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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 558 में से

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पृष्ठ 203
  • १२५ § २२१ ] प्रथमोऽध्यायः ९१

पातौ । १ताभ्यां विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्याम् । तयोर्विशेषस्तद्विशेषः । तत्र विशुद्ध्या तावत्-ऋजुमते-
विपुलमतिर्द्रव्यक्षेत्रकालभावैर्विशुद्धतरः । कथम् । इह यः कार्मणद्रव्यानन्तभागोऽन्त्यः सर्वावधिना
ज्ञातस्तस्य पुनरनन्तभागीकृतस्यान्त्यो भाग ऋजुमतेर्विषयः । तस्य ऋजुमतिविषयस्यानन्तभागी-
कृतस्यान्त्यो भागो विपुलमतेर्विषयः । अनन्तस्यानन्तभेदत्वात् । द्रव्यक्षेत्रकालतो विशुद्धिरुक्ता ।
भावतो विशुद्धिः सूक्ष्मतरद्रव्यविषयत्वादेव वेदितव्या प्रकृष्टक्षयोपशमविशुद्धियोगात् । अप्रतिपातेनापि ५
विपुलमतिर्विशिष्टः ; स्वामिनां प्रवर्द्धमानचारित्रोदयत्वात् । ऋजुमतिः पुनः प्रतिपाती ; स्वामिनां
कषायोद्रेकाद्धीयमानचारित्रोदयत्वात् ।
§ २२१. यद्यस्य मनःपर्ययस्य प्रत्यात्ममयं विशेषः, अथानयोरवधिमनःपर्यययोः कुतो
विशेष इत्यत आह—
विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ॥२५॥ १०
और विपुलमतिमें भेद है । विशुद्धि यथा—ऋजुमतिसे विपुलमति द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी
अपेक्षा विशुद्धतर है । शंका—कैसे ? समाधान—यहाँ जो कार्मण द्रव्यका अनन्तवाँ अन्तिम भाग
सर्वावधिज्ञानका विषय है उसके भी अनन्त भाग करनेपर जो अन्तिम भाग प्राप्त होता है वह
ऋजुमतिका विषय है । और इस ऋजुमतिके विषयके अनन्त भाग करनेपर जो अन्तिम भाग प्राप्त
होता है वह विपुलमतिका विषय है । अनन्तके अनन्त भेद हैं अतः ये उत्तरोत्तर सूक्ष्म विषय बन १५
जाते हैं । इस प्रकार द्रव्य, क्षेत्र और कालकी अपेक्षा विशुद्धि कही । भावकी अपेक्षा विशुद्धि
उत्तरोत्तर सूक्ष्म द्रव्यको विषय करनेवाला होनेसे ही जान लेनी चाहिए क्योंकि इनका उत्तरोत्तर
प्रकृष्ट क्षयोपशम पाया जाता है, इसलिए ऋजुमतिसे विपुलमतिमें विशुद्धि अधिक होती है ।
अप्रतिपातकी अपेक्षा भी विपुलमति विशिष्ट है; क्योंकि इसके स्वामियोंके प्रवर्धमान चारित्र
पाया जाता है । परन्तु ऋजुमति प्रतिपाती है; क्योंकि इसके स्वामियोंके कषायके उदयसे घटता २०
हुआ चारित्र पाया जाता है ।
विशेषार्थ—यहाँ मनःपर्यय ज्ञानके दोनों भेदोंमें अन्तर दिखलाया गया है । ऋजुमति स्थूल
ज्ञान है और विपुलमति सूक्ष्मज्ञान । इसीसे इसका भेद स्पष्ट हो जाता है । यह विशुद्धिकृत भेद
है । इससे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा पदार्थका ज्ञान करनेमें अन्तर पड़ जाता है । किन्तु
इन दोनों ज्ञानोंके अन्तरका एक कारण और है जो कि प्रतिपात और अप्रतिपात शब्दसे पुकारा २५
जाता है । प्रतिपातका अर्थ है गिरना और अप्रतिपातका अर्थ है नहीं गिरना । ऐसा नियम है कि
विपुलमति मनःपर्ययज्ञान उसीके होता है जो तद्भव मोक्षगामी होते हुए भी क्षपकश्रेणीपर चढ़ता
है किन्तु ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञानके लिए ऐसा कोई नियम नहीं है । वह तद्भव मोक्षगामीके भी
हो सकता है और अन्यके भी हो सकता है । इसी प्रकार जो क्षपक श्रेणीपर चढ़ता है उसके भी
हो सकता है और जो उसपर नहीं चढ़कर उपशम श्रेणीपर चढ़ता है या नहीं भी चढ़ता है उसके ३०
भी हो सकता है । इसीसे ऋजुमति प्रतिपाती और विपुलमति अप्रतिपाती माना गया है । यह
विशेषता योग्यताजन्य है इसलिए इसका निर्देश अलगसे किया है ।
§ २२१. यदि इस मनःपर्ययज्ञानका अलग-अलग यह भेद है तो अवधिज्ञान और मनःपर्यय
ज्ञानमें किस कारणसे भेद है ? अब इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं--
विशुद्धि, क्षेत्र, स्वामी और विषयकी अपेक्षा अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें भेद है ॥२५॥ ३५

१. ताभ्याम् । तयोः मु० ।