सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
§ २१३. भव इत्युच्यते । को भवः । आयुर्नामकर्मोदयनिमित्त आत्मनः पर्यायो भवः ।
प्रत्ययः कारणं निमित्तमित्यनर्थान्तरम् । भवः प्रत्ययोऽस्य भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणां वेदितव्यः ।
यद्येवं तत्र क्षयोपशमनिमित्तत्वं न प्राप्नोति । नैष दोष; तदाश्रयात्तत्सिद्धेः । भवं प्रतीत्य क्षयो-
पशमः संजायत¹ इति कृत्वा भवः प्रधानकारणमित्युपदिश्यते । यथा पतत्रिणो गमनमाकाशे भव-
निमित्तम्, न शिक्षागुणविशेषः तथा देवनारकाणां व्रतनियमाद्यभावेऽपि जायत 'इति भवप्रत्ययः'
²इत्युच्यते । इतरथा हि भवः साधारण इति कृत्वा सर्वेषामविशेषः स्यात् । इष्यते च तत्रावधेः
प्रकर्षाप्रकर्षवृत्तिः । 'देवनारकाणाम्' इत्यविशेषाभिधानेऽपि सम्यग्दृष्टीनामेव ग्रहणम् । कुतः ।
अवधिग्रहणात् । मिथ्यादृष्टीनां च विभङ्ग इत्युच्यते । प्रकर्षाप्रकर्षवृत्तिश्च आगमतो विज्ञेया ।
§ २१४. यदि भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्, अथ क्षयोपशमहेतुकः केषामित्यत आह—
§ २१३. भवका स्वरूप कहते हैं । शंका—भव किसे कहते हैं ? समाधान—आयु नामकर्म-
के उदयका निमित्त पाकर जो जीवकी पर्याय होती है उसे भव कहते हैं ? प्रत्यय, कारण और
निमित्त ये एकार्थवाची नाम हैं । जिस अवधिज्ञानके होनेमें भव निमित्त है वह भवप्रत्यय अवधि-
ज्ञान है । वह देव और नारकियोंके जानना चाहिए । शंका—यदि ऐसा है तो इनके अवधिज्ञानके
होनेमें क्षयोपशमकी निमित्तता नहीं बनती ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि भवके
आश्रयसे क्षयोपशमकी सिद्धि हो जाती है । भवका आलम्बन लेकर क्षयोपशम हो जाता है ऐसा
समझकर भव प्रधान कारण है ऐसा उपदेश दिया जाता है । जैसे पक्षियोंका आकाशमें गमन करना
भवनिमित्तक होता है, शिक्षा गुणकी अपेक्षासे नहीं होता वैसे ही देव और नारकियोंके व्रत निय-
मादिकके अभावमें भी अवधिज्ञान होता है, इसलिए उसे भवनिमित्तक कहते हैं । यदि ऐसा न
माना जाय तो भव तो सबके साधारण रूपसे पाया जाता है, अतः सबके एक-सा अवधिज्ञान प्राप्त
होगा । परन्तु वहाँपर अवधिज्ञान न्यूनाधिक कहा ही जाता है, इससे ज्ञात होता है कि यद्यपि
वहाँपर अवधिज्ञान होता तो क्षयोपशमसे ही है पर वह क्षयोपशम भवके निमित्तसे प्राप्त होता है
अतः उसे 'भवप्रत्यय' कहते हैं । सूत्रमें 'देवनारकाणाम्' ऐसा सामान्य वचन होने पर भी इससे
सम्यग्दृष्टियोंका ही ग्रहण होता हैं, क्योंकि सूत्रमें 'अवधि' पदका ग्रहण किया है । मिथ्यादृष्टियोंका
वह विभंगज्ञान कहलाता है । अवधिज्ञान देव और नारकियोंमें न्यूनाधिक किसके कितना पाया
जाता है यह आगमसे जान लेना चाहिए ।
विशेषार्थ—अवधिज्ञान वह मर्यादित ज्ञान है जो इन्द्रिय और मनकी सहायताके बिना
मूर्तिक पदार्थोंको स्पष्ट जानता है । मनःपर्ययज्ञानका भी यही स्वरूप कहा जाता है पर इससे
मनःपर्ययज्ञानमें मौलिक भेद है । वह मनकी पर्यायों-द्वारा ही मूर्तिक पदार्थोंको जानता है, सीधे
तौरसे मूर्तिक पदार्थोंको नहीं जानता । यह अवधिज्ञान देव और नारकियोंके उस पर्यायके प्राप्त
होने पर अनायास होता है । इसके लिए उन्हें प्रयत्न विशेष नहीं करना पड़ता । तथा तिर्यञ्चों
और मनुष्योंके सम्यग्दर्शन आदि गुणोंके निमित्तसे होता है । इससे इसके भवप्रत्यय और क्षयोप-
शमनिमित्तक ये दो भेद किये गये हैं। यहाँ भवप्रत्यय अवधिज्ञान मुख्यतः देव और नारकियोंके
बतलाया है, पर तीर्थंकर आदिके भी इस अवधिज्ञानकी प्राप्ति देखी जाती है इतना यहाँ विशेष
जानना चाहिए । देव और नारकियोंमें भी उन्हींके भवके प्रथम समयसे अवधिज्ञान होता है जो
सम्यग्दृष्टि होते हैं । मिथ्यादृष्टियोंके इसकी उत्पत्ति पर्याप्त होनेपर ही होती है और उसका नाम
विभंगज्ञान है। इस ज्ञानकी विशेष जानकारी जीवकाण्ड, धवला वेदनाखण्ड आदिसे करनी चाहिए ।
§ २१४. यदि भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव और नारकियोंके होता है तो क्षयोपशमहेतुक
अवधिज्ञान किसके होता है । आगे इसी बातको बतलाते हैं—
१. -शमः संजात इति आ०, दि० १, दि० २ । २. -त्यय इष्यते । इत—आ०, दि० १, दि० २ ।
८८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।२२ § २१५ -
'क्षयोपशमनिमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम् ॥२२॥
§ २१५. अवधिज्ञानावरणस्य देशघातिस्पर्द्धकानामुदये सति सर्वघातिस्पर्द्धकानामुदयाभावः
क्षयः तेषामेवानुदयप्राप्तानां सदवस्था उपशमः। तौ निमित्तमस्येति क्षयोपशमनिमित्तः। स
शेषाणां वेदितव्यः। के पुनः शेषाः। मनुष्यास्तिर्यञ्चश्च । तेष्वपि यत्र सामर्थ्यमस्ति तत्रैव
वेदितव्यः। न ह्यसंज्ञिनामपर्याप्तकानां च तत्सामर्थ्यमस्ति । संज्ञिनां पर्याप्तकानां च न सर्वेषाम् ।
केषां र्तार्ह । यथोक्तसम्यग्दर्शनादिनिमित्तसंनिधाने सति शान्तक्षीणकर्मणां तस्योपलब्धिर्भवति ।
सर्वस्य क्षयोपशमनिमित्तत्वे क्षयोपशमग्रहणं नियमार्थं क्षयोपशम एव निमित्तं न भव इति । स
एषोऽवधिः षड्विकल्पः । कुतः अनुगाम्यननगामिवर्धमानहीयमानावस्थितानवस्थितभेदात् । कश्चि-
दवधिर्भास्करप्रकाशवद् गच्छन्तमनुगच्छति । कश्चिन्नानुगच्छति तत्रैवातिपतति २उन्मुखप्रश्नादेशि-
पुरुषवचनवत् । अपरोऽवधिः अरणिन्मंथनोत्पन्नशुष्कपर्णोपचीयमानेन्धननिचयसमिद्धपावकवत्स-
म्यग्दर्शनादिगुणविशुद्धिपरिणामसंनिधानाद्यत्परिमाण उत्पन्नस्ततो वर्द्धते आ संख्येय-
लोकेभ्यः । अपरोऽवधिः ३परिच्छिन्नोपादानसंतत्यग्निशिखावत्सम्यग्दर्शनादिगुणहानिसंक्लेेशपरि-
णामवृद्धियोगाद्यत्परिमाण उत्पन्नस्ततो हीयते आ अङ्गुलस्यासंख्येयभागात् । इतरोऽवधिः सम्य-
ग्दर्शनादिगुणावस्थानाद्यत्परिमाण उत्पन्नस्तत्परिमाण एवावतिष्ठते; न हीयते नापि वर्धते लिङ्गवत्
क्षयोपशमनिमित्तक अवधिज्ञान छह प्रकारका है। जो शेष अर्थात् तिर्यंचों और मनुष्योंके
होता है ॥ २२ ॥
§ २१५. अवधिज्ञानावरण कर्मके देशघाती स्पर्धकोंका उदयाभावी क्षय और अनुदय प्राप्त
इन्हींका सदवस्थारूप उपशम इन दोनोंके निमित्तसे जो होता है वह क्षयोपशमनिमित्तक अवधि-
ज्ञान है। यह शेष जीवोंके जानना चाहिए। शंका - शेष कौन हैं ? समाधान - मनुष्य और
तिर्यंच। उनमें भी जिनके सामर्थ्य है उन्हींके जानना चाहिए। असंज्ञी और अपर्याप्तकोंके यह
सामर्थ्य नहीं है। संज्ञी और पर्याप्तकोंमें भी सबके यह सामर्थ्य नहीं होती । शंका - तो फिर किनके
होती है ? समाधान - यथोक्त सम्यग्दर्शन आदि निमित्तोंके मिलने पर जिनके अवधिज्ञानावरण
कर्म शान्त और क्षीण हो गया है उनके यह सामर्थ्य होती है। यद्यपि अवधिज्ञानमात्र क्षयोपशमके
निमित्तसे होता है तो भी सूत्रमें क्षयोपशम पदका ग्रहण यह नियम करनेके लिए किया है कि
उक्त जीवोंके मात्र क्षयोपशम निमित्त है भव नहीं। यह अवधिज्ञान अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान,
हीयमान, अवस्थित और अनवस्थितके भेदसे छह प्रकारका है। कोई अवधिज्ञान जैसे सूर्यका
प्रकाश उसके साथ जाता है वैसे अपने स्वामीका अनुसरण करता है। कोई अवधिज्ञान अनुसरण
नहीं करता किन्तु जैसे विमुख हुए पुरुषके प्रश्नके उत्तरस्वरूप दूसरा पुरुष जो वचन कहता है वह
वहीं छूट जाता है, विमुख पुरुष उसे ग्रहण नहीं करता है वैसे ही यह अवधिज्ञान भी वहींपर छूट
जाता है। कोई अवधिज्ञान जंगलके निर्मन्थनसे उत्पन्न हुई और सूखे पत्तोंसे उपचीयमान ईंधनके
समुदायसे वृद्धिको प्राप्त हुई अग्निके समान सम्यग्दर्शनादि गुणोंकी विशुद्धि रूप परिणामोंके सन्नि-
धानवश जितने परिमाणमें उत्पन्न होता है उससे असंख्यात लोक जानने की योग्यता होने तक
बढ़ता जाता है। कोई अवधिज्ञान परिमित उपादानसन्ततिवाली अग्निशिखाके समान सम्यग्दर्श-
नादि गुणोंकी हानिसे हुए संक्लेश परिणामोंकें बढ़नेसे जितने परिमाणमें उत्पन्न होता है उससे
मात्र अंगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण जाननेकी योग्यता होने तक घटता चला जाता है। कोई
अवधिज्ञान सम्यग्दर्शनादि गुणोंके समानरूपसे स्थिर रहनेके कारण जितने परिमाणमें उत्पन्न
होता है उतना ही बना रहता है। पर्यायके नाश होते तक या केवलज्ञानके उत्पन्न होने तक
१. 'सेसाण खओवसमियाओ ।' -वि० आ० गा० ५७५ । २. -तति । उन्मुग्धप्र- ता०, ना०, मु० ।
३. -वह्निः परिमितपरि-मु० ।
- १।२३ § २१८ ] प्रथमोऽध्यायः ८९
आ भवक्षयादाकेवलज्ञानोत्पत्तेर्वा । अन्योऽवधिः सम्यग्दर्शनादिगुणवृद्धिहानियोगाद्यत्परिमाण
उत्पन्नस्ततो वर्धते यावदनेन वर्धितव्यं हीयते च यावदनेन हातव्यं वायुवेगप्रेरितजलोर्मिवत् । एवं
षड्विकल्पोऽवधिर्भवति ।
§ २१६. एवं व्याख्यातमवधिज्ञानं तदनन्तरमिदानीं मनःपर्ययज्ञानं वक्तव्यम् । तस्य भेद-
पुरःसरं लक्षणं व्याचिख्यासुरिदमाह— ५
ऋजुविपुलमती मनःपर्ययः ॥२३॥
§ २१७. ऋज्वी निर्वर्तिता प्रगुणा च । कस्मान्निर्वर्तिता । वाक्कायमनःकृतार्थस्य परमनो-
गतस्य विज्ञानात् । ऋज्वी मतिर्यस्य सोऽयं ऋजुमतिः । अनिर्वर्तिता कुटिला च विपुला । कस्माद-
निर्वर्तिता । वाक्कायमनःकृतार्थस्य परकीयमनोगतस्य विज्ञानात् । विपुला मतिर्यस्य सोऽयं विपुल-
मतिः । ऋजुमतिश्च विपुलमतिश्च ऋजुविपुलमती । एकस्य मतिशब्दस्य गतार्थत्वादप्रयोगः । १०
अथवा ऋजुश्च विपुला च ऋजुविपुले । ऋजुविपुले मती ययोस्तौ ऋजुविपुलमती इति । स एष
मनःपर्ययो द्विविधः ऋजुमतिर्विपुलमतिरिति ।
§ २१८. आह, उक्तो भेदः, लक्षणमिदानीं वक्तव्यमित्यत्रोच्यते—वीर्यान्तरायमनःपर्यय-
ज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलाभावष्टम्भादात्मनः परकीयमनःसंबन्धेन लब्धवृत्तिरुपयोगो
मनःपर्ययः । मतिज्ञानप्रसङ्ग इति चेत् उक्तोत्तरं पुरस्तात् । अपेक्षाकारणं मन इति । परकीयमनसि १५
शरीरमें स्थित मसा आदि चिह्नके समान न घटता है और न बढ़ता है। कोई अवधिज्ञान वायुके
वेगसे प्रेरित जलकी तरंगोंके समान सम्यग्दर्शनादि गुणोंकी कभी वृद्धि और कभी हानि होनेसे
जितने परिमाणमें उत्पन्न होता है उससे बढ़ता है जहांतक उसे बढ़ना चाहिए और घटता है जहां-
तक उसे घटना चाहिए । इस प्रकार अवधिज्ञान छह प्रकारका है।
विशेषार्थ—क्षयोपशमनिमित्तक अवधिज्ञानके तीन भेद हैं—देशावधि, परमावधि और सर्वा- २०
वधि । देशावधि तिर्यंचों और मनुष्योंके होता है पर मनुष्योंके संयत अवस्थामें परमावधि और
सर्वावधिका प्राप्त होना भी सम्भव है । मनुष्योंके चौथे और पांचवें गुणस्थानमें देशावधि और आगे
के गुणस्थानोंमें यथासम्भव तीनों होते हैं । भवप्रत्यय अवधिज्ञानका अन्तर्भाव देशावधिमें होता है ।
§ २१६. इस प्रकार अवधिज्ञानका व्याख्यान किया । अब आगे मनःपर्ययज्ञानका व्याख्यान
करना चाहिए । अतः उसके भेदोंके साथ लक्षणका कथन करनेकी इच्छासे आगेका सूत्र कहते हैं— २५
ऋजुमति और विपुलमति मनःपर्ययज्ञान है ॥ २३॥
§ २१७. ऋजुका अर्थ निर्वर्तित और प्रगुण है। शंका- किससे निर्वर्तित ? समाधान-
दूसरेके मनको प्राप्त हुए वचन, काय और मनकृत अर्थके विज्ञानसे निर्वर्तित । जिसकी मति ऋजु
है वह ऋजुमति कहलाता है । विपुलका अर्थ अनिर्वर्तित और कुटिल है । शंका—किससे अनिर्व-
र्तित ? समाधान—दूसरेके मनको प्राप्त हुए वचन, काय और मनकृत अर्थके विज्ञानसे अनिर्वर्तित । ३०
जिसकी मति विपुल है वह विपुलमति कहलाता है । सूत्रमें जो 'ऋजुविपुलमती' पद आया है वह
ऋजुमति और विपुलमति इन पदोंसे समसित होकर बना है। यहाँ एक ही मति शब्द पर्याप्त होने-
से दूसरे मति शब्दका प्रयोग नहीं किया । अथवा ऋजु और विपुल शब्दका कर्मधारय समास
करनेके बाद इनका मति शब्दके साथ बहुव्रीहि समास कर लेना चाहिए । तब भी दूसरे मति
शब्दकी आवश्यकता नहीं रहती । यह मनःपर्ययज्ञान दो प्रकारका है—ऋजुमति और विपुलमति । ३५
§ २१८. शंका—मनःपर्ययज्ञानके भेद तो कह दिये। अब उसका लक्षण कहना चाहिए ।
समाधान—वीर्यान्तराय और मनःपर्यय ज्ञानावरणके क्षयोपशम और अंगोपांग नामकर्मके आल-
म्बनसे आत्मामें जो दूसरेके मनके सम्बन्धसे उपयोग जन्म लेता है उसे मनःपर्ययज्ञान कहते हैं।
१२
९० सर्वार्थसिद्धौ [ १।२४ § २१९ –
व्यवस्थितोऽर्थः अनेन ज्ञायते इत्येतावदत्रापेक्ष्यते¹ । तत्र ऋजुमतिर्मनःपर्ययः कालतो जघन्येन
जीवानामात्मनश्च ²द्वित्रीणि भवग्रहणानि, उत्कर्षेण सप्ताष्टौ गत्यागत्यादिभिः प्ररूपयति । क्षेत्रतो
जघन्येन गव्यूतिपृथक्त्वं, उत्कर्षेण योजनपृथक्त्वस्याभ्यन्तरं, न बहिः । द्वितीयः कालतो जघन्येन
सप्ताष्टौ भवग्रहणानि, उत्कर्षेणासंख्येयानि गत्यागत्यादिभिः प्ररूपयति । क्षेत्रतो जघन्येन योजन-
पृथक्त्वं, उत्कर्षेण मानुषोत्तरशैलस्याभ्यन्तरं, न बहिः ।
§ २१९. उक्तयोरनयोः पुनरपि विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ॥ २४ ॥
§ २२०. तदावरणक्षयोपशमे सति आत्मनः प्रसादो विशुद्धिः । प्रतिपतनं प्रतिपातः ।
न प्रतिपातः अप्रतिपातः । उपशान्तकषायस्य चारित्रमोहोद्रेकात्प्रच्युतसंयमशिखरस्य प्रतिपातो
भवति । क्षीणकषायस्य प्रतिपातकारणाभावादप्रतिपातः । विशुद्धिश्च अप्रतिपातश्च विशुद्धयप्रति-
शंका—यह ज्ञान मनके सम्बन्धसे होता है अतः इसे मतिज्ञान होनेका प्रसंग आता है ? समाधान—
नहीं, क्योंकि इस शंकाका उत्तर दे आये हैं। अर्थात् यहाँ मनकी अपेक्षामात्र है । दूसरेके मनमें
अवस्थित अर्थ को यह जानता है इतनी मात्र यहाँ मनकी अपेक्षा है । इनमेंसे ऋजुमति मनःपर्यय-
ज्ञान कालकी अपेक्षा जघन्यसे जीवोंके और अपने दो तीन भवोंको ग्रहण करता है, उत्कृष्टसे गति
और आगतिकी अपेक्षा सात-आठ भवोंका कथन करता है । क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्यसे गव्यूतिपृथक्त्व
और उत्कृष्टसे योजनपृथक्त्वके भीतरकी बात जानता है । इससे बाहरकी नहीं । विपुलमति
कालकी अपेक्षा जघन्यसे सात-आठ भवोंको ग्रहण करता है, उत्कृष्टसे गति और आगतिकी अपेक्षा
असंख्यात भवोंका कथन करता है । क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्यसे योजनापृथक्त्व और उत्कृष्टसे मानुषो-
त्तर पर्वतके भीतरकी बात जानता है इससे बाहरकी बात नहीं जानता ।
विशेषार्थ—तत्त्वार्थसूत्रके छठवें अध्यायके दसवें सूत्रके राजवार्तिकमें शंका-समाधानके
प्रसंगसे मनःपर्ययज्ञानकी चर्चा की है। वहाँ बतलाया है कि मनःपर्ययज्ञान अपने विषयमें अवधि-
ज्ञानके समान स्वमुखसे प्रवृत्त नहीं होता है । किन्तु दूसरेके मनके सम्बन्धसे ही प्रवृत्त होता है ।
इसलिए जैसे मन अतीत और अनागत विषयोंका विचार तो करता है पर साक्षात्कार नहीं करता
उसी प्रकार मनःपर्ययज्ञानी भी भूत और भविष्यत् विषयोंको जानता तो है पर सीधे तौरसे
साक्षात्कार नहीं करता । इसी प्रकार यह वर्तमान विषयको भी मनोगत होने पर विशेषरूपसे
जानता है।' राजवार्तिकका यह कथन इतना स्पष्ट है जिससे मनःपर्ययज्ञानकी उपयोगात्मक
दशाका स्पष्ट आभास मिल जाता है । इसका आशय यह है कि करता तो है यह मनकी पर्यायोंको
ही विषय किन्तु तद्द्वारा पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है। इसके दो भेद हैं—ऋजुमति और
विपुलमति ।
§ २१९. पहले मनःपर्ययज्ञानके दो भेद कहे हैं उनका और विशेष ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
विशुद्धि और अप्रतिपातकी अपेक्षा इन दोनोंमें अन्तर है ॥२४॥
§ २२०. मनःपर्ययज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होनेपर जो आत्मामें निर्मलता आती है उसे
विशुद्धि कहते हैं । गिरनेका नाम प्रतिपात है और नहीं गिरना अप्रतिपात कहलाता है । उपशान्त-
कषाय जीवका चारित्र मोहनीयके उदयसे संयम शिखर छूट जाता है जिससे प्रतिपात होता है और
क्षीणकषाय जीवका पतनका कारण न होनेसे प्रतिपात नहीं होता । इन दोनोंकी अपेक्षा ऋजुमति
१. -पेक्षते आ० दि० १, दि० २ । २. –द्वित्रीणि मु० ।
- १२५ § २२१ ] प्रथमोऽध्यायः ९१
पातौ । १ताभ्यां विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्याम् । तयोर्विशेषस्तद्विशेषः । तत्र विशुद्ध्या तावत्-ऋजुमते-
विपुलमतिर्द्रव्यक्षेत्रकालभावैर्विशुद्धतरः । कथम् । इह यः कार्मणद्रव्यानन्तभागोऽन्त्यः सर्वावधिना
ज्ञातस्तस्य पुनरनन्तभागीकृतस्यान्त्यो भाग ऋजुमतेर्विषयः । तस्य ऋजुमतिविषयस्यानन्तभागी-
कृतस्यान्त्यो भागो विपुलमतेर्विषयः । अनन्तस्यानन्तभेदत्वात् । द्रव्यक्षेत्रकालतो विशुद्धिरुक्ता ।
भावतो विशुद्धिः सूक्ष्मतरद्रव्यविषयत्वादेव वेदितव्या प्रकृष्टक्षयोपशमविशुद्धियोगात् । अप्रतिपातेनापि ५
विपुलमतिर्विशिष्टः ; स्वामिनां प्रवर्द्धमानचारित्रोदयत्वात् । ऋजुमतिः पुनः प्रतिपाती ; स्वामिनां
कषायोद्रेकाद्धीयमानचारित्रोदयत्वात् ।
§ २२१. यद्यस्य मनःपर्ययस्य प्रत्यात्ममयं विशेषः, अथानयोरवधिमनःपर्यययोः कुतो
विशेष इत्यत आह—
विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ॥२५॥ १०
और विपुलमतिमें भेद है । विशुद्धि यथा—ऋजुमतिसे विपुलमति द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी
अपेक्षा विशुद्धतर है । शंका—कैसे ? समाधान—यहाँ जो कार्मण द्रव्यका अनन्तवाँ अन्तिम भाग
सर्वावधिज्ञानका विषय है उसके भी अनन्त भाग करनेपर जो अन्तिम भाग प्राप्त होता है वह
ऋजुमतिका विषय है । और इस ऋजुमतिके विषयके अनन्त भाग करनेपर जो अन्तिम भाग प्राप्त
होता है वह विपुलमतिका विषय है । अनन्तके अनन्त भेद हैं अतः ये उत्तरोत्तर सूक्ष्म विषय बन १५
जाते हैं । इस प्रकार द्रव्य, क्षेत्र और कालकी अपेक्षा विशुद्धि कही । भावकी अपेक्षा विशुद्धि
उत्तरोत्तर सूक्ष्म द्रव्यको विषय करनेवाला होनेसे ही जान लेनी चाहिए क्योंकि इनका उत्तरोत्तर
प्रकृष्ट क्षयोपशम पाया जाता है, इसलिए ऋजुमतिसे विपुलमतिमें विशुद्धि अधिक होती है ।
अप्रतिपातकी अपेक्षा भी विपुलमति विशिष्ट है; क्योंकि इसके स्वामियोंके प्रवर्धमान चारित्र
पाया जाता है । परन्तु ऋजुमति प्रतिपाती है; क्योंकि इसके स्वामियोंके कषायके उदयसे घटता २०
हुआ चारित्र पाया जाता है ।
विशेषार्थ—यहाँ मनःपर्यय ज्ञानके दोनों भेदोंमें अन्तर दिखलाया गया है । ऋजुमति स्थूल
ज्ञान है और विपुलमति सूक्ष्मज्ञान । इसीसे इसका भेद स्पष्ट हो जाता है । यह विशुद्धिकृत भेद
है । इससे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा पदार्थका ज्ञान करनेमें अन्तर पड़ जाता है । किन्तु
इन दोनों ज्ञानोंके अन्तरका एक कारण और है जो कि प्रतिपात और अप्रतिपात शब्दसे पुकारा २५
जाता है । प्रतिपातका अर्थ है गिरना और अप्रतिपातका अर्थ है नहीं गिरना । ऐसा नियम है कि
विपुलमति मनःपर्ययज्ञान उसीके होता है जो तद्भव मोक्षगामी होते हुए भी क्षपकश्रेणीपर चढ़ता
है किन्तु ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञानके लिए ऐसा कोई नियम नहीं है । वह तद्भव मोक्षगामीके भी
हो सकता है और अन्यके भी हो सकता है । इसी प्रकार जो क्षपक श्रेणीपर चढ़ता है उसके भी
हो सकता है और जो उसपर नहीं चढ़कर उपशम श्रेणीपर चढ़ता है या नहीं भी चढ़ता है उसके ३०
भी हो सकता है । इसीसे ऋजुमति प्रतिपाती और विपुलमति अप्रतिपाती माना गया है । यह
विशेषता योग्यताजन्य है इसलिए इसका निर्देश अलगसे किया है ।
§ २२१. यदि इस मनःपर्ययज्ञानका अलग-अलग यह भेद है तो अवधिज्ञान और मनःपर्यय
ज्ञानमें किस कारणसे भेद है ? अब इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं--
विशुद्धि, क्षेत्र, स्वामी और विषयकी अपेक्षा अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें भेद है ॥२५॥ ३५
१. ताभ्याम् । तयोः मु० ।
§ २२२. विशुद्धिः प्रसादः। क्षेत्रं यत्रस्थान्भावान्प्रतिपद्यते। स्वामी प्रयोक्ता। विषयो ज्ञेयः।
तत्रावधेर्मनःपर्ययो विशुद्धतरः। कुतः सूक्ष्मविषयत्वात्। क्षेत्रमुक्तम्¹। विषयो वक्ष्यते। स्वामित्वं
प्रत्युच्यते। प्रकृष्टचारित्रगुणोपेतेषु वर्तते² प्रमत्तादिषु क्षीणकषायान्तेषु। तत्र चोत्पद्यमानः प्रवर्द्ध-
मानचारित्रेषु न हीयमानचारित्रेषु। प्रवर्द्धमानचारित्रेषु चोत्पद्यमानः सप्तविधान्यतमर्द्धिप्राप्तेषूप-
जायते नेतरेषु। ऋद्धिप्राप्तेषु केषुचिन्न सर्वेषु। ³इत्यस्यायं स्वामिविशेषो विशिष्टसंयमग्रहणं वा
वाक्ये प्रकृतम्। अवधिः पुनश्चातुर्गतिकेष्विति स्वामिभेदादप्यनयोर्विशेषः।
§ २२३. इदानीं केवलज्ञानलक्षणाभिधानं प्राप्तकालम्। तदुल्लङ्घ्य ज्ञानानां विषयनिबन्धः
परीक्ष्यते। कुतः। तस्य 'मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम्' इत्यत्र वक्ष्यमाणत्वात्।
यद्येवमाद्ययोरेव तावन्मतिश्रुतयोर्विषयनिबन्ध उच्यतामित्यत आह—
मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ॥२६॥
§ २२४. निबन्धनं निबन्धः। कस्य। विषयस्य। तद्विषयग्रहणं कर्तव्यम्। न कर्तव्यम्।
प्रकृतं विषयग्रहणम्। क्व प्रकृतम्। 'विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः' ४इत्यत्र। अतस्तस्यार्थवशादिह-
§ २२२. विशुद्धिका अर्थ निर्मलता है। जितने स्थानमें स्थित भावोंको जानता है वह क्षेत्र
है। स्वामीका अर्थ प्रयोक्ता है। विषय ज्ञेयको कहते हैं। सो इन दोनों ज्ञानोंमें अवधिज्ञानसे मनः-
पर्ययज्ञान विशुद्धतर है क्योंकि मनःपर्ययज्ञानका विषय सूक्ष्म है। क्षेत्रका कथन पहले कर आये हैं।
विषयका कथन आगे करेंगे। यहाँ स्वामीका विचार करते हैं—मनःपर्ययज्ञान प्रमत्तसंयतसे लेकर
क्षीणकषाय गुणस्थान तकके उत्कृष्ट चारित्रगुणसे युक्त जीवोंके ही पाया जाता है। वहाँ उत्पन्न
होता हुआ भी वह वर्द्धमान चारित्रवाले जीवोंके ही उत्पन्न होता है घटते हुए चारित्रवाले जीवोंके
नहीं। वर्धमान चारित्रवाले जीवोंमें उत्पन्न होता हुआ भी सात प्रकारकी ऋद्धियोंमें-से किसी एक
ऋद्धिको प्राप्त हुए जीवोंके ही उत्पन्न होता है अन्यके नहीं। ऋद्धिप्राप्त जीवोंमें भी किन्हींके ही
उत्पन्न होता है सबके नहीं, इस प्रकार सूत्रमें इसका स्वामीविशेष या विशिष्ट संयमका ग्रहण
प्रकृत है। परन्तु अवधिज्ञान चारों गतिके जीवोंके होता है, इसलिए स्वामियोंके भेदसे भी इनमें
अन्तर है।
विशेषार्थ—यों तो अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें मौलिक अन्तर है। अवधिज्ञान सीधे
तौरसे पदार्थोंको जानता है और मनःपर्ययज्ञान मनकी पर्यायरूपसे। फिर भी यहाँ अन्य आधारोंसे
इन दोनों ज्ञानोंमें अन्तर दिखलाया गया है। वे आधार चार हैं—द्रव्य, क्षेत्र, स्वामी और विषय।
§ २२३. अब केवलज्ञानका लक्षण कहनेका अवसर है किन्तु उसका कथन न कर पहले
ज्ञानोंके विषयका विचार करते हैं, क्योंकि केवलज्ञानका लक्षण 'मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्त-
रायक्षयाच्च केवलम्' यहाँ कहेंगे। यदि ऐसा है तो सर्वप्रथम आदिमें आये हुए मतिज्ञान और
श्रुतज्ञानके विषयका कथन करना चाहिए। इसी बातको ध्यान में रखकर आगेका सूत्र कहते हैं—
मतिज्ञान और श्रुतज्ञानकी प्रवृत्ति कुछ पर्यायोंसे युक्त सब द्रव्योंमें होती है ॥२६॥
§ २२४. निबन्ध शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—निबन्धनं निबन्धः = जोड़ना, सम्बन्ध
करना। शंका—किसका सम्बन्ध ? समाधान—विषयका। शंका—तो सूत्रमें विषय पदका ग्रहण
करना चाहिए ? समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि विषय पदका ग्रहण प्रकरण प्राप्त है।
शंका—कहाँ प्रकरणमें आया है ? समाधान—'विषयक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः' इस सूत्रमें आया है।
१. मुक्तं विशेषो ब-मु० । २. -तेऽप्रम- मु०, दि० १, २ । ३. इत्यस्य स्वामिविशेषविशिष्टसंयमग्रहणं वाक्ये
कृतम् । अव-मु० ता०, ना० । ४. -येभ्य इत्यतस्त-दि० १, दि० २, आ०, मु० ।
- १।२८ § २२७ ] प्रथमोऽध्यायः ९३
भक्तिपरिणामो भवतीति विषयस्य' इत्यभिसंबध्यते । 'द्रव्येषु' इति बहुवचननिर्देशः सर्वेषां
जीवधर्माधर्म १कालाकाशपुद्गलानां संग्रहार्थः । तद्विशेषणार्थं 'असर्वपर्याय' ग्रहणम् । तानि द्रव्याणि
मतिश्रुतयोर्विषयभावमापद्यमानानि कतिपयैरेव पर्यायैर्विषयभावमास्कन्दन्ति न सर्वपर्यायैरनन्तैर-
पीति । अत्राह—धर्मास्तिकायादीन्यतीन्द्रियाणि तेषु मतिज्ञानं न प्रवर्तते । अतः सर्वद्रव्येषु मतिज्ञानं
वर्तत इत्ययुक्तम् । नैष दोषः ; अनिन्द्रियाख्यं करणमस्ति तदालम्बनो नोइन्द्रियावरणक्षयोपशम- ५
लब्धिपूर्वक उपयोगोऽवग्रहादिरूपः प्रागेवोपजायते । ततस्तत्पूर्वं श्रुतज्ञानं तद्विषयेषु स्वयोग्येषु
व्याप्रियते ।
§ २२५. अथ मतिश्रुतयोरनन्तरनिर्देशार्हस्यावधेः को विषयनिबन्ध इत्यत आह—
रूपिष्ववधेः ॥२७॥
§ २२६. 'विषयनिबन्धः' इत्यनुवर्तते । 'रूपिषु' इत्यनेन पुद्गलाः पुद्गलद्रव्यसंबन्धाश्च १०
जीवाः परिगृह्यन्ते । रूपिष्वेवावधेर्विषयनिबन्धो २नारूपिष्विति नियमः क्रियते । रूपिष्वपि भवन्न
सर्वपर्यायेषु, स्वयोग्येष्वेवेत्यवधारणार्थमसर्वपर्यायेष्वित्यभिसंबध्यते ।
§ २२७. अथ तदनन्तरनिर्देशभाजो मनःपर्ययस्य को विषयनिबन्ध इत्यत आह—
तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ॥२८॥
वहांसे 'विषय' पदको ग्रहण कर अर्थके अनुसार उसकी विभक्ति बदल ली गयी है, इसलिए १५
यहाँ षष्ठी विभक्तिके अर्थमें उसका ग्रहण हो जाता है । सूत्रमें 'द्रव्येषु' बहुवचनान्त पदका
निर्देश जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन सब द्रव्योंका संग्रह करनेके लिए
किया है । और इन सब द्रव्योंके विशेषण रूपसे 'असर्वपर्यायेषु' पदका ग्रहण किया है । वे सब
द्रव्य मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके विषय भावको प्राप्त होते हुए कुछ पर्यायोंके द्वारा ही विषय-
भावको प्राप्त होते हैं, सब पर्यायोंके द्वारा नहीं और अनन्त पर्यायोंके द्वारा भी नहीं । २०
शंका—धर्मास्तिकाय आदि अतीन्द्रिय हैं । उनमें मतिज्ञानकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती, अतः
'सब द्रव्योंमें मतिज्ञानकी प्रवृत्ति होती है' यह कहना अयुक्त है ? समाधान—यह कोई दोष
नहीं है, क्योंकि अनिन्द्रिय नामका एक करण है । उसके आलम्बनसे नोइन्द्रियावरण कर्मके
क्षयोपशमरूप लब्धिपूर्वक अवग्रह आदिरूप उपयोग पहले ही उत्पन्न हो जाता है, अतः तत्पूर्वक
होनेवाला श्रुतज्ञान अपने योग्य इन विषयोंमें व्यापार करता है । २५
§ २२५. मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके अनन्तर निर्देशके योग्य अवधिज्ञानका विषय क्या है
आगे सूत्र द्वारा इसी बातको बतलाते हैं—
अवधिज्ञानकी प्रवृत्ति रूपी पदार्थोंमें होती है ॥२७॥
§ २२६. पिछले सूत्रसे 'विषयनिबन्धः' पदकी अनुवृत्ति होती है । 'रूपिषु' पद-द्वारा पुद्गलों
और पुद्गलोंमें बद्ध जीवोंका ग्रहण होता है । इस सूत्र-द्वारा 'रूपी पदार्थोंमें ही अवधिज्ञानका ३०
विषय सम्बन्ध है अरूपी पदार्थोंमें नहीं' यह नियम किया गया है । रूपी पदार्थोंमें होता हुआ भी
उनकी सब पर्यायोंमें नहीं होता किन्तु स्वयोग्य पर्यायोंमें ही होता है इस प्रकारका निश्चय करनेके
लिए 'असर्वपर्यायेषु' पदका सम्बन्ध होता है ।
§ २२७. अब इसके अनन्तर निर्देशके योग्य मनःपर्ययज्ञानका विषयसम्बन्ध क्या है इस
बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— ३५
मनःपर्ययज्ञानकी प्रवृत्ति अवधिज्ञानके विषयके अनन्तवें भागमें होती है ॥ २८ ॥
१. धर्माकाश-मु० । २. नारूपेष्विति मु० ।
९४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।२९ § २२८ -
§ २२८. यदेतद्रूपि¹ द्रव्यं सर्वावधिज्ञानविषयत्वेन समर्थितं तस्यानन्तभागीकृतस्यैकस्मिन्भागे
मनःपर्ययः प्रवर्तते ।
§ २२९. अथान्ते यन्निर्द्दिष्टं केवलज्ञानं तस्य को विषयनिबन्ध इत्यत आह—
सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥२९॥
§ २३०. द्रव्याणि च पर्यायाश्च द्रव्यपर्याया इति इतरेतरयोगलक्षणो द्वन्द्वः । तद्विशेषणं
'सर्व'ग्रहणं प्रत्येकमभिसंबध्यते, सर्वेषु द्रव्येषु सर्वेषु पर्यायेष्विति । जीवद्रव्याणि तावदनन्ता-
नन्तानि ततोऽप्यनन्तानन्तानि पुद्गलद्रव्याणि च अणुस्कन्धभेदैर्भिन्नानि, धर्माधर्माकाशानि त्रीणि,
कालश्चासंख्येयस्तेषां पर्यायाश्च त्रिकालभुवः प्रत्येकमनन्तानन्तास्तेषु । द्रव्यं पर्यायजातं वा न
किंचित्केवलज्ञानस्य विषयाभावमतिक्रान्तमस्ति । अपरिमितमाहात्म्यं हि तदिति ज्ञापनार्थं
'सर्वद्रव्यपर्यायेषु' इत्युच्यते ।
§ २३१. आह विषयनिबन्धोऽवधृतो मत्यादीनाम् । इदं तु न निर्ज्ञातमेकस्मिन्नात्मनि स्वनि-
मित्तसंनिधानोपजनितवृत्तीनि ज्ञानानि यौगपद्येन कति भवन्तीत्युच्यते—
§ २२८. जो रूपी द्रव्य सर्वावधिज्ञानका विषय है उसके अनन्त भाग करनेपर उसके एक
भागमें मनःपर्ययज्ञान प्रवृत्त होता है ।
§ २२९. अब अन्तमें जो केवलज्ञान कहा है उसका विषय क्या है यह बतलानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
केवलज्ञानकी प्रवृत्ति सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायोंमें होती है ॥ २९ ॥
§ २३०. सूत्रमें आये हुए द्रव्य और पर्याय इन दोनों पदोंका इतरेतरयोग द्वन्द्वसमास है ।
तथा इन दोनोंके विशेषणरूपसे आये हुए 'सर्व' पदको द्रव्य और पर्याय इन दोनोंके साथ जोड़ लेना
चाहिए । यथा—सब द्रव्योंमें और सब पर्यायोंमें । जीव द्रव्य अनन्तानन्त हैं। पुद्गल द्रव्य इनसे
भी अनन्तानन्तगुणे हैं । जिनके अणु और स्कन्ध ये भेद हैं। धर्म, अधर्म और आकाश ये तीन
हैं और काल असंख्यात हैं। इन सब द्रव्योंकी पृथक्-पृथक् तीनों कालोंमें होनेवाली अनन्तानन्त
पर्यायें हैं। इन सबमें केवलज्ञानकी प्रवृत्ति होती है । ऐसा न कोई द्रव्य है और न पर्यायसमूह है
जो केवलज्ञानके विषयके परे हो। केवलज्ञानका माहात्म्य अपरिमित है इसी बातका ज्ञान करानेके
लिए सूत्रमें 'सर्वद्रव्यपर्यायेषु' पद कहा है ।
विशेषार्थ—यहाँ चार सूत्रोंमें पाँचों ज्ञानोंके विषयका निर्देश किया गया है। मतिज्ञान
और श्रुतज्ञान पाँचों इन्द्रियों और मनकी सहायतासे प्रवृत्त होते हैं यह तो स्पष्ट ही है इसलिए
इनका विषय मूर्तिक पदार्थ ही हो सकता है पर मन विकल्प-द्वारा रूपी और अरूपी सभी पदार्थों-
को जानता है इसीसे इन दोनों ज्ञानोंका विषय छहों द्रव्य और उनकी कुछ पर्यायोंको बतलाया है ।
अवधिज्ञान यद्यपि बाह्य सहायताके बिना प्रवृत्त होता है पर वह क्षायोपशमिक होनेसे उसका
विषय मूर्तिक पदार्थ ही हो सकता है। इसी कारणसे अवधिज्ञानका विषय रूपी पदार्थ कहा है ।
मनःपर्यय ज्ञान भी क्षायोपशमिक होता है, इसलिए उसका विषय यद्यपि रूपी पदार्थ ही है पर
यह रूपी पदार्थको मनकी पर्यायों-द्वारा ही ग्रहण करता है इससे इसका विषय अवधिज्ञानके
विषयके अनन्तवें भागप्रमाण कहा है तथा केवलज्ञान निरावरण होता है इसलिए उसका विषय
सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायें हैं ऐसा कहा है ।
§ २३१. मत्यादिकके विषयसम्बन्धका निश्चय किया, किन्तु यह न जान सके कि एक
१. यद्रूपि-दि० १, दि० २ । २. भेदेन मि-मु० ।
- १३० ६ २३२ ] प्रथमोऽध्यायः ९५
एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्ना चतुर्भ्यः ॥३०॥
§ २३२. एकशब्दः संख्यावाची, आदिशब्दोऽवयववचनः । एक आदिर्येषां तानि इमान्येका-
दीनि । भाज्यानि विभक्तव्यानि । यौगपद्येनैकस्मिन्नात्मनि । आ कुतः । आ चतुर्भ्यः । तद्यथा-
एकं तावत्केवलज्ञानं, न तेन सहान्यानि क्षायोपशमिकानि युगपदवतिष्ठन्ते । द्वे मतिश्रुते । त्रीणि
मतिश्रुतावधिज्ञानानि, मतिश्रुतमनःपर्ययज्ञानानि वा । चत्वारि मतिश्रुतावधिमनःपर्ययज्ञानानि । ५
न पञ्च सन्ति, केवलस्यासहायत्वात् ।
आत्मामें एक साथ अपने-अपने निमित्तोंके मिलनेपर कितने ज्ञान उत्पन्न हो सकते हैं, इसी बातका
ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
एक आत्मामें एक साथ एकसे लेकर चार तक ज्ञान भजनासे होते हैं ॥ ३० ॥
§ २३२. 'एक' शब्द संख्यावाची है और 'आदि' शब्द अवयववाची है । जिनका आदि एक १०
है वे एकादि कहलाते हैं। 'भाज्यानि' का अर्थ 'विभाग करना चाहिए' होता है। तात्पर्य यह है
कि एक आत्मामें एक साथ एक ज्ञानसे लेकर चार ज्ञान तक हो सकते हैं। यथा-यदि एक ज्ञान
होता है तो केवलज्ञान होता है। उसके साथ दूसरे क्षायोपशमिक ज्ञान एक साथ नहीं रह सकते ।
दो होते हैं तो मतिज्ञान और श्रुतज्ञान होते हैं। तीन होते हैं तो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधि-
ज्ञान या मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और मनःपर्ययज्ञान होते हैं। तथा चार होते हैं तो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, १५
अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान होते हैं। एक साथ पाँच ज्ञान नहीं होते, क्योंकि केवलज्ञान
असहाय है।
विशेषार्थ-यहाँ एक साथ एक आत्मामें कमसे कम कितने और अधिकसे अधिक कितने
ज्ञान हो सकते हैं इस बातका निर्देश किया है। यह तो स्पष्ट है कि ज्ञान एक है अतः उसकी पर्याय
भी एक कालमें एक ही हो सकती है फिर भी यहाँ एक आत्मामें एक साथ कई ज्ञान होनेका निर्देश २०
किया है सो उसका कारण अन्य है। बात यह है कि जब ज्ञान निरावरण होता है तब तो उसमें
किसी प्रकारका भेद नहीं किया जा सकता है, अतएव ऐसो अवस्थामें एक केवलज्ञान पर्यायका ही
प्रकाश माना गया है। किन्तु संसार अवस्थामें जब ज्ञान सावरण होता है तब निमित्त भेदसे उसी
ज्ञानको कई भागोंमें विभक्त कर दिया जाता है। सावरण अवस्थामें जितने भो ज्ञान प्रकट होते हैं
वे सब क्षायोपशमिक ही होते हैं और क्षयोपशम एक साथ कई प्रकारका हो सकता है, इसलिए २५
सावरण अवस्थामें दो, तीन या चार ज्ञानकी सत्ता युगपत् मानो गयी है। पर इसका यह अर्थ
नहीं कि जब दो, तीन या चार ज्ञानकी सत्ता रहती है तब वे सब ज्ञान एक साथ उपयोगरूप हो
सकते हैं। उपयोग तो एक कालमें एक ही ज्ञानका होता है अन्य ज्ञान उस समय लब्धिरूपसे रहते
हैं। आशय यह है कि ऐसा कोई क्षण नहीं जब ज्ञानको कोई पर्याय प्रकट न हो। मतिज्ञान,
श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये सब ज्ञानकी पर्यायें हैं इसलिए इनमेंसे ३०
एक कालमें एक ही पर्यायका उदय रहता है। निरावरण अवस्थामें मात्र केवलज्ञान पर्यायका उदय
रहता है और सावरण अवस्थामें प्रारम्भकी चार पर्यायोंमेंसे एक कालमें किसी एक पर्यायका
उदय रहता है फिर भी तब युगपत् दो, तीन और चार ज्ञानोंकी सत्ताके माननेका कारण एकमात्र
निमित्तभेद है। जब मति और श्रुत इन दो पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता है तब
युगपत् दो ज्ञानोंका सद्भाव कहा जाता है। जब मति, श्रुत और अवधि या मति, श्रुत और ३५
मनःपर्यय इन तीन पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता है तब युगपत् तीन ज्ञानोंका
सद्भाव कहा जाता है और जब मति आदि चार पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता
है तब युगपत् चार ज्ञानोंका सद्भाव माना जाता है। यही कारण है कि प्रकृत सूत्रमें एक साथ
एक आत्माके एक, दो, तीन या चार ज्ञान हो सकते हैं यह कहा है।
९६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३१ § २३३ -
§ २३३. अथ यथोक्तानि मत्यादीनि ज्ञानव्यपदेशमेव लभन्ते उतान्यथापीत्यत आह—
मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च१ ॥ ३१ ॥
§ २३४. विपर्ययो मिथ्येत्यर्थः । कुतः । सम्यगधिकारात् । 'च'शब्दः समुच्चयार्थः ।
विपर्ययश्च सम्यक्चेति । कुतः पुनरेषां विपर्ययः । मिथ्यादर्शनेन सहैकार्थसमवायात् सरजस्क-
कटुकालाबुगतदुग्धवत् । ननु च तत्राधारदोषाद् दुग्धस्य रसविपर्ययो भवति । न च तथा मत्यज्ञा-
नादीनां विषयग्रहणे विपर्ययः । तथा हि, सम्यग्दृष्टिर्यथा चक्षुरादिभी रूपादीनुपलभते तथा
मिथ्यादृष्टिरपि२ मत्यज्ञानेन । यथा च सम्यग्दृष्टिः श्रुतेन रूपादीन् जानाति निरूपयति च तथा
मिथ्यादृष्टिरपि श्रुताज्ञानेन । यथा चावधिज्ञानेन सम्यग्दृष्टिः रूपिणोऽर्थानवगच्छति तथा मिथ्या-
दृष्टिर्विभङ्गज्ञानेनेति ।
§ २३५. अत्रोच्यते—
३सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥ ३२ ॥
§ २३६. सद्दिद्यमानमसदविद्यमानमित्यर्थः । तयोरविशेषेण यदृच्छया उपलब्धेर्विपर्ययो
भवति । कदाचिद्रूपादि संदप्यसदिति प्रतिपद्यते, असदपि सदिति, कदाचित्सत्सदेव, असदप्यसदेवेति
मिथ्यादर्शनोदयादध्यवस्यति । यथा पित्तोदयाकुलितबुद्धिर्मातरं भार्येति, भार्यामपि मातेति मन्यते ।
§ २३३. अब यथोक्त मत्यादिक ज्ञान व्यपदेशको ही प्राप्त होते हैं या अन्यथा भी होते हैं इस
बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मति, श्रुत और अवधि ये तीन विपर्यय भी हैं ॥ ३१ ॥
§ २३४. विपर्ययका अर्थ मिथ्या है, क्योंकि सम्यग्दर्शनका अधिकार है । 'च' शब्द समु-
च्चयरूप अर्थमें आया है । इससे यह अर्थ होता है कि मति, श्रुत और अवधि विपर्यय भी हैं और
समीचीन भी । शंका—ये विपर्यय क्यों हैं ? —समाधान—क्योंकि मिथ्यादर्शनके साथ एक आत्मामें
इनका समवाय पाया जाता है । जिस प्रकार रज सहित कड़वी तूंबड़ीमें रखा हुआ दूध कड़वा हो
जाता है उसी प्रकार मिथ्यादर्शनके निमित्तसे ये विपर्यय होते हैं । कड़वी तूंबड़ीमें आधारके दोषसे
दूधका रस मीठेसे कड़वा हो जाता है, यह स्पष्ट है किन्तु उस प्रकार मत्यादि ज्ञानोंकी विषयके
ग्रहण करनेमें विपरीतता नहीं मालूम होती । खुलासा इस प्रकार है—जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि चक्षु
आदिके द्वारा रूपादिक पदार्थोंको ग्रहण करता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि भी । जिस प्रकार
सम्यग्दृष्टि श्रुतके द्वारा रूपादि पदार्थोंको जानता है और उनका निरूपण करता है उसी प्रकार
मिथ्यादृष्टि भो श्रुतज्ञानके द्वारा रूपादिक पदार्थोंको जानता है और उनका निरूपण करता है ।
जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि अवधिज्ञानके द्वारा रूपी पदार्थोंको जानता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि भी
विभंग ज्ञानके द्वारा रूपी पदार्थोंको जानता है ।
§ २३५. यह एक प्रश्न है जिसका समाधान करनेके लिए अगला सूत्र कहते हैं ।
वास्तविक और अवास्तविकके अन्तरके बिना यदृच्छोपलब्धि ( जब जैसा जी में आया
उस रूप ग्रहण होने ) के कारण उन्मत्तकी तरह ज्ञान भी अज्ञान ही है ॥ ३२ ॥
§ २३६. प्रकृतमें 'सत्' का अर्थ विद्यमान और 'असत्' का अर्थ अविद्यमान है । इनकी
विशेषता न करके इच्छानुसार ग्रहण करनेसे विपर्यय होता है । कदाचित् रूपादिक विद्यमान हैं तो
१. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् । पा० यो० सू० १, ८ । २. -रपि । यथा दि० १, दि० २, आ० ।
३. 'सदसदविसेसणाओ भवहेजउदिच्छिओवलम्भाओ । नाणफलाभावाओ मिच्छदिट्ठिस्स अण्णाणं ।'-वि० भा०
गा० ११५ ।
Here is the line-by-line transcription of the Sanskrit text, Hindi translation/commentary, and footnotes from the image:
– १३२ § २३९ ] प्रथमोऽध्यायः ९७
यदृच्छया$^१$ यदापि मातरं मातैवेति भार्यामपि भार्यैवेति च तदापि न तत्सम्यग्ज्ञानम् । एवं
मत्यादीनामपि रूपादिषु विपर्ययो वेदितव्यः। तथा हि, कश्चिन्मिथ्यादर्शनपरिणाम आत्मन्यवस्थितो
रूपाद्युपलब्धौ सत्यामपि कारणविपर्यास भेदाभेदविपर्यास स्वरूपविपर्यास च जनयति ।
§ २३७. कारणविपर्यासस्तावद्—रूपादीनामेकं कारणममूर्त्तं नित्यमिति केचित्प्रकल्पयन्ति ।$^३$
अपरे पृथिव्यादिजातिभिन्नाः परमाणवश्चतुस्त्रिद्व्येकगुणास्तुल्यजातीयानां कार्याणामारम्भका ५
इति । $^४$अन्ये वर्णयन्ति—पृथिव्यादीनि चत्वारि भूतानि, भौतिकधर्मा वर्णगन्धरसस्पर्शाः, एतेषां
समुदायो रूपपरमाणुरष्टक इत्यादि । $^५$इतरे $^६$वर्णयन्ति—पृथिव्यप्तेजोवायवः काठिन्यादिद्रवत्वा-
द्युष्णत्वादीरणत्वादिगुणा$^७$ जातिभिन्नाः परमाणवः कार्यस्यारम्भकाः ।
§ २३८. भेदाभेदविपर्यासः 'कारणात्कार्यमर्थान्तरभूतमेवेति $^८$अनर्थान्तरभूतमेवेति च १०
परिकल्पना ।
§ २३९. स्वरूपविपर्यासौ रूपादयो निर्विकल्पाः$^१$$^०$ सन्ति न सन्त्येव$^१$$^१$ वा। तदाकारपरिणतं
विज्ञानमेव$^१$$^२$। न च तदालम्बनं वस्तु बाह्यमिति । एवमन्यानपि परिकल्पनाभेदान् दृष्टेष्टविरुद्धा-
भी उन्हें अविद्यमान मानता है। और कदाचित् अविद्यमान वस्तुको भी विद्यमान कहता है। कदा-
चित् सत्को सत् और असत्को असत् ही मानता है। यह सब निश्चय मिथ्यादर्शनके उदयसे होता
है। जैसे पित्तके उदयसे आकुलित बुद्धिवाला मनुष्य माताको भार्या और भार्याको माता मानता १५
है। जब अपनी इच्छाकी लहरके अनुसार माताको माता और भार्या भार्याको ही मानता है
तब भी वह ज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है। इसी प्रकार मत्यादिकका भी रूपादिकमें विपर्यय जानना
चाहिए। खुलासा इस प्रकार है- आत्मामें स्थित कोई मिथ्यादर्शनरूप परिणाम रूपादिककी
उपलब्धि होनेपर भी कारणविपर्यास, भेदाभेदविपर्यास और स्वरूपविपर्यासको उत्पन्न करता
रहता है। २०
§ २३७. कारणविपर्यास यथा-कोई मानते हैं कि रूपादिकका एक कारण है जो अमूर्त्त
और नित्य है। कोई मानते हैं कि पृथिवी जातिके परमाणु अलग हैं जो चार गुणवाले हैं। जल
जातिके परमाणु अलग हैं जो तीन गुणवाले हैं। अग्नि जातिके परमाणु अलग हैं जो दो गुणवाले हैं
और वायु जातिके परमाणु अलग हैं जो एक गुणवाले हैं। तथा ये परमाणु अपने समान जातीय
कार्यको ही उत्पन्न करते हैं। कोई कहते हैं कि पृथिवी आदि चार भूत हैं और इन भूतोंके वर्ण, २५
गन्ध, रस और स्पर्श ये भौतिक धर्म हैं। इन सबके समुदायको एक रूप परमाणु या अष्टक कहते
हैं। कोई कहते हैं कि पृथिवी, जल, अग्नि और वायु ये क्रमसे काठिन्यादि, द्रवत्वादि, उष्णत्वादि
और ईरणत्वादि गुणवाले अलग-अलग जातिके परमाणु होकर कार्यको उत्पन्न करते हैं।
§ २३८. भेदाभेदविपर्यास यथा - कारणसे कार्यको सर्वथा भिन्न या सर्वथा अभिन्न मानना।
§ २३९. स्वरूपविपर्यास यथा-रूपादिक निर्विकल्प हैं, या रूपादिक हैं ही नहीं, या ३०
रूपादिकके आकाररूपसे परिणत हुआ विज्ञान ही है उसका आलम्बनभूत और कोई बाह्य पदार्थ
नहीं है। इसी प्रकार मिथ्यादर्शनके उदयसे ये जीव प्रत्यक्ष और अनुमानके विरुद्ध नाना प्रकारकी
कल्पनाएँ करते हैं और उनमें श्रद्धान उत्पन्न करते हैं। इसलिए इनका यह ज्ञान मत्यज्ञान,
श्रुताज्ञान या विभंग ज्ञान होता है। किन्तु सम्यग्दर्शन तत्त्वार्थ के ज्ञानमें श्रद्धान उत्पन्न करता है
अतः इस प्रकारका ज्ञान मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और और अवधिज्ञान होता है। ३५
१. -च्छया मातरं मु०, ता०, ना० । २. सांख्याः । ३. नैयायिकाः । ४. बौद्धाः । ५. लौकायतिकः ।
६. -तरे कल्पयन्ति पथि- आ०, दि० १ । ७. -णत्त्वादिगमनादिगुणा आ०, दि० १, दि० २ । ८. नैयायिकाः ।
९. सांख्याः । १०. बौद्धाः । ११. नैयायिकाः । १२. योगाचाराः ।
१३
९८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २४० -
न्मिथ्यादर्शनोदयात्कल्पयन्ति तत्र च श्रद्धानमुत्पादयन्ति । ततस्तन्मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं १विभङ्गज्ञानं
च भवति । सम्यग्दर्शनं पुनस्तत्त्वार्थाधिगमे श्रद्धानमुत्पादयति । ततस्तन्मतिज्ञानं श्रुतज्ञान-
मवधिज्ञानं च भवति ।
§ २४०. आह प्रमाणं द्विप्रकारं वर्णितम् । प्रमाणैकदेशाश्च नयास्तदनन्तरोद्देशभाजो निर्दे-
ष्टव्या इत्यत आह—
नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूढैवंभूता नयाः ॥ ३३ ॥
§ २४१. एतेषां सामान्यविशेषलक्षणं वक्तव्यम् । सामान्यलक्षणं तावद्वस्तुन्यनेकान्तात्मन्य-
विरोधेन हेत्वर्पणात्साध्यविशेषस्य याथात्म्यप्रापणप्रवणः२ प्रयोगो नयः । स द्वेधा द्रव्यार्थिकः
पर्यायार्थिकश्चेति । द्रव्यं सामान्यमुत्सर्गः अनुवृत्तिरित्यर्थः । तद्विषयो द्रव्यार्थिकः । पर्यायो विशेषो-
ऽपवादो व्यावृत्तिरित्यर्थः । तद्विषयः पर्यायार्थिकः । तयोर्भेदा नैगमादयः ।
§ २४२. तेषां विशेषलक्षणमुच्यते—अनभिनिर्वृत्तार्थसंकल्पमात्रग्राही नैगमः । कंचित्पुरुषं
परिगृहीतपरशुं गच्छन्तमवलोक्य कश्चित्पृच्छति किमर्थं भवान्गच्छतीति । स आह प्रस्थमानेतु-
मिति । नासौ तदा प्रस्थपर्यायः संनिहितः । तदभिनिर्वृत्तये संकल्पमात्रे प्रस्थव्यवहारः । तथा
विशेषार्थ—यहाँपर प्रारम्भके तीन ज्ञान विपर्यय होते हैं यह बतलाकर वे विपर्यय क्यों होते
हैं यह बतलाया गया है । संसारी जीवकी श्रद्धा विपरीत और समीचीनके भेदसे दो प्रकारकी होती
है । विपरीत श्रद्धावाले जीवको विश्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता । वह जगत्में कितने पदार्थ हैं
उनका स्वरूप क्या है यह नहीं जानता । आत्मा और परमात्माके स्वरूप बोधसे तो वह सर्वथा
वंचित रहता है । वह घटको घट और पटको पट ही कहता है पर जिन तत्त्वोंसे इनका निर्माण
होता है उनका इसे यथार्थ बोध नहीं होने पाता । यही कारण है कि जीवकी श्रद्धाके अनुसार ज्ञान
भी समीचीन ज्ञान और मिथ्या ज्ञान इन दो भागोंमें विभक्त हो जाता है । यथार्थ श्रद्धाके होनेपर
जो ज्ञान होते हैं उन्हें समीचीन ज्ञान कहते हैं और यथार्थ श्रद्धाके अभावमें होनेवाले ज्ञानोंका नाम
ही मिथ्या ज्ञान है । ऐसे मिथ्या ज्ञान तीन माने गये हैं—कुमति ज्ञान, कुश्रुत ज्ञान और विभंग
ज्ञान । ये ही तीन ज्ञान मिथ्या होते हैं अन्य नहीं, क्योंकि ये ज्ञान विपरीत श्रद्धावालेके भी पाये
जाते हैं । विपरीत श्रद्धा क्यों होती है इसका निर्देश मूल टीकामें किया ही है ।
§ २४०. दो प्रकारके प्रमाणका वर्णन किया । प्रमाणके एकदेशको नय कहते हैं । इनका
कथन प्रमाणके अनन्तर करना चाहिए, अतः आगेका सूत्र कहते हैं—
नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ये सात नय हैं ॥३३॥
२४१. इनका सामान्य और विशेष लक्षण कहना चाहिए । सामान्य लक्षण—अनेकान्तात्मक
वस्तुमें विरोधके बिना हेतुकी मुख्यतासे साध्यविशेषकी यथार्थताके प्राप्त करानेमें समर्थ प्रयोगको
नय कहते हैं । इसके दो भेद हैं-द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक । द्रव्यका अर्थ सामान्य, उत्सर्ग और
अनुवृत्ति है और इसको विषय करनेवाला नय द्रव्यार्थिक नय कहलाता है । तथा पर्यायका अर्थ
विशेष, अपवाद और व्यावृत्ति है और इसको विषय करनेवाला नय पर्यायार्थिक नय कहलाता है ।
इन दोनों नयोंके उत्तर भेद नैगमादिक हैं ।
§ २४२. अब इनका विशेष लक्षण कहते हैं—अनिष्पन्न अर्थमें संकल्पमात्रको ग्रहण करने-
वाला नय नैगम है । यथा–हाथमें फरसा लेकर जाते हुए किसी पुरुषको देखकर कोई अन्य पुरुष
पूछता है आप किस कामके लिए जा रहे हैं । वह कहता है प्रस्थ लानेके लिए जा रहा हूँ । उस
समय वह प्रस्थ पर्याय संनिहित नहीं है, केवल उसके बनानेका संकल्प होनेसे उसमें प्रस्थ व्यवहार
१. -ज्ञानमवध्यज्ञा-मु० । २. -वणप्रयो-मु० ।
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- १३३ § २४४ ] प्रथमोऽध्यायः ९९
एधोदकाद्याहरणे व्यापिप्रमाणं कश्चित्पृच्छति किं करोति भवानिति । स आह ओदनं पचामीति ।
न तदौदनपर्यायः संनिहितः, तदर्थे व्यापारे स प्रयुज्यते । एवं प्रकारो लोकसंव्यवहारः अनभिनि-
वृत्ताऽर्थसंकल्पमात्रविषयो नैगमस्य गोचरः ।
§ २४३. स्वजात्यविरोघेनैकध्यमुपानीय पर्यायानाक्रान्तभेदानविशेषेण समस्तग्रहणात्संग्रहः ।
सत्, द्रव्यं, घट इत्यादि । सदित्युक्ते सदिति वाग्विज्ञानानुवृत्तिलिङ्गाऽनुमितसत्ताधारभूतानाम- ५
विशेषेण सर्वेषां संग्रहः । द्रव्यमित्युक्तेऽपि द्रवति गच्छति तांस्तान्पर्यायानित्युपलक्षितानां जीवाजीव-
तद्भेदप्रभेदानां संग्रहः । तथा घट इत्युक्तेऽपि घटबुद्ध्यभिधानानुगमलिङ्गाऽनुमितसकलार्थसंग्रहः ।
एवं प्रकारोऽन्योऽपि संग्रहनयस्य १विषयः ।
§ २४४. संग्रहनयाक्षिप्तानामर्थानां विधिपूर्वक्रमवहरणं व्यवहारः । को विधिः । यः संग्रह-
गृहीतोऽर्थस्तदानुपूर्येणैव व्यवहारः प्रवर्तत इत्ययं विधिः । तद्यथा—सर्वसंग्रहेण २यत्तत्त्वं गृहीतं १०
तच्चानपेक्षितविशेषं नालं संव्यवहारायेति व्यवहारनय आश्रीयते । यत्सत्तद् द्रव्यं गुणो वेति ।
द्रव्येणापि संग्रहाक्षिप्तेन जीवाजीवविशेषानपेक्षेण न शक्यः संव्यवहार इति जीवद्रव्यममजीवद्रव्य-
मिति वा व्यवहार आश्रीयते । जीवाजीवावपि ३ च संग्रहाक्षिप्तौ नालं संव्यवहारायेति प्रत्येकं
देवनारकादिर्घटादिश्च व्यवहारेणाश्रीयते । एवमयं नयस्तावद्वर्तते यावत्पुनर्नास्ति विभागः ।
किया गया है। तथा ईंधन और जल आदिके लानेमें लगे हुए किसी पुरुषसे कोई पूछता है कि १५
आप क्या कर रहे हैं। उसने कहा भात पका रहा हूँ। उस समय भात पर्याय सन्निहित नहीं है,
केवल भातके लिए किये गये व्यापारमें भातका प्रयोग किया गया है। इस प्रकारका जितना लोक-
व्यवहार अनिष्पन्न अर्थके आलम्बनसे संकल्पमात्रको विषय करता है वह सब नैगम नयका
विषय है।
§ २४३. भेदसहित सब पर्यायोंको अपनी जातिके अविरोध-द्वारा एक मानकर सामान्यसे २०
सबको ग्रहण करनेवाला नय संग्रहनय है। यथा- सत्, द्रव्य और घट आदि। 'सत्' ऐसा कहनेपर
सत् इस प्रकारके वचन और विज्ञानकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सत्ताके आधारभूत सब पदार्थों
का सामान्य रूपसे संग्रह हो जाता है। 'द्रव्य' ऐसा कहनेपर भी 'उन-उन पर्यायोंको द्रवता है
अर्थात् प्राप्त होता है' इस प्रकार इस व्युत्पत्तिसे युक्त जीव, अजीव और उनके सब भेद-प्रभेदोंका
संग्रह हो जाता है। तथा 'घट' ऐसा कहनेपर भी घट इस प्रकारकी बुद्धि और घट इस प्रकारके २५
शब्दकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सब घट पदार्थोंका संग्रह हो जाता है। इस प्रकार अन्य भी
संग्रह नयका विषय है।
§ २४४. संग्रह नयके द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थोंका विधिपूर्वक अवहरण अर्थात् भेद करना
व्यवहार नय है। शंका--विधि क्या है ? समाधान--जो संग्रह नयके द्वारा गृहीत अर्थ है उसीके
आनुपूर्वी क्रमसे व्यवहार प्रवृत्त होता है, यह विधि है। यथा--सर्वसंग्रह नयके द्वारा जो वस्तु ३०
ग्रहण की गयी है वह अपने उत्तर भेदोंके बिना व्यवहार करानेमें असमर्थ है, इसलिए व्यवहार
नयका आश्रय लिया जाता है। यथा--जो सत् है वह या तो द्रव्य है या गुण । इसी प्रकार संग्रह
नयका विषय जो द्रव्य है वह जीव अजीवकी अपेक्षा किये बिना व्यवहार करानेमें असमर्थ है
इसलिए जीव द्रव्य है और अजीव द्रव्य है इस प्रकारके व्यवहारका आश्रय लिया जाता है। जीव
द्रव्य और अजीव द्रव्य भी जब तक संग्रह नयके विषय रहते हैं तब तक वे व्यवहार करानेमें ३५
असमर्थ हैं इसलिए व्यवहारसे जीव द्रव्यके देव, नारकी आदि रूप और अजीव द्रव्यके घटादिरूप
भेदोंका आश्रय लिया जाता है। इस प्रकार इस नयकी प्रवृत्ति वहीं तक होती है जहाँ तक वस्तुमें
फिर कोई विभाग करना सम्भव नहीं रहता।
१. संग्रहनयः ॥२॥ संग्र-मु० । २. यत्संग्र-मु०, दि० १; दि०२, आ० । ३. जीवावपि संग्र-मु० ।
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१०० सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २४५ -
§ २४५. ऋजुं प्रगुणं सूत्रयति १ तन्त्रयतीति ऋजुसूत्रः । २पूर्वापरांस्त्रिकालविषयानतिशय्य
वर्तमानकालविषयानादत्ते३ अतीतानागतयोर्विनष्टानुत्पन्नत्वेन व्यवहाराभावात् । तच्च वर्तमानं
समयमात्रम् । तद्विषयपर्यायमात्रग्राह्यमृजुसूत्रः । ननु संव्यवहारलोपप्रसङ्ग इति चेद्४ । न; अस्य
नयस्य विषयमात्रप्रदर्शनं क्रियते । सर्वनयसमूहसाध्यो हि लोकसंव्यवहारः ।
§ २४६. लिङ्गसंख्यासाधनादिव्यभिचारनिवृत्तिपरः शब्दनयः । तत्र लिङ्गव्यभिचारः-
पुष्यस्तारका नक्षत्रमिति । संख्याव्यभिचारः - जलमापः, वर्षा ऋतुः, आम्रा वनम्५, वरणा नगर-
मिति । साधनव्यभिचारः६- सेना७ पर्वतमधिवसति । पुरुषव्यभिचारः - एहि८ मन्ये रथेन यास्यसि,
न हि यास्यसि, यातस्ते पितेति । कालव्यभिचारः - विश्वदृश्वाऽस्य पुत्रो जनिता । ९
- १३३ § २४८ ] प्रथमोऽध्यायः १०१
मन्यते; अन्यार्थस्यान्यार्थेन संबन्धाभावात्। लोकसमयविरोध इति चेत् । विरुध्यताम्। १तत्त्वमिह
मीमांस्यते, न२ भेषज्यमातुरેચ્છानुवर्ति ।
§ २४७. नानार्थसमभिरोहणात्समभिरूढः। यतो नानार्थान्समतीत्यैकमर्थमाभिमुख्येन रूढः
समभिरूढः । गौरित्ययं शब्दो वागादिष्वर्थेषु३ वर्तमानः पशावभिरूढः। अथवा ४अर्थगत्यर्थः
शब्दप्रयोगः । तत्रैकस्यार्थस्यैकेन गतार्थत्वात्पर्यायशब्दप्रयोगोऽनर्थकः । शब्दभेदश्चेदस्ति ५
अर्थभेदेनाप्यवश्यं भवितव्यमिति । नानार्थसमभिरोहणात्समभिरूढः। इन्दनादिन्द्रः शकनाच्छक्रः
पूर्दारणात् पुरंदर इत्येवं सर्वत्र । अथवा यो यत्राभिरूढः स तत्र समेत्याभिमुख्येनारोहणात्समभि-
रूढः । यथा क्व भवानास्ते । आत्मनीति । कुतः । वस्त्वन्तरे वृत्त्यभावात् । ५यद्यन्यस्यान्यत्र वृत्तिः
स्यात्, ज्ञानादीनां रूपादीनां चाकाशे वृत्तिः स्यात् ।
§ २४८. येनात्मना भूतस्तेनैवाध्यवसाययतीति एवंभूतः । स्वाभिप्रेतक्रियापरिणतिक्षणे एव १०
स शब्दो युक्तो नान्यदेति । यदैवेन्दति तदैवेन्द्रो नाभिषेचको न पूजक इति । यदैव गच्छति तदैव
गौर्न स्थितो न शयित इति । अथवा येनात्मना येन ज्ञानेन भूततः परिणतस्तेनैवाध्यवसाययति ।
यथेन्द्राग्निज्ञानपरिणत आत्मैवेन्द्रोऽग्निश्चेति ।
अन्य अर्थके साथ सम्बन्ध नहीं बन सकता । शंका—इससे लोकसमयका (व्याकरण शास्त्रका)
विरोध होता है । समाधान—यदि विरोध होता है तो होने दो, इससे हानि नहीं, क्योकि यहाँ १५
तत्त्वकी मीमांसा की जा रही है । दवाई कुछ पीड़ित पुरुषकी इच्छाका अनुकरण करनेवाली
नहीं होती ।
§ २४७. नाना अर्थोंका समभिरोहण करनेवाला होनेसे समभिरूढ़ नय कहलाता है । चूंकि
जो नाना अर्थोंको 'सम्' अर्थात् छोड़कर प्रधानतासे एक अर्थमें रूढ़ होता है वह समभिरूढ़ नय है ।
उदाहरणार्थ-'गो' इस शब्दके वचन आदि अनेक अर्थ पाये जाते हैं तो भी वह 'पशु' इस अर्थमें २०
रूढ़ है । अथवा अर्थका ज्ञान करानेके लिए शब्दोंका प्रयोग किया जाता है। ऐसी हालतमें एक
अर्थका एक शब्दसे ज्ञान हो जाता है इसलिए पर्यायवाची शब्दोंका प्रयोग करना निष्फल है ।
यदि शब्दोंमें भेद है तो अर्थभेद अवश्य होना चाहिए । इस प्रकार नाना अर्थोंका समभिरोहण
करनेवाला होनेसे समभिरूढ़ नय कहलाता है । जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर ये तीन शब्द होनेसे
इनके अर्थ भी तीन हैं। इन्द्रका अर्थ आज्ञा ऐश्वर्यवान् है, शक्रका अर्थ समर्थ है और पुरन्दरका २५
अर्थ नगरका दारण करनेवाला है । इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिए । अथवा जो जहाँ अभिरूढ़
है वह वहाँ 'सम्' अर्थात् प्राप्त होकर प्रमुखतासे रूढ़ होनेके कारण समभिरूढ़ नय कहलाता है ।
यथा—आप कहाँ रहते हैं ? अपनेमें, क्योंकि अन्य वस्तुकी अन्य वस्तुमें वृत्ति नहीं हो सकती ।
यदि अन्यकी अन्यमें वृत्ति होती है ऐसा माना जाय तो ज्ञानादिककी और रूपादिककी आकाशमें
वृत्ति होने लगे । ३०
§ २४८. जो वस्तु जिस पर्यायको प्राप्त हुई है उसी रूप निश्चय करानेवाले नयको एवंभूत
नय कहते हैं। आशय यह है कि जिस शब्दका जो वाच्य है उस रूप क्रियाके परिणमनके समय ही
उस शब्दका प्रयोग करना युक्त है अन्य समयमें नहीं । जबी आज्ञा ऐश्वर्यवाला हो तभी इन्द्र है
अभिषेक करनेवाला नहीं और न पूजा करनेवाला ही । जब गमन करती हो तभी गाय है बैठी हुई
नहीं और न सोती हुई ही । अथवा जिस रूपसे अर्थात् जिस ज्ञानसे आत्मा परिणत हो उसी रूपसे ३५
१. तत्त्वं मीमां- आ०, दि० १, दि० २ । २. न तु भैष-आ०, ता०, दि० १ । ३. -गादिषु वर्त-ता०,
ना० । ४. 'अर्थगत्यर्थः शब्दप्रयोगः । अर्थं संप्रत्याययिष्यामीति शब्दः प्रयुज्यते । तत्रैकेनोक्तत्वात्तस्यार्थस्य
द्वितीयस्य च तृतीयस्य च प्रयोगेण न भवितव्यम् 'उक्तार्थानामप्रयोगः' इति' पा० म० भा० २।१।१।१ ।
५. यद्यस्यान्यत्र आ० ।
१०२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २४९ –
§ २४९. उक्ता नैगमादयो नयाः । उत्तरोत्तरसूक्ष्मविषयत्वादेषां क्रमः पूर्वपूर्वहेतुकत्वाच्च ।
एवमेते नयाः पूर्वपूर्वविरुद्धमहाविषया उत्तरोत्तरानुकूलाल्पविषया द्रव्यस्यानन्तशक्तेः प्रतिशक्ति
विभिद्यमाना बहुविकल्पा जायन्ते । त एते गुणप्रधानतया परस्परतन्त्राः सम्यग्दर्शनहेतवः पुरुषार्थ-
क्रियासाधनसामर्थ्यात्तन्तवादय इव यथोपायं विनिवेश्यमानाः पटादिसंज्ञाः स्वतन्त्राश्चासमर्थाः ।
§ २५०. १तन्त्वादय इवेति विषम उपन्यासः । तन्त्वादयो निरपेक्षा अपि कांचिदर्थमात्रां
जनयन्ति । भवति हि कश्चित्प्रत्येकं २तन्तुस्त्वक्त्राणे समर्थः । एकश्च बल्वजो बन्धने समर्थः । इमे
पुनर्नया निरपेक्षाः सन्तो न कांचिदपि सम्यग्दर्शनमात्रां प्रादुर्भावयन्तीति । नैष दोषः, अभिहिता-
नवबोधात् । अभिहितमर्थमनवबुध्य परेणेदमुपालभ्यते । एतदुक्तं, निरपेक्षेषु तन्त्वादिषु पटादिकार्यं
नास्तीति । यत्तु तेनोपदर्शितं न तत्पटादिकार्यम् । किं तर्हि । केवलं तन्त्वादिकार्यम्३ । तन्त्वादि-
कार्यमपि तन्त्वाद्यवयवेषु निरपेक्षेषु नास्त्येव इत्यस्मत्पक्षसिद्धिरव । अथ तन्त्वादिषु पटादिकार्यं
शक्त्यपेक्षया अस्तीत्युच्यते । नयेष्वपि निरपेक्षेषु बुद्धयभिधानरूपेषु कारणवशात्सम्यग्दर्शनहेतु-
त्वविपरिणतिसद्भावात् शक्त्यात्मनास्तित्वमिति साम्यमेवोपन्यासस्य४ ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां प्रथमोऽध्यायः ।
उसका निश्चय करानेवाला नय एवंभूत नय है। यथा—इन्द्ररूप ज्ञानसे परिणत आत्मा इन्द्र है और
अग्निरूप ज्ञानसे परिणत आत्मा अग्नि है।
२४९. ये नैगमादिक नय कहे । उत्तरोत्तर सूक्ष्म विषयवाले होनेके कारण इनका यह क्रम
कहा है । पूर्व-पूर्व नय आगे-आगेके नयका हेतु है इसलिए भी यह क्रम कहा है । इस प्रकार ये नय
पूर्व-पूर्व विरुद्ध महाविषयवाले और उत्तरोत्तर अनुकूल अल्प विषयवाले हैं। द्रव्यकी अनन्त शक्ति
है इसलिए प्रत्येक शक्तिकी अपेक्षा भेदको प्राप्त होकर ये अनेक विकल्पवाले हो जाते हैं। ये सब
नय गौण मुख्यरूपसे एक दूसरेकी अपेक्षा करके ही सम्यग्दर्शनके हेतु हैं। जिस प्रकार पुरुषकी
अर्थक्रिया और साधनोंकी सामर्थ्यवश यथायोग्य निवेशित किये गये तन्तु आदिक पट आदिक
संज्ञाको प्राप्त होते हैं और स्वतन्त्र रहनेपर कार्यकारी नहीं होते उसी प्रकार ये नय समझने चाहिए।
§ २५०. शंका—प्रकृतमें 'तन्त्वादय इव' विषम दृष्टान्त है; क्योंकि तन्तु आदिक निरपेक्ष
रहकर भी किसी-न-किसी कार्यको जन्म देते ही हैं। देखते हैं कि कोई एक तन्तु त्वचाकी रक्षा
करनेमें समर्थ है और एक वल्कल किसी वस्तुको बाँधनेमें समर्थ है। किन्तु ये नय निरपेक्ष रहते
हुए थोड़ा भी सम्यग्दर्शनरूप कार्यको नहीं पैदा कर सकते हैं? समाधान—यह कोई दोष नहीं
है, क्योंकि जो कुछ कहा गया है उसे समझे नहीं। कहे गये अर्थको समझे बिना दूसरेने यह उपालम्भ
दिया है। हमने यह कहा है कि निरपेक्ष तन्तु आदिमें पटादि कार्य नहीं पाया जाता। किन्तु
शंकाकारने जिसका निर्देश किया है वह पटादिका कार्य नहीं है। शंका—तो वह क्या है?
समाधान—केवल तन्तु आदिका कार्य है। तन्तु आदिका कार्य भी सर्वथा निरपेक्ष तन्तु
आदिके अवयवोंमें नहीं पाया जाता, इसलिए इससे हमारे पक्षका ही समर्थन होता है। यदि
यह कहा जाय कि तन्तु आदिमें पटादि कार्य शक्तिकी अपेक्षा है हो तो यह बात बुद्धि और
अभिधान—शब्दरूप निरपेक्ष नयोंके विषयमें भी जानना चाहिए। उनमें भी ऐसी शक्ति पायी
१. तन्त्वादिवदेष विष–आ०, दि० १, दि० २, ता० ना० । २. 'एकस्तन्तुस्त्वक्त्राणेऽसमर्थस्तत्समुदायश्च
कम्बलः समर्थः × ×एकश्च बल्वजो बन्धनेऽसमर्थस्तत्समुदायश्च रज्जु समर्था भवति । विषम उपन्यासः ।
भवति हि तत्र या च यावती चार्थमात्रा । भवति हि कश्चित्प्रत्येकस्तन्तुस्त्वक्त्राणे समर्थः । × ×एकश्च
बल्वजो बन्धने समर्थः ।' पा० म० भा० १।२।२।४५। ३. कार्यम् । तर्हि तन्त्वा–ता०, ना० । ४. न्यायस्य ।
ज्ञानदर्शनयोस्तत्त्वं नयानां चैव लक्षणम् । ज्ञानस्य च प्रमाणत्वमध्यायेऽस्मिन्निरूपितम् ।। इति' प्रतिष्वेवं पाठः ।
जाती है जिससे वे कारणवश सम्यग्दर्शनके हेतु रूपसे परिणमन करनेमें समर्थ हैं। इसलिए दृष्टान्त
का दार्ष्टान्तसे साम्य ही है।
विशेषार्थ—प्रमाणके भेद-प्रभेदोंका कथन करनेके बाद यहाँ नयोंका निर्देश किया गया है।
नय श्रुतज्ञानका एक भेद है यह पहले ही बतला आये हैं। यहाँ आलम्बनकी प्रधानतासे उसके
सात भेद किये गये हैं। मुख्यतः आलम्बनको तीन भागोंमें विभक्त किया जा सकता है, उपचार, ५
अर्थ और शब्द। पहला नैगमनय उपचारनय है। संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र अर्थनय हैं और
शेष तीन शब्दनय हैं। आशय यह है कि नैगम नयकी प्रवृत्ति उपचारकी प्रधानतासे होती है
इसलिए इसे उपचार नय कहा है। वैसे तो इसकी परिगणना अर्थनयमें की गयी है। संग्रह,
व्यवहार और ऋजुसूत्रकी प्रवृत्ति अर्थकी प्रधानतासे होती है इसलिए इन्हें अर्थनय कहा है और
शब्द, समभिरूढ़ तथा एवंभूत नयकी प्रवृत्ति शब्दकी प्रधानतासे होती है इसलिए इन्हें शब्द नय १०
कहा है। जैसा कि हमने संकेत किया है कि नैगमनयका समावेश अर्थनयोंमें किया जाता है किन्तु
शेष अर्थनयोंसे नैगमनयको अर्थनय माननेमें मौलिक भेद है। बात यह है कि उपचारकी प्रधानतासे
वस्तुको स्वीकार करना यह नैगमनयका काम है शेष अर्थनयोंका नहीं इसलिए इसे उपचार नय
कहा है। शेष अर्थनय तो भेदाभेद या सामान्य विशेषकी प्रधानतासे सीधा ही वस्तुको विषय करते
हैं वहाँ उपचारको विशेषस्थान नहीं इसलिए हमने अर्थनयोसे नैगमनयको पृथक् बतलाया है। १५
माना कि नैगमनय भी गौण मुख्यभावसे भेदाभेद या सामान्यविशेषको विषय करता है पर इन
सबकी जड़में उपचार काम करता है इसलिए नैगमनय मुख्यतः उपचारनय ही है। सिद्धसेन
दिवाकरने नैगमनयको नय ही नहीं माना है इसका कारण यह उपचार ही है। सम्यग्ज्ञानके
प्रकरणमें उपचारको कहाँ तक स्थान दिया जाय यह एक प्रश्न तो है ही। वस्तुस्पर्शी विकल्प और
वस्तुमें आरोपित विकल्प इनमें बड़ा अन्तर है। वस्तुस्पर्शी विकल्पोंको सम्यग्ज्ञानकी कोटिमें स्थान २०
देना तो अनिवार्य है, किन्तु यदि वस्तुमें आरोपित विकल्पोंको सम्यग्ज्ञानकी कोटिमें स्थान दिया
जाय तो अनवस्थाकी सीमा ही न रहे यह एक भय था जिसके कारण आचार्य सिद्धसेन दिवाकरने
नय प्रकरणमें नैगमका नामोल्लेख तक न किया। किन्तु ऐसा उपचार, जो परम्परासे ही सही मूल
कार्यका ज्ञान करानेमें सहायक हो और जिससे अवास्तविक भ्रम फैलनेका भय न हो या जो
वस्तुका विपरीतरूपसे बोध न कराकर वस्तुके गूढ़तम तत्त्वकी ओर इशारा करता हो, ग्राह्य है २५
ऐसा मानकर उपचार प्रधान नैगमनयको नयप्रकरणमें स्थान दिया गया है। इससे विचार करने-
की परिधि बढ़ जाती है और सम्यग्ज्ञानके जनक समग्र विचारोंका वर्गीकरण करनेमें सहायता
मिलती है। यदि नैगमनयकी श्रेणीमें जो विचार आते हैं उन्हें मिथ्या मानकर सर्वथा छोड़ दिया
जाता है—सम्यग्ज्ञानकी श्रेणीमें स्थान नहीं दिया जाता है तो अभेदकी ओर ले जानेवाले जितने
विचार हैं उनकी भी यही गति होनी चाहिए। यदि उनसे वस्तुके स्वरूपका विश्लेषण करनेमें ३०
सहायता मिलती है इसलिए उनकी नयोंकी श्रेणीमें परिगणना की जाती है तो यही बात नैगमनयके
ऊपर भी लागू करनी चाहिए। इन नयोंका सामान्य और विशेष स्वरूप टीकामें दिया ही है
इसलिए यहाँ इस विषयमें विशेष नहीं लिखा गया है। ऋजुसूत्र नय वर्तमान पर्याय-द्वारा वस्तुको
ग्रहण करता है और शब्दादिक नय शब्दों-द्वारा वर्तमान पर्यायमुखेन वस्तुको ग्रहण करते हैं,
इसलिए इन नयोंका विषय द्वित्व नहीं हो सकता। यही कारण है कि शब्दनयके विषयका निरूपण ३५
करते समय एक साथ प्रयुक्त किये गये एकवचनान्त और द्विवचनान्त आदि शब्दके वाच्य आदि
इसके अविषय बतलाये हैं और समभिरूढ़के विषयका निरूपण करते समय एक शब्दके अनेक अर्थ
या एक अर्थमें अनेक शब्दोंका प्रयोग करना इसका अविषय बतलाया है, क्योंकि एकवचनान्त
शब्दका वाच्य अन्यार्थ है और द्विवचनान्त शब्दका वाच्य अन्यार्थ है, इसलिए शब्द नय इनको
१०४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २५० -
एक वाच्य रूपसे ग्रहण नहीं कर सकता । इसी प्रकार गो शब्दका गाय अर्थ अन्यार्थ है और वाणी
अर्थ अन्यार्थ है, इसलिए समभिरूढ़ नय इन अर्थोंको एक साथ ग्रहण नहीं कर सकता । इसी प्रकार
सभी नयोंके विषयको समझना चाहिए । नय अंश-द्वारा वस्तुको स्पर्श करनेवाला एक विकल्प है ।
प्रमाण ज्ञानके समान यह समग्र वस्तुको स्पर्श नहीं करता, इसलिए ही निरपेक्ष नयको मिथ्या और
५ सापेखनयको सम्यक् कहा गया है । इस विषयका विशेष खुलासा और सब नयोंकी उत्तरोत्तर
सूक्ष्मताका विचार मूलमें किया ही है। इस प्रकार नय सात हैं और वे द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक
इन दो भागोंमें बटे हुए हैं यह निश्चित होता है ।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामवाली तत्त्वार्थवृत्तिमें प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ।
अथ द्वितीयोऽध्यायः
§ २५१. आह, सम्यग्दर्शनस्य विषयभावेनोपदिष्टेषु जीवादिष्वादावुपन्यस्तस्य जीवस्य किं
स्वतत्त्वमित्युच्यते—
औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च ॥१॥
§ २५२. आत्मनि कर्मणः स्वशक्तेः कारणवशादनुद्भूतिरुपशमः । यथा कतकादिद्रव्य- ५
संबन्धादम्भसि पङ्कस्य उपशमः । क्षय आत्यन्तिकी निवृत्तिः । यथा तस्मिन्नेवाम्भसि शुचिभाजना-
न्तरसंक्रान्ते पङ्कस्यात्यन्ताभाव उभयात्मको मिश्रः । यथा तस्मिन्नेवाम्भसि कतकादिद्रव्यसंबन्ध्या-
त्पङ्कस्य क्षीणाक्षीणवृत्तिः । द्रव्यादिनिमित्तवशात्कर्मणां फलप्राप्तिरुदयः । द्रव्यात्मलाभमात्रहेतुकः
परिणामः । उपशमः प्रयोजनमस्येत्यौपशमिकः । एवं क्षायिकः क्षायोपशमिकः औदयिकः पारिणामि-
कश्च । त एते पञ्च भावा असाधारणा जीवस्य स्वतत्त्वमित्युच्यन्ते । १०
§ २५३. सम्यग्दर्शनस्य प्रकृतत्वात्तस्य त्रिषु विकल्पेषु औपशमिकमादौ लभ्यत इति तस्यादौ
ग्रहणं क्रियते । तदनन्तरं क्षायिकग्रहणम्; तस्य प्रतियोगित्वात् संसार्यपेक्षया द्रव्यतस्ततोऽसंख्येय-
गुणत्वाच्च । तत उत्तरं मिश्रग्रहणम्; तदुभयात्मकत्वात्ततोऽसंख्येयगुणत्वाच्च । तेषां सर्वेषामनन्त-
गुणत्वाद् औदयिकपारिणामिकग्रहणमन्ते क्रियते । अत्र द्वन्द्वनिर्देशः कर्तव्यः-औपशमिकक्षायिक-
§ २५१. सम्यग्दर्शनके विषयरूपसे जीवादि पदार्थोंका कथन किया । उनके आदिमें जो जीव १५
पदार्थ आया है उसका स्वतत्त्व क्या है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
औपशमिक, क्षायिक, मिश्र, औदयिक और पारिणामिक ये जीवके स्वतत्त्व हैं ॥१॥
§ २५२. जैसे कतक आदि द्रव्यके सम्बन्धसे जलमें कीचड़का उपशम हो जाता है उसी
प्रकार आत्मामें कर्मकी निज शक्तिका कारणवशसे प्रकट न होना उपशम है । जैसे उसी जलको
दूसरे साफ बर्तनमें बदल देनेपर कीचड़का अत्यन्त अभाव हो जाता है वैसे ही कर्मोंका आत्मासे २०
सर्वथा दूर हो जाना क्षय है । जिस प्रकार उसी जलमें कतकादि द्रव्यके सम्बन्धसे कुछ कीचड़का
अभाव हो जाता है और कुछ बना रहता है उसी प्रकार उभयरूप भाव मिश्र है । द्रव्यादि निमित्त-
के वशसे कर्मोंके फलका प्राप्त होना उदय है । और जिसके होनेमें द्रव्यका स्वरूपलाभमात्र कारण
है वह परिणाम है । जिस भावका प्रयोजन अर्थात् कारण उपशम है वह औपशमिक भाव है ।
इसी प्रकार क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक और पारिणामिक भावोंकी व्युत्पत्ति कहनी चाहिए । २५
ये पाँच भाव असाधारण हैं इसलिए जीवके स्वतत्त्व कहलाते हैं।
§ २५३. सम्यग्दर्शनका प्रकरण होनेसे उसके तीन भेदोंमेंसे सर्वप्रथम औपशमिक सम्यग्दर्शन
होता है अतएव औपशमिक भावको आदिमें ग्रहण किया है। क्षायिक भाव औपशमिक भावका
प्रतियोगी है और संसारो जीवोंकी अपेक्षा औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंसे क्षायिक सम्यग्दृष्टि असंख्यात-
गुणे हैं अतः औपशमिक भावके पश्चात् क्षायिक भावको ग्रहण किया है। मिश्रभाव इन दोनोंरूप ३०
होता है और क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि जीव औपशमिक और क्षायिक सम्यग्दृष्टियोंसे असंख्यातगुणे
होते हैं अतः तत्पश्चात् मिश्रभावको ग्रहण किया है। इन सबसे अनन्तगुणे होनेके कारण इन सबके
अन्तमें औदयिक और पारिणामिक भावोंको रखी है । शंका-यहाँ 'औपशमिकक्षायिकमिश्रौदयि-
१४
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१०६ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ सर्वार्थसिद्धौ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ [ २।२ § २५४ –
मिश्रौदयिकपारिणामिका इति । तथा सति हिः 'च'शब्दो न कर्तव्यो भवति । नैवं शङ्क्यम्;
अन्यगुणापेक्षया मिश्र इति प्रतीयेत । वाक्ये पुनः सति 'च'शब्देन प्रकृतोभयानुकर्षः कृतो भवति ।
तर्हि क्षायोपशमिकग्रहणमेव कर्तव्यमिति चेत् । न; गौरवात् । मिश्रग्रहणं मध्ये क्रियते उभया-
पेक्षार्थम् । भव्यस्य औपशमिकक्षायिकौ भावौ । मिश्रः पुनरभव्यस्यापि भवति औदयिकपारिणामि-
काभ्यां सह भव्यस्यापीति । भावापेक्षया तल्लिङ्गसंख्याप्रसङ्गः स्वतत्त्वस्येति चेत् । न; उपात्त-
लिङ्गसंख्यत्वात्$^१$ । तद्भावस्तत्त्वम् । स्वं तत्त्वं स्वतत्त्वमिति ।
§ २५४. अत्राह तस्यैकस्यात्मनो ये भावा औपशमिकादयस्ते किं भेदवन्त उताभेदा इति ।
अत्रोच्यते, भेदवन्तः । यद्येवं, भेदा उच्यन्तामित्यत आह—
द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥२॥
§ २५५. द्वयादीनां संख्याशब्दानां कृतद्वन्द्वानां भेदशब्देन सह स्वपदार्थेऽन्यपदार्थे वा वृत्ति-
र्वेदितव्या । द्वौ च नव च अष्टादश च एकविंशतिश्च त्रयश्च द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयः$^२$ । ते च
कपारिणामिकाः' इस प्रकार द्वन्द्व समास करना चाहिए । ऐसा करनेसे सूत्रमें दो 'च' शब्द नहीं
रखने पड़ते हैं ? समाधान—ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सूत्रमें यदि 'च' शब्द न रखकर
द्वन्द्व समास करते तो मिश्रकी प्रतीति अन्य गुणकी अपेक्षा होती । किन्तु वाक्यमें 'च' शब्दके
रहनेपर उससे प्रकरणमें आये हुए औपशमिक और क्षायिक भावका अनुकर्षण हो जाता है ।
शंका—तो फिर सूत्रमें 'क्षायोपशमिक' पदका ही ग्रहण करना चाहिए ? समाधान—नहीं, क्योंकि
क्षायोपशमिक पदके ग्रहण करनेमें गौरव है; अतः इस दोषको दूर करनेके लिए क्षायोपशमिक पदका
ग्रहण न करके मिश्र पद रखा है । दोनोंकी अपेक्षासे मिश्र पद मध्यमें रखा है । औपशमिक और
क्षायिकभाव भव्यके ही होते हैं। किन्तु मिश्रभाव अभव्यके भी होता है । तथा औदयिक और
पारिणामिक भावोंके साथ भव्यके भी होता है। शंका—भावोंकी अपेक्षा स्वतत्त्वपदका वही लिंग
और संख्या प्राप्त होती है ? समाधान—नहीं, क्योंकि जिस पदको जो लिंग और संख्या प्राप्त हो
गयी है उसका वही लिंग और वही संख्या बनी रहती है । स्वतत्त्वका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—स्वं
तत्त्वं स्वतत्त्वम् = जिस वस्तुका जो भाव है वह तत्त्व है और स्व तत्त्व स्वतत्त्व है।
विशेषार्थ—पांच भावोंमें प्रारम्भके चार भाव निमित्तकी प्रधानतासे कहे गये हैं और
अन्तिम भाव योग्यताकी प्रधानतासे । जगमें जितने कार्य होते हैं उनका विभागीकरण इसी
हिसाबसे किया जाता है । कहीं निमित्तको प्रमुखता दी जाती है और कहीं योग्यताको । पर इससे
अन्य वस्तुका कर्तृत्व अन्यमें मानना उचित नहीं। ऐसे विभागीकरणके दिखलानेका इतना ही
प्रयोजन है कि जहाँ जिस कार्यका जो सुनिश्चित निमित्त हो उसका परिज्ञान हो जावे । यों तो
कार्य अपनी योग्यतासे होता है किन्तु जिसके बिना जो कार्य नहीं होता वह उसका सुनिश्चित
निमित्त कहा जाता है। इस हिसाबसे विचार करनेपर औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक और
औदयिक ये चार नैमित्तिक भाव ठहरते हैं ।
§ २५४. एक आत्माके जो औपशमिक आदि भाव कहे हैं, उनके कोई भेद हैं या नहीं ?
भेद हैं । यदि ऐसा है तो इनके भेदोंका कथन करना चाहिए, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उक्त पाँच भावोंके क्रमसे दो, नौ, अठारह, इक्कीस और तीन भेद हैं ॥२॥
§ २५५. संख्यावाची दो आदि शब्दोंका द्वन्द्व समास करके पश्चात् उनका भेद शब्दके
साथ स्वपदार्थमें या अन्यपदार्थमें समास जानना चाहिए । स्वपदार्थ प्रधान समास यथा—द्वौ च
नव च अष्टादश च एकविंशतिश्च त्रयश्च इति द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयः, ते एव भेदाः इति
१. संख्यात्वात् मु० । २. त्रयः । त एव भेदाः मु० ।