सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 467, कुल 558 में से
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– ९।४७ § ९१९ ] नवमोऽध्यायः ३५५
§ ९१७. लेश्याः—पुलाकस्योत्तरास्तिस्रः बकुशप्रतिसेवनाकुशीलयोः षडपि$^१$। कषायकुशी-
लस्य चतस्र उत्तराः । सूक्ष्मसांपरायस्य निर्ग्रन्थस्नातकयोश्च शुक्लैव केवला । अयोगा अलेश्याः ।
§ ९१८. उपपादः—पुलाकस्योत्कृष्ट उपपाद उत्कृष्टस्थितिदेवेषु सहस्रारे । बकुशप्रतिसेवना-
कुशीलयोर्द्वाविंशतिसागरोपमस्थितिषु आरणाच्युतकल्पयोः । कषायकुशीर्लानिर्ग्रन्थयोस्त्रयस्त्रिंश-
त्सागरोपमस्थितिषु सर्वार्थसिद्धौ । सर्वेषामपि जघन्यः सौधर्मकल्पे द्विसागरोपमस्थितिषु । स्नात-
कस्य निर्वाणमिति ।
§ ९१९. स्थानम्—असंख्येयानि संयमस्थानानि कषायनिमित्तानि भवन्ति । तत्र सर्वजघ-
न्यानि लब्धिस्थानानि पुलाककषायकुशीलयोः । तौ युगपदसंख्येयानि स्थानानि गच्छतः । ततः
पुलाको व्युच्छिद्यते । कषायकुशीलस्ततोऽसंख्येयानि स्थानानि गच्छत्येकाकी । ततः कषायकुशील-
प्रतिसेवनाकुशीलबकुशा युगपदसंख्येयानि स्थानानि गच्छन्ति । ततो बकुशो व्युच्छिद्यते । ततोऽ- १०
प्यसंख्येयानि स्थानानि गत्वा प्रतिसेवनाकुशीलो व्युच्छिद्यते । ततोऽप्यसंख्येयानि स्थानानि गत्वा
कषायकुशीलो व्युच्छिद्यते । अत ऊर्ध्वमकषायस्थानानि निर्ग्रन्थः प्रतिपद्यते । सोऽप्यसंख्येयानि
स्थानानि गत्वा व्युच्छिद्यते । अत ऊर्ध्वमेकं स्थानं गत्वा स्नातको निर्वाणं $^२$प्राप्नोतीत्येतेषां संयम-
लब्धिरनन्तगुणा भवति ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां नवमोऽध्यायः समाप्तः ।
§ ९१७. लेश्या—पुलाकके आगेकी तीन लेश्याएँ होती हैं। बकुश और प्रतिसेवना कुशील- १५
के छहों लेश्याएँ होती हैं। कषायकुशीलके अन्तकी चार लेश्याएँ होती हैं । सूक्ष्मसाम्पराय कषाय-
कुशीलके तथा निर्ग्रन्थ और स्नातकके केवल शुक्ल लेश्या होती है और अयोगी लेश्यारहित
होते हैं ।
§ ९१८. उपपाद—पुलाकका उत्कृष्ट उपपाद सहस्रार कल्पके उत्कृष्ट स्थितिवाले देवोंमें
होता है । बकुश और प्रतिसेवना कुशीलका उत्कृष्ट उपपाद आरण और अच्युत कल्पमें बाईस २०
सागरकी स्थितिवाले देवोंमें होता है। कषायकुशील और निर्ग्रन्थका उत्कृष्ट उपपाद सर्वार्थसिद्धिमें
तैंतीस सागरकी स्थितिवाले देवोंमें होता है। इन सभीका जघन्य उपपाद सौधर्म कल्पमें दो सागर
की स्थितिवाले देवोंमें होता है । तथा स्नातक मोक्ष जाते हैं ।
§ ९१९. स्थान—कषायनिमित्तक असंख्यात संयमस्थान होते हैं । पुलाक और कषाय-
कुशीलके सबसे जघन्य लब्धिस्थान होते हैं । वे दोनों असंख्यात स्थानोंतक एक साथ जाते हैं । २५
इसके बाद पुलाककी व्युच्छित्ति हो जाती है । आगे कषायकुशील असंख्यात स्थानोंतक अकेला
जाता है । इससे आगे कषायकुशील, प्रतिसेवना कुशील और बकुश असंख्यात स्थानोंतक एक
साथ जाते हैं । यहाँ बकुशकी व्युच्छित्ति हो जाती है । इससे भी असंख्यात स्थान आगे जाकर
प्रतिसेवना कुशीलकी व्युच्छित्ति हो जाती है। पुनः इससे भी असंख्यात स्थान आगे जाकर कषाय
कुशीलकी व्युच्छित्ति हो जाती है । इससे आगे अकषाय स्थान हैं जिन्हें निर्ग्रन्थ प्राप्त होता है । ३०
उसकी भी असंख्यातस्थान आगे जाकर व्युच्छित्ति हो जाती है । इससे आगे एक स्थान जाकर
स्नातक निर्वाणको प्राप्त होता है । इनकी संयमलब्धि अनन्तगुणी होती है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धिनामक तत्त्वार्थवृत्तिका नौवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
१. षडपि । कृष्णलेश्यादित्रितयं तयोः कथमिति चेदुच्यते-तयोरुपकरणासक्तिसंभवादात्तंर्ध्यानं कदाचित्संभवति,
आर्तध्यानेन च कृष्णादिलेश्यात्रितयं संभवतीति । कषाय-मु० । २. प्राप्नोति तेषां मु० । ३५