सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।४४ § ९०६ –
कंसामर्थ्यः ^१अर्थव्यञ्जने कायवचसी च पृथक्त्वेन संक्रामता मनसापर्याप्तबालोत्साहवदव्यवस्थितेना-
निशितेनापि शस्त्रेण चिरात्तरुं छिन्दन्निव मोहप्रकृतीरुपशमयन्क्षपयंश्च पृथक्त्ववितर्कवीचारध्यान-
भाग्भवति । स एव पुनः समूलतूलं ^३ मोहनीयं निर्दिधक्षन्नन्तगुणविशुद्धियोगविशेषमाश्रित्य बहु-
राणां ज्ञानावरणसहायीभूतानां प्रकृतीनां बन्धं निरुन्धन् स्थितिह्रासक्षयौ च कुर्वन् श्रुतज्ञानोपयोगो^५
५ निवृत्तार्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्तिः अविचलितमनाः क्षीणकषायो वैडूर्यमणिरिव निरुपलेपो ध्यात्वा पुनर्न
निवर्तत इत्युक्तमेकत्ववितर्कम् । एवमेकत्ववितर्कशुक्लध्यानवैश्वानरनिर्दग्धघातिकर्मेन्धनः प्रज्वलित-
केवलज्ञानगभस्तिमण्डलो मेघपञ्जरनिरोधनिर्गत इव घर्मरश्मिर्वा भासमानो भगवांस्तीर्थकर इतरो
वा केवली लोकेश्वराणामभिगमनीयोऽर्चनीयश्चोत्कर्षेणायुषः पूर्वकोटीं देशोनां विहरति । स
यदान्तर्मुहूर्तशेषायुष्कस्तत्तुल्यस्थितिवेदद्यनामगोत्रश्च भवति तदा सर्वं वाङ्मनसयोगं बादरकाययोगं
१० च परिहाय्य सूक्ष्मकाययोगालम्बनः सूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिध्यानमास्कन्दितुमर्हतीति । यदा पुनरन्त-
र्मुहूर्तशेषायुष्कस्ततोऽधिकस्थितिशेषकर्मत्रयो भवति सयोगी तदात्मोपयोगातिशयस्य सामायिक-
सहायस्य विशिष्टकरणस्य महासंवरस्य लघुकर्मपरिपाचनस्याशेषकर्मरेणुपरिशातनशक्तिस्वाभा-
व्याद्दण्डकपाटरप्रतरलोकपूरणानि स्वात्मप्रदेशविसर्पणतश्चतुर्भिः समयैः कृत्वा पुनरपि तावद्भिरेव
समयैः समुपहृतप्रदेशविसरणः समीकृतस्थितिशेषकर्मचतुष्टयः पूर्वशरीरप्रमाणो भूत्वा सूक्ष्मकाय-
१५ करनेके योग्य होता है । जिस प्रकार अपर्याप्त उत्साहसे युक्त बालक अव्यवस्थित और भौथरे शस्त्रके
द्वारा भी चिरकालमें वृक्षको छेदता है उसी प्रकार चित्तके सामर्थ्यको प्राप्तकर जो द्रव्यपरमाणु
और भावपरमाणुका ध्यान कर रहा है वह अर्थ और व्यंजन तथा काय और वचनमें पृथक्त्व
रूपसे संक्रमण करनेवाले मनके द्वारा मोहनीय कर्मकी प्रकृतियोंका उपशमन और क्षय करता हुआ
पृथक्त्ववितर्क वीचारध्यानको धारण करनेवाला होता है। पुनः जो समूल मोहनीय कर्मका दाह
२० करना चाहता है, जो अनन्तगुणो विशुद्धिविशेषको प्राप्त होकर बहुत प्रकारकी ज्ञानावरणकी
सहायीभूत प्रकृतियोंके बन्धको रोक रहा है, जो कर्मोंकी स्थितिको न्यून और नाश कर रहा है,
जो श्रुतज्ञानके उपयोगसे युक्त है, जो अर्थ, व्यंजन और योगकी संक्रान्तिसे रहित है, निश्चल
मनवाला है, क्षीण कषाय है और वैडूर्यमणिके समान निरुपलेप है वह ध्यान करके पुनः नहीं
लौटता है । इस प्रकार उसके एकत्ववितर्क ध्यान कहा गया है । इस प्रकार एकत्ववितर्क शुक्लध्यान
२५ रूपी अग्निके द्वारा जिसने चार घातिया कर्मरूपी ईंधनको जला दिया है, जिसके केवलज्ञानरूपी
किरणसमुदाय प्रकाशित हो गया है, जो मेघमण्डलका निरोध कर निकले हुए सूर्यके समान भास-
मान हो रहा है ऐसे भगवान्, तीर्थंकर, केवली या सामान्य केवली इन्द्रोंके द्वारा आदरणीय और
पूजनीय होते हुए उत्कृष्ट रूपसे कुछ कम पूर्व कोटि काल तक बिहार करते हैं । वह जब आयुमें
अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहता है तथा वेदनीय, नाम और गोत्र कर्मकी स्थिति आयुकर्मके बराबर
३० शेष रहती है तब सब प्रकारके वचनयोग, मनोयोग और बादरकाययोगको त्यागकर तथा सूक्ष्म
काययोगका अवलम्बन लेकर सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानको स्वीकार करते हैं, परन्तु जब उन
सयोगी जिनके आयु अन्तर्मुहूर्त शेष रहती है और शेष तीन कर्मोंकी स्थिति उससे अधिक शेष
रहती है तब जिन्हें सातिशय आत्मोपयोग प्राप्त है, जिन्हें सामायिकका अवलम्बन है, जो विशिष्ट
करणसे युक्त हैं, जो कर्मोंका महासंवर कर रहे हैं और जिनके स्वल्पमात्रामें कर्मोंका परिपाचन हो
३५ रहा है ऐसे वे अपने आत्मप्रदेशोंके फैलनेसे कर्मरजको परिशातन करनेकी शक्तिवाले दण्ड, कपाट,
प्रतर और लोकपूरण समुद्घातको चार समयोंके द्वारा करके अनन्तर प्रदेशोंके विसर्पणका संकोच
१. -सामर्थ्यादर्थ-मु० । २. मनसा पर्याप्त- मु० । ३. समूलतलं मु०, दि० १, दि० २, आ० । ४. -शुद्धियोग
-मु० । ५. -योगे निवृत्ता-मु० ।