सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रादुर्भूवन्निति प्रलापमात्रमनर्थकेयं प्रव्रज्या । विफलं व्रतपरिपालनमित्येवमसमाधानस्य दर्शन-
विशुद्धियोगाददर्शनपरिषहसहनमवसातव्यम् ।
§ ८३७. एवं परिषहान्¹ असंकल्पोपस्थितान् सहमानस्यासंक्लिष्टचेतसो रागादिपरिणामास्र-
वनिरोधान्महान् संवरो भवति ।
§ ८३८. आह, किमिमे परिषहाः सर्वे संसारमहाटवीमतिक्रमितुमभ्युद्यतमभिद्रवन्ति उत
कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—अमी व्याख्यातलक्षणाः क्षुदादयश्चारित्रान्तराणि प्रति भाज्याः ।
नियमेन पुनरनयोः प्रत्येतव्याः—
सूक्ष्म सांपरायछद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश ॥१०॥
§ ८३९. क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकचर्याशय्यावधालाभरोगतृणस्पर्शमलप्रज्ञाज्ञानानि । 'चतु-
र्दश' इति वचनादन्येषां परिषहाणामभावो वेदितव्यः । आह युक्तं तावद्वीतरागच्छद्मस्थे मोहनीया-
भावात्³ तत्कृतवक्ष्यमाणाष्टपरिषहाभावाच्चतुर्दशनियमवचनम् । सूक्ष्मसांपराये तु मोहोदयसद्-
भावात् 'चतुर्दश' इति नियमो नोपपद्यत इति । तदयुक्तम्; सन्मात्रत्वात् । तत्र हि केवलं⁴ लोभ-
संज्वलनकषायोदयः सोऽप्यतिसूक्ष्मः । ततो वीतरागच्छद्मस्थकल्पत्वात् 'चतुर्दश' इति नियमस्तत्रापि
युज्यते । ननु मोहोदयसहायाभावान्मन्दोदयत्वाच्च क्षुदादिवेदनाभावात्तत्सहनकृतपरिषहव्यपदेशो
विशेष उत्पन्न हुए यह प्रलापमात्र है, यह प्रव्रज्या अनर्थक है, व्रतोंका पालन करना निरर्थक है
इत्यादि बातोंका दर्शनविशुद्धिके योगसे मनमें नहीं विचार करनेवालेके अदर्शनपरिषहसहन जानना
चाहिए ।
§ ८३७. इस प्रकार जो संकल्पके बिना उपस्थित हुए परीषहोंको सहन करता है और
जिसका चित्त संक्लेश रहित है उसके रागादि परिणामोंके आस्रवका निरोध होनेसे महान् संवर
होता है ।
§ ८३८. संसाररूपी महा अटवीको उल्लंघन करनेके लिए उद्यत हुए पुरुषको क्या ये सब
परीषह प्राप्त होती हैं या कोई विशेषता है इसलिए यहाँ कहते हैं—जिनके लक्षण कह आये हैं
ऐसे ये क्षुधादिक परीषह अलग-अलग चारित्रके प्रति विकल्पसे होते हैं । उसमें भी इन दोनोंमें
नियमसे जानने योग्य—
सूक्ष्मसाम्पराय और छद्मस्थवीतरागके चौदह परीषह सम्भव हैं ॥१०॥
§ ८३९. क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श,
मल, प्रज्ञा और अज्ञान ये चौदह परीषह हैं । सूत्रमें आये हुए 'चतुर्दश' इस वचनसे अन्य परीषहों-
का अभाव जानना चाहिए । शंका—वीतरागच्छद्मस्थके मोहनीयके अभावसे तत्कृत आगे कहे
जानेवाले आठ परीषहोंका अभाव होनेसे चौदह परीषहोंके नियमका वचन तो युक्त है, परन्तु
सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें मोहनीयका उदय होनेसे चौदह परीषह होते हैं यह नियम नहीं बनता ।
समाधान—यह कहना अयुक्त है, क्योंकि वहाँ मोहनीयकी सत्तामात्र है । वहाँपर केवल लोभ-
संज्वलन कषायका उदय होता है और वह भी अतिसूक्ष्म होता है इसलिए वीतराग छद्मस्थके
समान होनेसे सूक्ष्मसाम्परायमें भी चौदह परीषह होते हैं यह नियम बन जाता है। शंका—इन
स्थानोंमें मोहके उदयकी सहायता नहीं होनेसे और मन्द उदय होनेसे क्षुधादि वेदनाका अभाव है
१. –षहान् सह-मु० । २. वेयणीयभवाए ए पन्नाणाणा उ आइमे । अट्ठमंमि अलाभोत्थो छउमत्थे चोद्दस ॥'
–पञ्चसं० द्वा०४, गा० २२ । ३. मुद्रितप्रतौ मोहनीयाभावाद्वक्ष्यमाणान्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशायाचनासत्कार-
पुरस्कारादर्शनानि तत्कृताष्ट-इति पाठः । लिखितप्रतिषु च तथैव । परं नासौ सम्यक् प्रतिभाति संशोधित-
पाठस्तु तत्त्वार्थवार्तिकपाठानुसारी इति सोऽत्र योजितः । ४. केवललोभ-मु० ।