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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 558 में से

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पृष्ठ 201
  • १।२३ § २१८ ] प्रथमोऽध्यायः ८९

आ भवक्षयादाकेवलज्ञानोत्पत्तेर्वा । अन्योऽवधिः सम्यग्दर्शनादिगुणवृद्धिहानियोगाद्यत्परिमाण
उत्पन्नस्ततो वर्धते यावदनेन वर्धितव्यं हीयते च यावदनेन हातव्यं वायुवेगप्रेरितजलोर्मिवत् । एवं
षड्विकल्पोऽवधिर्भवति ।
§ २१६. एवं व्याख्यातमवधिज्ञानं तदनन्तरमिदानीं मनःपर्ययज्ञानं वक्तव्यम् । तस्य भेद-
पुरःसरं लक्षणं व्याचिख्यासुरिदमाह— ५
ऋजुविपुलमती मनःपर्ययः ॥२३॥
§ २१७. ऋज्वी निर्वर्तिता प्रगुणा च । कस्मान्निर्वर्तिता । वाक्कायमनःकृतार्थस्य परमनो-
गतस्य विज्ञानात् । ऋज्वी मतिर्यस्य सोऽयं ऋजुमतिः । अनिर्वर्तिता कुटिला च विपुला । कस्माद-
निर्वर्तिता । वाक्कायमनःकृतार्थस्य परकीयमनोगतस्य विज्ञानात् । विपुला मतिर्यस्य सोऽयं विपुल-
मतिः । ऋजुमतिश्च विपुलमतिश्च ऋजुविपुलमती । एकस्य मतिशब्दस्य गतार्थत्वादप्रयोगः । १०
अथवा ऋजुश्च विपुला च ऋजुविपुले । ऋजुविपुले मती ययोस्तौ ऋजुविपुलमती इति । स एष
मनःपर्ययो द्विविधः ऋजुमतिर्विपुलमतिरिति ।
§ २१८. आह, उक्तो भेदः, लक्षणमिदानीं वक्तव्यमित्यत्रोच्यते—वीर्यान्तरायमनःपर्यय-
ज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलाभावष्टम्भादात्मनः परकीयमनःसंबन्धेन लब्धवृत्तिरुपयोगो
मनःपर्ययः । मतिज्ञानप्रसङ्ग इति चेत् उक्तोत्तरं पुरस्तात् । अपेक्षाकारणं मन इति । परकीयमनसि १५
शरीरमें स्थित मसा आदि चिह्नके समान न घटता है और न बढ़ता है। कोई अवधिज्ञान वायुके
वेगसे प्रेरित जलकी तरंगोंके समान सम्यग्दर्शनादि गुणोंकी कभी वृद्धि और कभी हानि होनेसे
जितने परिमाणमें उत्पन्न होता है उससे बढ़ता है जहांतक उसे बढ़ना चाहिए और घटता है जहां-
तक उसे घटना चाहिए । इस प्रकार अवधिज्ञान छह प्रकारका है।
विशेषार्थ—क्षयोपशमनिमित्तक अवधिज्ञानके तीन भेद हैं—देशावधि, परमावधि और सर्वा- २०
वधि । देशावधि तिर्यंचों और मनुष्योंके होता है पर मनुष्योंके संयत अवस्थामें परमावधि और
सर्वावधिका प्राप्त होना भी सम्भव है । मनुष्योंके चौथे और पांचवें गुणस्थानमें देशावधि और आगे
के गुणस्थानोंमें यथासम्भव तीनों होते हैं । भवप्रत्यय अवधिज्ञानका अन्तर्भाव देशावधिमें होता है ।
§ २१६. इस प्रकार अवधिज्ञानका व्याख्यान किया । अब आगे मनःपर्ययज्ञानका व्याख्यान
करना चाहिए । अतः उसके भेदोंके साथ लक्षणका कथन करनेकी इच्छासे आगेका सूत्र कहते हैं— २५
ऋजुमति और विपुलमति मनःपर्ययज्ञान है ॥ २३॥
§ २१७. ऋजुका अर्थ निर्वर्तित और प्रगुण है। शंका- किससे निर्वर्तित ? समाधान-
दूसरेके मनको प्राप्त हुए वचन, काय और मनकृत अर्थके विज्ञानसे निर्वर्तित । जिसकी मति ऋजु
है वह ऋजुमति कहलाता है । विपुलका अर्थ अनिर्वर्तित और कुटिल है । शंका—किससे अनिर्व-
र्तित ? समाधान—दूसरेके मनको प्राप्त हुए वचन, काय और मनकृत अर्थके विज्ञानसे अनिर्वर्तित । ३०
जिसकी मति विपुल है वह विपुलमति कहलाता है । सूत्रमें जो 'ऋजुविपुलमती' पद आया है वह
ऋजुमति और विपुलमति इन पदोंसे समसित होकर बना है। यहाँ एक ही मति शब्द पर्याप्त होने-
से दूसरे मति शब्दका प्रयोग नहीं किया । अथवा ऋजु और विपुल शब्दका कर्मधारय समास
करनेके बाद इनका मति शब्दके साथ बहुव्रीहि समास कर लेना चाहिए । तब भी दूसरे मति
शब्दकी आवश्यकता नहीं रहती । यह मनःपर्ययज्ञान दो प्रकारका है—ऋजुमति और विपुलमति । ३५
§ २१८. शंका—मनःपर्ययज्ञानके भेद तो कह दिये। अब उसका लक्षण कहना चाहिए ।
समाधान—वीर्यान्तराय और मनःपर्यय ज्ञानावरणके क्षयोपशम और अंगोपांग नामकर्मके आल-
म्बनसे आत्मामें जो दूसरेके मनके सम्बन्धसे उपयोग जन्म लेता है उसे मनःपर्ययज्ञान कहते हैं।
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