सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 461, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 461
- ९।४४ § ९०६ ] नवमोऽध्यायः ३४९
§ ९०१. तत्र यथासंख्यप्रसङ्गेऽनिष्टनिवृत्त्यर्थमिदमुच्यते—
अवीचारं द्वितीयम् ॥४२॥
§ ९०२. पूर्वयोर्यद् द्वितीयं तदवीचारं प्रत्येतव्यम् । एतदुक्तं भवति—आद्यं सवितर्कं
सवीचारं च भवति । द्वितीयं सवितर्कमवीचारं चेति । ५
§ ९०३. अथ वितर्कवीचारयोः कः प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
वितर्कः श्रुतम् ॥४३॥
§ ९०४. विशेषेण तर्कणमूह्नं वितर्कः श्रुतज्ञानमित्यर्थः ।
§ ९०५. अथ को वीचारः ।
वीचारोऽर्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्तिः ॥४४॥
§ ९०६. अर्थो ध्येयो द्रव्यं पर्यायो वा । व्यञ्जनं वचनम् । योगः कायवाङ्मनःकर्मलक्षणः । १०
संक्रान्तिः परिवर्तनम् । द्रव्यं विहाय पर्यायमुपैति पर्यायं त्यक्त्वा द्रव्यमित्यर्थसंक्रान्तिः । एकं श्रुत-
वचनमुपादाय वचनान्तरमालम्बते तदपि विहायान्यदिति व्यञ्जनसंक्रान्तिः । काययोगं त्यक्त्वा
योगान्तरं गृह्णाति योगान्तरं च^१ त्यक्त्वा काययोगमिति योगसंक्रान्तिः । एवं परिवर्तनं वीचार
इत्युच्यते^२ । तदेतत्सामान्यविशेषनिर्दिष्टं चतुर्विधं धर्म्यं शुक्लं च पूर्वोदितगुप्त्यादिबहुप्रकारोपायं
संसारनिवृत्तये मुनिर्ध्यातुमर्हति कृतपरिकर्मा । तत्र द्रव्यपरमाणुं भावपरमाणुं वा ध्यायन्नाहितवित- १५
§ ९०१. पूर्व सूत्रमें यथासंख्यका प्रसंग होनेपर अनिष्ट अर्थकी निवृत्ति करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
दूसरा ध्यान अवीचार है ॥४२॥
§ ९०२. पहलेके दो ध्यानोंमें जो दूसरा ध्यान है वह अवीचार जानना चाहिए । अभिप्राय
यह है कि पहला शुक्लध्यान सवितर्क और सवीचार होता है तथा दूसरा शुक्लध्यान सवितर्क २०
और अवीचार होता है ।
§ ९०३. अब वितर्क और वीचारमें क्या भेद है यह दिखलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
वितर्कका अर्थ श्रुत है ॥४३॥
§ ९०४. विशेष रूपसे तर्कणा करना अर्थात् ऊहा करना वितर्क अर्थात् श्रुतज्ञान कहलाता है । २५
§ ९०५. अब वीचार किसे कहते हैं यह बात अगले सूत्र द्वारा कहते हैं—
अर्थ, व्यञ्जन और योगकी संक्रान्ति वीचार है ॥४४॥
§ ९०६. अर्थ ध्येयको कहते हैं । इससे द्रव्य और पर्याय लिये जाते हैं । व्यञ्जनका अर्थ
वचन है तथा काय, वचन और मनकी क्रियाको योग कहते हैं । संक्रान्तिका अर्थ परिवर्तन है ।
द्रव्यको छोड़कर पर्यायको प्राप्त होता है और पर्यायको छोड़कर द्रव्यको प्राप्त होता है । यह अर्थ- ३०
संक्रान्ति है । एक श्रुतवचनका आलम्बन लेकर दूसरे वचनका आलम्बन लेता है और उसे भी
त्यागकर अन्य वचनका आलम्बन लेता है । यह व्यञ्जन-संक्रान्ति है । काययोगको छोड़कर दूसरे
योगको स्वीकार करता है और दूसरे योगको छोड़कर काययोगको स्वीकार करता है । यह योग-
संक्रान्ति है । इस प्रकारके परिवर्तनको वीचार कहते हैं । सामान्य और विशेष रूपसे कहे गये
इस चार प्रकारके धर्म्यध्यान और शुक्लध्यानको पूर्वोक्त गुप्ति आदि बहुत प्रकारके उपायोंसे युक्त ३५
होनेपर संसारका नाश करनेके लिए जिसने भले प्रकारसे परिकर्मको किया है ऐसा मुनि ध्यान
१. -न्तरं त्यक्त्वा मु० । २. इत्युच्यते । संक्रान्तौ सत्यां कथं ध्यानमिति चेत् ध्यानसंतानमपि ध्यानमुच्यते
इति न दोषः । तदेतत्सामान्य-मु०, दि० १, दि० २, आ० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri