, पाँच प्रशस्तवर्ण, पाँच अप्रशस्तवर्ण, दो गन्ध, पाँच प्रशस्तरस, पाँच अप्रशस्तरस, आठ
३० स्पर्श, देवगति, प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, अप्र-
शस्तविहायोगति, अपर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, सुस्वर, दुःस्वर,
अनादेय, अयशःकीर्ति, निर्माण और नीचगोत्र नामवाली बहत्तर प्रकृतियोंको अयोगकेवली गुण-
स्थानके उपान्त्य समयमें विनष्ट करता है तथा कोई एक वेदनीय मनुष्य आयु, मनुष्यगति, पंचे-
न्द्रियजाति, मनुष्यगति-प्रायोग्यानुपूर्वी, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यशःकीर्ति, तीर्थंकर
३५ और उच्चगोत्र नामवाली तेरह प्रकृतियोंका अयोगकेवली गुणस्थानके
- १०१४ § ९२७ ] दशमोऽध्यायः ३५९
§ ९२४. आह, किमासां पौद्गलिकीनामेव द्रव्यकर्मप्रकृतीनां निरासान्मोक्षोऽवसीयते उत
भावकर्मणोऽपीत्यत्रोच्यते—
औपशमिकादिभव्यत्वानां च ॥ ३ ॥
§ ९२५. किम् । 'मोक्षः' इत्यनुवर्तते । भव्यत्वग्रहणमन्यपारिणामिकनिवृत्त्यर्थम् । तेन पारि-
णामिकेषु भव्यत्वस्यौपशमिकादीनां च भावानाम्भावान्मोक्षो भवतीत्यभ्युपगम्यते । ५
§ ९२६. आह, यद्यपवर्गो भावोपरतेः प्रतिज्ञायते नैनु औपशमिकादिभावनिवृत्तितत्सर्व-
क्षायिकभावनिवृत्तिर्व्यपदेशो मुक्तस्य प्राप्नोतीति । स्यादेतदेवं यदि विशेषो नोच्येत । अस्त्यत्र
विशेष इत्यपवादविधानार्थमिदमुच्यते—
अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः ॥ ४ ॥
§ ९२७. अन्यत्रशब्दापेक्षया 'का'निर्देशः । केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्योऽन्यत्रान्य- १०
स्मिन्नयं विधिरिति । यदि चत्वार एवावशिष्यन्ते, अनन्तवीर्यादीनां निवृत्तिः प्राप्नोति । नैष दोषः,
और किसीके नहीं होता । इनके सिवा शेष प्रकृतियोंका सत्त्व नियमसे होता है । यह जीव गुण-
स्थान क्रमसे बन्धहेतुओंका अभाव करता है इसलिए क्रमसे नूतन बन्धका अभाव होता जाता है
और सत्तामें स्थित प्राचीन प्रकृतियोंका परिणाम-विशेषसे क्षय करता जाता है इसलिए सत्तामें
स्थित कर्मोंका भी अभाव होता जाता है और इस प्रकार अन्तमें सब कर्मोंका वियोग हो जानेसे १५
यह जीव मुक्त होता है। यहाँ मोक्ष शब्दका प्रयोग कर्म, नोकर्म और भावकर्मके वियोग अर्थमें
किया गया है । संसारी जीव बद्ध है अतएव वह परतन्त्र है। उसके बन्धनके टूट जाने पर
वह मुक्त होता है अर्थात् अपनी स्वतन्त्रताको प्राप्त करता है। इस प्रकार मोक्ष क्या है इसका
निर्देश किया ।
§ ९२४. कहते हैं कि क्या इन पौद्गलिक द्रव्यकर्म प्रकृतियोंके वियोगसे ही मोक्ष मिलता २०
है या भावकर्मोंके भी अभावसे मोक्ष मिलता है इस बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
तथा औपशमिक आदि भावों और भव्यत्व भावके अभाव होनेसे मोक्ष होता है ॥३॥
§ ९२५. क्या होता है ? मोक्ष होता है। यहाँ पर 'मोक्ष' इस पदकी अनुवृत्ति होती है।
अन्य पारिणामिक भावोंकी निवृत्ति करनेके लिए सूत्रमें भव्यत्व पदका ग्रहण किया है। इससे
पारिणामिक भावोंमें भव्यत्वका और औपशमिक आदि भावोंका अभाव होनेसे मोक्ष होता है यह २५
ज्ञात होता है।
§ ९२६. कहते हैं, यदि भावोंके अभाव होनेसे मोक्षकी प्रतिज्ञा करते हो तो औपशमिक
आदि भावोंकी निवृत्तिके समान समस्त क्षायिक भावोंकी निवृत्ति मुक्त जीवके प्राप्त होती है ?
यह ऐसा होवे यदि इसके सम्बन्धमें कोई विशेष बात न कही जावे तो । किन्तु इस सम्बन्धमें
विशेषता है इसलिए अपवादका विधान करनेके लिए यह आगेका सूत्र कहते हैं— ३०
पर केवल सम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन और सिद्धत्व भावका अभाव नहीं होता ॥४॥
§ ९२७. यहाँ पर अन्यत्र शब्दकी अपेक्षा पंचमी विभक्तिका निर्देश किया है। केवल-
सम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन और सिद्धत्व इनके सिवा अन्य भावोंमें यह विधि होती है।
शंका—सिद्धोंके यदि चार ही भाव शेष रहते हैं तो अनन्तवीर्य आदिकी निवृत्ति प्राप्त होती है।
१. –यते नत्वौप-मु० । –यतेतदौप– ता० । २. 'कापदाने' –जैनेन्द्र० १, ४, ४१ । 'अपादाने कारके का ३५
विभक्तिर्भवति ।' – वृत्तिः । प्रतिषु 'को निर्देशः' इति पाठः ।