सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५२ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।४५ § ९०८ –
वरणक्षयोपशमनिमित्तपरिणामप्राप्तिकाले विशुद्धिप्रकर्षयोगात् श्रावको भवन् ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो
भवति । स एव पुनः प्रत्याख्यानावरणक्षयोपशमकारणपरिणामविशुद्धियोगाद् विरतव्यपदेशभाक्
सन् ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनरनन्तानुबन्धिक्रोधमानमायालोभानां वियोजनपरो
भवति यदा तदा परिणामविशुद्धिप्रकर्षयोगात्ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनर्दर्शन-
५ मोहप्रकृतित्रयतृणनिचयं निर्दधक्षन् परिणामविशुद्ध्यतिशययोगाद्दर्शनमोहक्षपकव्यपदेशभाक्१
पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । एवं सः क्षायिकसम्यग्दृष्टिर्भूत्वा श्रेण्यारोहणाभिमुखश्चारित्र-
मोहोपशमं प्रति व्याप्रीयमाणो विशुद्धिप्रकर्षयोगादुपशमकव्यपदेशमनुभवन् पूर्वोक्तादसंख्येयगुण-
निर्जरो भवति । स एव पुनरशेषचारित्रमोहोपशमनिमित्तसंनिधाने परिप्राप्तोपशान्तकषाय-
व्यपदेशः पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनश्चारित्रमोहक्षपणं प्रत्यभिमुखः परिणाम-
१० विशुद्ध्या वर्द्धमानः क्षपकव्यपदेशमनुभवन्पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स यदा निःशेष-
चारित्रमोहक्षपणकारणपरिणामाभिमुखः क्षीणकषायव्यपदेशमास्कन्दन्पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो
भवति । स एव द्वितीयशुक्लध्यानानलनिव्दग्धघातिकर्मनिचयः सन् जिनव्यपदेशभाक् पूर्वोक्ताद-
संख्येयगुणनिर्जरो भवति ।
चारित्र मोहनीय कर्मके एक भेद अप्रत्याख्यानावरण कर्मके क्षयोपशम निमित्तक परिणामोंकी प्राप्तिके
१५ समय विशुद्धिका प्रकर्ष होनेसे श्रावक होता हुआ उससे संख्येयगुण निर्जरावाला होता है। पुनः
वह ही प्रत्याख्यानावरण कर्मके क्षयोपशम निमित्तक परिणामोंकी विशुद्धिवश विरत संज्ञाको प्राप्त
होता हुआ उससे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही जब अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान,
माया और लोभकी विसंयोजना करता है तब परिणामोंकी विशुद्धिके प्रकर्षवश उससे असंख्येयगुण
निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही दर्शनमोहनीयत्रिकरूपी तृणसमूहको भस्मसात् करता हुआ
२० परिणामोंकी विशुद्धिके अतिशयवश दर्शनमोह क्षपक संज्ञाको प्राप्त होता हुआ पहलेसे असंख्येयगुण
निर्जरावाला होता है। इस प्रकार वह क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर श्रेणिपर आरोहण करनेके सम्मुख
होता हुआ तथा चारित्र मोहनीयके उपशम करनेके लिए प्रयत्न करता हुआ विशुद्धिके प्रकर्षवश
उपशमक संज्ञाको अनुभव करता हुआ पहले कही गयो निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता
है। पुनः वह ही समस्त चारित्रमोहनीयके उपशमके निमित्त मिलनेपर उपशान्तकषाय संज्ञाको
२५ प्राप्त होता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही
चारित्रमोहनीयकी क्षपणाके लिए सम्मुख होता हुआ तथा परिणामोंकी विशुद्धिसे वृद्धिको प्राप्त
होकर क्षपक संज्ञाको अनुभव करता हुआ पहले कही गयो निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला
होता है। पुनः वह ही समस्त चारित्रमोहनीयकी क्षपणाके कारणोंसे प्राप्त हुए परिणामोंके
अभिमुख होकर क्षीणकषाय संज्ञाको प्राप्त करता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येय गुण
३० निर्जरावाला होता है। पुनः वह ही द्वितीय शुक्लध्यान रूपी अग्निके द्वारा घातिकर्म समूहका
नाश करके जिन संज्ञाको प्राप्त होता हुआ पहले कही गयो निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला
होता है।
विशेषाथ—यहाँ मुख्य रूपसे गुणश्रेणि निर्जराके दस स्थानोंका निर्देश किया गया है।
असंख्यात गुणितक्रम श्रेणिरूपसे कर्मोंकी निर्जरा होना गुणश्रेणिनिर्जरा है। यह गुणश्रेणि निर्जरा
३५ सर्वदा नहीं होती किन्तु उपशमना और क्षपणाके कारणभूत परिणामोंके द्वारा ही गुणश्रेणि रचना
होकर यह निर्जरा होतो है। गुणश्रेणि रचना दो प्रकारको होती है—एक तो गलितावशेष गुणश्रेणि
रचना और दूसरी अवस्थित गुणश्रेणि रचना । यह कहाँ किस प्रकारकी होती है इसे लब्धिसार
क्षपणासारसे जान लेना चाहिए । यहाँ इतना ही विशेष वक्तव्य है कि यहाँ जो दस स्थान बतलाये
१.-भाक् तेष्वेव पूर्वो-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri