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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 558 में से

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पृष्ठ 200

८८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।२२ § २१५ -
'क्षयोपशमनिमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम् ॥२२॥
§ २१५. अवधिज्ञानावरणस्य देशघातिस्पर्द्धकानामुदये सति सर्वघातिस्पर्द्धकानामुदयाभावः
क्षयः तेषामेवानुदयप्राप्तानां सदवस्था उपशमः। तौ निमित्तमस्येति क्षयोपशमनिमित्तः। स
शेषाणां वेदितव्यः। के पुनः शेषाः। मनुष्यास्तिर्यञ्चश्च । तेष्वपि यत्र सामर्थ्यमस्ति तत्रैव
वेदितव्यः। न ह्यसंज्ञिनामपर्याप्तकानां च तत्सामर्थ्यमस्ति । संज्ञिनां पर्याप्तकानां च न सर्वेषाम् ।
केषां र्तार्ह । यथोक्तसम्यग्दर्शनादिनिमित्तसंनिधाने सति शान्तक्षीणकर्मणां तस्योपलब्धिर्भवति ।
सर्वस्य क्षयोपशमनिमित्तत्वे क्षयोपशमग्रहणं नियमार्थं क्षयोपशम एव निमित्तं न भव इति । स
एषोऽवधिः षड्विकल्पः । कुतः अनुगाम्यननगामिवर्धमानहीयमानावस्थितानवस्थितभेदात् । कश्चि-
दवधिर्भास्करप्रकाशवद् गच्छन्तमनुगच्छति । कश्चिन्नानुगच्छति तत्रैवातिपतति २उन्मुखप्रश्नादेशि-
पुरुषवचनवत् । अपरोऽवधिः अरणिन्मंथनोत्पन्नशुष्कपर्णोपचीयमानेन्धननिचयसमिद्धपावकवत्स-
म्यग्दर्शनादिगुणविशुद्धिपरिणामसंनिधानाद्यत्परिमाण उत्पन्नस्ततो वर्द्धते आ संख्येय-
लोकेभ्यः । अपरोऽवधिः ३परिच्छिन्नोपादानसंतत्यग्निशिखावत्सम्यग्दर्शनादिगुणहानिसंक्लेेशपरि-
णामवृद्धियोगाद्यत्परिमाण उत्पन्नस्ततो हीयते आ अङ्गुलस्यासंख्येयभागात् । इतरोऽवधिः सम्य-
ग्दर्शनादिगुणावस्थानाद्यत्परिमाण उत्पन्नस्तत्परिमाण एवावतिष्ठते; न हीयते नापि वर्धते लिङ्गवत्
क्षयोपशमनिमित्तक अवधिज्ञान छह प्रकारका है। जो शेष अर्थात् तिर्यंचों और मनुष्योंके
होता है ॥ २२ ॥
§ २१५. अवधिज्ञानावरण कर्मके देशघाती स्पर्धकोंका उदयाभावी क्षय और अनुदय प्राप्त
इन्हींका सदवस्थारूप उपशम इन दोनोंके निमित्तसे जो होता है वह क्षयोपशमनिमित्तक अवधि-
ज्ञान है। यह शेष जीवोंके जानना चाहिए। शंका - शेष कौन हैं ? समाधान - मनुष्य और
तिर्यंच। उनमें भी जिनके सामर्थ्य है उन्हींके जानना चाहिए। असंज्ञी और अपर्याप्तकोंके यह
सामर्थ्य नहीं है। संज्ञी और पर्याप्तकोंमें भी सबके यह सामर्थ्य नहीं होती । शंका - तो फिर किनके
होती है ? समाधान - यथोक्त सम्यग्दर्शन आदि निमित्तोंके मिलने पर जिनके अवधिज्ञानावरण
कर्म शान्त और क्षीण हो गया है उनके यह सामर्थ्य होती है। यद्यपि अवधिज्ञानमात्र क्षयोपशमके
निमित्तसे होता है तो भी सूत्रमें क्षयोपशम पदका ग्रहण यह नियम करनेके लिए किया है कि
उक्त जीवोंके मात्र क्षयोपशम निमित्त है भव नहीं। यह अवधिज्ञान अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान,
हीयमान, अवस्थित और अनवस्थितके भेदसे छह प्रकारका है। कोई अवधिज्ञान जैसे सूर्यका
प्रकाश उसके साथ जाता है वैसे अपने स्वामीका अनुसरण करता है। कोई अवधिज्ञान अनुसरण
नहीं करता किन्तु जैसे विमुख हुए पुरुषके प्रश्नके उत्तरस्वरूप दूसरा पुरुष जो वचन कहता है वह
वहीं छूट जाता है, विमुख पुरुष उसे ग्रहण नहीं करता है वैसे ही यह अवधिज्ञान भी वहींपर छूट
जाता है। कोई अवधिज्ञान जंगलके निर्मन्थनसे उत्पन्न हुई और सूखे पत्तोंसे उपचीयमान ईंधनके
समुदायसे वृद्धिको प्राप्त हुई अग्निके समान सम्यग्दर्शनादि गुणोंकी विशुद्धि रूप परिणामोंके सन्नि-
धानवश जितने परिमाणमें उत्पन्न होता है उससे असंख्यात लोक जानने की योग्यता होने तक
बढ़ता जाता है। कोई अवधिज्ञान परिमित उपादानसन्ततिवाली अग्निशिखाके समान सम्यग्दर्श-
नादि गुणोंकी हानिसे हुए संक्लेश परिणामोंकें बढ़नेसे जितने परिमाणमें उत्पन्न होता है उससे
मात्र अंगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण जाननेकी योग्यता होने तक घटता चला जाता है। कोई
अवधिज्ञान सम्यग्दर्शनादि गुणोंके समानरूपसे स्थिर रहनेके कारण जितने परिमाणमें उत्पन्न
होता है उतना ही बना रहता है। पर्यायके नाश होते तक या केवलज्ञानके उत्पन्न होने तक
१. 'सेसाण खओवसमियाओ ।' -वि० आ० गा० ५७५ । २. -तति । उन्मुग्धप्र- ता०, ना०, मु० ।
३. -वह्निः परिमितपरि-मु० ।