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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 558 में से

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पृष्ठ 465
  • ९।४६ § ९१० ] नवमोऽध्यायः ३५३
    § ९०९. आह सम्यग्दर्शनसंनिधानेऽपि यद्यसंख्येयगुणनिर्जरत्वात्परस्परतो न साम्यमेषां किं
    तर्हि श्रावकवदमी विरतादयो गुणभेदान्न निर्ग्रन्थतामर्हन्तीति । उच्यते, नैतदेवम् । कुतः । यस्माद्
    गुणभेदादन्योऽन्यविशेषेऽपि नैगमादिनयव्यापारात्सर्वेऽपि हि भवन्ति—
    पुलाकबकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातका निर्ग्रन्थाः ॥४६॥
    § ९१०. उत्तरगुणभावैनापेतमनसो व्रतेष्वपि क्वचित्कदाचित्परिपूर्णतामपरिप्राप्नुवन्तोऽ- ५
    विशुद्धपुलाकसादृश्यात्पुलाका इत्युच्यन्ते । नैर्ग्रन्ध्यं प्रति स्थिता अखण्डितव्रताः शरीरोपकरणविभू-
    षानुवर्तिनोऽविविक्तपरिवारा³ मोहशबलयुक्ता बकुशाः । शबलपर्यायवाची बकुशशब्दः । कुशीला
    द्विविधाः—प्रतिसेवनाकुशीलाः कषायकुशीला इति । अविविक्तपरिग्रहाः परिपूर्णोभयाः कथंचिदुत्तर-
    गुणैर्विराधिनः प्रतिसेवनाकुशीलाः । वशीकृतान्यकषायोदयाः संज्वलनमात्रतन्त्राः कषायकुशीलाः ।
    उदकदण्डराजिवदनभिव्यक्तोदयकर्मणः ऊर्ध्वं मुहूर्तादुद्भिद्यमानकेवलज्ञानदर्शनभाजो निर्ग्रन्थाः । १०
    प्रक्षीणघातिकर्माणः केवलिनो द्विविधाः स्नातकाः । त एते पञ्चापि निर्ग्रन्थाः । चारित्रपरिणामस्य
    प्रकर्षाप्रकर्षभेदे सत्यपि नैगमसंग्रहादिनयापेक्षया सर्वेऽपि ते निर्ग्रन्था इत्युच्यन्ते ।
    हैं उनमें उत्तरोत्तर गुणश्रेणिनिर्जराके लिए असंख्यातगुणा द्रव्य प्राप्त होता है किन्तु आगे-आगे
    गुणश्रेणिका काल संख्यातगुणा हीन-हीन है। अर्थात् सम्यग्दृष्टिको गुणश्रेणि निर्जरामें जो अन्तर्मुहूर्त
    काल लगता है उससे श्रावकको संख्यात गुणा हीन काल लगता है पर सम्यग्दृष्टि गुणश्रेणि द्वारा १५
    जितने कर्मप्रदेशोंकी निर्जरा करता है उससे श्रावक असंख्यात गुणे कर्मपरमाणुओंकी निर्जरा करता
    है। इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिए।
    § ९०९. कहते हैं सम्यग्दर्शनका सान्निध्य होनेपर भी यदि असंख्येयगुण निर्जराके कारण
    ये परस्परमें समान नहीं हैं तो श्रावकके समान ये विरत आदिक भी केवल गुणभेदके कारण
    निर्ग्रन्थपनेको नहीं प्राप्त हो सकते हैं, इसलिए कहते हैं कि यह बात ऐसी नहीं है क्योंकि यतः २०
    गुणभेदके कारण परस्पर भेद होनेपर भी नैगमादि नयकी अपेक्षा वे सभी होते हैं—
    पुलाक, बकुश, कुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातक ये पाँच निर्ग्रन्थ हैं ॥४६॥
    § ९१०. जिनका मन उत्तरगुणोंकी भावनासे रहित है, जो कहीं पर और कदाचित् व्रतोंमें
    भी परिपूर्णताको नहीं प्राप्त होते हैं वे अविशुद्धपुलाक (तुच्छ धान्य) के समान होनेसे पूलाक कहे
    जाते हैं। जो निर्ग्रन्थ होते हैं, व्रतोंका अखण्ड रूपसे पालन करते हैं, शरीर और उपकरणोंकी शोभा २५
    बढ़ानेमें लगे रहते हैं, परिवारसे घिरे रहते हैं और विविध प्रकारके मोहसे युक्त होते हैं वे बकुश
    कहलाते हैं। यहाँ पर बकुश शब्द 'शबल' (चित्र-विचित्र) शब्दका पर्यायवाची है। कुशील दो
    प्रकारके होते हैं—प्रतिसेवनाकुशील और कषायकुशील। जो परिग्रहसे घिरे रहते हैं, जो मूल और
    उत्तरगुणोंमें परिपूर्ण हैं लेकिन कभी-कभी उत्तरगुणोंकी विराधना करते हैं वे प्रतिसेवनाकुशील
    कहलाते हैं। जिन्होंने अन्य कषायोंके उदयको जीत लिया है और जो केवल संज्वलन कषायके ३०
    अधीन हैं। वे कषायकुशील कहलाते हैं। जिस प्रकार जलमें लकड़ीसे की गयी रेखा अप्रकट रहती
    है उसी प्रकार जिनके कर्मोंका उदय अप्रकट हो और जो अन्तर्मुहूर्तके बाद प्रकट होनेवाले केवल-
    ज्ञान और केवलदर्शनको प्राप्त करते हैं वे निर्ग्रन्थ कहलाते हैं। जिन्होंने चार घातिया कर्मोंका नाश
    कर दिया है ऐसे दोनों प्रकारके केवली स्नातक कहलाते हैं। ये पाँचों ही निर्ग्रन्थ होते हैं। इनमें
    चारित्ररूप परिणामोंकी न्यूनाधिकताके कारण भेद होनेपर भी नैगम और संग्रह आदि नयोंकी ३५
    अपेक्षा वे सब निर्ग्रन्थ कहलाते हैं ।
    १. -भावनोपेत-मु० । २. शुद्धाः पुलाक-मु० । ३. -वारा मोहछेदशवल-आ०, दि० १ । -वारानु मोहसवल
    -दि० २ । ४. -विरोधिनः मु० ।
    ४५
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri