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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 558 में से

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पृष्ठ 435
  • ९।९ § ८२५ ] नवमोऽध्यायः ३२३
    § ८२३. दीर्घकालमुषितगुरुकुलब्रह्मचर्यस्याधिगतबन्धमोक्षपदार्थतत्त्वस्य संयमायतनभक्ति-
    हेतोर्देशान्तरातिथेर्गुरुणाभ्यनुज्ञातस्य पवनवन्निःसङ्गतामङ्गीकुर्वतो बहुशोऽनशनावमौदर्यवृत्तिपरि-
    संख्यानरसपरित्यागादिबाधापरिक्लान्तकायस्य१ देशकालप्रमाणापेतमध्वगमनं संयमविरोधि परि-
    हरतोनिराकृतपादावरणस्य परुषकर्कराकण्टकादिव्यर्धन२जातचरणखेदस्यापि सतः पूर्वोचितयान-
    वाहनादिगमनमस्मरतो यथाकालमावश्यकपरिहाणिमास्कन्दतश्चर्यापरीषहसहनमवसेयम् । ५
    § ८२४. श्मशानोद्यानशून्यायतनगिरिगुहागह्वरादिष्वनभ्यस्तपूर्वेषु निवसतः आदित्यप्रकाशे-३
    स्वेन्द्रियज्ञानपरीक्षितप्रदेशे४ कृतनियमक्रियस्य निषद्यां नियमितकालामास्थितवतः सिंहव्याघ्रादिवि-
    विधभीषणध्वनिश्रवणान्निवृत्तभयस्य चतुर्विधोपसर्गसहनादप्रच्युतमोक्षमार्गस्य वीरासनोत्कुटिकाद्या-
    सनादविचलितविग्रहस्य तत्कृतबाधासहनं निषद्यापरीषहविजय इति निश्चीयते ।
    § ८२५. स्वाध्यायध्यानाध्वश्रमपरिखेदितस्य मौहूर्तिकीं खरविषमप्रचुरशर्कराकपालसङ्कटा-५ १०
    तिशीतोष्णेषु भूमिप्रदेशेषु निद्रामनुभवतो यथाकृतैकपार्श्वदण्डायितादिशायिनः प्राणिबाधापरिहाराय
    पतितदारुवद्६ व्यपगतासुवद्७ परिवर्तमानस्य ज्ञान८भावनावाहितचेतसोऽनुष्ठितव्यन्तरादिविधोपसर्गा-
    दप्यचलितविग्रहस्यानियमितकालां तत्कृतबाधां क्षममाणस्य शय्या परीषहक्षमा कथ्यते ।
    § ८२३. जिसने दीर्घकाल तक गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्यको धारण किया है, जिसने बन्ध-
    मोक्ष पदार्थोंके स्वरूपको जान लिया है, संयमके आयतन शरीरको भोजन देनेके लिए जो देशा- १५
    न्तरका अतिथि बना है, गुरुके द्वारा जिसे स्वीकृति मिली है, जो वायुके समान निःसंगताको
    स्वीकार करता है, बहुत बार अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान और रसपरित्याग आदि जन्य
    बाधाके कारण जिसका शरीर परिक्लान्त है, देश और कालके प्रमाणसे रहित तथा संयमविरोधी
    मार्गगमनका जिसने परिहार कर दिया है, जिसने खड़ाऊँ आदिका त्याग कर दिया है, तीक्ष्ण
    कंकड़ और कांटे आदिके बिंधनेसे चरणमें खेदके उत्पन्न होनेपर भी पहले योग्य यान और वाहन २०
    आदिसे गमन करनेका जो स्मरण नहीं करता है तथा जो यथाकाल आवश्यकोंका परिपूर्ण परि-
    पालन करता है उसके चर्यापरीषहजय जानना चाहिए ।
    § ८२४. जिनमें पहले रहनेका अभ्यास नहीं किया है ऐसे श्मशान, उद्यान, शून्यघर, गिरि-
    गुफा और गह्वर आदिमें जो निवास करता है, आदित्यके प्रकाश और स्वेन्द्रिय ज्ञानसे परीक्षित
    प्रदेशमें जिसने नियमक्रिया की है, जो नियतकाल निषद्या लगाकर बैठता है, सिंह और व्याघ्र २५
    आदिकी नाना प्रकारकी भीषण ध्वनिके सुननेसे जिसे किसी प्रकारका भय नहीं होता, चार
    प्रकारके उपसर्गके सहन करनेसे जो मोक्षमार्गसे च्युत नहीं हुआ है तथा वीरासन और उत्कुटिका
    आदि आसनके लगानेसे जिसका शरीर चलायमान नहीं हुआ है उसके निषद्याकृत बाधाका सहन
    करना निषद्यापरीषहजय निश्चित होता है ।
    § ८२५. स्वाध्याय, ध्यान और अध्वश्रमके कारण थककर जो कठोर, विषम तथा ३०
    प्रचुरमात्रामें कंकड़ और खपरोंके टुकड़ोंसे व्याप्त ऐसे अति शीत तथा अत्युष्ण भूमिप्रदेशोंमें एक
    मुहूर्तप्रमाण निद्राका अनुभव करता है, जो यथाकृत एक पार्श्व भागसे या दण्डायित आदि रूपसे
    शयन करता है, करवट लेनेसे प्राणियोंको होनेवाली बाधाका निवारण करनेके लिए जो गिरे हुए
    लकड़ीके कुन्देके समान या मुर्दाके समान करवट नहीं बदलता, जिसका चित्त ज्ञानभावनामें लगा
    हुआ है, व्यन्तरादिके द्वारा किये गये नाना प्रकारके उपसर्गोंसे भी जिसका शरीर चलायमान नहीं ३५
    होता और जो अनियतकालिक तत्कृत बाधाको सहन करता है उसके शय्यापरीषहजय कहा जाता है।
    १. -परिक्रान्त-मु० । २.-व्यथन-मु०, दि० १, दि० २ । ३. प्रतिषु आदित्यस्येन्द्रियज्ञानप्रकाशपरीक्षितप्रदेशे
    इति पाठः । ४. -देशे प्रकृत-मु० । ५. -संकटादिशी-मु० । ६. -पतिततरुदण्डव-ता० । ७. -तासुवदुपारि-
    मु० । ८. ज्ञानपरिभावना-मु० ।