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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 558 में से

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पृष्ठ 440

३२८ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।११ § ८४० -
न युक्तिमवतरति । तन्न । किं कारणम् । शक्तिमात्रस्य विवक्षितत्वात् । सर्वार्थसिद्धिदेवस्य सप्तम-
पृथिवीगमनसामर्थ्यव्यपदेशवत् ।
§ ८४०. आह, यदि शरीरवत्यात्मनि परिषहसंनिधानं प्रतिज्ञायते अथ भवति उत्पन्न-
केवलज्ञाने कर्मचतुष्टयफलानुभवनवशवर्तिनि कियन्त उपनिपतन्तीत्यत्रोच्यते । तस्मिन्पुनः—
एकादश जिने ॥११॥
§ ८४१. निरस्तघातिकर्मचतुष्टये जिने वेदनीयसद्भावात्तदाश्रया एकादशपरीषहाः सन्ति ।
ननु च² मोहनीयोदयसहायाभावात्क्षुदादिवेदनाभावे परिषहव्यपदेशो न युक्तः । सत्यमेवमेतत्—
वेदनाभावेऽपि द्रव्यकर्मसद्भावापेक्षया परिषहोपचारः क्रियते, निरवशेषनिरस्तज्ञानातिशये चिन्ता-
निरोधाभावेऽपि तत्फलकर्मनिर्हरणफलापेक्षया ध्यानोपचारवत् । अथवा—एकादश जिने 'न सन्ति'
इति वाक्यशेषः कल्पनीयः; सोपस्कारत्वात्सूत्राणाम् । "कल्प्यो हि³ वाक्यशेषो वाक्यं च वक्तर्यधीनम्"
इत्युपगमात् मोहोदयसहायीकृतक्षुदादि⁴वेदनाभावात् 'न सन्ति' इति वाक्यशेषः ।
इसलिए इनके कार्यरूपसे 'परीषह' संज्ञा युक्तिको नहीं प्राप्त होती । समाधान—ऐसा नहीं है,
क्योंकि यहाँ शक्तिमात्र विवक्षित है। जिस प्रकार सर्वार्थसिद्धिके देवके सातवीं पृथिवीके गमनके
सामर्थ्यका निर्देश करते हैं उसी प्रकार यहाँ भी जानना चाहिए ।
§ ८४०. यदि शरीरवाले आत्मामें परीषहोंके सन्निधानकी प्रतिज्ञा की जाती है तो केवल-
ज्ञानको प्राप्त और चार कर्मोंके फलके अनुभवके वशवर्ती भगवान्के कितने परीषह प्राप्त होते हैं
इसलिए यहाँ कहते हैं। उनमें तो—
जिनमें ग्यारह परीषह सम्भव हैं ॥११॥
§ ८४१. जिन्होंने चार घातिया कर्मोंका नाश कर दिया है ऐसे जिन भगवान्में वेदनीय-
कर्मका सद्भाव होनेसे तन्निमित्तक ग्यारह परीषह होते हैं । शंका—मोहनीयके उदयकी सहायता
न होनेसे क्षुधादि वेदनाके न होनेपर परीषह संज्ञा युक्त नहीं हैं । समाधान—यह कथन सत्य ही है
तथापि वेदनाका अभाव होनेपर भी द्रव्यकर्मके सद्भावकी अपेक्षासे यहाँ परीषहोंका उपचार किया
जाता है । जिस प्रकार समस्त ज्ञानावरणके नाश हो जानेपर एक साथ समस्त पदार्थोंके रहस्यको
प्रकाशित करनेवाले केवलज्ञानातिशयके होनेपर चिन्ता-निरोधका अभाव होनेपर भी कर्मोंके नाश
रूप उसके फलकी अपेक्षा ध्यानका उपचार किया जाता है उसी प्रकार यहाँ परीषहोंका उपचारसे
कथन जानना चाहिए, अथवा जिन भगवान्में ग्यारह परीषह 'नहीं हैं' इतना वाक्यशेष कल्पित
कर लेना चाहिए क्योंकि सूत्र उपस्कारसहित होते हैं । 'वाक्य शेषकी कल्पना करनी चाहिए और
वाक्य वक्ताके अधीन होता है' ऐसा स्वीकार भी किया गया है। मोहके उदयकी सहायतासे
होनेवाली क्षुधादि वेदनाओंका अभाव होनेसे 'नहीं हैं' यह वाक्यशेष उपन्यस्त किया गया है ।
विशेषार्थ—जिन भगवान्के असाता वेदनीयका उदय होता है और यह क्षुधादि वेदनाका
कारण है इसलिए यहाँ जिन भगवान्के कारणकी दृष्टिसे क्षुधादि ग्यारह परीषह कहे जातें हैं । पर
क्या सचमुचमें जिन भगवान्के क्षुधादि ग्यारह परीषह होते हैं यह एक प्रश्न है जिसका समाधान
टीकामें दो प्रकारसे किया है। पहले तो जिन भगवान्के क्षुधादि परीषहोंके होनेके कारणके
सद्भावकी अपेक्षा उनके अस्तित्वका निर्देश किया है पर कार्यरूपमें ये क्षुधादि ग्यारह परीषह जिन
भगवान्के नहीं होते इसलिए इस दृष्टिसे 'न सन्ति' इस वाक्यशेषकी योजना कर वहाँ उनका निषेध
१. 'खुप्पिवामुण्हसीयाणि सेज्जा रोगो वहो मलो । तणफासो चरीया य दंसेक्कारस जोगिसु ॥'-पञ्चसं० द्वा०
४, गा०, २२ । २. ननु मोह-मु० । ३. 'कल्प्यो हि वाक्यशेषो वाक्यं वक्तर्यधीनं हि'-पा० म० भा० १,
१, ८ । ४. -भावात् । आह मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri