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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 558 में से

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पृष्ठ 468

अथ दशमोऽध्यायः
§ ९२०. आह, अन्ते निर्दिष्टस्य मोक्षस्येदानीं स्वरूपाभिधानं प्राप्तकालमिति । सत्यमेवम् ।
मोक्षप्राप्तिः केवलज्ञानावाप्ति¹पूर्विकेति केवलज्ञानोत्पत्तिकारणमुच्यते—
मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् ॥ १॥
§ ९२१. इह वृत्तिकरणं न्याय्यम् । कुतः । लघुत्वात् । कथम्² । एकस्य ‘क्षय’शब्दस्या-
करणाद् विभक्त्यन्तरनिर्देशस्य चाभावात् ‘च’ शब्दस्य चाप्रयोगाल्लघु सूत्रं भवति ‘मोहज्ञानदर्शना-
वरणान्तरायक्षयात्केवलम्’ इति । सत्यमेतत्, क्षयक्रमप्रतिपादनार्थो वाक्यभेदेन निर्देशः क्रियते ।
प्रागेव मोहं क्षयमुपनीयान्तर्मुहूर्तं क्षीणकषायव्यपदेशमवाप्य ततो युगपज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायाणां
क्षयं कृत्वा केवलमवाप्नोति इति । तत्क्षयो³ हेतुः केवलोत्पत्तेरिति हेतुलक्षणो विभक्तिनिर्देशः कृतः ।
कथं प्रागेव मोहः क्षयमुपनीयते इति चेदुच्यते—भव्यः सम्यग्दृष्टिः परिणामविशुद्ध्या वर्धमानोऽ-
संयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तगुणस्थानेषु कस्मिंश्चिन्मोहस्य सप्त प्रकृतीः क्षयमुपनीय
क्षायिकसम्यग्दृष्टिर्भूत्वा क्षपकश्रेण्यारोहणाभिमुखोऽधःप्रवृत्तकरणमप्रमत्तस्थाने प्रतिपद्यापूर्वकरण-
प्रयोगेणापूर्वकरणक्षपकगुणस्थानव्यपदेशमनुभूय तत्राभिनवशुभाभिसन्धितानूतनपापप्रकृतिस्थित्यनु-
§ ९२०. कहते हैं कि अन्तमें कहे गये मोक्षके स्वरूपके कथनका अब समय आ गया है ।
यह कहना सही है तथापि केवलज्ञानकी उत्पत्ति होने पर ही मोक्षकी प्राप्ति होती है इसलिए पहले
केवलज्ञानकी उत्पत्तिके कारणोंका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मोहका क्षय होनेसे तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मका क्षय होनेसे केवल-
ज्ञान प्रकट होता है ॥१॥
§ ९२१. इस सूत्रमें समास करना उचित है क्योंकि इससे सूत्र लघु हो जाता है । शंका—
कैसे ? प्रतिशंका—क्योंकि ऐसा करनेसे एक क्षयशब्द नहीं देना पड़ता है और दूसरो विभक्तिके
निर्देशका अभाव हो जानेसे ‘च’ शब्दका प्रयोग नहीं करना पड़ता है इसलिए सूत्र लघु हो जाता
है । यथा—‘मोहज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयात्केवलम्’ । समाधान—यह कहना सही है तथापि
क्षयके क्रमका कथन करनेके लिए वाक्योंका भेद करके निर्देश किया है। पहले ही मोहका क्षय
करके और अन्तर्मुहूर्त कालतक क्षीणकषाय संज्ञाको प्राप्त होकर अनन्तर ज्ञानावरण, दर्शनावरण
और अन्तराय कर्मका एक साथ क्षय करके केवलज्ञानको प्राप्त होता है । इन कर्मोंका क्षय केवल-
ज्ञानकी उत्पत्तिका हेतु है ऐसा जानकर ‘हेतुरूप’ विभक्तिका निर्देश किया है। शंका—पहले ही
मोहके क्षयको कैसे प्राप्त होता है ? समाधान—वृद्धिको प्राप्त होता हुआ असंयत सम्यग्दृष्टि, संयता-
संयत, प्रमत्तसंयत, और अप्रमत्तसंयत इन चार गुणस्थानोंमें-से किसी एक गुणस्थानमें मोहनीयकी
सात प्रकृतियोंका क्षय करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर क्षपकश्रेणिपर आरोहण करनेके लिए
सम्मुख होता हुआ अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें अधःप्रवृत्तकरणको प्राप्त होकर अपूर्वकरणके प्रयोग
द्वारा अपूर्वकरणक्षपकगुणस्थान संज्ञाका अनुभव करके और वहाँपर नूतन-परिणामोंकी विशुद्धिवश
१. –ज्ञानाप्ति–आ० । २. कथम् ? क्षय–मु० । ३. तत्क्षयहेतुः केवलोत्पत्तिरिति मु०, ता० ।