सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

§ ७९७. किमर्थमिदमुच्यते । आद्यं प्रवृत्तिनिग्रहार्थम्, तत्रासमर्थानां प्रवृत्त्युपायप्रदर्शनार्थं
द्वितीयम् । इदं पुनर्दशविधधर्माख्यानं¹ समितिषु प्रवर्तमानस्य प्रमादपरिहारार्थं वेदितव्यम् । शरीर-
स्थितिहेतुमार्गणार्थं परकुलान्यु²पगच्छतो भिक्षोर्दुष्टजनाक्रोशप्रहसनावज्ञाताडनशरीरव्यापादनादीनां
संनिधाने कालुष्यानुत्पत्तिः क्षमा । जात्यादिमदावेशादभिमानाभावो मार्दवं माननिर्हरणम् ।
योगस्यावक्रता आर्जवम् । प्रकर्षप्राप्तलोभान्निवृत्तिः शौचम् । सत्सु प्रशस्तेषु जनेषु साधु वचनं
सत्यमित्युच्यते । ननु चैतद् भाषासमितावन्तर्भवति । नैष दोषः; समितौ प्रवर्तमानो मुनिः साधुष्व-
साधुषु च भाषाव्यवहारं कुर्वन् हितं मितं च ब्रूयात् अन्यथा रागादनर्थदण्डदोषः स्यादिति वाक्स-
मितिरित्यर्थः । इह पुनः सन्तः प्रव्रजितास्तद्भक्ता वा तेषु साधु सत्यं ज्ञानचारित्र³शिक्षणादिषु
बह्वपि कर्तव्यमित्यनुज्ञायते धर्मोपबृंहणार्थम् । समितिषु वर्तमानस्य प्राणीन्द्रियपरिहारस्संयमः ।
कर्मक्षयार्थं तप्यत इति तपः । तदुत्तरत्र वक्ष्यमाणं द्वादशविकल्पमवसेयम् । संयतस्य योग्यं ज्ञानादि-
दानं त्यागः । उपात्तेष्वपि शरीरादिषु संस्कारापोहाय ममेदमित्यभिसन्धिनिवृत्तिराकिंचन्यम् ।
नास्य⁴ किंचनास्तीत्याकिंचनः तस्य भावः कर्म वा आकिंचन्यम् । अनुभूताङ्गनास्मरणकथा-
श्रवणस्त्रीसंसक्तशयनासनादिवर्जनाद् ब्रह्मचर्यं परिपूर्णमवतिष्ठते । स्वतन्त्रवृत्तिनिवृत्त्यर्थो वा⁵ गुरुकुल-
§ ७९७. शंका—यह किसलिए कहा है ? समाधान—संवरका प्रथम कारण प्रवृत्तिका
निग्रह करनेके लिए कहा है। जो वैसा करनेमें असमर्थ हैं उन्हें प्रवृत्तिका उपाय दिखलानेके लिए
दूसरा कारण कहा है किन्तु यह दश प्रकारके धर्मका कथन समितियोंमें प्रवृत्ति करनेवालेके
प्रमादका परिहार करनेके लिए कहा है। शरीरकी स्थितिके कारणकी खोज करनेके लिए पर
कुलोंमें जाते हुए भिक्षुको दुष्ट जन गाली-गलौज करते हैं, उपहास करते हैं, तिरस्कार करते हैं,
मारते-पीटते हैं और शरीरको तोड़ते-मरोड़ते हैं तो भी उनके कलुषताका उत्पन्न न होना क्षमा
है। जाति आदि मदोंके आवेशवश होनेवाले अभिमानका अभाव करना मार्दव है। मार्दवका अर्थ
मानका नाश करना। योगोंका वक्र न होना आर्जव है। प्रकर्षप्राप्त लोभका त्याग करना शौच
है। अच्छे पुरुषोंके साथ साधु वचन बोलना सत्य है। शंका—इसका भाषासमितिमें अन्तर्भाव
होता है? समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि समितिके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाला मुनि
साधु और असाधु दोनों प्रकारके मनुष्योंमें भाषाव्यवहार करता हुआ हितकारी परिमित वचन
बोले, अन्यथा राग होनेसे अनर्थदण्डका दोष लगता है यह वचनसमितिका अभिप्राय है। किन्तु
सत्य धर्मके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाला मुनि सज्जन पुरुष, दीक्षित या उनके भक्तोंमें साधु सत्य
वचन बोलता हुआ भी ज्ञान चारित्रके शिक्षण आदिके निमित्तसे बहुविध कर्तव्योंकी सूचना देता
है और यह सब धर्मकी अभिवृद्धिके अभिप्रायसे करता है, इसलिए सत्य धर्मका भाषासमितिमें
अन्तर्भाव नहीं होता। समितियोंमें प्रवृत्ति करनेवाले मुनिके उनका परिपालन करनेके लिए जो
प्राणियोंका और इन्द्रियोंका परिहार होता है वह संयम है। कर्मक्षयके लिए जो तपा जाता है वह
तप है। वह आगे कहा जानेवाला बारह प्रकारका जानना चाहिए। संयतके योग्य ज्ञानादिका
दान करना त्याग है। जो शरीरादिक उपात्त हैं उनमें भी संस्कारका त्याग करनेके लिए 'यह
मेरा है' इस प्रकारके अभिप्रायका त्याग करना आकिंचन्य है। जिसका कुछ नहीं है वह अकिंचन
है और उसका भाव या कर्म आकिंचन्य है। अनुभूत स्त्रीका स्मरण न करनेसे, स्त्रीविषयक
कथाके सुननेका त्याग करनेसे और स्त्रीसे सटकर सोने व बैठनेका त्याग करनेसे परिपूर्ण ब्रह्मचर्य
१. -ख्यानं प्रवर्त्त-ता० । २. -न्युपयतो भिक्षो ता० । ३. -रित्रलक्षणा-मु० । ४. -नास्ति किंचनास्याकिं-
मु०, दि० १, दि० २ । ५. -कुलावा सो मु०, ता० ।

  • ९७ § ८०० ] नवमोऽध्यायः ३१५
    वासो ब्रह्मचर्यम् । दृष्टप्रयोजनपरिवर्जनार्थमुत्तमविशेषणम् । तान्येवं भाव्यमानानि धर्मव्यपदेशभाञ्जि
    स्वगुणप्रतिपक्षदोषसद्भावनाप्रणिहितानि संवरकारणानि भवन्ति ।
    § ७९८. आह, क्रोधाद्यनुत्पत्तिः क्षमादिविशेषप्रत्यनीकालम्बनादित्युकम्, तत्र कस्मात्क्षमा-
    दीनयमवलम्बते नान्यथा प्रवर्तत इत्युच्यते । यस्मात्तप्तायःपिण्डवत्क्षमादिपरिणतेनात्महितैषिणा
    कर्तव्याः- ५
    अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवरनिर्जरालोकबोधिदुर्लभधर्मस्वा-
    ख्यातत्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७॥
    § ७९९. इमानि शरीरेन्द्रियविषयोपभोगद्रव्याणि समुदायरूपाणि जलबुद्बुदवदनवस्थितस्व-
    भावानि गर्भादिष्ववस्थाविशेषेषु सदोपलभ्यमानसंयोगविपर्ययाणि, मोहादत्राज्ञो नित्यतं मन्यते ।
    न किंचित्संसारे समुदितं ध्रुवमस्ति आत्मनो ज्ञानदर्शनोपयोगस्वभावादन्यदिति चिन्तनमनित्यता- १०
    नुप्रेक्षा । एवं १ह्यस्य भव्यस्य चिन्तयतस्तेष्वभिष्वङ्गाभावाद् भुक्तोज्झितगन्धमाल्यादिष्विव
    वियोगकालेऽपि विनिपातो नोत्पद्यते ।
    § ८००. यथा-मृगशावस्यैकान्ते बलवता क्षुधितेनामिषैषिणा व्याघ्रेणाभिभूतस्य न किंचि-
    च्छरणमस्ति, तथा जन्मजरामृत्युव्याधिप्रभृतिव्यसनमध्ये परिभ्रमतो जन्तोः शरणं न विद्यते ।
    परिपुष्टमपि शरीरं भोजनं प्रति सहायीभवति न व्यसनोपनिपाते । यत्नेन संचिता२ अर्था अपि न १५
    होता है । अथवा स्वतन्त्र वृत्तिका त्याग करनेके लिए गुरुकुलमें निवास करना ब्रह्मचर्य है । दिखाई
    देनेवाले प्रयोजनका निषेध करनेके लिए क्षमादिके पहले उत्तम विशेषण दिया है । इस प्रकार
    जीवनमें उतारे गये और स्वगुण तथा प्रतिपक्षभूत दोषोंके सद्भावमें यह लाभ और यह हानि है
    इस तरहकी भावनासे प्राप्त हुए ये धर्मसंज्ञावाले उत्तम क्षमादिक संवरके कारण होते हैं ।
    § ७९८. क्षमादि विशेष और उनके उलटे कारणोंका अवलम्बन आदि करनेसे क्रोधादिकी २०
    उत्पत्ति नहीं होती है यह पहले कह आये हैं । उसमें किस कारणसे यह जीव क्षमादिकका अवलम्बन
    लेता है, अन्यथा प्रवृत्ति नहीं करता है इसका कथन करते हैं । यतः तपाये हुए लोहेके गोलेके
    समान क्षमादि रूपसे परिणत हुए आत्महितैषीको करने योग्य-
    अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधि-
    दुर्लभ और धर्मस्वाख्यातत्वका बार-बार चिन्तन करना अनुप्रेक्षाएँ हैं ॥७॥ २५
    § ७९९. ये समुदायरूप शरीर, इन्द्रियविषय, उपभोग और परिभोग द्रव्य जलके बुलबुलके
    समान अनवस्थित स्वभाववाले होते हैं तथा गर्भादि अवस्थाविशेषोंमें सदा प्राप्त होनेवाले संयोगों-
    से विपरीत स्वभाववाले होते हैं । मोहवश अज्ञ प्राणी इनमें नित्यताका अनुभव करता है पर
    वस्तुतः आत्माके ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोगके सिवा इस संसारमें कोई भी पदार्थ ध्रुव नहीं है
    इस प्रकार चिन्तन करना अनित्यानुप्रेक्षा है । इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस भव्यके उन ३०
    शरीरादिमें आसक्तिका अभाव होनेसे भोगकर छोड़े हुए गन्ध और माला आदिके समान वियोग
    कालमें भी सन्ताप नहीं होता है ।
    § ८००. जिस प्रकार एकान्तमें क्षुधित और मांसके लोभी बलवान् व्याघ्रके द्वारा दबोचे
    गये मृगशावकके लिए कुछ भी शरण नहीं होता उसी प्रकार जन्म, जरा, मृत्यु और व्याधि आदि
    दुःखोंके मध्यमें परिभ्रमण करनेवाले जीवका कुछ भी शरण नहीं है । परिपुष्ट शरीर ही भोजनके ३५
    प्रति सहायक है, दुःखोंके प्राप्त होनेपर नहीं । यत्नसे संचित किया हुआ धन भी भवान्तरमें साथ
    १. ह्यस्य चिन्त-मु०, ता० । २. संचितोऽर्थोऽपि न भवान्तरमनुगच्छति मु० ।

३१६ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।७ ६ ८०१-
भवान्तरमनुगच्छन्ति । संविभक्तसुखदुःखः सुहृदोऽपि न मरणकाले परित्रायन्ते । बान्धवाः
समुदिताश्च रुजा परीतं न परिपालयन्ति । अस्ति चेत्सुचरितो धर्मो व्यसनमहार्णवे तरणोपायो
भवति । मृत्युना नीयमानस्य सहस्रनयनादयोऽपि न शरणम् । तस्माद् भवव्यसनसंकटे धर्म एव
शरणं सुहृदर्थोऽप्यनपायी, नान्यत्किञ्चिच्छरणमिति भावना अशरणानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्याध्यवस्यतो
नित्यमशरणोऽस्मीति भृशमुद्विग्नस्य सांसारिकेषु भावेषु ममत्वविगमो भवति । भगवदर्हत्सर्वज्ञ-
प्रणीत एव मार्गे प्रयत्नौ भवति ।
§ ८०१. कर्मविपाकवशादात्मनो भवान्तरावाप्तिः संसारः । स पुरस्तात्पञ्चविधपरिवर्तन-
रूपेण व्याख्यातः । तस्मिन्ननेकयोनिकुलकोटिबहुलशतसहस्रसंकटे संसारे परिभ्रमन् जीवः कर्मयन्त्र-
प्रेरितः पिता भूत्वा भ्राता पुत्रः पौत्रश्च भवति । माता भूत्वा भगिनी भार्या दुहिता च भवति ।
स्वामी भूत्वा दासो भवति । दासो भूत्वा स्वाम्यपि भवति । नट इव रङ्गे । अथवा किं बहुना,
स्वयमात्मनः पुत्रो भवतीत्येवमादि संसारस्वभावचिन्तनं संसारानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य भावयतः
संसारदुःखभयादुद्विग्नस्य ततो निर्वेदो भवति । निर्विण्णश्च संसारप्रहाणाय प्रयतते ।
§ ८०२. जन्मजरामरणावृत्ति महादुःखानुभवनं प्रति एक एवाहं न कश्चिन्मे स्वः परो वा
विद्यते । एक एव जायेऽहम् । एक एव म्रिये । न मे कश्चित् स्वजनः परजनो वा व्याधिजरामरणा-
दीनि दुःखान्यपहरति । बन्धुमित्राणि श्मशानं नातिवर्तन्ते । धर्म एव मे सहायः सदा अनपायीति
नहीं जाता । जिन्होंने सुख और दुःखको समान रूपसे बाँट लिया है ऐसे मित्र भी मरणके समय
रक्षा नहीं कर सकते । मिलकर बन्धुजन भी रोगसे व्याप्त इस जीवकी रक्षा करनेमें असमर्थ होते
हैं। यदि सुचरित धर्म हो तो वह ही दुःखरूपी महासमुद्रमें तरनेका उपाय हो सकता है । मृत्युसे ले
जानेवाले इस जीवके सहस्रनयन आदि भी शरण नहीं है, इसलिए संसार विपत्तिरूप स्थानमें धर्म
ही शरण है। वही मित्र है और वही कभी भी न छूटनेवाला अर्थ है, अन्य कुछ शरण नहीं है इस
प्रकारकी भावना करना अशरणानुप्रेक्षा है । इस प्रकार विचार करनेवाले इस जीवके 'मैं सदा
अशरण हूँ' इस तरह अतिशय उद्विग्न होनेके कारण संसारके कारणभूत पदार्थोंमें ममता नहीं
रहती और वह भगवान् अरहंत सर्वज्ञ प्रणीत मार्गमें ही प्रयत्नशील होता है ।
§ ८०१. कर्मके विपाकके वशसे आत्माको भवान्तरकी प्राप्ति होना संसार है । उसका
पहले पाँच प्रकारके परिवर्तन रूपसे व्याख्यान कर आये हैं। अनेक योनि और कुल कोटिलाखसे
व्याप्त उस संसारमें परिभ्रमण करता हुआ यह जीव कर्मयन्त्रसे प्रेरित होकर पिता होकर भाई,
पुत्र और पौत्र होता है। माता होकर भगिनी, भार्या और लड़की होता है। स्वामी होकर दास
होता है तथा दास होकर स्वामी भी होता है । जिस प्रकार रंगस्थलमें नट नाना रूप धारण
करता है उस प्रकार यह होता है। अथवा बहुत कहनेसे क्या प्रयोजन, स्वयं अपना पुत्र होता है।
इत्यादि रूपसे संसारके स्वभावका चिन्तन करना संसारानुप्रेक्षा है । इस प्रकार चिन्तन करते हुए
संसारके दुःखके भयसे उद्विग्न हुए इसके संसारसे निर्वेद होता है और निर्विण्ण होकर संसारका
नाश करनेके लिए प्रयत्न करता है।
§ ८०२. 'जन्म, जरा और मरणकी आवृत्ति रूप महादुःखका अनुभवन करनेके लिए अकेला
ही मैं हूँ, न कोई मेरा स्व है और न पर है, अकेला ही मैं जन्मता हूँ और अकेला ही मरता हूँ।
मेरा कोई स्वजन या परजन व्याधि, जरा और मरण आदि दुःखोंको दूर नहीं करता । बन्धु और
मित्र श्मशानसे आगे नहीं जाते । धर्म ही मेरा कभी साथ न छोड़नेवाला सदा काल सहायक है।
१. ममत्वनिरासो भव-आ०, दि० १, दि० २, मु०, ना० । २. मार्गे प्रतिपन्नो भव-आ०, दि० १,
दि० २, मु० । ३. -यन्त्रानुप्रेरितः । ४. प्रतियतते मु० । ५. - मरणानुवृत्ति-मु० । ६. जायेऽहम् । एक
ता० । ७. श्मशानात् नाति-ता० ।

– ९।७ § ८०५ ] नवमोऽध्यायः ३१७
चिन्तनमेकत्वानुप्रेक्षा। एवं ह्यस्य भावयतः स्वजनेषु प्रीत्यनुबन्धो न भवति। परजनेषु च द्वेषानु-
बन्धो नोपजायते। ततो निःसङ्गतामभ्युपगतो मोक्षायैव घटते।
§ ८०३. शरीरादन्यत्वचिन्तनमन्यत्वानुप्रेक्षा। तद्यथा—बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यपि लक्षणभेदा-
दन्योऽहमैन्द्रियकं शरीरमै¹तीन्द्रियोऽहमज्ञं शरीरं ज्ञोऽहमनित्यं शरीरं नित्योऽहमाद्यन्तवच्छरीरमनाद्य-
नन्तोऽहम्। बहूनि मे शरीरशतसहस्राण्यतीतानि संसारे परिभ्रमतः। स एवाहमन्यस्तेभ्य इत्येवं ५
मे किमङ्ग, पुनर्बाह्येभ्यः परिग्रहेभ्यः। इत्येवं ह्यस्य मनः समाधानस्य शरीरादिषु स्पृहा नोत्पद्यते।
ततस्तत्त्वज्ञानभावनापूर्वके वैराग्यप्रकर्षे सति आत्यन्तिकस्य मोक्षसुखस्यावा²प्तिर्भवति।
§ ८०४. शरीरमिदमत्यन्ताशुचियोनिं³ शुक्रशोणिताशुचिसंवर्धितमवस्करवदशुचिभाजनं
त्वङ्‌मात्रप्रच्छादितमतिपूतिरसनिष्यन्दिस्रोतोबिलमङ्गारवदात्मभावमाश्रितमप्याश्वेवापादयति ।
स्नानानुलेपनधूपप्रघर्षवासमाल्यादिभिरपि न शक्यमशुचित्वमपहर्तु मस्य। सम्यग्दर्शनादि पुनर्भा- १०
व्यमानं जीवस्यात्यन्तिकां शुद्धिमाविर्भावयतीति तत्त्वतो भावनमशुचित्वानुप्रेक्षा। एवं ह्यस्य
संस्मरतः शरीरनिर्वेदो भवति। निर्विण्णश्च जन्मोदधितरणाय चित्तं समाधत्ते।
§ ८०५. आस्रवसंवरनिर्जराः पूर्वोक्ता अपि इहोपन्यस्यन्ते तद्‍गतगुणदोषभावनार्थम्। तद्यथा—
आस्रवा इहामुत्रापाययुक्ता महानदीस्रोतोवेगतीक्ष्णा इन्द्रियकषाया व्रतादयः। तत्रेन्द्रियाणि ताव-
त्स्पर्शनादीनि वनगजवायसपन्नगपतङ्गहरिणादीन् व्यसनार्णवमवगाहयन्ति तथा कषायादयोऽपीह १५
इस प्रकार चिन्तन करना एकत्वानुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके स्वजनोंमें
प्रीतिका अनुबन्ध नहीं होता और परजनोंमें द्वेषका अनुबन्ध नहीं होता, इसलिए निःसंगताको
प्राप्त होकर मोक्षके लिए ही प्रयत्न करता है।
§ ८०३. शरीरसे अन्यत्वका चिन्तन करना अन्यत्वानुप्रेक्षा है। यथा—बन्धकी अपेक्षा अभेद
होनेपर भी लक्षणके भेदसे 'मैं' अन्य हूँ। शरीर ऐन्द्रियिक है, मैं अतीन्द्रिय हूँ। शरीर अज्ञ है, मैं २०
ज्ञाता हूँ। शरीर अनित्य है, मैं नित्य हूँ। शरीर आदि-अन्तवाला है और मैं अनाद्यनन्त हूँ। संसार-
में परिभ्रमण करते हुए मेरे लाखों शरीर अतीत हो गये। उनसे भिन्न वह ही मैं हूँ, इस प्रकार
शरीरसे भी जब मैं अन्य हूँ तब हे वत्स ! मैं बाह्य पदार्थोंसे भिन्न होऊँ तो इसमें क्या आश्चर्य ?
इस प्रकार मनको समाधान युक्त करनेवाले इसके शरीरादिकमें स्पृहा उत्पन्न नहीं होती है और
इससे तत्त्वज्ञानकी भावनापूर्वक वैराग्यका प्रकर्ष होनेपर आत्यन्तिक मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है। २५
§ ८०४. यह शरीर अत्यन्त अशुचि पदार्थोंका योनि है। शुक्र और शोणितरूप अशुचि
पदार्थोंसे वृद्धिको प्राप्त हुआ है, शौचगृहके समान अशुचि पदार्थोंका भाजन है। त्वचामात्रसे
आच्छादित है। अति दुर्गन्ध रसको बहानेवाला झरना है। अंगारके समान अपने आश्रयमें आये
हुए पदार्थको भी शीघ्र ही नष्ट करता है। स्नान, अनुलेपन, धूपका मालिश और सुगन्धिमाला
आदिके द्वारा भी इसकी अशुचिताको दूर कर सकना शक्य नहीं है किन्तु अच्छी तरह भावना ३०
किये गये सम्यग्दर्शन आदिक जीवकी आत्यन्तिक शुद्धिको प्रकट करते हैं। इस प्रकार वास्तविक-
रूपसे चिन्तन करना अशुचि अनुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इसके शरीरसे निर्वेद
होता है और निर्विण्ण होकर जन्मोदधिको तरनेके लिए चित्तको लगाता है।
§ ८०५. आस्रव, संवर और निर्जराका कथन पहले कर आये हैं तथापि उनके गुण और
दोषोंका विचार करनेके लिए यहाँ उनका फिरसे उपन्यास किया गया है। यथा—आस्रव इस लोक ३५
और परलोकमें दुःखदायी हैं। महानदीके प्रवाहके वेगके समान तीक्ष्ण हैं तथा इन्द्रिय, कषाय और
अव्रतरूप हैं। उनमें से स्पर्शनादिक इन्द्रियाँ वनगज, कौआ, सर्प, पतंग और हरिण आदिको दुःख-
१. – मनिन्द्रियो मु०, दि० १, दि० २, ता० । २. –स्याप्तिर्भ-मु० । ३. –न्ताशुचिशुक्रशोणितयोन्यशुचिसं-
मु० । –न्ताशुचिपूतिशुक्रशोणितसं – दि० १। –न्ताशुचिशुक्रशोणितसं–दि० २ । ४. तद्गुण-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३१८ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।७ § ८०६-
वधबन्धापयशःपरिक्लेशादीन् जनयन्ति । अमुत्र च नानागतिषु बहुविधदुःखप्रज्वलितासु परि२-
भ्रमयन्तीत्येवमास्रवदोषानुचिन्तनमास्रवानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतः क्षमादिषु श्रेयस्त्वबुद्धिर्न
प्रच्यवते । सर्व एते आस्रवदोषाः कूर्मवत्संवृतात्मनो न भवन्ति ।
§ ८०६. यथा महार्णवे नावो विवर३पिधानेऽसति क्रमात् स्रुतजलाभिप्लवे सति तदाश्रयाणां
५ विनाशोऽवश्यंभावी, छिद्रपिधाने च निरुपद्रवमभिलषितदेशान्तरप्रापणं, तथा कर्मागमद्वारसंवरणे
सति नास्ति श्रेयःप्रतिबन्ध इति संवरगुणानुचिन्तनं संवरानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतः संवरे
नित्योद्युक्तता भवति । ततश्च निःश्रेयसपदप्राप्तिरिति ।
§ ८०७. निर्जरा वेदनाविपाक४ इत्युक्तम् । सा द्वेधा — अबुद्धिपूर्वा कुशलमूला चेति । तत्र
नरकादिषु कर्मफलविपाकजा अबुद्धिपूर्वा सा अकुशलानुबन्धा । परिषहजये कृते कुशलमूला सा
१० शुभानुबन्धा निरनुबन्धा चेति । इत्येवं निर्जराया गुणदोषभावनं निर्जरानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्यानुस्मरतः
कर्मनिर्जरायै प्रवृत्तिर्भवति ।
§ ८०८. लोकसंस्थानादिविधिर्व्याख्यातः । समन्तादनन्तस्यालोकाकाशस्य बहुमध्यदेश-
भाविनो लोकस्य संस्थानादिविधिर्व्याख्यातः । तत्स्वभावानुचिन्तनं लोकानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्याध्य-
वस्यतस्तत्त्वज्ञानविशुद्धिर्भवति ।
१५ § ८०९. एकस्मिन्निगोतशरीरे जीवाः सिद्धानामनन्तगुणाः। एवं सर्वलोको निरन्तरं निचितः
रूप समुद्रमें अवगाहन कराती हैं। कषाय आदिक भी इस लोकमें वध, अपयश और क्लेशादिक
दुःखोंको उत्पन्न करते हैं, तथा परलोकमें नाना प्रकारके दुःखोंसे प्रज्वलित नाना गतियोंमें परि-
भ्रमण कराते हैं। इस प्रकार आस्रवके दोषोंका चिन्तन करना आस्रवानुप्रेक्षा है । इस प्रकार
चिन्तन करनेवाले इस जीवके क्षमादिकमें कल्याणरूप बुद्धिका त्याग नहीं होता है, तथा कछुएके
२० समान जिसने अपनी आत्माको संवृत कर लिया है उसके ये सब आस्रवके दोष नहीं होते हैं ।
§ ८०६. जिस प्रकार महार्णवमें नावके छिद्रके नहीं ढके रहनेपर क्रमसे झिरे हुए जलसे
व्याप्त होनेपर उसके आश्रयसे बैठे हुए मनुष्योंका विनाश अवश्यम्भावी है और छिद्रके ढँके रहनेपर
निरुपद्रवरूपसे अभिलषित देशान्तरका प्राप्त होना अवश्यम्भावी है उसी प्रकार कर्मागमके द्वारके
ढँके होनेपर कल्याणका प्रतिबन्ध नहीं होता । इस प्रकार संवरके गुणोंका चिन्तन करना संवरानु-
२५ प्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके संवरमें निरन्तर उद्युक्तता होती है और इससे
मोक्षपदकी प्राप्ति होती है ।
§ ८०७ वेदना विपाकका नाम निर्जरा है यह पहले कह आये हैं। वह दो प्रकारकी है—
अबुद्धिपूर्वा और कुशलमूला। नरकादि गतियोंमें कर्मफलके विपाकसे जायमान जो अबुद्धिपूर्वा
निर्जरा होती है वह अकुशलानुबन्धा है। तथा परीषहके जीतनेपर जो निर्जरा होती है वह कुशल-
३० मूला निर्जरा है। वह शुभानुबन्धा और निरनुबन्धा होती है। इस प्रकार निर्जराके गुणदोषका
चिन्तन करना निर्जरानुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करने वाले इसकी कर्मनिर्जराके लिए प्रवृत्ति
होती है ।
§ ८०८. लोकसंस्थान आदिकी विधि पहले कह आये हैं। अर्थात् चारों ओरसे अनन्त
अलोकाकाशके बहुमध्यदेशमें स्थित लोकके संस्थान आदिकी विधि पहले कह आये हैं। उसके
३५ स्वभावका अनुचिन्तन करना लोकानुप्रेक्षा है। इस प्रकार विचार करनेवाले इसके तत्त्वज्ञानकी
विशुद्धि होती है।
§ ८०९. एक निगोदशरीरमें सिद्धोंसे अनन्तगुणे जीव हैं। इस प्रकार स्थावर जीवोंसे सब
१. -बन्धपरि-मु०, ता० । २. -तासु भ्रम-मु० । ३. विवरापिधाने सति मु० । ४. -पाकजा इत्यु-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

– ९।७ § ८१० ] नवमोऽध्यायः ३१९
स्थावरैरतस्तत्र त्रसता वालुकासमुद्रे पतिता वज्रसिकताकणिकेव दुर्लभा । तत्र च विकलेन्द्रियाणां
भूयिष्ठत्वात्पञ्चेन्द्रियता गुणेषु कृतज्ञतेव कृच्छ्रलभ्या । तत्र च तिर्यक्षु पशुमृगपक्षिसरीसृपादिषु
बहुषु सत्सु मनुष्यभावश्चतुष्पथे रत्नराशिरिव दुरासदः । तत्प्रच्यवे च पुनस्तदुत्पत्तिर्दग्धतरुपुद्गल-
तद्भावोपपत्तिवद् दुर्लभा । तल्लाभे च देशकुलेन्द्रियसंपन्नीरोगत्वान्युत्तरोत्तरतोऽतिदुर्लभानि ।
सर्वेष्वपि तेषु लब्धेषु सद्धर्मप्रतिलम्भो यदि न स्याद् व्यर्थं जन्म वदनमिव दृष्टिविकलम् । तमेवं¹ ५
कृच्छ्रलभ्यं धर्ममवाप्य विषयसुखे रञ्जनं भस्मार्थंचन्दनदहनमिव विफलम् । विरक्तविषयसुखस्य तु
तपोभावनाधर्मप्रभावनासुखमरणदिलक्षणः समाधिर्दु र्वापः । तस्मिन् सति बोधिलाभः फलवान्
भवतीति चिन्तनं बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य भावयतो बोधिं प्राप्य प्रमादो न कदाचिदपि
भवति ।
§ ८१०. अयं जिनोपदिष्टो धर्मोऽहिंसालक्षणः सत्याधिष्ठितो विनयमूलः । क्षमाबलो ब्रह्मचर्यगुप्त १०
उपशमप्रधानो नियतिलक्षणो निष्परिग्रहतालम्बनः । अस्यालाभादनादिसंसारे जीवाः परिभ्रमन्ति
दुष्कर्मविपाकजं दुःखमनुभवन्तः । अस्य पुनः प्रतिलम्भे विविधाभ्युदयप्राप्तिपूर्विका निःश्रेयसोप-
लब्धिर्नियतेति चिन्तनं धर्मस्वाख्यातत्वानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतो धर्मानुरागात्सदा² प्रतियत्नो
भवति ।
लोक निरन्तर भरा हुआ है । अतः इस लोकमें त्रस पर्यायका प्राप्त होना इतना दुर्लभ है जितना १५
कि बालुकाके समुद्रमें पड़ी हुई वज्रसिकताकी कणिकाका प्राप्त होना दुर्लभ होता है । उसमें भी
विकलेन्द्रिय जीवोंकी बहुलता होनेके कारण गुणोंमें जिस प्रकार कृतज्ञता गुणका प्राप्त होना बहुत
दुर्लभ होता है उसी प्रकार पंचेन्द्रिय पर्यायका प्राप्त होना बहुत दुर्लभ है। उसमें भी पशु, मृग,
पक्षी और सरीसृप तिर्यंचोंकी बहुलता होती है, इसलिए जिस प्रकार चौपथपर रत्नराशिका प्राप्त
होना अति कठिन है उसी प्रकार मनुष्य पर्यायका प्राप्त होना भी अति कठिन है । और मनुष्य २०
पर्यायके मिलनेके बाद उसके च्युत हो जानेपर पुनः उसकी उत्पत्ति होना इतना कठिन है जितना
कि जले हुए वृक्षके पुद्गलोंका पुनः उस वृक्ष पर्यायरूपसे उत्पन्न होना कठिन होता है । कदाचित्
पुनः इसकी प्राप्ति हो जाये तो देश, कुल, इन्द्रियसम्पत् और नीरोगता इनका प्राप्त होना उत्तरो-
त्तर दुर्लभ है । इन सबके मिल जानेपर भी यदि समीचीन धर्मकी प्राप्ति न होवे तो जिस प्रकार
दृष्टिके बिना मुख व्यर्थ होता है उसी प्रकार मनुष्यजन्मका प्राप्त होना व्यर्थ है । इस प्रकार २५
अतिकठिनतासे प्राप्त होने योग्य उस धर्मको प्राप्त कर विषयसुखमें रममाण होना भस्मके लिए
चन्दनको जलानेके समान निष्फल है । कदाचित् विषयसुखसे विरक्त हुआ तो भी इसके लिए तपकी
भावना, धर्मकी प्रभावना और सुखपूर्वक मरणरूप समाधिका प्राप्त होना अतिदुर्लभ है । इसके
होनेपर ही बोधिलाभ सफल है ऐसा विचार करना बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा है । इस प्रकार विचार
करनेवाले इस जीवके बोधिको प्राप्त कर कभी भी प्रमाद नहीं होता । ३०
§ ८१०. जिनेन्द्रदेवने यह जो अहिंसालक्षण धर्म कहा है, सत्य उसका आधार है, विनय
उसकी जड़ है, क्षमा उसका बल है, ब्रह्मचर्यसे रक्षित है, उपशमकी उसमें प्रधानता है, नियति
उसका लक्षण है, परिग्रह रहितपना उसका आलम्बन है । इसकी प्राप्ति नहीं होनेसे दुष्कर्म विपाकसे
जायमान दुःखको अनुभव करते हुए ये जीव अनादि संसारमें परिभ्रमण करते हैं । परन्तु इसका
लाभ होने पर नाना प्रकारके अभ्युदयोंकी प्राप्तिपूर्वक मोक्षकी प्राप्ति होना निश्चित है ऐसा चिन्तन ३५
करना धर्मस्वाख्यातत्वानुप्रेक्षा है । इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके धर्मानुरागवश उसकी
प्राप्तिके लिए सदा यत्न होता है ।
१. तमेव कृ–आ०, दि० १, दि० २ । २. सदा कृतप्रति–ता० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३२० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।९ § ८११ -
§ ८११. एवमनित्यत्वाद्यनुप्रेक्षासंनिधाने उत्तमक्षमादिधारणान्महान् संवरो भवति । मध्ये
'अनुप्रेक्षा'वचनमुभयार्थम् । अनुप्रेक्षा हि भावयन्नुत्तमक्षमादींश्च प्रतिपालयति परीषहांश्च
जेतुमुत्सहते ।
§ ८१२. के पुनस्ते परिषहाः किमर्थं वा¹ ते सह्यन्त इतीदमाह—
मार्गाच्यवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः ॥८॥
§ ८१३. संवरस्य प्रकृतत्वात्तेन मार्गो विशिष्यते । संवरमार्ग इति । तदच्यवनार्थं निर्जरार्थं
च परिषोढव्याः परीषहाः । क्षुत्पिपासादिसहनं कुर्वन्तः जिनोपदिष्टान्मार्गादप्रच्यवमानास्तन्मार्ग-
परिक्रमणपरिचयेन कर्मागमद्वारं संवृण्वन्त औपक्रमिकं कर्मफलमनुभवन्तः क्रमेण निर्जीर्णकर्माणो
मोक्षमाप्नुवन्ति ।
§ ८१४. तत्स्वरूपसंख्यासंप्रतिपत्त्यर्थमाह—
क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्याशय्याक्रोशवधयाचना-
लाभरोगतृणस्पर्शमलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि ॥९॥
§ ८१५. क्षुदादयो वेदनाविशेषा द्वाविंशतिः । एतेषां सहनं मोक्षार्थिना कर्तव्यम् ।
तद्यथा—भिक्षोर्निरवद्याहारगवेषिणस्तदलाभे ईषल्लाभे च अनिवृत्तवेदनस्याकाले अदेशे च भिक्षां
प्रति निवृत्तेच्छस्यावश्यकपरिहाणिं मनागप्यसहमानस्य स्वाध्यायध्यानभावनापरस्य बहुकृत्वः
§ ८११. इस प्रकार अनित्यादि अनुप्रेक्षाओंका सान्निध्य मिलने पर उत्तमक्षमादिके धारण
करनेसे महान् संवर होता है। अनुप्रेक्षा दोनोंका निमित्त है इसलिए 'अनुप्रेक्षा' वचन मध्यमें दिया
है। अनुप्रेक्षाओंका चिन्तन करता हुआ यह जीव उत्तमक्षमादिका ठीक तरहसे पालन करता है
और परीषहोंको जीतनेके लिए उत्साहित होता है।
§ ८१२. वे परीषह कौन-कौन हैं और वे किसलिए सहन किये जाते हैं, यह बतलानेके लिए
यह सूत्र कहते हैं—
मार्गसे च्युत न होनेके लिए और कर्मोंकी निर्जरा करनेके लिए जो सहन करने योग्य हों
वे परीषह हैं ॥८॥
§ ८१३. संवरका प्रकरण होनेसे वह मार्गका विशेषण है, इसलिए सूत्रमें आये हुए 'मार्ग'
पदसे संवरमार्गका ग्रहण करना चाहिए । उससे च्युत न होनेके लिए और निर्जराके लिए सहन
करने योग्य परीषह होते हैं। क्षुधा, पिपासा आदिको सहन करनेवाले, जिनदेवके द्वारा कहे हुए
मार्गसे नहीं च्युत होनेवाले, उस मार्गके सतत अभ्यासरूप परिचयके द्वारा कर्मागमद्वारको संवृत
करनेवाले यथा औपक्रमिक कर्मफलको अनुभव करनेवाले क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करके मोक्षको
प्राप्त होते हैं।
§ ८१४. अब उन परीषहोंके स्वरूप और संख्याका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, नग्नता, अरति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शय्या, आक्रोश,
वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कारपुरस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और अदर्शन इन
नामवाले परीषह हैं ॥९॥
§ ८१५. क्षुधादिक वेदनाविशेष बाईस हैं। मोक्षार्थी पुरुषको इनको सहन करना चाहिए।
यथा—जो भिक्षु निर्दोष आहारका शोध करता है, जो भिक्षाके नहीं मिलने पर या अल्पमात्रामें
मिलने पर क्षुधावेदनाको नहीं प्राप्त होता, अकालमें या अदेशमें जिसे भिक्षा लेनेकी इच्छा नहीं
१. वा सह्य- मु० । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

  • ९।९ § ८१८ ] नवमोऽध्यायः ३२१
    स्वकृतपरकृतानशनावमौदर्यस्य नीरसाहारस्य१ संतप्तभ्राष्ट्रपतितजलबिन्दुकतिपयवत्सहसा परिशुष्क-
    पानस्योदीर्णक्षुद्वेदनस्यापि सतो भिक्षालाभादलाभमधिकगुणं मन्यमानस्य क्षुद्बाधां प्रत्यचिन्तनं
    क्षुद्विजयः ।
    § ८१६. जलस्नानावगाहनपरिषेकपरित्यागिनः पतत्त्रिवदनियतासनावसथस्यातिलवण- ५
    स्निग्धरूक्षविरुद्धाहारैर्ग्रैष्मातपपित्तज्वरानशनादिभिरुदीर्णां शरीरेन्द्रियोन्माथिनीं पिपासां प्रत्यना-
    द्रियमाणप्रतीकारस्य पिपासानलशिखां धृतिनवमृद्घटपूरितशीतलसुगन्धिसमाधिवारिणा प्रशमयतः
    पिपासासहनं प्रशस्यते ।
    § ८१७. परित्यक्तप्रच्छादनस्य पक्षिवदनवधारितालयस्य वृक्षमूलपथिशिलातलादिषु हिमा-
    नीपतनशीतलानिल२संपाते तत्प्रतिकारप्रा

३२२ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।९ § ८१९ -

§ ८१९. 'दंशमशक'¹ ग्रहणमुपलक्षणम् । यथा "काकेभ्यो रक्ष्यतां सर्पिः" इति उपघातकोप²-
लक्षणं काकग्रहणं, तेन दंशमशकमक्षिकापिशुकपुत्तिकामत्कुणकीटपिपीलिकावृश्चिकादयो गृह्यन्ते ।
तत्कृतां बाधामप्रतीकारां सहमानस्य तेषां बाधां त्रिधाप्यकुर्वाणस्य निर्वाणप्राप्तिमात्रसंकल्पप्रावर-
णस्य तद्वेदनासहनं दंशमशकपरीषहक्षमेत्युच्यते ।
५ § ८२०. जातरूपवन्निष्कलङ्कजातरूपधारणमशक्यप्रार्थनीयं³ याचनरक्षणहिंसनादिदोषवि-
निर्मुक्तं निष्परिग्रहत्वान्निर्वाणप्राप्तिं प्रत्येकं साधनमनन्यबाधनं नाग्न्यं बिभ्रतो मनोविक्रियाविप्लु-
तिविरहात् स्त्रीरूपाण्यत्यन्ताशुचिकुणपरूपेण भावयतो रात्रिन्दिवं ब्रह्मचर्यमखण्डमतिष्ठमानस्या-
चेलव्रतधारणमनवद्यमवगन्तव्यम् ।
§ ८२१. संयतस्येन्द्रियेष्टविषयसंबन्धं प्रति निरुत्सुकस्य गीतनृत्यवादित्रादिविरहितेषु शून्या-
१० गारदेवकुलतरुकोटरशिलागुहादिषु स्वाध्यायध्यानभावनारतिमास्कन्दतो दृष्टश्रुतानु⁴भूतरतिस्मरण-
तत्कथाश्रवणकामशरप्रवेशनिर्विवरहृदयस्य प्राणिषु सदा सदयस्यारतिपरीषहजयोऽवसेयः ।
§ ८२२. एकान्तेष्वारामभवनादिप्रदेशेषु नवयौवनमदविभ्रममदिरापानप्रमत्तासु प्रमदासु
बाधमानासु कूर्मवत्संवृ⁵तेन्द्रियविकारस्य ललितस्मितमृदुकथितसविलासवीक्षणप्रहसनमद⁶मन्थर-
गमनमन्मथशरव्यापारविफलीकरणस्य⁷ स्त्रीबाधापरीषहसहनमवगन्तव्यम् ।
१५ § ८१९. सूत्रमें 'दंशमशक' पदका ग्रहण उपलक्षण है। जैसे 'कौओंसे घीकी रक्षा करनी
चाहिए' यहां 'काक' पदका ग्रहण उपघातक जितने जीव हैं उनका उपलक्षण है, इसलिए
'दंशमशक' पदसे दंशमशक, मक्खी, पिस्सू, छोटी मक्खी, खटमल, कीट, चींटी और बिच्छू आदिका
ग्रहण होता है । जो इनके द्वारा की गयी बाधाको बिना प्रतीकार किये सहन करता है, मन वचन
और कायसे उन्हें बाधा नहीं पहुँचाता है और निर्वाणकी प्राप्तिमात्र संकल्प ही जिसका ओढ़ना है
२० उसके उनकी वेदनाको सह लेना दंशमशक परीषहजय कहा जाता है ।
§ ८२०. बालकके स्वरूपके समान जो निष्कलंक जातरूपको धारण करने रूप हैं, जिसका
याचना करनेसे प्राप्त होना अशक्य है, जो याचना, रक्षा करना और हिंसा आदि दोषोंसे रहित है,
जो निष्परिग्रहरूप होनेसे निर्वाण प्राप्तिका अनन्य साधन है और जो अन्य बाधाकर नहीं है ऐसे
नाग्न्यको जो धारण करता है, जो मनके विक्रियारूप उपद्रवसे रहित होनेके कारण स्त्रियोंके रूप-
२५ को अत्यन्त अपवित्र बदबूदार अनुभव करता है और जो दिन रात अखण्ड ब्रह्मचर्यको धारण
करता है उसके निर्दोष अचेलव्रत धारण जानना चाहिए ।
§ ८२१. जो संयत इन्द्रियोंके इष्ट विषय सम्बन्धके प्रति निरुत्सुक है, जो गीत, नृत्य और
वादित्र आदिसे रहित शून्यघर, देवकुल, तरुकोटर और शिलागुफा आदिमें स्वाध्याय, ध्यान और
भावनामें लीन है, पहले देखे हुए, सुने हुए और अनुभव किये हुए विषय भोगके स्मरण, विषयभोग
३० सम्बन्धी कथाके श्रवण और कामशर प्रवेशके लिए जिसका हृदय निश्छिद्र है और जो प्राणियोंके
ऊपर सदाकाल सदय है उसके अरतिपरीषहजय जानना चाहिए ।
§ ८२२. एकान्त ऐसे बगीचा और भवन आदि स्थानों पर नवयौवन, मदविभ्रम और
मदिरापानसे प्रमत्त हुई स्त्रियोंके द्वारा बाधा पहुँचाने पर कछुएके समान जिसने इन्द्रिय और
हृदयके विकारको रोक लिया है तथा जिसने मन्द मुस्कान, कोमल सम्भाषण, तिरछी नजरोंसे
३५ देखना, हँसना, मदभरी धीमी चालसे चलना, और कामवाण मारना आदिको विफल कर दिया
है उसके स्त्रीबाधापरीषहजय जानना चाहिए ।
१. -ग्रहणं दंशमशकोपलक्षणं । यथा आ०, दि० १, दि० २, ता० । २. उपघातोप-मु० । ३. -शक्यमप्रार्थ्य-
ता०, ना०, दि० २, आ० । ४. 'मुदपरिचिदाणभूदा सव्वस्य वि कामभोगवंधकहा ।' -समयप्रा० गा० ४ ।
५. संहृते-मु० । ६. पदमन्थर-मु० । ७. -करणचरणस्य आ०, दि० १, दि० २ ।

  • ९।९ § ८२५ ] नवमोऽध्यायः ३२३
    § ८२३. दीर्घकालमुषितगुरुकुलब्रह्मचर्यस्याधिगतबन्धमोक्षपदार्थतत्त्वस्य संयमायतनभक्ति-
    हेतोर्देशान्तरातिथेर्गुरुणाभ्यनुज्ञातस्य पवनवन्निःसङ्गतामङ्गीकुर्वतो बहुशोऽनशनावमौदर्यवृत्तिपरि-
    संख्यानरसपरित्यागादिबाधापरिक्लान्तकायस्य१ देशकालप्रमाणापेतमध्वगमनं संयमविरोधि परि-
    हरतोनिराकृतपादावरणस्य परुषकर्कराकण्टकादिव्यर्धन२जातचरणखेदस्यापि सतः पूर्वोचितयान-
    वाहनादिगमनमस्मरतो यथाकालमावश्यकपरिहाणिमास्कन्दतश्चर्यापरीषहसहनमवसेयम् । ५
    § ८२४. श्मशानोद्यानशून्यायतनगिरिगुहागह्वरादिष्वनभ्यस्तपूर्वेषु निवसतः आदित्यप्रकाशे-३
    स्वेन्द्रियज्ञानपरीक्षितप्रदेशे४ कृतनियमक्रियस्य निषद्यां नियमितकालामास्थितवतः सिंहव्याघ्रादिवि-
    विधभीषणध्वनिश्रवणान्निवृत्तभयस्य चतुर्विधोपसर्गसहनादप्रच्युतमोक्षमार्गस्य वीरासनोत्कुटिकाद्या-
    सनादविचलितविग्रहस्य तत्कृतबाधासहनं निषद्यापरीषहविजय इति निश्चीयते ।
    § ८२५. स्वाध्यायध्यानाध्वश्रमपरिखेदितस्य मौहूर्तिकीं खरविषमप्रचुरशर्कराकपालसङ्कटा-५ १०
    तिशीतोष्णेषु भूमिप्रदेशेषु निद्रामनुभवतो यथाकृतैकपार्श्वदण्डायितादिशायिनः प्राणिबाधापरिहाराय
    पतितदारुवद्६ व्यपगतासुवद्७ परिवर्तमानस्य ज्ञान८भावनावाहितचेतसोऽनुष्ठितव्यन्तरादिविधोपसर्गा-
    दप्यचलितविग्रहस्यानियमितकालां तत्कृतबाधां क्षममाणस्य शय्या परीषहक्षमा कथ्यते ।
    § ८२३. जिसने दीर्घकाल तक गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्यको धारण किया है, जिसने बन्ध-
    मोक्ष पदार्थोंके स्वरूपको जान लिया है, संयमके आयतन शरीरको भोजन देनेके लिए जो देशा- १५
    न्तरका अतिथि बना है, गुरुके द्वारा जिसे स्वीकृति मिली है, जो वायुके समान निःसंगताको
    स्वीकार करता है, बहुत बार अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान और रसपरित्याग आदि जन्य
    बाधाके कारण जिसका शरीर परिक्लान्त है, देश और कालके प्रमाणसे रहित तथा संयमविरोधी
    मार्गगमनका जिसने परिहार कर दिया है, जिसने खड़ाऊँ आदिका त्याग कर दिया है, तीक्ष्ण
    कंकड़ और कांटे आदिके बिंधनेसे चरणमें खेदके उत्पन्न होनेपर भी पहले योग्य यान और वाहन २०
    आदिसे गमन करनेका जो स्मरण नहीं करता है तथा जो यथाकाल आवश्यकोंका परिपूर्ण परि-
    पालन करता है उसके चर्यापरीषहजय जानना चाहिए ।
    § ८२४. जिनमें पहले रहनेका अभ्यास नहीं किया है ऐसे श्मशान, उद्यान, शून्यघर, गिरि-
    गुफा और गह्वर आदिमें जो निवास करता है, आदित्यके प्रकाश और स्वेन्द्रिय ज्ञानसे परीक्षित
    प्रदेशमें जिसने नियमक्रिया की है, जो नियतकाल निषद्या लगाकर बैठता है, सिंह और व्याघ्र २५
    आदिकी नाना प्रकारकी भीषण ध्वनिके सुननेसे जिसे किसी प्रकारका भय नहीं होता, चार
    प्रकारके उपसर्गके सहन करनेसे जो मोक्षमार्गसे च्युत नहीं हुआ है तथा वीरासन और उत्कुटिका
    आदि आसनके लगानेसे जिसका शरीर चलायमान नहीं हुआ है उसके निषद्याकृत बाधाका सहन
    करना निषद्यापरीषहजय निश्चित होता है ।
    § ८२५. स्वाध्याय, ध्यान और अध्वश्रमके कारण थककर जो कठोर, विषम तथा ३०
    प्रचुरमात्रामें कंकड़ और खपरोंके टुकड़ोंसे व्याप्त ऐसे अति शीत तथा अत्युष्ण भूमिप्रदेशोंमें एक
    मुहूर्तप्रमाण निद्राका अनुभव करता है, जो यथाकृत एक पार्श्व भागसे या दण्डायित आदि रूपसे
    शयन करता है, करवट लेनेसे प्राणियोंको होनेवाली बाधाका निवारण करनेके लिए जो गिरे हुए
    लकड़ीके कुन्देके समान या मुर्दाके समान करवट नहीं बदलता, जिसका चित्त ज्ञानभावनामें लगा
    हुआ है, व्यन्तरादिके द्वारा किये गये नाना प्रकारके उपसर्गोंसे भी जिसका शरीर चलायमान नहीं ३५
    होता और जो अनियतकालिक तत्कृत बाधाको सहन करता है उसके शय्यापरीषहजय कहा जाता है।
    १. -परिक्रान्त-मु० । २.-व्यथन-मु०, दि० १, दि० २ । ३. प्रतिषु आदित्यस्येन्द्रियज्ञानप्रकाशपरीक्षितप्रदेशे
    इति पाठः । ४. -देशे प्रकृत-मु० । ५. -संकटादिशी-मु० । ६. -पतिततरुदण्डव-ता० । ७. -तासुवदुपारि-
    मु० । ८. ज्ञानपरिभावना-मु० ।

§ ८२६. मिथ्यादर्शनोदृक्तामर्षपरुषावज्ञानिन्दासभ्यवचनानि क्रोधाग्निशिखाप्रवर्धनानि
१निशृण्वतोऽपि तदर्थेऽवसमाहितचेतसः सहसा तत्प्रतीकारं कर्तुमपि शक्नुवतः पापकर्मविपाक-
मभिचिन्तयतस्तान्याकर्ण्य तपश्चरणभावनापरस्य कषायविषलवमात्रास्याप्यनवकाशमात्महृदयं
कुर्वत आक्रोशपरीषहसहनमवधार्यते ।
§ ८२७. निशितविशसनमुशलमुद्गराद्रिप्रहरणताडनादिभिर्व्यापाद्यमानशरीरस्य व्यापादकेषु
मनागपि मनोविकारमकुर्वतो मम पुराकृतदुष्कर्मफलमिदमिमे वराकाः किं कुर्वन्ति, शरीरमिदं
जलबुद्बुदवद्विशरणस्वभावं व्यसनकारणमेतैर्बाध्यते२, संज्ञानदर्शनचारित्राणि मम न केनचिदुप-
हन्यन्ते इति चिन्तयतो वासितक्षणचन्दनानुलेपनसमदर्शिनो वधपरीषहक्षमा मन्यते ।
§ ८२८. बाह्याभ्यन्तरतपोऽनुष्ठानपरस्य तद्भावनावशेन निस्सारीकृतमूर्तेः पटुत्तपनताप-
निष्पीतसारतरोरिव विरहितच्छायास्य त्वगस्थिशिराजालमात्रतनुयन्त्रस्य प्राणत्यये३ सत्यप्याहार-
वसतिभेषजादीनि दीनाभिधानमुखवैवर्ण्याङ्गसंज्ञादिभिरयाचमानस्य भिक्षाकालेऽपि विद्युद्योतवद्
दुरुपलक्ष्यमूर्तेर्याचनापरीषहसहनमवसीयते ।
§ ८२९. वायुवदसङ्गादनेकदेशचारिणोऽभ्युपगतैककालसंभोजनस्य वाचंयमस्य तत्समितस्य४
वा सकृत्स्वतनुदर्शनमात्रतन्त्रस्य पाणिपुटमात्रपात्रस्य बहुषु दिवसेषु५ बहुषु च गृहेषु भिक्षामनवाप्या-
§ ८२६. मिथ्यादर्शनके उद्रेकसे कहे गये जो क्रोधाग्निकी शिखाको बढ़ाते हैं ऐसे क्रोधरूप,
कठोर, अवज्ञाकर, निन्दारूप और असभ्य वचनोंको सुनते हुए भी जिसका उनके विषयमें चित्त
नहीं जाता है, यद्यपि तत्काल उनका प्रतीकार करनेमें समर्थ है फिर भी यह सब पापकर्मका
विपाक है इस तरह जो चिन्तन करता है, जो उन शब्दोंको सुनकर तपश्चरणकी भावनामें तत्पर
रहता है और जो कषायविषके लेशमात्रको भी अपने हृदयमें अवकाश नहीं देता उसके आक्रोश-
परीषहसहन निश्चित होता है ।
§ ८२७. तीक्ष्ण तलवार, मूसर और मुद्गर आदि अस्त्रोंके द्वारा ताड़न और पीड़न आदि-
से जिसका शरीर तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है तथापि मारनेवालोंपर जो लेशमात्र भी मनमें विकार
नहीं लाता, यह मेरे पहले किये गये दुष्कर्मका फल है, ये बेचारे क्या कर सकते हैं, यह शरीर
जलके बुलबुलेके समान विशरण-स्वभाव है, दुःखके कारणको ही ये अतिशय बाधा पहुँचाते हैं, मेरे
सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्रको कोई नष्ट नहीं कर सकता इस प्रकार जो विचार
करता है वह बसूलासे छीलने और चन्दनसे लेप करनेमें समदर्शी होता है इसलिए उसके वधपरी-
षहजय माना जाता है ।
§ ८२८. जो बाह्य और आभ्यन्तर तपके अनुष्ठान करनेमें तत्पर है, जिसने तपकी भावना-
के कारण अपने शरीरको सुखा डाला है, जिसका तीक्ष्ण सूर्यके तापके कारण सार व छाया रहित
वृक्षके समान त्वचा, अस्थि और शिराजालमात्रसे युक्त शरीरयन्त्र रह गया है, जो प्राणोंका
वियोग होनेपर भी आहार, वसति और दवाई आदिकी दीन शब्द कहकर, मुखकी विवर्णता दिखा-
कर व संज्ञा आदिके द्वारा याचना नहीं करता तथा भिक्षाके समय भी जिसकी मूर्ति बिजलीकी
चमकके समान दुरुपलक्ष्य रहती है ऐसे साधुके याचना परीषहजय जानना चाहिए ।
§ ८२९. वायुके समान निःसंग होनेसे जो अनेक देशोंमें विचरण करता है। जिसने दिनमें
एक कालके भोजनको स्वीकार किया है, जो मौन रहता है या भाषासमितिका पालन करता है,
एक बार अपने शरीरको दिखलानामात्र जिसका सिद्धान्त है, पाणिपुट ही जिसका पात्र है, बहुत
१. -नानि शृण्व-मु०, दि० १ । २. -मेतैर्व्याबा-मु० । ३. प्राणवियोगे सत्य-मु० । ४. तत्समस्य वा
आ०, दि० १, दि० २ । ५. -सेषु च मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

iti शरीरे निःसंकल्पत्वाद्विगतसंस्कारस्य
Wait, in line 3: "निःसंकल्पत्वाद्विगतसंस्कारस्य" - is it निःसंकल्पत्वाद् or निःसङ्कल्पत्वाद्?
It is "निःसंकल्पत्वाद्विगतसंस्कारस्य" (with anusvara on स).

Line 4:
गुणरत्नभाण्डसंचयप्रवर्धनसंरक्षणसंधारणकारणत्वादभ्युपगतस्थितिविधानस्याक्षरक्षणवद् १ व्रणा-

Line 5:
नुलेपनवद्वा बहूपकारमाहारमभ्युपगच्छतो विरुद्धाहारपानसेवनवैषम्यजनितवातादिविकाररोगस्य ५

Line 6:
युगपदनेकशतसंख्यव्याधिप्रकोपे सत्यपि तद्वशवर्तितां विजहतो जल्लौषधिप्राप्त्याद्यनेकतपोविशेष-

Line 7:
र्द्धियोगे सत्यपि शरीरनिस्पृहत्वात्तत्प्रतिकारानपेक्षिणो रोगपरीषहसहनमवगन्तव्यम् ।

Line 8:
§ ८३१. तृणग्रहणमुपलक्षणं कस्यचिद्व्यधनदुःखकारणस्य । तेन शुष्कतृणपरुषशर्कराकण्टक-

Line 9:
निशितमृत्तिकाशूलादिव्य२धनकृतपादवेदनाप्राप्तौ सत्यां तत्राप्रणिहितचेतसश्चर्याशय्यानि

३२६ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।९ § ८३३ -
§ ८३३. सत्कारः पूजाप्रशंसात्मकः । पुरस्कारो नाम क्रियारम्भादिष्वग्रतः करणमामन्त्रणं
वा, तत्रानादरो १ मयि क्रियते । चिरोषितब्रह्मचर्यस्य महातपस्विनः स्वपरसमयनिर्णयज्ञस्य बहुकृत्वः
परवादिविजयिनः प्रणामभक्तिसंभ्रमासनप्रदानादीनि मे न कश्चित्करोति । मिथ्यादृष्टय एवातीव
भक्तिमन्तः किंचिदजानन्तमपि सर्वज्ञसंभावनया संमान्य स्वसमयप्रभावनां कुर्वन्ति । व्यन्तरादयः
५ पुरा अत्युग्रतपसां प्रत्यग्रपूजां निर्वर्तयन्तीति मिथ्या श्रुतिर्यदि न स्यादिदानीं कस्मान्मादृशां न
कुर्वन्तीति दुष्प्रणिधानविरहितचित्तस्य सत्कारपुरस्कारपरीषहविजय इति ३ विज्ञायते ।
§ ८३४. अङ्गपूर्वप्रकीर्णकविशारदस्य शब्दन्यायाध्यात्मनिपुणस्य मम पुरस्तादितरे भास्कर-
प्रभाभिभूतखद्योतोद्द्योतवन्नितरां नावभासन्त इति विज्ञानमदनिरासः प्रज्ञापरीषहजयः प्रत्येयः ।
§ ८३५. अज्ञोऽयं न वेत्ति पशुसम इत्येवमाद्यधिक्षेपवचनं सहमानस्य परमदुश्चरतपोऽनुष्ठा-
१० यिनो नित्यमप्रमत्तचेतसो मेऽद्योपि ज्ञानातिशयो नोत्पद्यत इति अनभिसंदधतोऽज्ञानपरीषहजयो-
ऽवगन्तव्यः ।
§ ८३६. परमवैराग्यभावनाशुद्धहृदयस्य विदितसकलपदार्थतत्त्वस्यार्हदायतनसाधुधर्मपूजकस्य
चिरन्तनप्रव्रजितस्याद्यापि मे ज्ञानातिशयो नोत्पद्यते । महोपवासाद्यनुष्ठायिनां प्रातिहार्यविशेषाः
सम्यक्चारित्ररूपी विमल जलके प्रक्षालन द्वारा जो कर्ममलपंकको दूर करनेके लिए निरन्तर
१५ उद्यतमति है उसके मलपीडासहन कहा गया है ।
§ ८३३. सत्कारका अर्थ पूजा-प्रशंसा है । तथा क्रिया-आरम्भ आदिकमें आगे करना या
आमन्त्रण देना पुरस्कार है । इस विषयमें यह मेरा अनादर करता है । चिरकालसे मैंने ब्रह्मचर्य-
का पालन किया है, मैं महातपस्वी हूँ, स्वसमय और परसमयका निर्णयज्ञ हूँ, मैंने बहुत बार पर-
वादियोंको जीता है तो भी कोई मुझे प्रणाम और भक्ति नहीं करता और उत्साहसे आसन नहीं
२० देता, मिथ्यादृष्टि ही अत्यन्त भक्तिवाले होते हैं, कुछ नहीं जाननेवालेको भी सर्वज्ञ समझ कर
आदर सत्कार करके अपने समयकी प्रभावना करते हैं, व्यन्तरादिक पहले अत्यन्त उग्र तप करने-
वालोंकी प्रत्यग्र पूजा रचते थे यह यदि मिथ्या श्रुति नहीं है तो इस समय वे हमारे समान तप-
स्वियोंकी क्यों नहीं करते हैं इस प्रकार खोटे अभिप्रायसे जिसका चित्त रहित है उसके सत्कार-
पुरस्कारपरीषहजय जानना चाहिए ।
२५ § ८३४. मैं अङ्ग, पूर्व और प्रकीर्णक शास्त्रोंमें विशारद हूँ तथा शब्दशास्त्र, न्यायशास्त्र
और अध्यात्मशास्त्रमें निपुण हूँ। मेरे आगे दूसरे जन सूर्यकी प्रभासे अभिभूत हुए खद्योतके उद्योत-
के समान बिलकुल नहीं सुशोभित होते हैं इस प्रकार विज्ञानमदका निरास होना प्रज्ञापरीषहजय
जानना चाहिए।
§ ८३५. यह मूर्ख है, कुछ नहीं जानता है, पशुके समान है इत्यादि तिरस्कारके वचनोंको
३० मैं सहन करता हूँ, मैंने परम दुश्चर तपका अनुष्ठान किया है, मेरा चित्त निरन्तर अप्रमत्त रहता
है, तो भी मेरे अभी तक भी ज्ञानका अतिशय नहीं उत्पन्न हुआ है इस प्रकार विचार नहीं करने-
वालेके अज्ञानपरीषहजय जानना चाहिए ।
§ ८३६. परम वैराग्यकी भावनासे मेरा हृदय शुद्ध है, मैंने समस्त पदार्थोंके रहस्यको जान
लिया है, मैं अरहन्त, आयतन, साधु और धर्मका उपासक हूँ, चिरकालसे मैं प्रव्रजित हूँ तो भी
३५ मेरे अभी ज्ञानातिशय नहीं उत्पन्न हुआ है। महोपवास आदिका अनुष्ठान करनेवालोंके प्रातिहार्य-
१. -दरोऽपि क्रि-मु० । २. स्वशासनप्रभा-ता० । ३. -जयः प्रतिज्ञा-मु० । ४. -द्यवक्षेप-मु० । -द्यविक्षेप-
दि० १, दि० २ । ५. मेऽद्यत्त्वेऽपि विज्ञा-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

प्रादुर्भूवन्निति प्रलापमात्रमनर्थकेयं प्रव्रज्या । विफलं व्रतपरिपालनमित्येवमसमाधानस्य दर्शन-
विशुद्धियोगाददर्शनपरिषहसहनमवसातव्यम् ।
§ ८३७. एवं परिषहान्¹ असंकल्पोपस्थितान् सहमानस्यासंक्लिष्टचेतसो रागादिपरिणामास्र-
वनिरोधान्महान् संवरो भवति ।
§ ८३८. आह, किमिमे परिषहाः सर्वे संसारमहाटवीमतिक्रमितुमभ्युद्यतमभिद्रवन्ति उत
कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—अमी व्याख्यातलक्षणाः क्षुदादयश्चारित्रान्तराणि प्रति भाज्याः ।
नियमेन पुनरनयोः प्रत्येतव्याः—
सूक्ष्म सांपरायछद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश ॥१०॥
§ ८३९. क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकचर्याशय्यावधालाभरोगतृणस्पर्शमलप्रज्ञाज्ञानानि । 'चतु-
र्दश' इति वचनादन्येषां परिषहाणामभावो वेदितव्यः । आह युक्तं तावद्वीतरागच्छद्मस्थे मोहनीया-
भावात्³ तत्कृतवक्ष्यमाणाष्टपरिषहाभावाच्चतुर्दशनियमवचनम् । सूक्ष्मसांपराये तु मोहोदयसद्-
भावात् 'चतुर्दश' इति नियमो नोपपद्यत इति । तदयुक्तम्; सन्मात्रत्वात् । तत्र हि केवलं⁴ लोभ-
संज्वलनकषायोदयः सोऽप्यतिसूक्ष्मः । ततो वीतरागच्छद्मस्थकल्पत्वात् 'चतुर्दश' इति नियमस्तत्रापि
युज्यते । ननु मोहोदयसहायाभावान्मन्दोदयत्वाच्च क्षुदादिवेदनाभावात्तत्सहनकृतपरिषहव्यपदेशो
विशेष उत्पन्न हुए यह प्रलापमात्र है, यह प्रव्रज्या अनर्थक है, व्रतोंका पालन करना निरर्थक है
इत्यादि बातोंका दर्शनविशुद्धिके योगसे मनमें नहीं विचार करनेवालेके अदर्शनपरिषहसहन जानना
चाहिए ।
§ ८३७. इस प्रकार जो संकल्पके बिना उपस्थित हुए परीषहोंको सहन करता है और
जिसका चित्त संक्लेश रहित है उसके रागादि परिणामोंके आस्रवका निरोध होनेसे महान् संवर
होता है ।
§ ८३८. संसाररूपी महा अटवीको उल्लंघन करनेके लिए उद्यत हुए पुरुषको क्या ये सब
परीषह प्राप्त होती हैं या कोई विशेषता है इसलिए यहाँ कहते हैं—जिनके लक्षण कह आये हैं
ऐसे ये क्षुधादिक परीषह अलग-अलग चारित्रके प्रति विकल्पसे होते हैं । उसमें भी इन दोनोंमें
नियमसे जानने योग्य—
सूक्ष्मसाम्पराय और छद्मस्थवीतरागके चौदह परीषह सम्भव हैं ॥१०॥
§ ८३९. क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श,
मल, प्रज्ञा और अज्ञान ये चौदह परीषह हैं । सूत्रमें आये हुए 'चतुर्दश' इस वचनसे अन्य परीषहों-
का अभाव जानना चाहिए । शंका—वीतरागच्छद्मस्थके मोहनीयके अभावसे तत्कृत आगे कहे
जानेवाले आठ परीषहोंका अभाव होनेसे चौदह परीषहोंके नियमका वचन तो युक्त है, परन्तु
सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें मोहनीयका उदय होनेसे चौदह परीषह होते हैं यह नियम नहीं बनता ।
समाधान—यह कहना अयुक्त है, क्योंकि वहाँ मोहनीयकी सत्तामात्र है । वहाँपर केवल लोभ-
संज्वलन कषायका उदय होता है और वह भी अतिसूक्ष्म होता है इसलिए वीतराग छद्मस्थके
समान होनेसे सूक्ष्मसाम्परायमें भी चौदह परीषह होते हैं यह नियम बन जाता है। शंका—इन
स्थानोंमें मोहके उदयकी सहायता नहीं होनेसे और मन्द उदय होनेसे क्षुधादि वेदनाका अभाव है
१. –षहान् सह-मु० । २. वेयणीयभवाए ए पन्नाणाणा उ आइमे । अट्ठमंमि अलाभोत्थो छउमत्थे चोद्दस ॥'
–पञ्चसं० द्वा०४, गा० २२ । ३. मुद्रितप्रतौ मोहनीयाभावाद्वक्ष्यमाणान्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशायाचनासत्कार-
पुरस्कारादर्शनानि तत्कृताष्ट-इति पाठः । लिखितप्रतिषु च तथैव । परं नासौ सम्यक् प्रतिभाति संशोधित-
पाठस्तु तत्त्वार्थवार्तिकपाठानुसारी इति सोऽत्र योजितः । ४. केवललोभ-मु० ।

३२८ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।११ § ८४० -
न युक्तिमवतरति । तन्न । किं कारणम् । शक्तिमात्रस्य विवक्षितत्वात् । सर्वार्थसिद्धिदेवस्य सप्तम-
पृथिवीगमनसामर्थ्यव्यपदेशवत् ।
§ ८४०. आह, यदि शरीरवत्यात्मनि परिषहसंनिधानं प्रतिज्ञायते अथ भवति उत्पन्न-
केवलज्ञाने कर्मचतुष्टयफलानुभवनवशवर्तिनि कियन्त उपनिपतन्तीत्यत्रोच्यते । तस्मिन्पुनः—
एकादश जिने ॥११॥
§ ८४१. निरस्तघातिकर्मचतुष्टये जिने वेदनीयसद्भावात्तदाश्रया एकादशपरीषहाः सन्ति ।
ननु च² मोहनीयोदयसहायाभावात्क्षुदादिवेदनाभावे परिषहव्यपदेशो न युक्तः । सत्यमेवमेतत्—
वेदनाभावेऽपि द्रव्यकर्मसद्भावापेक्षया परिषहोपचारः क्रियते, निरवशेषनिरस्तज्ञानातिशये चिन्ता-
निरोधाभावेऽपि तत्फलकर्मनिर्हरणफलापेक्षया ध्यानोपचारवत् । अथवा—एकादश जिने 'न सन्ति'
इति वाक्यशेषः कल्पनीयः; सोपस्कारत्वात्सूत्राणाम् । "कल्प्यो हि³ वाक्यशेषो वाक्यं च वक्तर्यधीनम्"
इत्युपगमात् मोहोदयसहायीकृतक्षुदादि⁴वेदनाभावात् 'न सन्ति' इति वाक्यशेषः ।
इसलिए इनके कार्यरूपसे 'परीषह' संज्ञा युक्तिको नहीं प्राप्त होती । समाधान—ऐसा नहीं है,
क्योंकि यहाँ शक्तिमात्र विवक्षित है। जिस प्रकार सर्वार्थसिद्धिके देवके सातवीं पृथिवीके गमनके
सामर्थ्यका निर्देश करते हैं उसी प्रकार यहाँ भी जानना चाहिए ।
§ ८४०. यदि शरीरवाले आत्मामें परीषहोंके सन्निधानकी प्रतिज्ञा की जाती है तो केवल-
ज्ञानको प्राप्त और चार कर्मोंके फलके अनुभवके वशवर्ती भगवान्के कितने परीषह प्राप्त होते हैं
इसलिए यहाँ कहते हैं। उनमें तो—
जिनमें ग्यारह परीषह सम्भव हैं ॥११॥
§ ८४१. जिन्होंने चार घातिया कर्मोंका नाश कर दिया है ऐसे जिन भगवान्में वेदनीय-
कर्मका सद्भाव होनेसे तन्निमित्तक ग्यारह परीषह होते हैं । शंका—मोहनीयके उदयकी सहायता
न होनेसे क्षुधादि वेदनाके न होनेपर परीषह संज्ञा युक्त नहीं हैं । समाधान—यह कथन सत्य ही है
तथापि वेदनाका अभाव होनेपर भी द्रव्यकर्मके सद्भावकी अपेक्षासे यहाँ परीषहोंका उपचार किया
जाता है । जिस प्रकार समस्त ज्ञानावरणके नाश हो जानेपर एक साथ समस्त पदार्थोंके रहस्यको
प्रकाशित करनेवाले केवलज्ञानातिशयके होनेपर चिन्ता-निरोधका अभाव होनेपर भी कर्मोंके नाश
रूप उसके फलकी अपेक्षा ध्यानका उपचार किया जाता है उसी प्रकार यहाँ परीषहोंका उपचारसे
कथन जानना चाहिए, अथवा जिन भगवान्में ग्यारह परीषह 'नहीं हैं' इतना वाक्यशेष कल्पित
कर लेना चाहिए क्योंकि सूत्र उपस्कारसहित होते हैं । 'वाक्य शेषकी कल्पना करनी चाहिए और
वाक्य वक्ताके अधीन होता है' ऐसा स्वीकार भी किया गया है। मोहके उदयकी सहायतासे
होनेवाली क्षुधादि वेदनाओंका अभाव होनेसे 'नहीं हैं' यह वाक्यशेष उपन्यस्त किया गया है ।
विशेषार्थ—जिन भगवान्के असाता वेदनीयका उदय होता है और यह क्षुधादि वेदनाका
कारण है इसलिए यहाँ जिन भगवान्के कारणकी दृष्टिसे क्षुधादि ग्यारह परीषह कहे जातें हैं । पर
क्या सचमुचमें जिन भगवान्के क्षुधादि ग्यारह परीषह होते हैं यह एक प्रश्न है जिसका समाधान
टीकामें दो प्रकारसे किया है। पहले तो जिन भगवान्के क्षुधादि परीषहोंके होनेके कारणके
सद्भावकी अपेक्षा उनके अस्तित्वका निर्देश किया है पर कार्यरूपमें ये क्षुधादि ग्यारह परीषह जिन
भगवान्के नहीं होते इसलिए इस दृष्टिसे 'न सन्ति' इस वाक्यशेषकी योजना कर वहाँ उनका निषेध
१. 'खुप्पिवामुण्हसीयाणि सेज्जा रोगो वहो मलो । तणफासो चरीया य दंसेक्कारस जोगिसु ॥'-पञ्चसं० द्वा०
४, गा०, २२ । २. ननु मोह-मु० । ३. 'कल्प्यो हि वाक्यशेषो वाक्यं वक्तर्यधीनं हि'-पा० म० भा० १,
१, ८ । ४. -भावात् । आह मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

  • ९।१२ § ८४३ ] नवमोऽध्यायः ३२९
    § ८४२. आह, यदि सूक्ष्मसांपरायादिषु व्यस्ताः परिषहाः अथ समस्ताः¹ ताः क्वेति—
    ²बादरसांपराये सर्वे ॥१२॥
    § ८४३. सांपरायः कषायः । बादरः सांपरायो यस्य स बादरसांपराय इति । नेदं
    किया है । अब यहाँ यह देखना है कि जिन भगवान्के क्षुधादि ग्यारह परीषह नहीं होते यह कैसे
    समझा जाय । वे इस कालमें पाये तो जाते नहीं, इसलिए प्रत्यक्ष देखकर तो यह जाना नहीं जा
    सकता । एक मात्र आगमको पुष्ट करनेवाली युक्तियां ही शेष रहती हैं जिनके अवलम्बनसे यह
    बात समझी जा सकती है, अतः यहाँ उन्हींका निर्देश करते हैं—
    १. केवली जिनके शरीरमें निगोद और त्रस जीव नहीं रहते । उनका क्षीणमोह गुणस्थान
    में अभाव होकर वे परम औदारिक शरीरके धारी होते हैं । अतः भूख, प्यास और रोगादिकका
    कारण नहीं रहनेसे उन्हें भूख, प्यास और रोगादिककी बाधा नहीं होती । देवोंके शरीरमें इन
    जीवोंके न होनेसे जो विशेषता होती है उससे अनन्तगुणी विशेषता इनके शरीरमें उत्पन्न हो
    जाती है । २. श्रेणि आरोहण करने पर प्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्तगुणा बढ़ता
    जाता है और अप्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभाग प्रति समय अनन्तगुणा हीन होता जाता है । इसलिए
    तेरहवें गुणस्थानमें होनेवाला असाता प्रकृतिका उदय इतना बलवान् नहीं होता जिससे उसे
    क्षुधादि कार्योंका सूचक माना जा सके । ३. असाताकी उदीरणा छठे गुणस्थान तक ही होती है,
    आगे नहीं होती, इसलिए उदीरणाके अभावमें वेदनीय कर्म क्षुधादिरूप कार्यका वेदन करानेमें
    असमर्थ है । जब कि केवली जिनके शरीरको पानी और भोजनकी ही आवश्यकता नहीं रहती
    तब इनके न मिलनेसे जो क्षुधा और तृषा होती है वह उनके हो ही कैसे सकती है । वेदनीय
    कर्मका कार्य कुछ शरीरमें पानी तत्त्व और भोजन तत्त्वका अभाव करना नहीं है । वास्तवमें
    इनका अभाव अन्य कारणोंसे होता है । हाँ, इनका अभाव होनेपर इनकी पूर्तिके लिए जो वेदना
    होती है वह वेदनीय कर्मका काम है । सो जब कि केवली जिनके शरीरको उनकी आवश्यकता
    ही नहीं रहती, तब वेदनीयके निमित्तसे तज्जनित वेदना कैसे हो सकती है ? अर्थात् नहीं हो
    सकती । ४. केवली जिनके साताका आस्रव सदाकाल होनेसे उसकी निर्जरा भी सदाकाल
    होती रहती है, इसलिए जिस कालमें असाताका उदय होता है उस कालमें केवल उसका
    ही उदय नहीं होता किन्तु अनन्तगुणी शक्तिवाले साताके साथ वह उदयमें आता है । माना
    कि उस समय उसका स्वमुखेन उदय है पर वह प्रति समय बँधनेवाले साता कर्मपरमाणुओंकी
    निर्जराके साथ ही होता है, इसलिए असाताका उदय वहाँ क्षुधादिरूप वेदनाका कारण नहीं
    हो सकता । ५. सुख दुखका वेदन वेदनीय कर्मका कार्य होने पर भी वह मोहनीयकी सहायतासे
    ही होता है। यतः केवली जिनके मोहनीयका अभाव होता है अतः वहाँ क्षुधादिरूप वेदनाओंका
    सद्भाव मानना युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता । इन प्रमाणोंसे निश्चित होता है कि केवली जिनके
    क्षुधादि ग्यारह परीषह नहीं होते ।
    § ८४२. कहते हैं—यदि सूक्ष्मसाम्पराय आदि में अलग-अलग परीषह होते हैं तो मिलकर
    वे कहाँ होते हैं, यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    बादरसाम्परायमें सब परीषह सम्भव हैं ॥१२॥
    § ८४३. साम्पराय कषायको कहते हैं । जिसके साम्पराय बादर होता है वह बादर-
    १. समस्ताः क्वेति मु० । २. 'निसेज्जा जायणाकोसो अरई इत्थिनग्गया । सक्कारो दंसणं मोहा
    बावीसा चेव रागिसु ।।' -पञ्चसं० द्वा० ४, गा० २३ ।
    ४२ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३३० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।१३ § ८४४ –
गुणस्थानविशेषग्रहणम् । किं तर्हि । अर्थनिर्देशः । तेन प्रमत्तादीनां संयतानां ग्रहणम् । तेषु हि
अक्षीणकषायदोषत्वात्सर्वे संभवन्ति । कस्मिन् पुनश्चारित्रे सर्वेषां संभवः । सामायिकच्छेदो-
पस्थापनपरिहारविशुद्धिसंयमेषु प्रत्येकं सर्वेषां संभवः ।
§ ८४४. आह, गृहीतमेतत्परीषहाणां स्थानविशेषावधारणम्, इदं तु न विद्मः कस्याः प्रकृतेः
५ कः कार्य इत्यत्रोच्यते—
ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने ॥१३॥
§ ८४५. इदमयुक्तं वर्तते । किमत्रायुक्तम् । ज्ञानावरणे सत्यज्ञानपरीषह उपपद्यते, प्रज्ञापरी-
षहः पुनस्तदपाये भवतीति कथं ज्ञानावरणे स्यात् । इत्यत्रोच्यते—क्षायोपशमिकी प्रज्ञा अन्यस्मिन्
ज्ञानावरणे सति मदं जनयति न सकलावरणक्षये इति ज्ञानावरणे सतीत्युपपद्यते ।
१० साम्पराय कहलाता है। यह गुणस्थान विशेषका ग्रहण नहीं है। तो क्या है ? सार्थंकनिर्देश है।
इससे प्रमत्त आदिक संयतोंका ग्रहण होता है। इनमें कषाय और दोषोंके क्षीण न होनेसे सब
परीषह सम्भव हैं। शंका—तो किस चारित्रमें सब परीषह सम्भव हैं ? समाधान—सामायिक,
छेदोपस्थापना और परिहारविशुद्धिसंयम इनमेंसे प्रत्येकमें सब परीषह सम्भव हैं।
विशेषार्थ—बादरसाम्पराय अनिवृत्तिकरण नामक नौवें गुणस्थानका दूसरा नाम है। नौवे
१५ गुणस्थान तक स्थूल कषायका सद्भाव होता है, इसलिए अन्तदीपक न्यायसे इस गुणस्थानका नाम
भी बादरसम्पराय है। यहाँ 'बादरसाम्पराय' पदसे इस गुणस्थानका ग्रहण न हो इसीलिए टीकामें
इसका निषेध किया है, क्योंकि बादरसाम्परायमें तो बाईस परीषह सम्भव हैं, बादरसाम्पराय
नामक नौवें गुणस्थानमें नहीं। कारण कि इस गुणस्थानमें दर्शनमोहनीयका उदय नहीं होता।
दर्शनमोहनीयके तीन भेद हैं। उनमेंसे सम्यक्त्वमोहनीयका उदय सातवें गुणस्थान तक ही सम्भव
२० है, क्योंकि यहीं तक वेदक सम्यक्त्व होता है, इसलिए यहाँ पर बादरसाम्पराय अर्थात् स्थूल
कषायमें सब परीषह सम्भव हैं यही अर्थ लेना चाहिए।
§ ८४४. कहते हैं—इन परीषहोंके स्थानविशेषका अवधारण किया, किन्तु हम यह नहीं
जानते कि किस प्रकृतिका क्या कार्य है इसलिए यहाँपर यह कहते हैं—
ज्ञानावरणके सद्भावमें प्रज्ञा और अज्ञान परीषह होते हैं ॥१३॥
२५ § ८४५. शंका—यह अयुक्त है ? प्रतिशंका—यहाँ क्या अयुक्त है। शंका—माना कि
ज्ञानावरणके होनेपर अज्ञान परीषह उत्पन्न होता है परन्तु प्रज्ञा परीषह उसके अभावमें होता है
इसलिए वह ज्ञानावरणके सद्भावमें कैसे हो सकता है ? समाधान—यहाँ कहते हैं—क्षायोपशमिकी
प्रज्ञा अन्य ज्ञानावरणके होनेपर मदको उत्पन्न करती है, समस्त ज्ञानावरणके क्षय होनेपर नहीं,
इसलिए ज्ञानावरणके होनेपर प्रज्ञा परीषह होती है यह कथन बन जाता है ।
३० विशेषार्थ—विकल्पका अर्थ श्रुतज्ञान है, इसलिए जहाँ तक श्रुतज्ञान होता है वहाँ तक 'मैं
अधिक जानता हूँ, यह कुछ भी नहीं जानता' ऐसा विकल्प देखा जाता है। यद्यपि इस प्रकारका
विकल्प करनेवाले व्यक्तिको अधिक ज्ञानका लाभ ज्ञानावरण कर्मके प्रकृष्ट क्षयोपशमसे होता है
तथापि जबतक क्षायोपशमिक ज्ञान होता है तभी तक यह विकल्प होता है और क्षायोपशमिक
ज्ञान उदयसापेक्ष होता है इसलिए यहाँ पर इस प्रकारके विकल्पका मुख्य कारण ज्ञानावरण कर्मका
३५ उदय कहा है। बहुतसे जीवोंको मोहका उदय रहते हुए भी ऐसा भाव होता है कि 'मैं महाप्राज्ञ हूँ,
मेरी बराबरी करनेवाला अन्य कोई नहीं।' पर यहाँ मोहके उदयसे होनेवाले इस भावका ग्रहण
१. अक्षीणकषायत्वात्सर्व- आ०, दि०, मु०, ता०, वा० । २. प्रत्येकं सर्व-आ०, दि०, मु०, ता० ।

  • ९।१५ § ८४८ ] नवमोऽध्यायः ३३१
    § ८४६. पुनरपरयोः परिषहयोः प्रकृतिविशेषनिर्देशार्थमाह—
    दर्शनमोहान्तराययोर्दर्शनालाभौ ॥१४॥
    § ८४७. यथासंख्यमभिसंबन्धः । दर्शनमोहे अदर्शनपरिषहो, लाभान्तराये अलाभपरिषह
    इति । आह, यद्याद्ये मोहनीयभेदे एकः परिषहः, अथ द्वितीयस्मिन् कति भवन्तीत्यत्रोच्यते—
    चारित्रमोहे नाग्न्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशायाचनासत्कारपुरस्काराः ॥१५॥ ५
    § ८४८. पुंवेदोदयादिनिमित्तत्वान्नाग्न्यादिपरिषहाणां मोहोदयनिमित्तत्वं प्रतिपद्यामहे ।
    नहीं किया है। यहाँ तो अपनी अज्ञानतावश जो अल्पज्ञानको महाज्ञान माननेका विकल्प होता है
    उसीका ग्रहण किया है। इस प्रकार ज्ञानावरणके सद्भावमें प्रज्ञा और अज्ञान दो परीषह होते हैं
    यह निश्चित होता है ।
    § ८४६. पुनः अन्य दो परीषहोंकी प्रकृति विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र १०
    कहते हैं—
    दर्शनमोह और अन्तरायके सद्भावमें क्रमसे अदर्शन और अलाभ परीषह होते हैं ॥१४॥
    इस सूत्रमें 'यथासंख्य' पदका सम्बन्ध होता है। दर्शनमोहके सद्भावमें अदर्शन परीषह
    होता है और लाभान्तरायके सद्भावमें अलाभ परीषह होता है।
    विशेषार्थ—दर्शनमोहसे यहाँ सम्यक्त्वमोहनीय प्रकृति ली गयी है। इसका उदय रहते हुए १५
    चल, मल और अगाढ़ दोष उत्पन्न होते हैं। सम्यक्त्वके रहते हुए भी आप्त, आगम और पदार्थोंके
    विषयमें नाना विकल्प होना चल दोष है। जिस प्रकार जलके स्वस्थ होते हुए भी उसमें वायुके
    निमित्तसे तरंगमाला उठा करती है उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि पुरुष यद्यपि अपने स्वरूपमें स्थित
    रहता है तथापि सम्यक्त्व मोहनीयके उदयसे आप्त, आगम और पदार्थोंके विषयमें उसकी बुद्धि
    चलायमान होती रहती है। यही चल दोष है। मलका अर्थ मैल है। शंकादि दोषोंके निमित्तसे २०
    सम्यग्दर्शनका मलिन होना मल दोष है। यह भी सम्यक्त्व मोहनीयके उदयमें होता है। तथा
    अगाढका अर्थ स्थिर न रहना है। सम्यग्दृष्टि जीव लौकिक प्रयोजनवश कदाचित् तत्त्वसे चलाय-
    मान होने लगता है। उदाहरणार्थ—अन्य अन्यका कर्ता नहीं होता यह सिद्धान्त है और
    सम्यग्दृष्टि इसे भले प्रकार जानता है पर रागवश वह इस सिद्धान्त पर स्थिर नहीं रह पाता।
    वह पारमार्थिक कार्यको भी लौकिकप्रयोजनका प्रयोजक मान बैठता है। इस प्रकार सम्यक्त्व २५
    मोहनीयके उदयसे ये तीन दोष होते हैं। ये तीनों एक हैं फिर भी भिन्न-भिन्न अभिप्रायकी दृष्टिसे
    यहाँ इन्हें पृथक्-पृथक् रूपसे परिगणित किया है। प्रकृतमें इसी दोषको ध्यानमें रखकर अदर्शन
    परीषहका निर्देश किया है। यह दर्शनमोहनीयके उदयसे होता है इसलिए इसे दर्शनमोहनीयका
    कार्य कहा है। भोजनादि पदार्थोंका न प्राप्त होना अन्य बात है पर भोजनादि पदार्थोंके न मिलने
    पर जिसके 'अलाभ' परिणाम होता है उसका वह परिणाम लाभान्तराय कर्मका कार्य होनेसे ३०
    अलाभको लाभान्तराय कर्मका कार्य कहा है। परके लाभको स्वका लाभ मानना मिथ्यात्व
    दर्शनमोहनीयका कार्य है इसलिए यहाँ इसकी विवक्षा नहीं है। यहाँ तो अलाभ परिणाम किसके
    उदयमें होता है इतना ही विचार किया गया है। इस प्रकार अदर्शनभाव मोहनीय कर्मका और
    अलाभभाव लाभान्तराय कर्मका कार्य है यह निश्चित होता है।
    § ८४७. कहते हैं—यदि आदिके मोहनीयके भेदके होनेपर एक परीषह होता है तो दूसरे ३५
    भेदके होनेपर कितने परीषह होते हैं इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    चारित्रमोहके सद्भावमें नाग्न्य, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कारपुर-
    स्कार परीषह होते हैं ॥१५॥
    § ८४८. शंका—नाग्न्यादि परीषह पुंवेदोदय आदिके निमित्तसे होते हैं इसलिए मोहोदयको

३३२ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।१६ § ८४९ –
निषद्यापरीषहस्य कथम् । तत्रापि प्राणिपीडापरिहारार्थत्वात् । मोहोदये सति प्राणिपीडापरिणामः
संजायत इति ।
§ ८४९. अवशिष्टपरीषहप्रकृतिविशेषप्रतिपादनार्थमाह—
वेदनीये शेषाः ॥१६॥
§ ८५०. उक्ता एकादश परीषहाः । तेभ्योऽन्ये शेषाः वेदनीये सति 'भवन्ति' इति वाक्यशेषः ।
के पुनस्ते । क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकचर्याशय्यावधरोगतृणस्पर्शमलपरीषहाः ।
§ ८५१. आह, व्याख्यातनिमित्तलक्षणविकल्पाः प्रत्यात्मनि प्रादुर्भवन्तः कति युगपदवतिष्ठन्त
इत्यत्रोच्यते—
एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नैकान्नविंशतेः ॥१७॥
उनका निमित्त कहते हैं पर निषद्यापरीपह मोहोदयके निमित्तसे कैसे होता है ? समाधान—उसमें
भी प्राणिपीडाके परिहारकी मुख्यता होनेसे वह मोहोदय निमित्तक माना गया है, क्योंकि मोहोदय-
के होनेपर प्राणिपीडारूप परिणाम होता है ।
विशेषार्थ—आगे चर्या और शय्याको वेदनीयनिमित्तक कहा है और यहाँ निषद्याको
मोहनीयनिमित्तक । ये तीनों परीषह एक श्रेणीके हैं । फिर क्या कारण है कि इनमें-से निषद्याको
मोहोदय निमित्तक कहा है । यदि चर्या और शय्या परीषह वेदनीयनिमित्तक होते हैं तो इसे
वेदनीयनिमित्तक क्यों नहीं माना जाता । यह एक प्रश्न है जिसका उत्तर टीकामें दिया है । वहाँ
बतलाया है कि प्राणिपीडारूप परिणाम मोहोदयसे होता है और निषद्यापरीषहजयमें इस प्रकारके
परिणामपर विजय पानेकी मुख्यता है । यही कारण है कि निषद्याको चारित्रमोहनिमित्तक माना
है । माना कि इस विवक्षासे चर्या और शय्या परीषहको भी मोहोदयनिमित्तक मान सकते थे पर
वहाँ कण्टकादिकके निमित्तसे होनेवाली वेदनाकी मुख्यता करके उक्त दोनों परीषह वेदनीयनिमित्तक
कहे हैं । तात्पर्य यह है कि चर्या, शय्या और निषद्या इनमें प्राणिपोड़ा और कण्टकादिनिमित्तक
वेदना ये दोनों कार्य सम्भव हैं। इसलिए इन दोनों कार्योंका परिज्ञान करानेके लिए निषद्याको
मोहनिमित्तक और शेष दोको वेदनीयनिमित्तक कहा है ।
§ ८४९. अब अवशिष्ट परीषहोंकी प्रकृति विशेषका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
बाकीके सब परीषह वेदनीयके सद्भावमें होते हैं ॥१६॥
§ ८५०. ग्यारह परीषह पहले कह आये हैं । उनसे अन्य शेष परीषह हैं । वे वेदनीयके
सद्भावमें होते हैं। यहां 'भवन्ति' यह वाक्यशेष है । शंका—वे कौन-कौन हैं ? समाधान—क्षुधा,
पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या. वध, रोग, तृणस्पर्श और मलपरीषह ।
विशेषार्थ—शरीरमें भोजनका कम होना, पानीका कम होना. कण्ठका सूखना, ऋतुमें
ठण्डी या गरमीका होना, डांस-मच्छरका काटना, गमन व शयन करते समय कण्टक आदिका
चुभना, किसीके द्वारा मारना, गाली-गलौज करना, शरीरमें रोगका होना, तिनका आदिका
चुभना और शरीरमें मलका जमा होना आदि अपने-अपने कारणोंसे होते हैं। इनका कारण
वेदनीय कर्मका उदय नहीं है पर इन कामोंके होने पर भूखकी वेदना होती है, प्यास लगती है
आदि वह वेदनीय कर्मका कार्य है । ऐसा यहाँ अभिप्राय समझना चाहिए ।
§ ८५१. कहते हैं, परीषहोंके निमित्त, लक्षण और भेद कहे । प्रत्येक आत्मामें उत्पन्न होते
हुए वे एक साथ कितने हो सकते हैं, इस बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
एक साथ एक आत्मामें एकसे लेकर उन्नीस तक परीषह विकल्पसे हो सकते हैं ॥१७॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

  • ९।१८ ६ ८५४ ] नवमोऽध्यायः ३३३
    § ८५२. आङभिविध्यर्थः । तेन एकोनविंशतिरपि क्वचित् युगपत्संभवतीत्यवगम्यते ।
    तत्कथमिति चेदुच्यते - शीतोष्णपरीषहयोरेकः शय्यानिषद्याचर्याणां $^१$चान्यतम एव भवति एक-
    स्मिन्नात्मनि । कुतः । विरोधात् । तत्रयाणामपगमे युगपदेकात्मनीतरेषां संभवादेकोनविंशति-
    विकल्पा$^२$ बोद्धव्याः । ननु प्रज्ञाज्ञानयोरपि विरोधाद्युगपदसंभवः । श्रुतज्ञानापेक्षया प्रज्ञापरीषहः
    अवधिज्ञानाद्यभावापेक्षया अज्ञानपरीषह इति नास्ति विरोधः ।
    § ८५३. आह, उक्ता गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयाः संवरहेतवः पञ्च । संवरहेतुश्चा-
    रित्रसंज्ञो वक्तव्य इति तद्भेदप्रदर्शनार्थमुच्यते—
    सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययथाख्यातमिति
    चारित्रम् ॥१८॥
    § ८५४. अत्र चोद्यते - दशविधे धर्मे संयम उक्तः स एव चारित्रमिति पुनर्ग्रहणमनर्थक- १०
    मिति । नानर्थकम्; धर्मेऽन्तर्भूतमपि चारित्रमन्ते गृह्यते मोक्षप्राप्तेः साक्षात्कारणमिति ज्ञापनार्थम् ।
    सामायिकमुक्तम् । क्व । 'दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिक-' इत्यत्र । तद् द्विविधं नियतकालम-
    नियतकालं च । स्वाध्यायादि नियतकालम् । ईर्यापथाद्यनियतकालम्$^४$ । प्रमादकृतानर्थप्रबन्ध-
    विलोपे सम्यक्प्रतिक्रिया छेदोपस्थापना विकल्पनिवृत्तिर्वा । परिहरणं परिहारः प्राणिवधान्निवृत्तिः ।
    § ८५२. यहाँ 'आङ्' अभिविधि अर्थ में आया है। इससे किसी एक आत्मामें एक साथ उन्नीस १५
    भी सम्भव हैं यह ज्ञात होता है। शंका-यह कैसे ? समाधान-एक आत्मामें शीत और उष्ण
    परीषहोंमें-से कोई एक तथा शय्या, निषद्या और चर्या इनमें-से कोई एक परीषह ही होते हैं, क्योंकि
    शीत और उष्ण इन दोनोंके तथा शय्या, निषद्या और चर्या इन तीनोंके एक साथ होनेमें विरोध
    आता है। इन तीनोंके निकाल देनेपर एक साथ एक आत्मामें इतर परीषह सम्भव होनेसे वे सब
    मिलकर उन्नीस परीषह जानना चाहिए। शंका-प्रज्ञा और अज्ञान परीषहमें भी विरोध है, इस- २०
    लिए इन दोनों का एक साथ होना असम्भव है ? समाधान - एक साथ एक आत्मामें श्रुतज्ञानकी
    अपेक्षा प्रज्ञा परीषह और अवधिज्ञान आदिके अभावकी अपेक्षा अज्ञान परीषह रह सकते हैं इसलिए
    कोई विरोध नहीं है।
    § ८५३. कहते हैं, गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा और परीषहजय ये पाँच संवरके हेतु कहे ।
    अब चारित्रसंज्ञक संवरका हेतु कहना चाहिए इसलिए उसके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र २५
    कहते हैं-
    सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात यह पाँच
    प्रकारका चारित्र है ॥१८॥
    § ८५४. शंका-दश प्रकारके धर्ममें संयमका कथन कर आये हैं और वह ही चारित्र है
    इसलिए उसका फिरसे ग्रहण करना निरर्थक है ? समाधान-निरर्थक नहीं है, क्योंकि धर्ममें ३०
    अन्तर्भाव होनेपर भी चारित्र मोक्ष-प्राप्तिका साक्षात् कारण है यह दिखलानेके लिए उसका अन्तमें
    ग्रहण किया है। सामायिकका कथन पहले कर आये हैं। शंका-कहाँ पर ? समाधान- 'दिग्देशा-
    नर्थदण्डविरतिसामायिक'- इस सूत्रका व्याख्यान करते समय । वह दो प्रकारका है—नियतकाल
    और अनियतकाल । स्वाध्याय आदि नियतकाल सामायिक है और ईर्यापथ आदि अनियतकाल
    सामायिक है। प्रमादकृत अनर्थप्रबन्धका अर्थात् हिंसादि अव्रतोंके अनुष्ठानका विलोप अर्थात् सर्वथा ३५
    त्याग करनेपर जो भले प्रकार प्रतिक्रिया अर्थात् पुनः व्रतोंका ग्रहण होता है वह छेदोपस्थापना
    १. -चर्याणामन्यतम मु० । २. कल्पो बोद्धव्यो । ननु आ०, दि० १, दि० २ । ३. - ज्ञानापेक्षया मु० ।
    ४. -कालञ्च । प्रमा-ता० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri