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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 558 में से

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पृष्ठ 438

३२६ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।९ § ८३३ -
§ ८३३. सत्कारः पूजाप्रशंसात्मकः । पुरस्कारो नाम क्रियारम्भादिष्वग्रतः करणमामन्त्रणं
वा, तत्रानादरो १ मयि क्रियते । चिरोषितब्रह्मचर्यस्य महातपस्विनः स्वपरसमयनिर्णयज्ञस्य बहुकृत्वः
परवादिविजयिनः प्रणामभक्तिसंभ्रमासनप्रदानादीनि मे न कश्चित्करोति । मिथ्यादृष्टय एवातीव
भक्तिमन्तः किंचिदजानन्तमपि सर्वज्ञसंभावनया संमान्य स्वसमयप्रभावनां कुर्वन्ति । व्यन्तरादयः
५ पुरा अत्युग्रतपसां प्रत्यग्रपूजां निर्वर्तयन्तीति मिथ्या श्रुतिर्यदि न स्यादिदानीं कस्मान्मादृशां न
कुर्वन्तीति दुष्प्रणिधानविरहितचित्तस्य सत्कारपुरस्कारपरीषहविजय इति ३ विज्ञायते ।
§ ८३४. अङ्गपूर्वप्रकीर्णकविशारदस्य शब्दन्यायाध्यात्मनिपुणस्य मम पुरस्तादितरे भास्कर-
प्रभाभिभूतखद्योतोद्द्योतवन्नितरां नावभासन्त इति विज्ञानमदनिरासः प्रज्ञापरीषहजयः प्रत्येयः ।
§ ८३५. अज्ञोऽयं न वेत्ति पशुसम इत्येवमाद्यधिक्षेपवचनं सहमानस्य परमदुश्चरतपोऽनुष्ठा-
१० यिनो नित्यमप्रमत्तचेतसो मेऽद्योपि ज्ञानातिशयो नोत्पद्यत इति अनभिसंदधतोऽज्ञानपरीषहजयो-
ऽवगन्तव्यः ।
§ ८३६. परमवैराग्यभावनाशुद्धहृदयस्य विदितसकलपदार्थतत्त्वस्यार्हदायतनसाधुधर्मपूजकस्य
चिरन्तनप्रव्रजितस्याद्यापि मे ज्ञानातिशयो नोत्पद्यते । महोपवासाद्यनुष्ठायिनां प्रातिहार्यविशेषाः
सम्यक्चारित्ररूपी विमल जलके प्रक्षालन द्वारा जो कर्ममलपंकको दूर करनेके लिए निरन्तर
१५ उद्यतमति है उसके मलपीडासहन कहा गया है ।
§ ८३३. सत्कारका अर्थ पूजा-प्रशंसा है । तथा क्रिया-आरम्भ आदिकमें आगे करना या
आमन्त्रण देना पुरस्कार है । इस विषयमें यह मेरा अनादर करता है । चिरकालसे मैंने ब्रह्मचर्य-
का पालन किया है, मैं महातपस्वी हूँ, स्वसमय और परसमयका निर्णयज्ञ हूँ, मैंने बहुत बार पर-
वादियोंको जीता है तो भी कोई मुझे प्रणाम और भक्ति नहीं करता और उत्साहसे आसन नहीं
२० देता, मिथ्यादृष्टि ही अत्यन्त भक्तिवाले होते हैं, कुछ नहीं जाननेवालेको भी सर्वज्ञ समझ कर
आदर सत्कार करके अपने समयकी प्रभावना करते हैं, व्यन्तरादिक पहले अत्यन्त उग्र तप करने-
वालोंकी प्रत्यग्र पूजा रचते थे यह यदि मिथ्या श्रुति नहीं है तो इस समय वे हमारे समान तप-
स्वियोंकी क्यों नहीं करते हैं इस प्रकार खोटे अभिप्रायसे जिसका चित्त रहित है उसके सत्कार-
पुरस्कारपरीषहजय जानना चाहिए ।
२५ § ८३४. मैं अङ्ग, पूर्व और प्रकीर्णक शास्त्रोंमें विशारद हूँ तथा शब्दशास्त्र, न्यायशास्त्र
और अध्यात्मशास्त्रमें निपुण हूँ। मेरे आगे दूसरे जन सूर्यकी प्रभासे अभिभूत हुए खद्योतके उद्योत-
के समान बिलकुल नहीं सुशोभित होते हैं इस प्रकार विज्ञानमदका निरास होना प्रज्ञापरीषहजय
जानना चाहिए।
§ ८३५. यह मूर्ख है, कुछ नहीं जानता है, पशुके समान है इत्यादि तिरस्कारके वचनोंको
३० मैं सहन करता हूँ, मैंने परम दुश्चर तपका अनुष्ठान किया है, मेरा चित्त निरन्तर अप्रमत्त रहता
है, तो भी मेरे अभी तक भी ज्ञानका अतिशय नहीं उत्पन्न हुआ है इस प्रकार विचार नहीं करने-
वालेके अज्ञानपरीषहजय जानना चाहिए ।
§ ८३६. परम वैराग्यकी भावनासे मेरा हृदय शुद्ध है, मैंने समस्त पदार्थोंके रहस्यको जान
लिया है, मैं अरहन्त, आयतन, साधु और धर्मका उपासक हूँ, चिरकालसे मैं प्रव्रजित हूँ तो भी
३५ मेरे अभी ज्ञानातिशय नहीं उत्पन्न हुआ है। महोपवास आदिका अनुष्ठान करनेवालोंके प्रातिहार्य-
१. -दरोऽपि क्रि-मु० । २. स्वशासनप्रभा-ता० । ३. -जयः प्रतिज्ञा-मु० । ४. -द्यवक्षेप-मु० । -द्यविक्षेप-
दि० १, दि० २ । ५. मेऽद्यत्त्वेऽपि विज्ञा-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri