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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 558 में से

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पृष्ठ 466

३५४ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।४७ § ९११ -
§ ९११. तेषां पुलाकादीनां भूयोऽपि विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिङ्गलेश्योपपादस्थानविकल्पतः साध्याः ॥ ४७ ॥
§ ९१२. त एते पुलाकादयः संयमादिभिरष्टभिरनुयोगैः साध्या व्याख्येयाः । तद्यथा—पुलाक-
बकुशप्रतिसेवनाकुशीला द्वयोः संयमयोः सामायिकच्छेदोपस्थापनयोर्वर्तन्ते । कषायकुशीला
द्वयोः संयमयोः परिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययोः पूर्वयोश्च । निर्ग्रन्थस्नातका एकस्मिन्नेव यथा-
ख्यातसंयमे सन्ति ।
§ ९१३. श्रुतं—पुलाकबकुशप्रतिसेवनाकुशीला उत्कर्षेणाभिन्नाक्षरदशपूर्वधराः । कषाय-
कुशीला निर्ग्रन्थाश्चतुर्दशपूर्वधराः । जघन्येन पुलाकस्य श्रुतमाचारवस्तु । बकुशकुशीलनिर्ग्रन्थानां
श्रुतमष्टौ प्रवचनमातरः । स्नातका अपगतश्रुताः केवलिनः ।
§ ९१४. प्रतिसेवना—पञ्चानां मूलगुणानां रात्रिभोजनवर्जनस्य च पराभियोगाद् बला-
दन्यतमं प्रतिसेवमानः पुलाको भवति । बकुशो द्विविधः—उपकरणबकुशः शरीरबकुशश्चेति ।
तत्रोपकरणबकुशो बहुविशेषयुक्तोपकरणाकांक्षी । शरीरसंस्कारसेवी शरीरबकुशः । प्रतिसेवना-
कुशीलो मूलगुणानविराधयन्नुत्तरगुणेषु कांचिद्विराधनां प्रतिसेवते । कषायकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातकानां
प्रतिसेवना नास्ति ।
§ ९१५. तीर्थमिति सर्वे सर्वेषां तीर्थकराणां तीर्थेषु भवन्ति ।
§ ९१६. लिङ्गं द्विविधं—द्रव्यलिङ्गं भावलिङ्गं चेति । भावलिङ्गं प्रतीत्य सर्वे पञ्च निर्ग्रन्था
लिङ्गिनो भवन्ति । द्रव्यलिङ्गं प्रतीत्य भाज्याः ।
§ ९११. अब उन पुलाक आदिके सम्बन्धमें पुनरपि ज्ञान प्राप्त करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
संयम, श्रुत, प्रतिसेवना, तीर्थ, लिंग, लेश्या, उपपाद और स्थानके भेदसे इन निर्ग्रन्थोंका
व्याख्यान करना चाहिए ॥४७॥
§ ९१२. ये पुलाक आदि संयम आदि आठ अनुयोगोंके द्वारा साध्य हैं अर्थात् व्याख्यान
करने योग्य हैं । यथा—पुलाक, बकुश और प्रतिसेवना कुशील सामायिक और छेदोपस्थापना इन
दो संयमोंमें रहते हैं । कषायकुशील पूर्वोक्त दो संयमोंके साथ परिहारविशुद्धि और सूक्ष्मसाम्पराय
इन दो संयमोंमें रहते हैं । निर्ग्रन्थ और स्नातक एक मात्र यथाख्यात संयममें रहते हैं ।
§ ९१३. श्रुत—पुलाक, बकुश और प्रतिसेवनाकुशील उत्कृष्ट रूपसे अभिन्नाक्षर दश
पूर्वधर होते हैं । कषायकुशील और निर्ग्रन्थ चौदह पूर्वधर होते हैं । जघन्य रूपसे पुलाक श्रुत
आचार वस्तुप्रमाण होता है । बकुश, कुशील और निर्ग्रन्थोंका श्रुत आठ प्रवचनमातृका प्रमाण
होता है । स्नातक श्रुतज्ञानसे रहित केवली होते हैं ।
§ ९१४. प्रतिसेवना—दूसरोंके दबाववश जबरदस्तीसे पाँच मूलगुण और रात्रिभोजन
वर्जन व्रतमें से किसी एककी प्रतिसेवना करनेवाला पुलाक होता है । बकुश दो प्रकारके होते हैं,
उपकरणबकुश और शरीरबकुश । उनमें से अनेक प्रकारकी विशेषताओंको लिये हुए उपकरणोंको
चाहनेवाला उपकरणबकुश होता है तथा शरीरका संस्कार करनेवाला शरीरबकुश होता है ।
प्रतिसेवना कुशील मूलगुणोंकी विराधना न करता हुआ उत्तरगुणोंकी विराधनाकी प्रतिसेवना
करनेवाला होता है । कषायकुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातकोंके प्रतिसेवना नहीं होती ।
§ ९१५. तीर्थ—ये सब निर्ग्रन्थ सब तीर्थंकरोंके तीर्थोंमें होते हैं ।
§ ९१६. लिंग—लिंग दो प्रकारका है, द्रव्यलिंग और भावलिंग । भावलिंगकी अपेक्षा
पाँचों ही साधु निर्ग्रन्थ लिंगवाले होते हैं । द्रव्यलिंग अर्थात् शरीरकी ऊँचाई, रंग व पीछी आदि-
की अपेक्षा उनमें भेद है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri