सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ९।४५ § ९०८ ] नवमोऽध्यायः ३५१
योगेन सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानं ध्यायति । ततस्तदनन्तरं समुच्छिन्नक्रियानिवर्तिध्यानमारभते ।
समुच्छिन्नप्राणापानप्रचारसर्वकायवाङ्मनोयोगसर्वप्रदेशपरिस्पन्दक्रियाव्यापारत्वात् समुच्छिन्न-
क्रियानिवर्तीत्युच्यते । तस्मिन्समुच्छिन्नक्रियानिवर्तिनि ध्याने सर्वबन्धास्रवनिरोधसर्वशेषकर्मशातन-
सामर्थ्योपपत्तेरयोगिकेवलिनः संपूर्णयथाख्यातचारित्रज्ञानदर्शनं सर्वसंसारदुःखजालपरिष्वङ्गोच्छेद-
जननं साक्षान्मोक्षकारणमुपजायते । स पुनरयोगकेवली भगवांस्तदा ध्यानातिशयाग्निनिर्दग्धसर्व- ५
मलकळङ्कबन्धनो निरस्तकिट्टधातुपाषाणजात्यकनकवल्लब्धात्मा परिनिर्वाति । तदेतद् द्विविधं
तपोऽभिनवकमास्रवनिरोधहेतुत्वात्संवरकारणं प्राक्तनकर्मरजोविधूनननिमित्तत्वान्निर्जराहेतुरपि
भवति ।
§ ९०७. अत्राह सम्यग्दृष्टयः किं सर्वे समनिर्जरा आहोस्वित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्य-
त्रोच्यते— १०
सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्त-
मोहक्षपकक्षीणमोहजिनाः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः ॥४५॥
§ ९०८. त एते दश सम्यग्दृष्ट्यादयः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः । तद्यथा—भव्यः पञ्चेन्द्रिय-
संज्ञी पर्याप्तकः पूर्वोक्तकाललब्ध्यादिसहायः परिणामविशुद्ध्या वर्धमानः क्रमेणापूर्वकरणादिसोपान-
पङ्क्त्योत्प्लवमानो बहुतरकर्मनिर्जरो भवति । स एव पुनः प्रथमसम्यक्त्वप्राप्तिनिमित्तसन्निधाने १५
सति सम्यग्दृष्टिर्भवन्नसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनश्चारित्रमोहकर्मविकल्पाप्रत्याख्याना-
करके तथा शेष चार कर्मोंकी स्थितिको समान करके अपने पूर्व शरीरप्रमाण होकर सूक्ष्म काय-
योगके द्वारा सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानको स्वीकार करते हैं। इसके बाद चौथे समुच्छिन्न क्रिया-
निवर्ति ध्यानको आरम्भ करते हैं। इसमें प्राणापानके प्रचाररूप क्रियाका तथा सब प्रकारके
काययोग, वचनयोग और मनोयोगके द्वारा होनेवाली आत्मप्रदेश परिस्पन्द रूप क्रियाका उच्छेद २०
हो जानेसे इसे समुच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यान कहते हैं। इस समुच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यानमें सब
प्रकारके कर्मबन्धके आस्रवका निरोध हो जानेसे तथा बाकीके बचे सब कर्मों के नाश करनेकी
शक्तिके उत्पन्न हो जानेसे अयोगिकेवलीके संसारके सब प्रकारके दुःखजालके सम्बन्धका उच्छेद
करनेवाला सम्पूर्ण यथाख्यातचारित्र, ज्ञान और दर्शनरूप साक्षात् मोक्षका कारण उत्पन्न होता है।
वे अयोगिकेवली भगवान् उस समय ध्यानातिशयरूप अग्निके द्वारा सब प्रकारके मल-कलंकबन्धन- २५
को जलाकर और किट्ट धातु व पाषाणका नाशकर शुद्ध हुए सोनेके समान अपने आत्माको प्राप्तकर
परिनिर्वाणको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यह दोनों प्रकारका तप नूतन कर्मोंके आस्रवके निरोधका
हेतु होनेसे संवरका कारण है और प्राक्तन कर्मरूपी रजके नाश करनेका हेतु होनेसे निर्जराका भी
हेतु है।
§ ९०७. यहाँ कहते हैं कि सब सम्यग्दृष्टि क्या समान निर्जरावाले होते हैं या कुछ विशेषता ३०
है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत, अनन्तानुबन्धिवियोजक, दर्शनमोहक्षपक, उपशमक, उपशान्त-
मोह, क्षपक, क्षीणमोह और जिन ये क्रमसे असंख्यगुण निर्जरावाले होते हैं ॥४५॥
§ ९०८. सम्यग्दृष्टि आदि ये दश क्रमसे असंख्येयगुण निर्जरावाले होते हैं। यथा—जिसे
पूर्वोक्त काललब्धि आदिकी सहायता मिली है और जो परिणामोंकी विशुद्धि द्वारा वृद्धिको प्राप्त हो ३५
रहा है ऐसा भव्य पञ्चेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तक जीव क्रमसे अपूर्वकरण आदि सोपान पंक्तिपर चढ़ता
हुआ बहुतर कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला होता है। सर्वप्रथम वह ही प्रथम सम्यक्त्वकी प्राप्तिके
निमित्त मिलनेपर सम्यग्दृष्टि होता हुआ असंख्येयगुण कर्मनिर्जरावाला होता है। पुनः वह ही