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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 558 में से

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पृष्ठ 432

३२० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।९ § ८११ -
§ ८११. एवमनित्यत्वाद्यनुप्रेक्षासंनिधाने उत्तमक्षमादिधारणान्महान् संवरो भवति । मध्ये
'अनुप्रेक्षा'वचनमुभयार्थम् । अनुप्रेक्षा हि भावयन्नुत्तमक्षमादींश्च प्रतिपालयति परीषहांश्च
जेतुमुत्सहते ।
§ ८१२. के पुनस्ते परिषहाः किमर्थं वा¹ ते सह्यन्त इतीदमाह—
मार्गाच्यवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः ॥८॥
§ ८१३. संवरस्य प्रकृतत्वात्तेन मार्गो विशिष्यते । संवरमार्ग इति । तदच्यवनार्थं निर्जरार्थं
च परिषोढव्याः परीषहाः । क्षुत्पिपासादिसहनं कुर्वन्तः जिनोपदिष्टान्मार्गादप्रच्यवमानास्तन्मार्ग-
परिक्रमणपरिचयेन कर्मागमद्वारं संवृण्वन्त औपक्रमिकं कर्मफलमनुभवन्तः क्रमेण निर्जीर्णकर्माणो
मोक्षमाप्नुवन्ति ।
§ ८१४. तत्स्वरूपसंख्यासंप्रतिपत्त्यर्थमाह—
क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्याशय्याक्रोशवधयाचना-
लाभरोगतृणस्पर्शमलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानादर्शनानि ॥९॥
§ ८१५. क्षुदादयो वेदनाविशेषा द्वाविंशतिः । एतेषां सहनं मोक्षार्थिना कर्तव्यम् ।
तद्यथा—भिक्षोर्निरवद्याहारगवेषिणस्तदलाभे ईषल्लाभे च अनिवृत्तवेदनस्याकाले अदेशे च भिक्षां
प्रति निवृत्तेच्छस्यावश्यकपरिहाणिं मनागप्यसहमानस्य स्वाध्यायध्यानभावनापरस्य बहुकृत्वः
§ ८११. इस प्रकार अनित्यादि अनुप्रेक्षाओंका सान्निध्य मिलने पर उत्तमक्षमादिके धारण
करनेसे महान् संवर होता है। अनुप्रेक्षा दोनोंका निमित्त है इसलिए 'अनुप्रेक्षा' वचन मध्यमें दिया
है। अनुप्रेक्षाओंका चिन्तन करता हुआ यह जीव उत्तमक्षमादिका ठीक तरहसे पालन करता है
और परीषहोंको जीतनेके लिए उत्साहित होता है।
§ ८१२. वे परीषह कौन-कौन हैं और वे किसलिए सहन किये जाते हैं, यह बतलानेके लिए
यह सूत्र कहते हैं—
मार्गसे च्युत न होनेके लिए और कर्मोंकी निर्जरा करनेके लिए जो सहन करने योग्य हों
वे परीषह हैं ॥८॥
§ ८१३. संवरका प्रकरण होनेसे वह मार्गका विशेषण है, इसलिए सूत्रमें आये हुए 'मार्ग'
पदसे संवरमार्गका ग्रहण करना चाहिए । उससे च्युत न होनेके लिए और निर्जराके लिए सहन
करने योग्य परीषह होते हैं। क्षुधा, पिपासा आदिको सहन करनेवाले, जिनदेवके द्वारा कहे हुए
मार्गसे नहीं च्युत होनेवाले, उस मार्गके सतत अभ्यासरूप परिचयके द्वारा कर्मागमद्वारको संवृत
करनेवाले यथा औपक्रमिक कर्मफलको अनुभव करनेवाले क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करके मोक्षको
प्राप्त होते हैं।
§ ८१४. अब उन परीषहोंके स्वरूप और संख्याका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, नग्नता, अरति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शय्या, आक्रोश,
वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कारपुरस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और अदर्शन इन
नामवाले परीषह हैं ॥९॥
§ ८१५. क्षुधादिक वेदनाविशेष बाईस हैं। मोक्षार्थी पुरुषको इनको सहन करना चाहिए।
यथा—जो भिक्षु निर्दोष आहारका शोध करता है, जो भिक्षाके नहीं मिलने पर या अल्पमात्रामें
मिलने पर क्षुधावेदनाको नहीं प्राप्त होता, अकालमें या अदेशमें जिसे भिक्षा लेनेकी इच्छा नहीं
१. वा सह्य- मु० । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri