सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० सर्वार्थसिद्धौ [ १।२४ § २१९ –
व्यवस्थितोऽर्थः अनेन ज्ञायते इत्येतावदत्रापेक्ष्यते¹ । तत्र ऋजुमतिर्मनःपर्ययः कालतो जघन्येन
जीवानामात्मनश्च ²द्वित्रीणि भवग्रहणानि, उत्कर्षेण सप्ताष्टौ गत्यागत्यादिभिः प्ररूपयति । क्षेत्रतो
जघन्येन गव्यूतिपृथक्त्वं, उत्कर्षेण योजनपृथक्त्वस्याभ्यन्तरं, न बहिः । द्वितीयः कालतो जघन्येन
सप्ताष्टौ भवग्रहणानि, उत्कर्षेणासंख्येयानि गत्यागत्यादिभिः प्ररूपयति । क्षेत्रतो जघन्येन योजन-
पृथक्त्वं, उत्कर्षेण मानुषोत्तरशैलस्याभ्यन्तरं, न बहिः ।
§ २१९. उक्तयोरनयोः पुनरपि विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ॥ २४ ॥
§ २२०. तदावरणक्षयोपशमे सति आत्मनः प्रसादो विशुद्धिः । प्रतिपतनं प्रतिपातः ।
न प्रतिपातः अप्रतिपातः । उपशान्तकषायस्य चारित्रमोहोद्रेकात्प्रच्युतसंयमशिखरस्य प्रतिपातो
भवति । क्षीणकषायस्य प्रतिपातकारणाभावादप्रतिपातः । विशुद्धिश्च अप्रतिपातश्च विशुद्धयप्रति-
शंका—यह ज्ञान मनके सम्बन्धसे होता है अतः इसे मतिज्ञान होनेका प्रसंग आता है ? समाधान—
नहीं, क्योंकि इस शंकाका उत्तर दे आये हैं। अर्थात् यहाँ मनकी अपेक्षामात्र है । दूसरेके मनमें
अवस्थित अर्थ को यह जानता है इतनी मात्र यहाँ मनकी अपेक्षा है । इनमेंसे ऋजुमति मनःपर्यय-
ज्ञान कालकी अपेक्षा जघन्यसे जीवोंके और अपने दो तीन भवोंको ग्रहण करता है, उत्कृष्टसे गति
और आगतिकी अपेक्षा सात-आठ भवोंका कथन करता है । क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्यसे गव्यूतिपृथक्त्व
और उत्कृष्टसे योजनपृथक्त्वके भीतरकी बात जानता है । इससे बाहरकी नहीं । विपुलमति
कालकी अपेक्षा जघन्यसे सात-आठ भवोंको ग्रहण करता है, उत्कृष्टसे गति और आगतिकी अपेक्षा
असंख्यात भवोंका कथन करता है । क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्यसे योजनापृथक्त्व और उत्कृष्टसे मानुषो-
त्तर पर्वतके भीतरकी बात जानता है इससे बाहरकी बात नहीं जानता ।
विशेषार्थ—तत्त्वार्थसूत्रके छठवें अध्यायके दसवें सूत्रके राजवार्तिकमें शंका-समाधानके
प्रसंगसे मनःपर्ययज्ञानकी चर्चा की है। वहाँ बतलाया है कि मनःपर्ययज्ञान अपने विषयमें अवधि-
ज्ञानके समान स्वमुखसे प्रवृत्त नहीं होता है । किन्तु दूसरेके मनके सम्बन्धसे ही प्रवृत्त होता है ।
इसलिए जैसे मन अतीत और अनागत विषयोंका विचार तो करता है पर साक्षात्कार नहीं करता
उसी प्रकार मनःपर्ययज्ञानी भी भूत और भविष्यत् विषयोंको जानता तो है पर सीधे तौरसे
साक्षात्कार नहीं करता । इसी प्रकार यह वर्तमान विषयको भी मनोगत होने पर विशेषरूपसे
जानता है।' राजवार्तिकका यह कथन इतना स्पष्ट है जिससे मनःपर्ययज्ञानकी उपयोगात्मक
दशाका स्पष्ट आभास मिल जाता है । इसका आशय यह है कि करता तो है यह मनकी पर्यायोंको
ही विषय किन्तु तद्द्वारा पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है। इसके दो भेद हैं—ऋजुमति और
विपुलमति ।
§ २१९. पहले मनःपर्ययज्ञानके दो भेद कहे हैं उनका और विशेष ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
विशुद्धि और अप्रतिपातकी अपेक्षा इन दोनोंमें अन्तर है ॥२४॥
§ २२०. मनःपर्ययज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होनेपर जो आत्मामें निर्मलता आती है उसे
विशुद्धि कहते हैं । गिरनेका नाम प्रतिपात है और नहीं गिरना अप्रतिपात कहलाता है । उपशान्त-
कषाय जीवका चारित्र मोहनीयके उदयसे संयम शिखर छूट जाता है जिससे प्रतिपात होता है और
क्षीणकषाय जीवका पतनका कारण न होनेसे प्रतिपात नहीं होता । इन दोनोंकी अपेक्षा ऋजुमति
१. -पेक्षते आ० दि० १, दि० २ । २. –द्वित्रीणि मु० ।