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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 469, कुल 558 में से

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पृष्ठ 469
  • १०।२ § ९२३ ] दशमोऽध्यायः ३५७
    भागो विवर्धितशुभकर्मानुभवोऽनिवृत्तिकरणप्राप्त्याऽनिवृत्तिबादरसांपरायक्षपकगुणस्थानमधिरुह्य
    तत्र कषायाष्टकं नष्टं कृत्वा नपुंसकवेदनाशं समापाद्य स्त्रीवेदमुन्मूल्य नोकषायषट्कं पुंवेदे प्रक्षिप्य
    क्षपयित्वा पुंवेदं क्रोधसंज्वलने, क्रोधसंज्वलनं मानसंज्वलने, मानसंज्वलनं मायासंज्वलने, माया-
    संज्वलनं$^१$ च लोभसंज्वलने क्रमेण बादरकृष्टिविभागेन विलयमुपनीय लोभसंज्वलनं तनूकृत्य सूक्ष्म-
    सांपरायक्षपकत्वमनुभूय निरवशेषं मोहनीयं निर्मूलकषायं कषित्वा क्षीणकषायतामधिरुह्यावतारित- ५
    मोहनीयभार उपान्त्यप्रथमे समये निद्राप्रचले प्रलयमुपनीय पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शना-
    वरणानां पञ्चानामन्तरायाणां$^२$ चान्तमन्ते समुपनीय$^३$ तदनन्तरं ज्ञानदर्शनस्वभावं केवलपर्यायम-
    प्रतर्क्यविभूतिविशेषमवाप्नोति ।
    § ९२२. आह कस्माद्धेतोर्मोक्षः किंलक्षणश्चेत्यत्रोच्यते—
    बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ॥ २ ॥ १०
    § ९२३. मिथ्यादर्शनादिहेत्वभावादभिनवकर्मभावः पूर्वोदितनिर्जराहेतुसंनिधाने चार्जित-
    कर्मनिरासः । ताभ्यां बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यामिति हेतुलक्षणविभक्तिनिर्देशः । ततो भवस्थिति-
    हेतुसमीकृतशेषकर्मविस्थस्य$^४$ युगपदात्यन्तिकः$^५$ कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः प्रत्येत्यव्यः । कर्माभावो
    द्विविधः—यत्नसाध्योऽयत्नसाध्यश्चेति । तत्र चरमदेहस्य नारकतिर्यग्देवायुषामभावो न यत्नसाध्यः
    असत्त्वात् । यत्नसाध्य इत ऊर्ध्वमुच्यते—असंयतसम्यग्दृष्ट्यादिषु चतुर्षु गुणस्थानेषु कस्मिंश्चि- १५
    पापप्रकृतियोंकी स्थिति और अनुभागको कृश करके तथा शुभकर्मोंके अनुभागकी वृद्धि करके अनिवृत्ति-
    करणकी प्राप्ति द्वारा अनिवृत्तिबादरसाम्पराय क्षपकगुणस्थानपर आरोहण करके तथा वहाँ आठ
    कषायोंका नाश करके तथा नपुंसकवेद और स्त्रीवेदका क्रमसे नाश करके, छह नोकषायका पुरुषवेद
    में संक्रमण द्वारा नाश करके तथा पुरुषवेदका क्रोधसंज्वलनमें, क्रोधसंज्वलनका मानसंज्वलनमें,
    मानसंज्वलनका मायासंज्वलनमें और मायासंज्वलनका लोभसंज्वलनमें क्रमसे बादरकृष्टिविभागके २०
    द्वारा संक्रमण करके तथा लोभसंज्वलनको कृश करके, सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकत्वका अनुभव करके,
    समस्त मोहनीयका निर्मूल नाश करके, क्षीणकषाय गुणस्थानपर आरोहण करके, मोहनीयके
    भारको उतारकर क्षीणकषाय गुणस्थानके उपान्त्य समयमें निद्रा और प्रचलाका नाश करके तथा
    अन्तिम समयमें पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय कर्मोंका अन्त करके
    तदनन्तर ज्ञानदर्शनस्वभावरूप केवल पर्यायको प्राप्त होता है । २५
    § ९२२. कहते हैं कि किस कारणसे मोक्ष प्राप्त होता है और उसका लक्षण क्या है यह
    बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    बन्ध-हेतुओंके अभाव और निर्जरासे सब कर्मोंका आत्यन्तिक क्षय होना ही मोक्ष है ॥२॥
    § ९२३. मिथ्यादर्शनादिक हेतुओंका अभाव होनेसे नूतन कर्मोंका अभाव होता है और पहले
    कही गयी निर्जरारूप हेतुके मिलनेपर अर्जित कर्मोंका नाश होता है। इन दोनोंसे 'बन्धहेत्वभाव- ३०
    निर्जराभ्याम्' यह हेतुपरक विभक्तिका निर्देश है। जिसने भवस्थितिके हेतुभूत आयुकर्मके बराबर
    शेष कर्मोंकी स्थितिको कर लिया है उसके उक्त कारणोंसे एक साथ समस्त कर्मोंका आत्यन्तिक
    वियोग होना मोक्ष है ऐसा जानना चाहिए। कर्मका अभाव दो प्रकारका है—यत्नसाध्य और अय-
    त्नसाध्य । इनमें से चरम देहवालेके नरकायु, तिर्यंचायु और देवायुका अभाव यत्नसाध्य नहीं होता,
    क्योंकि उसके उनका सत्त्व नहीं उपलब्ध होता । यत्नसाध्य अभाव इससे आगे कहते हैं—असंयत- ३५
    १. –लनं लोभ–मु० । २. –याणामन्त–मु० । ३. समुपगमय्य तद–मु०, ता० । ४. –वस्थितस्य मु०, ता० ।
    ५. –दात्यतीकृतकृ–मु० ।