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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 436, कुल 558 में से

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पृष्ठ 436

§ ८२६. मिथ्यादर्शनोदृक्तामर्षपरुषावज्ञानिन्दासभ्यवचनानि क्रोधाग्निशिखाप्रवर्धनानि
१निशृण्वतोऽपि तदर्थेऽवसमाहितचेतसः सहसा तत्प्रतीकारं कर्तुमपि शक्नुवतः पापकर्मविपाक-
मभिचिन्तयतस्तान्याकर्ण्य तपश्चरणभावनापरस्य कषायविषलवमात्रास्याप्यनवकाशमात्महृदयं
कुर्वत आक्रोशपरीषहसहनमवधार्यते ।
§ ८२७. निशितविशसनमुशलमुद्गराद्रिप्रहरणताडनादिभिर्व्यापाद्यमानशरीरस्य व्यापादकेषु
मनागपि मनोविकारमकुर्वतो मम पुराकृतदुष्कर्मफलमिदमिमे वराकाः किं कुर्वन्ति, शरीरमिदं
जलबुद्बुदवद्विशरणस्वभावं व्यसनकारणमेतैर्बाध्यते२, संज्ञानदर्शनचारित्राणि मम न केनचिदुप-
हन्यन्ते इति चिन्तयतो वासितक्षणचन्दनानुलेपनसमदर्शिनो वधपरीषहक्षमा मन्यते ।
§ ८२८. बाह्याभ्यन्तरतपोऽनुष्ठानपरस्य तद्भावनावशेन निस्सारीकृतमूर्तेः पटुत्तपनताप-
निष्पीतसारतरोरिव विरहितच्छायास्य त्वगस्थिशिराजालमात्रतनुयन्त्रस्य प्राणत्यये३ सत्यप्याहार-
वसतिभेषजादीनि दीनाभिधानमुखवैवर्ण्याङ्गसंज्ञादिभिरयाचमानस्य भिक्षाकालेऽपि विद्युद्योतवद्
दुरुपलक्ष्यमूर्तेर्याचनापरीषहसहनमवसीयते ।
§ ८२९. वायुवदसङ्गादनेकदेशचारिणोऽभ्युपगतैककालसंभोजनस्य वाचंयमस्य तत्समितस्य४
वा सकृत्स्वतनुदर्शनमात्रतन्त्रस्य पाणिपुटमात्रपात्रस्य बहुषु दिवसेषु५ बहुषु च गृहेषु भिक्षामनवाप्या-
§ ८२६. मिथ्यादर्शनके उद्रेकसे कहे गये जो क्रोधाग्निकी शिखाको बढ़ाते हैं ऐसे क्रोधरूप,
कठोर, अवज्ञाकर, निन्दारूप और असभ्य वचनोंको सुनते हुए भी जिसका उनके विषयमें चित्त
नहीं जाता है, यद्यपि तत्काल उनका प्रतीकार करनेमें समर्थ है फिर भी यह सब पापकर्मका
विपाक है इस तरह जो चिन्तन करता है, जो उन शब्दोंको सुनकर तपश्चरणकी भावनामें तत्पर
रहता है और जो कषायविषके लेशमात्रको भी अपने हृदयमें अवकाश नहीं देता उसके आक्रोश-
परीषहसहन निश्चित होता है ।
§ ८२७. तीक्ष्ण तलवार, मूसर और मुद्गर आदि अस्त्रोंके द्वारा ताड़न और पीड़न आदि-
से जिसका शरीर तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है तथापि मारनेवालोंपर जो लेशमात्र भी मनमें विकार
नहीं लाता, यह मेरे पहले किये गये दुष्कर्मका फल है, ये बेचारे क्या कर सकते हैं, यह शरीर
जलके बुलबुलेके समान विशरण-स्वभाव है, दुःखके कारणको ही ये अतिशय बाधा पहुँचाते हैं, मेरे
सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्रको कोई नष्ट नहीं कर सकता इस प्रकार जो विचार
करता है वह बसूलासे छीलने और चन्दनसे लेप करनेमें समदर्शी होता है इसलिए उसके वधपरी-
षहजय माना जाता है ।
§ ८२८. जो बाह्य और आभ्यन्तर तपके अनुष्ठान करनेमें तत्पर है, जिसने तपकी भावना-
के कारण अपने शरीरको सुखा डाला है, जिसका तीक्ष्ण सूर्यके तापके कारण सार व छाया रहित
वृक्षके समान त्वचा, अस्थि और शिराजालमात्रसे युक्त शरीरयन्त्र रह गया है, जो प्राणोंका
वियोग होनेपर भी आहार, वसति और दवाई आदिकी दीन शब्द कहकर, मुखकी विवर्णता दिखा-
कर व संज्ञा आदिके द्वारा याचना नहीं करता तथा भिक्षाके समय भी जिसकी मूर्ति बिजलीकी
चमकके समान दुरुपलक्ष्य रहती है ऐसे साधुके याचना परीषहजय जानना चाहिए ।
§ ८२९. वायुके समान निःसंग होनेसे जो अनेक देशोंमें विचरण करता है। जिसने दिनमें
एक कालके भोजनको स्वीकार किया है, जो मौन रहता है या भाषासमितिका पालन करता है,
एक बार अपने शरीरको दिखलानामात्र जिसका सिद्धान्त है, पाणिपुट ही जिसका पात्र है, बहुत
१. -नानि शृण्व-मु०, दि० १ । २. -मेतैर्व्याबा-मु० । ३. प्राणवियोगे सत्य-मु० । ४. तत्समस्य वा
आ०, दि० १, दि० २ । ५. -सेषु च मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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