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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 434, कुल 558 में से

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पृष्ठ 434

३२२ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।९ § ८१९ -

§ ८१९. 'दंशमशक'¹ ग्रहणमुपलक्षणम् । यथा "काकेभ्यो रक्ष्यतां सर्पिः" इति उपघातकोप²-
लक्षणं काकग्रहणं, तेन दंशमशकमक्षिकापिशुकपुत्तिकामत्कुणकीटपिपीलिकावृश्चिकादयो गृह्यन्ते ।
तत्कृतां बाधामप्रतीकारां सहमानस्य तेषां बाधां त्रिधाप्यकुर्वाणस्य निर्वाणप्राप्तिमात्रसंकल्पप्रावर-
णस्य तद्वेदनासहनं दंशमशकपरीषहक्षमेत्युच्यते ।
५ § ८२०. जातरूपवन्निष्कलङ्कजातरूपधारणमशक्यप्रार्थनीयं³ याचनरक्षणहिंसनादिदोषवि-
निर्मुक्तं निष्परिग्रहत्वान्निर्वाणप्राप्तिं प्रत्येकं साधनमनन्यबाधनं नाग्न्यं बिभ्रतो मनोविक्रियाविप्लु-
तिविरहात् स्त्रीरूपाण्यत्यन्ताशुचिकुणपरूपेण भावयतो रात्रिन्दिवं ब्रह्मचर्यमखण्डमतिष्ठमानस्या-
चेलव्रतधारणमनवद्यमवगन्तव्यम् ।
§ ८२१. संयतस्येन्द्रियेष्टविषयसंबन्धं प्रति निरुत्सुकस्य गीतनृत्यवादित्रादिविरहितेषु शून्या-
१० गारदेवकुलतरुकोटरशिलागुहादिषु स्वाध्यायध्यानभावनारतिमास्कन्दतो दृष्टश्रुतानु⁴भूतरतिस्मरण-
तत्कथाश्रवणकामशरप्रवेशनिर्विवरहृदयस्य प्राणिषु सदा सदयस्यारतिपरीषहजयोऽवसेयः ।
§ ८२२. एकान्तेष्वारामभवनादिप्रदेशेषु नवयौवनमदविभ्रममदिरापानप्रमत्तासु प्रमदासु
बाधमानासु कूर्मवत्संवृ⁵तेन्द्रियविकारस्य ललितस्मितमृदुकथितसविलासवीक्षणप्रहसनमद⁶मन्थर-
गमनमन्मथशरव्यापारविफलीकरणस्य⁷ स्त्रीबाधापरीषहसहनमवगन्तव्यम् ।
१५ § ८१९. सूत्रमें 'दंशमशक' पदका ग्रहण उपलक्षण है। जैसे 'कौओंसे घीकी रक्षा करनी
चाहिए' यहां 'काक' पदका ग्रहण उपघातक जितने जीव हैं उनका उपलक्षण है, इसलिए
'दंशमशक' पदसे दंशमशक, मक्खी, पिस्सू, छोटी मक्खी, खटमल, कीट, चींटी और बिच्छू आदिका
ग्रहण होता है । जो इनके द्वारा की गयी बाधाको बिना प्रतीकार किये सहन करता है, मन वचन
और कायसे उन्हें बाधा नहीं पहुँचाता है और निर्वाणकी प्राप्तिमात्र संकल्प ही जिसका ओढ़ना है
२० उसके उनकी वेदनाको सह लेना दंशमशक परीषहजय कहा जाता है ।
§ ८२०. बालकके स्वरूपके समान जो निष्कलंक जातरूपको धारण करने रूप हैं, जिसका
याचना करनेसे प्राप्त होना अशक्य है, जो याचना, रक्षा करना और हिंसा आदि दोषोंसे रहित है,
जो निष्परिग्रहरूप होनेसे निर्वाण प्राप्तिका अनन्य साधन है और जो अन्य बाधाकर नहीं है ऐसे
नाग्न्यको जो धारण करता है, जो मनके विक्रियारूप उपद्रवसे रहित होनेके कारण स्त्रियोंके रूप-
२५ को अत्यन्त अपवित्र बदबूदार अनुभव करता है और जो दिन रात अखण्ड ब्रह्मचर्यको धारण
करता है उसके निर्दोष अचेलव्रत धारण जानना चाहिए ।
§ ८२१. जो संयत इन्द्रियोंके इष्ट विषय सम्बन्धके प्रति निरुत्सुक है, जो गीत, नृत्य और
वादित्र आदिसे रहित शून्यघर, देवकुल, तरुकोटर और शिलागुफा आदिमें स्वाध्याय, ध्यान और
भावनामें लीन है, पहले देखे हुए, सुने हुए और अनुभव किये हुए विषय भोगके स्मरण, विषयभोग
३० सम्बन्धी कथाके श्रवण और कामशर प्रवेशके लिए जिसका हृदय निश्छिद्र है और जो प्राणियोंके
ऊपर सदाकाल सदय है उसके अरतिपरीषहजय जानना चाहिए ।
§ ८२२. एकान्त ऐसे बगीचा और भवन आदि स्थानों पर नवयौवन, मदविभ्रम और
मदिरापानसे प्रमत्त हुई स्त्रियोंके द्वारा बाधा पहुँचाने पर कछुएके समान जिसने इन्द्रिय और
हृदयके विकारको रोक लिया है तथा जिसने मन्द मुस्कान, कोमल सम्भाषण, तिरछी नजरोंसे
३५ देखना, हँसना, मदभरी धीमी चालसे चलना, और कामवाण मारना आदिको विफल कर दिया
है उसके स्त्रीबाधापरीषहजय जानना चाहिए ।
१. -ग्रहणं दंशमशकोपलक्षणं । यथा आ०, दि० १, दि० २, ता० । २. उपघातोप-मु० । ३. -शक्यमप्रार्थ्य-
ता०, ना०, दि० २, आ० । ४. 'मुदपरिचिदाणभूदा सव्वस्य वि कामभोगवंधकहा ।' -समयप्रा० गा० ४ ।
५. संहृते-मु० । ६. पदमन्थर-मु० । ७. -करणचरणस्य आ०, दि० १, दि० २ ।