सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
८० सर्वार्थसिद्धौ [ १।१७ § १९७ –
§ १९७. यद्यवग्रहादयो बह्वादीनां कर्मणामाक्षेप्तारः, बह्वादीनि पुनर्विशेषणानि कस्येत्यत
आह—
अर्थस्य ॥१७॥
§ १९८. चक्षुरादिविषयोऽर्थः । तस्य बह्वादिविशेषणविशिष्टस्य अवग्रहादयो भवन्तीत्य-
भिसंबन्धः क्रियते । किमर्थमिदमुच्यते यावता बह्वादिरर्थ एव । सत्यमेवं किन्तु प्रवादिकल्पना-
निवृत्त्यर्थं 'अर्थस्य' इत्युच्यते । केचित्प्रवादिनो मन्यन्ते रूपादयो गुणा एव इन्द्रियैः संनिकृष्यन्ते
तेनैतेषामेव ग्रहणमिति । तदयुक्तम्; न हि ते रूपादयो गुणा अमूर्ता इन्द्रियसन्निकर्षमापद्यन्ते । न १
तर्हि इदानीमिदं भवति रूपं मया दृष्टं गन्धो वा घ्रात इति । भवति च । कथम् । इयर्ति पर्यायांस्तै-
र्वाऽर्थत इत्यर्थो द्रव्यं तस्मिन्निन्द्र
- ११९ § २०१ ] प्रथमोऽध्यायः ८१
§ २००. व्यञ्जनमव्यक्तं¹ शब्दादिजातं तस्यावग्रहो भवति² नेहादयः। किमर्थमिदम् ।
नियमार्थम्, अवग्रह एव नेहादय इति । स र्तहि एवकारः कर्तव्यः। न कर्तव्यः। 'सिद्धे
विधिरारभ्यमाणो नियमार्थः ३ इति अन्तरेणैवकारं नियमार्थो भविष्यति। ननु अवग्रहग्रहणमुभयत्र
तुल्यं तत्र किं कृतोऽयं विशेषः। अर्थावग्रहव्यञ्जनावग्रहयोर्व्यक्ताव्यक्तकृतो विशेषः। कथम् । अभि-
नवशरावाद्रीकरणवत् । यथा जलकणद्वित्रा⁴सिक्तः सरावेाऽभिनवो नार्द्रीभवति, स एव पुनःपुनः ५
सिच्यमानः शनैस्तिभ्यति, एवं श्रोत्रादिष्विन्द्रियेषु शब्दादिपरिणताः पुद्गला ५द्वित्रादिषु समयेषु
गृह्यमाणा न व्यक्तीभवन्ति, पुनःपुनरवग्रहे सति व्यक्तीभवन्ति । अतो व्यक्तग्रहणात्प्राग्व्यञ्जनाव-
ग्रहः व्यक्तग्रहणमर्थावग्रहः । ततोऽव्यक्तावग्रहणादीहादयो न भवन्ति ।
§ २०१. सर्वेन्द्रियाणामविशेषेण व्यञ्जनावग्रहप्रसङ्गे यत्रासंभवस्तदर्थप्रतिषेधमाह—
न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥१९॥ १०
§ २००. अव्यक्त शब्दादिके समूहको व्यंजन कहते हैं। इसका अवग्रह ही होता है ईहादिक
नहीं होते। शंका—यह सूत्र किसलिए आया है? समाधान—अवग्रह ही होता है ईहादिक नहीं
होते इस प्रकारका नियम करनेके लिए यह सूत्र आया है। शंका—तो फिर इस सूत्रमें एवकारका
निर्देश करना चाहिए। समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि 'किसी कार्यके सिद्ध रहते हुए यदि
उसका पुनः विधान किया जाता है तो वह नियमके लिए होता है' इस नियमके अनुसार सूत्रमें १५
एवकारके न करने पर भी वह नियमका प्रयोजक हो जाता है। शंका—जब कि अवग्रहका ग्रहण
दोनों जगह समान है तब फिर इनमें अन्तर किंनिमित्तक है? समाधान—इनमें व्यक्त ग्रहण और
अव्यक्त ग्रहणकी अपेक्षा अन्तर है। शंका—कैसे ? समाधान—जैसे माटीका नया सकोरा जलके
दो तीन कणोंसे सींचने पर गीला नहीं होता और पुनः-पुनः सींचने पर वह धीरे-धीरे गीला हो
जाता है इसी प्रकार श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके द्वारा किये गये शब्दादिरूप पुद्गल स्कन्ध दो तीन २०
समयोंमें व्यक्त नहीं होते हैं किन्तु पुनः-पुनः ग्रहण होनेपर वे व्यक्त हो जाते हैं। इससे सिद्ध हुआ
कि व्यक्त ग्रहणसे पहले-पहले व्यंजनावग्रह होता है और व्यक्त ग्रहणका नाम अर्थावग्रह है। यही
कारण है कि अव्यक्त ग्रहणपूर्व ईहादिक नहीं होते।
विशेषार्थ—यहाँ अव्यक्त शब्दादिको व्यंजन कहा है। किन्तु वीरसेन स्वामी इस लक्षण-
से सहमत नहीं हैं उनके मतानुसार प्राप्त अर्थका प्रथम ग्रहण व्यंजन कहलाता है। विचार करने २५
पर ज्ञात होता है कि दृष्टिभेदसे ही ये दो लक्षण कहे गये हैं। तत्त्वतः इनमें कोई भेद नहीं। प्राप्त
अर्थका प्रथम ग्रहण व्यंजन है यह तो पूज्यपाद स्वामी और वीरसेन स्वामी दोनोंको इष्ट है। केवल
पूज्यपाद स्वामीने स्पर्शन, रसना, घ्राण और श्रोत्र इन्द्रियोंके द्वारा विषयके प्राप्त होनेपर प्रथम
ग्रहणके समय उसकी क्या स्थिति रहती है इसका विशेष स्पष्टीकरण करने के लिए शब्दजातके
पहले अव्यक्त विशेषण दिया है। और वीरसेन स्वामो ऐसा विशेषण देना इष्ट नहीं मानते। शेष ३०
कथन सुगम है।
§ २०१. सब इन्द्रियोंके समान रूपसे व्यंजनावग्रहके प्राप्त होनेपर जिन इन्द्रियोंके द्वारा यह
सम्भव नहीं है उसका निषेध करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
चक्षु और मनसे व्यंजनावग्रह नहीं होता ॥ १९ ॥
१. 'तक्कालंम्मि वि णाणं तत्थत्थि तणुं ति तो तमव्वत्तं।' वि० भा० गा० १९६ । २. -ग्रहो भवति । ३५
किम-दि० १, दि० २, आ०, मु० । ३. 'सिद्धे विधिरारभ्यमाणो ज्ञापकार्थो भवति' — पा० म० भा० १,
१, ३ । ४. द्वित्रिसि—मु० । ५. द्वित्र्यादि—मु० ।
११
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८२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।१९ § २०२ -
§ २०२. चक्षुषा अनिन्द्रियेण च व्यञ्जनावग्रहो न भवति । कुतः । 'अप्राप्यकारित्वात् ।
यतोऽप्राप्तमर्थमविदिक्कं युक्तं संनिकर्षविषयेऽवस्थितं बाह्यप्रकाशाभिव्यक्तमुपलभते चक्षुः मनश्चा-
प्राप्तमित्यनयोर्व्यञ्जनावग्रहो नास्ति ।
५ § २०३. चक्षुषोऽप्राप्यकारित्वं कथमध्यवसीयते । आगतो युक्तितश्च । आगमतस्तावँत्-
"पुट्ठं सुणेदि सद्दं अपुट्ठं चेव पस्सदे रूअं ।
गंधं रसं च फासं पुट्ठमपुट्ठं वियाणादि ।।"
§ २०४. युक्तितश्च - अप्राप्यकारि चक्षुः; स्पृष्टानवग्रहात् । यदि प्राप्यकारि स्यात् त्वगि-
न्द्रियवत् स्पृष्टमंजनं गृह्णीयात् न तु गृह्णात्यतो मनोवदप्राप्यकारीत्यवसेयम् । ततश्चक्षुर्मनसी
वर्जयित्वा शेषाणामिन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रहः । सर्वेषामिन्द्रियानिन्द्रियाणामर्थावग्रह इति सिद्धम् ।
१० § २०२. चक्षु और मनसे व्यंजनावग्रह नहीं होता है । शंका- क्यों ? समाधान - क्योंकि
चक्षु और मन अप्राप्यकारी हैं। चूंकि नेत्र अप्राप्त, योग्य दिशामें अवस्थित, युक्त, सन्निकर्षके
योग्य देशमें अवस्थित और बाह्य प्रकाश आदिसे व्यक्त हुए पदार्थको ग्रहण करता है और मन भी
अप्राप्त अर्थको ग्रहण करता है अतः इन दोनोंके द्वारा व्यंजनावग्रह नहीं होता ।
§ २०३. शंका- चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है यह कैसे जाना जाता है ? समाधान- आगम
१५ और युक्तिसे जाना जाता है । आगमसे यथा- 'श्रोत्र स्पृष्ट शब्दको सुनता है और अस्पृष्ट शब्दको
भी सुनता है, नेत्र अस्पृष्ट रूपको ही देखता है। तथा घ्राण, रसना और स्पर्शन इन्द्रियाँ क्रमसे
स्पृष्ट और अस्पृष्ट गन्ध, रस और स्पर्शको जानती हैं।"
§ २०४. युक्तिसे यथा - चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है, क्योंकि वह स्पृष्ट पदार्थको नहीं ग्रहण
करती । यदि चक्षु इन्द्रिय प्राप्यकारी होती तो वह त्वचा इन्द्रियके समान स्पृष्ट हुए अंजनको ग्रहण
२० करती । किन्तु वह स्पृष्ट अंजनको नहीं ग्रहण करती है इससे मालूम होता है कि मनके समान चक्षु
इन्द्रिय अप्राप्यकारी है। अतः सिद्ध हुआ कि चक्षु और मनको छोड़कर शेष इन्द्रियोंके व्यंजनाव-
ग्रह होता है। तथा सब इन्द्रिय और मनके अर्थावग्रह होता है।
विशेषार्थ- पहले अवग्रहके दो भेद बतला आये हैं- अर्थावग्रह और व्यंजनावग्रह । इनमें-
से अर्थावग्रह तो पाँचों इन्द्रियों और मन इन छहोंसे होता है किन्तु व्यंजनावग्रह चक्षु और मन इन
२५ दोसे नहीं होता यह इस सूत्रका भाव है। चक्षु और मनसे व्यंजनावग्रह क्यों नहीं होता, इसका
निर्देश करते हुए जो टीकामें लिखा है उसका भाव यह है कि ये दोनों अप्राप्यकारी हैं अर्थात् ये
दोनों विषयको स्पृष्ट करके नहीं जानते हैं इसलिए इन द्वारा व्यंजनावग्रह नहीं होता । इससे यह
अपने आप फलित हो जाता है कि व्यंजनावग्रह प्राप्त अर्थका ही होता है और अर्थावग्रह प्राप्त तथा
अप्राप्त दोनों प्रकारके पदार्थोंका होता है। यहाँ यह कहा जा सकता है कि यदि अप्राप्त अर्थका
३० अर्थावग्रह होता है तो होओ इसमें बाधा नहीं, पर प्राप्त अर्थका अर्थावग्रह कैसे हो सकता है ? सो
इस शंकाका यह समाधान है कि प्राप्त अर्थका सर्व प्रथम ग्रहणके समय तो व्यंजनावग्रह ही होता
है किन्तु बादमें उसका भी अर्थावग्रह हो जाता है । नेत्र प्राप्त अर्थको क्यों नहीं जानता इसका
१. अप्राप्तिका - आ०, दि० १, दि० २ । २. युक्तस्स - मु०, ता०, ना० । ३. विशेषेऽव-मु०,
ता०, ना० । ४. प्राप्तमतो नानयोर्व्य - मु०, ता०, ना० । ५. ग्रहोऽस्ति - मु० । ६. कथमप्यवसी - मु० ।
३५ ७. तावत्- पुट्ठं सुणोदि सद्दं अपुट्ठं पुण पस्सदे ख्वं । फासं रसं च गंधं बद्धं पुट्ठं वियाणादि ।। युक्ति - मु० ।
आ० नि० गा० ५। .८ "जह पत्तं गेण्हेज्ज उ तग्गयमंजण-।" वि० भा० गा० २१२ । ९. 'लोयणमपत्त-
विसयं मणोव्व ।'- वि० भा० गा० २०९ ।
- १२० § २०६ ] प्रथमोऽध्यायः ८३
§ २०५. आह निर्दिष्टं मतिज्ञानं लक्षणतो विकल्पतश्च; तदनन्तरमुद्दिष्टं यत् श्रुतं तस्येदानीं
लक्षणं विकल्पश्च वक्तव्य इत्यत आह-
श्रुतं मतिपूर्वं द्वयनेकदशद्वादशभेदम् ॥२०॥
§ २०६. श्रुतशब्दोऽयं श्रवणमुपादाय व्युत्पादितोऽपि रूढिवशात् कस्मिंश्चिज्ज्ञानविशेषे
वर्तते। यथा कुशलवनकर्म प्रतीत्य¹ व्युत्पादितोऽपि कुशलशब्दो रूढिवशात्पर्यवदाते² वर्तते। कः ५
पुनरसौ ज्ञानविशेष इति। अत आह 'श्रुतं मतिपूर्वम्' इति। श्रुतस्य प्रमाणत्वं पूरयतीति³ पूर्वं
निमित्तं कारणमित्यनर्थान्तरम्। मतिर्निर्दिष्टा। मतिः पूर्वमस्य मतिपूर्वं मतिकारणमित्यर्थः। यदि
मतिपूर्वं श्रुतं तदपि मत्यात्मकं प्राप्नोति 'कारणसदृशं हि लोके कार्यं दृष्टम्' इति। नैतदैकान्तिकम्।
दण्डादिकारणोऽयं घटो न दण्डाद्यात्मकः। अपि च सति तस्मिंस्तदभावात्। सत्यपि मतिज्ञाने
बाह्यश्रुतज्ञाननिमित्तसंनिधानेऽपि प्रबलश्रुतावरणोदयस्य श्रुताभावः। श्रुतावरणक्षयोपशमप्रकर्षे तु १०
सति श्रुतज्ञानमुत्पद्यत इति मतिज्ञानं निमित्तमात्रं ज्ञेयम्।
निर्देश तो टीकामें किया ही है। इसी प्रकार शेष इन्द्रियाँ भी कदाचित् अप्राप्यकारी होतो हैं यह
भी सिद्ध होता है। प्रायः पृथिवीमें जिस ओर निधि रखी रहती है उस ओर वनस्पतिके मूलका
विकास देखा जाता है। यह तभी बन सकता है जब स्पर्शन इन्द्रिय-द्वारा अप्राप्त अर्थका ग्रहण
बन जाता है। इसी प्रकार रसना, घ्राण और श्रोत्र इन्द्रिय-द्वारा भी उसकी सिद्धि हो जाती है। १५
शेष कथन सुगम है।
§ २०५. लक्षण और भेदोंकी अपेक्षा मतिज्ञानका कथन किया। अब उसके बाद श्रुतज्ञानके
लक्षण और भेद कहने चाहिए; इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
श्रुतज्ञान मतिज्ञान पूर्वक होता है। वह दो प्रकारका, अनेक प्रकारका और बारह प्रकार-
का है ॥२०॥ २०
§ २०६. यह 'श्रुत' शब्द सुनने रूप अर्थकी मुख्यतासे निष्पादित है तो भी रूढ़िसे उसका
वाच्य कोई ज्ञानविशेष है। जैसे 'कुशल' शब्दका व्युत्पत्ति अर्थ कुशाका छेदना है तो भी रूढ़िसे
उसका अर्थ पर्यवदात अर्थात् विमल या मनोज्ञ लिया जाता है। वह ज्ञानविशेष क्या है इस बातको
ध्यानमें रखकर 'श्रुतं मतिपूर्वम्' यह कहा है। जो श्रुतकी प्रमाणताको पूरता है। इस व्युत्पत्तिके
अनुसार पूर्व, निमित्त और कारण ये एकार्थवाची हैं। मतिका व्याख्यान पहले कर आये हैं। वह २५
मति जिसका पूर्व अर्थात् निमित्त है वह मतिपूर्व कहलाता है जिसका अर्थ मतिकारणक होता है।
तात्पर्य यह है कि जो मतिज्ञानके निमित्तसे होता है उसे श्रुतज्ञान कहते हैं। शंका—यदि श्रुतज्ञान
मतिज्ञानपूर्वक होता है तो वह श्रुतज्ञान भी मत्यात्मक ही प्राप्त होता है; क्योंकि लोकमें कारणके
समान ही कार्य देखा जाता है? समाधान—यह कोई एकान्त नियम नहीं है कि कारणके समान
कार्य होता है। यद्यपि घटकी उत्पत्ति दण्डादिकसे होती है तो भी वह दण्डाद्यात्मक नहीं होता। ३०
दूसरे, मतिज्ञानके रहते हुए भी श्रुतज्ञान नहीं होता। यद्यपि मतिज्ञान रहा आता है और श्रुत-
ज्ञानके बाह्य निमित्त भी रहे आते हैं तो भी जिसके श्रुतज्ञानावरणका प्रबल उदय पाया जाता है
उसके श्रुतज्ञान नहीं होता। किन्तु श्रुतज्ञानावरण कर्मका प्रकर्ष क्षयोपशम होनेपर ही श्रुतज्ञान
होता है इसलिए मतिज्ञान श्रुतज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्तमात्र जानना चाहिए।
१. प्रतीत्या व्यु—मु० । २. 'अवदातं तु विमले मनोज्ञा'—'अ० ना० ४, ९६ । ३. पुव्वं पूरणगालणभावओ ३५
णं मई।' वि० मा० गा० १०५।
§ २०७. आह, श्रुतमनादिनिधनमिष्यते । तस्य मतिपूर्वकत्वे तदभावः; आदिमतोऽन्त-
वत्त्वात् । ततश्च १पुरुषकृतत्वादप्रामाण्यमिति नैष दोषः; द्रव्यादिसामान्यार्पणात् श्रुतमनादि-
निधनमिष्यते । न हि केनचित्पुरुषेण क्वचित्कदाचित्कथंचिदुत्प्रेक्षितमिति । तेषामेव विशेषापेक्षया
आदिरन्तश्च संभवतीति 'मतिपूर्वम्' इत्युच्यते । यथाङ्कुरो बीजपूर्वकः स च संतानापेक्षया
अनादिनिधन इति । न चापौरुषेयत्वं प्रामाण्यकारणम्; चौर्याद्युपदेशस्यास्मर्यमाणकर्तृकस्य
प्रामाण्यप्रसङ्गात् । अनित्यस्य च प्रत्यक्षादेः प्रामाण्ये को विरोधः ।
§ २०८. आह, २प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्तौ युगपज्ज्ञानपरिणामान्मतिपूर्वकत्वं श्रुतस्य नोपपद्यत
इति । तदयुक्तम्; सम्यक्त्वस्य तदपेक्षत्वात् । ३आत्मलाभस्तु क्रमवानिति मतिपूर्वकत्व-
व्याघाताभावः ।
§ २०९. आह, मतिपूर्वं श्रुतमित्येतल्लक्षणमव्यापि श्रुतपूर्वमपि श्रुतमिष्यते । तद्यथा--
शब्दपरिणतपुद्गलस्कन्धादाहितवर्णपदवा४क्यादिभावाच्चक्षुरादिविषयाच्च आद्यश्रुतविषयभावमा-
पन्नादव्यभिचारिणः ५कृतसंगतिर्जनो घटाज्जलधारणादि कार्यं संबन्ध्वन्तरं६ प्रतिपद्यते, धूमा-
देवाग्न्यादिवद्वयं, तदा श्रुतात् श्रुतप्रतिपत्तिरिति । नैष दोषः; तस्यापि मतिपूर्वकत्वमुपचारात् ।
श्रुतमपि क्वचिन्मतिरित्युपचर्यते मतिपूर्वकत्वादिति ।
§ २०७. शंका-श्रुतज्ञानको अनादिनिधन कहा है। ऐसी अवस्था में उसे मतिज्ञानपूर्वक
मान लेने पर उसकी अनादिनिधनता नहीं बनती, क्योंकि जिसका आदि होता है उसका अन्त
अवश्य होता है। और इसलिए वह पुरुषका कार्य होनेसे उसे प्रमाण नहीं माना जा सकता ?
समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि द्रव्य आदि सामान्य नयकी मुख्यतासे श्रुतको अनादि-
निधन कहा है। किसी पुरुषने कहीं और कभी किसी भी प्रकारसे उसे किया नहीं है। हाँ उन्हीं
द्रव्य आदि विशेष नयकी अपेक्षा उसका आदि और अन्त सम्भव है इसलिए 'वह मतिपूर्वक होता
है' ऐसा कहा जाता है। जैसे कि अंकुर बीजपूर्वक होता है, फिर भी वह सन्तानकी अपेक्षा अनादि-
निधन है। दूसरे जो यह कहा है कि पुरुषका कार्य होनेसे वह अप्रमाण है सो अपौरुषेयता
प्रमाणताका कारण नहीं है। यदि अपौरुषेयताको प्रमाणताका कारण माना जाय तो जिसके कर्त्ता-
का स्मरण नहीं होता ऐसे चोरी आदिके उपदेश भी प्रमाण हो जायेंगे । तीसरे प्रत्यक्ष आदि ज्ञान
अनित्य होकर भी यदि प्रमाण माने जाते हैं तो इसमें क्या विरोध है, अर्थात् कुछ भी नहीं ।
§ २०८. शंका-प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके साथ ही ज्ञानकी उत्पत्ति होती है, अतः
श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है यह कथन नहीं बनता ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं है,
क्योंकि ज्ञानमें समीचीनता सम्यग्दर्शनके निमित्तसे प्राप्त होती है। इन दोनोंका आत्मलाभ तो
क्रमसे ही होता है, इसलिए 'श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है' इस कथनका व्याघात नहीं होता ।
§ २०९. शंका—'मतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान होता है' इस लक्षणमें अव्याप्ति दोष आता है,
क्योंकि श्रुतज्ञानपूर्वक भी श्रुतज्ञान होता है ऐसा कहा जाता है। यथा—किसी एक जीवने वर्ण,
पद और वाक्य आदि रूपसे शब्द परिणत पुद्गल स्कन्धोंको कर्ण इन्द्रिय-द्वारा ग्रहण किया ।
अनन्तर उससे घटपदार्थ विषयक प्रथम श्रुतज्ञान हुआ । यदि उसने घटके कार्योंका संकेत कर रखा
है तो उसे उस घटज्ञानके बाद जलधारणादि दूसरे कार्योंका ज्ञान होता है और तब श्रुतज्ञानसे
१. -षकृतत्वा—मु० । २. 'णाणाण्णाणाणि य समकालाइं जओ मइसुयाइं । तो न सुयं मइपुव्वं मइणाणे वा
'सुयन्नाणं'—वि० भा० गा० १०७ । ३. 'इहलद्धिमइसुयाइं समकालाइं न तूवओगो सिं । मइपुव्वं
सुयमिह पुण सुओपजोगो मइप्पभवो । —वि० भा० गा० १०८ । ४. पदव्याख्यादि—आ०, दि० १ ।
५. संगति—मु० । ६. सम्बन्धान्तरं ता०, ना० ।
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[Header] - १।२० § २११ ] प्रथमोऽध्यायः ८५
§ २१०. भेदशब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते - द्विभेदमनेकभेदं द्वादशभेदमिति । द्विभेदं तावत्—
अङ्गबाह्यमङ्गप्रविष्टमिति । अङ्गबाह्यमनेकविधं दशवैकालिकोत्तराध्ययनादि । अङ्गप्रविष्टं द्वादश-
विधम् । तद्यथा, आचारः सूत्रकृतं स्थानं समवायः व्याख्याप्रज्ञप्तिः ज्ञातृधर्मकथा उपासकाध्ययनं
अन्तकृद्दशं अनुत्तरोपपादिकदशं प्रश्नव्याकरणं विपाकसूत्रं दृष्टिवाद इति । दृष्टिवादः पञ्चविधः—
परिकर्म सूत्रं प्रथमानुयोगः पूर्वगतं चूलिका चेति । तत्र पूर्वगतं चतुर्दशविधम्—उत्पादपूर्वं अग्राय- ५
णीयं वीर्यानुप्रवादं अस्तिनास्तिप्रवादं ज्ञानप्रवादं सत्यप्रवादं आत्मप्रवादं कर्मप्रवादं प्रत्याख्यान-
नामधेयं विद्यानुप्रवादं कल्याणनामधेयं प्राणावायं क्रियाविशालं लोकबिन्दुसारमिति । तदेतत् श्रुतं
द्विभेदमनेकभेदं द्वादशभेदमिति ।
§ २११. किंकृतोऽयं विशेषः । १वक्तृविशेषकृतः । त्रयो वक्तारः—सर्वज्ञस्तीर्थंकर इतरो वा
श्रुतकेवली आरातीयश्चेति । तत्र सर्वज्ञेन परमर्षिणा परमाचिन्त्यकेवलज्ञानविभूतिविशेषेण अर्थत १०
आगम उद्दिष्टः । तस्य प्रत्यक्षदर्शित्वात्प्रक्षीणदोषत्वाच्च प्रामाण्यम् । तस्य साक्षाच्छिष्यैर्बुद्ध्यति-
शयर्द्धियुक्तैर्गणधरैः श्रुतकेवलिभिरनुस्मृतग्रन्थरचनमङ्गपूर्व लक्षणम् । तत्प्रमाणम्; तत्प्रामाण्यात् ।
आरातीयैः पुनराचार्यैः कालदोषात्संक्षिप्तायुर्मतिबल शिष्यानुग्रहार्थं दशवैकालिकाद्युपनिबद्धम् ।
तत्प्रमाणमर्थतस्तदेवेदमिति क्षीरार्णवजलं घटगृहीतमिव ।
श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। या किसी एक जीवने चक्षु आदि इन्द्रियोंके विषयको ग्रहण किया। १५
अनन्तर उसे उससे धूमादि पदार्थविषयक प्रथम श्रुतज्ञान हुआ। यदि उसे धूमादि और अग्नि
आदि द्रव्यके सम्बन्धका ज्ञान है तो वह धूमादिके निमित्तसे अग्नि आदि द्रव्यको जानता है और
तब भी श्रुतज्ञानसे श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। इसलिए मतिज्ञानपूर्वक ही श्रुतज्ञान होता है यह
बात नहीं बनती ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जहांपर श्रुतज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान
होता है वहाँपर प्रथम श्रुतज्ञान उपचारसे मतिज्ञान माना गया है। श्रुतज्ञान भी कहींपर मति- २०
ज्ञानरूपसे उपचारित किया जाता है क्योंकि श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है ऐसा नियम है।
§ २१०. सूत्रमें आये हुए 'भेद' शब्दको दो आदि प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए।
यथा—दो भेद, अनेक भेद और बारह भेद । श्रुतज्ञानके दो भेद अंगबाह्य और अंगप्रविष्ट हैं।
अंगबाह्यके दशवैकालिक और उत्तराध्ययन आदि अनेक भेद हैं। अंगप्रविष्टके बारह भेद हैं।
यथा—आचार, सूत्रकृत्, स्थान, समवाय, व्याख्याप्रज्ञप्ति, ज्ञातृधर्मकथा, उपासकाध्ययन, अन्त- २५
कृद्दश, अनुत्तरोपपादिकदश, प्रश्नव्याकरण, विपाकसूत्र और दृष्टिवाद । दृष्टिवादके पाँच भेद हैं—
परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत और चूलिका । इनमें-से पूर्वगतके चौदह भेद हैं—उत्पादपूर्व,
आग्रायणीय, वीर्यानुवाद, अस्तिनास्तिप्रवाद, ज्ञानप्रवाद, सत्यप्रवाद, आत्मप्रवाद, कर्मप्रवाद,
प्रत्याख्याननामधेय, विद्यानुवाद, कल्याणनामधेय, प्राणावाय, क्रियाविशाल और लोकबिन्दुसार ।
इस प्रकार यह श्रुत दो प्रकारका, अनेक प्रकारका और बारह प्रकारका है । ३०
§ २११. शंका—यह भेद किंकृत है ? समाधान—यह भेद वक्ताविशेषकृत है। वक्ता तीन
प्रकारके हैं—सर्वज्ञ तीर्थंकर या सामान्य केवली तथा श्रुतकेवली और आरातीय । इनमें-से परम
ऋषि सर्वज्ञ उत्कृष्ट और अचिन्त्य केवलज्ञानरूपी विभूतिविशेषसे युक्त हैं। इस कारण उन्होंने अर्थ-
रूपसे आगमका उपदेश दिया । ये सर्वज्ञ प्रत्यक्षदर्शी और दोषमुक्त हैं इसलिए प्रमाण हैं। इनके
साक्षात् शिष्य और बुद्धिके अतिशयरूप ऋद्धिसे युक्त गणधर श्रुतकेवलियोंने अर्थरूप आगमका ३५
स्मरण कर अंग और पूर्वग्रन्थोंकी रचना की। सर्वज्ञदेवकी प्रमाणताके कारण ये भी प्रमाण हैं।
तथा आरातीय आचार्योने कालदोषसे जिनकी आयु, मति और बल घट गया है ऐसे शिष्योंका
१. -क्षेपः । विशेषवक्तृतो विशेषः कृतः । आ०, दि० १, दि० २ ।
८६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।२१ § २१२ -
§ २१२. व्याख्यातं परोक्षम् । प्रत्यक्षमिदानीं वक्तव्यम् । तद् द्वेधा-देशप्रत्यक्षं १सर्वप्रत्यक्षं
च । देशप्रत्यक्षमवधिमनःपर्ययज्ञाने । सर्वप्रत्यक्षं केवलम् । यद्येवमिदमेव तावदवधिज्ञानं त्रिःप्रका-
रस्य प्रत्यक्षस्याद्यं व्याख्यायतामित्यत्रोच्यते-द्विविधोऽवधिर्भवप्रत्ययः क्षयोपशमनिमित्तश्चेति । तत्र
भवप्रत्यय उच्यते-
५ भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम् ॥२१॥
उपकार करनेके लिए दशवैकालिक आदि ग्रन्थ रचे । जिस प्रकार क्षीरसागरका जल घटमें भर
लिया जाता है उसी प्रकार ये ग्रन्थ भी अर्थरूपसे वे ही हैं, इसलिए प्रमाण हैं ।
विशेषार्थ-मतिज्ञान श्रुतज्ञानका कारण किस रूपमें है, मतिज्ञान और श्रुतज्ञानमें अन्तर
क्या है, श्रुत अनादिनिधन और सादि कैसे है, श्रुतके भेद कितने और कौन-कौन हैं, श्रुतमें प्रमा-
१० णता कैसे आती है इत्यादि बातोंका विशेष विचार तो मूलमें किया ही है। यहाँ केवल विचार-
णीय विषय यह है कि श्रुतज्ञानका निरूपण करते समय सूत्रकारने केवल द्रव्य आगम श्रुतका ही
निरूपण क्यों किया ? अनुमान आदि ऐसे बहुत-से ज्ञान हैं जिनका अन्तर्भाव श्रुतज्ञानमें किया जाता
है फिर उनका निर्देश यहाँ क्यों नहीं किया ? क्या श्रुतज्ञान द्रव्य आगम श्रुतके ज्ञान तक ही
सीमित है और अनुमान आदिका अन्तर्भाव सूत्रकारके मतानुसार मतिज्ञानमें होता है ? ये ऐसे
१५ विचारणीय प्रश्न हैं जिनका प्रकृतमें समाधान करना आवश्यक है । बात यह है कि जैन परम्परामें
द्रव्य आगम श्रुतकी प्रधानता सदासे चली आ रही है, इसलिए सूत्रकारने श्रुतज्ञानके निरूपणके
समय उसका प्रमुखतासे निर्देश किया है। पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि श्रुतज्ञान द्रव्य आगम
श्रुतके ज्ञान तक ही सीमित है। मतिके सिवा अनुमान आदि शेष सब परोक्ष ज्ञानोंका अन्तर्भाव
श्रुतज्ञानमें ही होता है क्योंकि इन ज्ञानोंमें हेतु आदिका प्रत्यक्ष ज्ञान आदि होने पर ही इन ज्ञानों-
२० की प्रवृत्ति होती है। उदाहरणार्थ नेत्र इन्द्रियसे धूमका ज्ञान होता है। अनन्तर व्याप्तिका स्मरण
होता है तब जाकर 'यहाँ अग्नि होनी चाहिए' यह अनुमान होता है। कहीं-कहीं मतिज्ञानमें भी
इनके अन्तर्भावका निर्देश मिलता है पर वह कारणरूपसे ही जानना चाहिए । मतिज्ञान श्रुतज्ञान-
की उत्पत्तिमें निमित्त है, इसलिए कारणमें कार्यका उपचार करके कहीं-कहीं अनुमान आदिका भी
मतिज्ञान रूपसे निर्देश किया जाता है। एक बात और विचारणीय है और वह यह कि यह श्रुत-
२५ ज्ञानका प्रकरण है द्रव्यश्रुतका नहीं, इसलिए यहाँ सूत्रकारने श्रुतज्ञानके भेद न दिखलाकर द्रव्य-
श्रुतके भेद क्यों दिखलाये ? उत्तर यह है कि श्रुतज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमका और द्रव्यश्रुतका
अन्योन्य सम्बन्ध है। क्षयोपशमके अनुसार होनेवाले श्रुतज्ञानको ध्यानमें रखकर ही द्रव्यश्रुतका
विभाग किया गया है। यही कारण है कि यहाँ श्रुतज्ञानका प्रकरण होते हुए भी द्रव्यश्रुतके भेद
गिनाये गये हैं। इस बातकी विशेष जानकारीके लिए गोम्मटसार जीवकाण्डमें निर्दिष्ट ज्ञान-
३० मार्गणा द्रष्टव्य है ।
§ २१२. परोक्ष प्रमाणका व्याख्यान किया । अब प्रत्यक्ष प्रमाणका व्याख्यान करना है ।
वह दो प्रकारका है-देशप्रत्यक्ष और सर्वप्रत्यक्ष । देशप्रत्यक्ष अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानके भेद-
से दो प्रकारका है। सर्वप्रत्यक्ष केवलज्ञान है । यदि ऐसा है तो तीन प्रकारके प्रत्यक्षके आदिमें कहे
गये अवधिज्ञानका व्याख्यान करना चाहिए, इसलिए कहते हैं-अवधिज्ञान दो प्रकारका है-
३५ भवप्रत्यय और क्षयोपशमनिमित्तक । उनमें-से सर्वप्रथम भवप्रत्यय अवधिज्ञानका अगले सूत्र द्वारा
कथन करते हैं-
भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव और नारकियोंके होता है ॥२१॥
१. -न्यक्षं सकलप्र-मु० ।
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§ २१३. भव इत्युच्यते । को भवः । आयुर्नामकर्मोदयनिमित्त आत्मनः पर्यायो भवः ।
प्रत्ययः कारणं निमित्तमित्यनर्थान्तरम् । भवः प्रत्ययोऽस्य भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणां वेदितव्यः ।
यद्येवं तत्र क्षयोपशमनिमित्तत्वं न प्राप्नोति । नैष दोष; तदाश्रयात्तत्सिद्धेः । भवं प्रतीत्य क्षयो-
पशमः संजायत¹ इति कृत्वा भवः प्रधानकारणमित्युपदिश्यते । यथा पतत्रिणो गमनमाकाशे भव-
निमित्तम्, न शिक्षागुणविशेषः तथा देवनारकाणां व्रतनियमाद्यभावेऽपि जायत 'इति भवप्रत्ययः'
²इत्युच्यते । इतरथा हि भवः साधारण इति कृत्वा सर्वेषामविशेषः स्यात् । इष्यते च तत्रावधेः
प्रकर्षाप्रकर्षवृत्तिः । 'देवनारकाणाम्' इत्यविशेषाभिधानेऽपि सम्यग्दृष्टीनामेव ग्रहणम् । कुतः ।
अवधिग्रहणात् । मिथ्यादृष्टीनां च विभङ्ग इत्युच्यते । प्रकर्षाप्रकर्षवृत्तिश्च आगमतो विज्ञेया ।
§ २१४. यदि भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्, अथ क्षयोपशमहेतुकः केषामित्यत आह—
§ २१३. भवका स्वरूप कहते हैं । शंका—भव किसे कहते हैं ? समाधान—आयु नामकर्म-
के उदयका निमित्त पाकर जो जीवकी पर्याय होती है उसे भव कहते हैं ? प्रत्यय, कारण और
निमित्त ये एकार्थवाची नाम हैं । जिस अवधिज्ञानके होनेमें भव निमित्त है वह भवप्रत्यय अवधि-
ज्ञान है । वह देव और नारकियोंके जानना चाहिए । शंका—यदि ऐसा है तो इनके अवधिज्ञानके
होनेमें क्षयोपशमकी निमित्तता नहीं बनती ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि भवके
आश्रयसे क्षयोपशमकी सिद्धि हो जाती है । भवका आलम्बन लेकर क्षयोपशम हो जाता है ऐसा
समझकर भव प्रधान कारण है ऐसा उपदेश दिया जाता है । जैसे पक्षियोंका आकाशमें गमन करना
भवनिमित्तक होता है, शिक्षा गुणकी अपेक्षासे नहीं होता वैसे ही देव और नारकियोंके व्रत निय-
मादिकके अभावमें भी अवधिज्ञान होता है, इसलिए उसे भवनिमित्तक कहते हैं । यदि ऐसा न
माना जाय तो भव तो सबके साधारण रूपसे पाया जाता है, अतः सबके एक-सा अवधिज्ञान प्राप्त
होगा । परन्तु वहाँपर अवधिज्ञान न्यूनाधिक कहा ही जाता है, इससे ज्ञात होता है कि यद्यपि
वहाँपर अवधिज्ञान होता तो क्षयोपशमसे ही है पर वह क्षयोपशम भवके निमित्तसे प्राप्त होता है
अतः उसे 'भवप्रत्यय' कहते हैं । सूत्रमें 'देवनारकाणाम्' ऐसा सामान्य वचन होने पर भी इससे
सम्यग्दृष्टियोंका ही ग्रहण होता हैं, क्योंकि सूत्रमें 'अवधि' पदका ग्रहण किया है । मिथ्यादृष्टियोंका
वह विभंगज्ञान कहलाता है । अवधिज्ञान देव और नारकियोंमें न्यूनाधिक किसके कितना पाया
जाता है यह आगमसे जान लेना चाहिए ।
विशेषार्थ—अवधिज्ञान वह मर्यादित ज्ञान है जो इन्द्रिय और मनकी सहायताके बिना
मूर्तिक पदार्थोंको स्पष्ट जानता है । मनःपर्ययज्ञानका भी यही स्वरूप कहा जाता है पर इससे
मनःपर्ययज्ञानमें मौलिक भेद है । वह मनकी पर्यायों-द्वारा ही मूर्तिक पदार्थोंको जानता है, सीधे
तौरसे मूर्तिक पदार्थोंको नहीं जानता । यह अवधिज्ञान देव और नारकियोंके उस पर्यायके प्राप्त
होने पर अनायास होता है । इसके लिए उन्हें प्रयत्न विशेष नहीं करना पड़ता । तथा तिर्यञ्चों
और मनुष्योंके सम्यग्दर्शन आदि गुणोंके निमित्तसे होता है । इससे इसके भवप्रत्यय और क्षयोप-
शमनिमित्तक ये दो भेद किये गये हैं। यहाँ भवप्रत्यय अवधिज्ञान मुख्यतः देव और नारकियोंके
बतलाया है, पर तीर्थंकर आदिके भी इस अवधिज्ञानकी प्राप्ति देखी जाती है इतना यहाँ विशेष
जानना चाहिए । देव और नारकियोंमें भी उन्हींके भवके प्रथम समयसे अवधिज्ञान होता है जो
सम्यग्दृष्टि होते हैं । मिथ्यादृष्टियोंके इसकी उत्पत्ति पर्याप्त होनेपर ही होती है और उसका नाम
विभंगज्ञान है। इस ज्ञानकी विशेष जानकारी जीवकाण्ड, धवला वेदनाखण्ड आदिसे करनी चाहिए ।
§ २१४. यदि भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव और नारकियोंके होता है तो क्षयोपशमहेतुक
अवधिज्ञान किसके होता है । आगे इसी बातको बतलाते हैं—
१. -शमः संजात इति आ०, दि० १, दि० २ । २. -त्यय इष्यते । इत—आ०, दि० १, दि० २ ।
८८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।२२ § २१५ -
'क्षयोपशमनिमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम् ॥२२॥
§ २१५. अवधिज्ञानावरणस्य देशघातिस्पर्द्धकानामुदये सति सर्वघातिस्पर्द्धकानामुदयाभावः
क्षयः तेषामेवानुदयप्राप्तानां सदवस्था उपशमः। तौ निमित्तमस्येति क्षयोपशमनिमित्तः। स
शेषाणां वेदितव्यः। के पुनः शेषाः। मनुष्यास्तिर्यञ्चश्च । तेष्वपि यत्र सामर्थ्यमस्ति तत्रैव
वेदितव्यः। न ह्यसंज्ञिनामपर्याप्तकानां च तत्सामर्थ्यमस्ति । संज्ञिनां पर्याप्तकानां च न सर्वेषाम् ।
केषां र्तार्ह । यथोक्तसम्यग्दर्शनादिनिमित्तसंनिधाने सति शान्तक्षीणकर्मणां तस्योपलब्धिर्भवति ।
सर्वस्य क्षयोपशमनिमित्तत्वे क्षयोपशमग्रहणं नियमार्थं क्षयोपशम एव निमित्तं न भव इति । स
एषोऽवधिः षड्विकल्पः । कुतः अनुगाम्यननगामिवर्धमानहीयमानावस्थितानवस्थितभेदात् । कश्चि-
दवधिर्भास्करप्रकाशवद् गच्छन्तमनुगच्छति । कश्चिन्नानुगच्छति तत्रैवातिपतति २उन्मुखप्रश्नादेशि-
पुरुषवचनवत् । अपरोऽवधिः अरणिन्मंथनोत्पन्नशुष्कपर्णोपचीयमानेन्धननिचयसमिद्धपावकवत्स-
म्यग्दर्शनादिगुणविशुद्धिपरिणामसंनिधानाद्यत्परिमाण उत्पन्नस्ततो वर्द्धते आ संख्येय-
लोकेभ्यः । अपरोऽवधिः ३परिच्छिन्नोपादानसंतत्यग्निशिखावत्सम्यग्दर्शनादिगुणहानिसंक्लेेशपरि-
णामवृद्धियोगाद्यत्परिमाण उत्पन्नस्ततो हीयते आ अङ्गुलस्यासंख्येयभागात् । इतरोऽवधिः सम्य-
ग्दर्शनादिगुणावस्थानाद्यत्परिमाण उत्पन्नस्तत्परिमाण एवावतिष्ठते; न हीयते नापि वर्धते लिङ्गवत्
क्षयोपशमनिमित्तक अवधिज्ञान छह प्रकारका है। जो शेष अर्थात् तिर्यंचों और मनुष्योंके
होता है ॥ २२ ॥
§ २१५. अवधिज्ञानावरण कर्मके देशघाती स्पर्धकोंका उदयाभावी क्षय और अनुदय प्राप्त
इन्हींका सदवस्थारूप उपशम इन दोनोंके निमित्तसे जो होता है वह क्षयोपशमनिमित्तक अवधि-
ज्ञान है। यह शेष जीवोंके जानना चाहिए। शंका - शेष कौन हैं ? समाधान - मनुष्य और
तिर्यंच। उनमें भी जिनके सामर्थ्य है उन्हींके जानना चाहिए। असंज्ञी और अपर्याप्तकोंके यह
सामर्थ्य नहीं है। संज्ञी और पर्याप्तकोंमें भी सबके यह सामर्थ्य नहीं होती । शंका - तो फिर किनके
होती है ? समाधान - यथोक्त सम्यग्दर्शन आदि निमित्तोंके मिलने पर जिनके अवधिज्ञानावरण
कर्म शान्त और क्षीण हो गया है उनके यह सामर्थ्य होती है। यद्यपि अवधिज्ञानमात्र क्षयोपशमके
निमित्तसे होता है तो भी सूत्रमें क्षयोपशम पदका ग्रहण यह नियम करनेके लिए किया है कि
उक्त जीवोंके मात्र क्षयोपशम निमित्त है भव नहीं। यह अवधिज्ञान अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान,
हीयमान, अवस्थित और अनवस्थितके भेदसे छह प्रकारका है। कोई अवधिज्ञान जैसे सूर्यका
प्रकाश उसके साथ जाता है वैसे अपने स्वामीका अनुसरण करता है। कोई अवधिज्ञान अनुसरण
नहीं करता किन्तु जैसे विमुख हुए पुरुषके प्रश्नके उत्तरस्वरूप दूसरा पुरुष जो वचन कहता है वह
वहीं छूट जाता है, विमुख पुरुष उसे ग्रहण नहीं करता है वैसे ही यह अवधिज्ञान भी वहींपर छूट
जाता है। कोई अवधिज्ञान जंगलके निर्मन्थनसे उत्पन्न हुई और सूखे पत्तोंसे उपचीयमान ईंधनके
समुदायसे वृद्धिको प्राप्त हुई अग्निके समान सम्यग्दर्शनादि गुणोंकी विशुद्धि रूप परिणामोंके सन्नि-
धानवश जितने परिमाणमें उत्पन्न होता है उससे असंख्यात लोक जानने की योग्यता होने तक
बढ़ता जाता है। कोई अवधिज्ञान परिमित उपादानसन्ततिवाली अग्निशिखाके समान सम्यग्दर्श-
नादि गुणोंकी हानिसे हुए संक्लेश परिणामोंकें बढ़नेसे जितने परिमाणमें उत्पन्न होता है उससे
मात्र अंगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण जाननेकी योग्यता होने तक घटता चला जाता है। कोई
अवधिज्ञान सम्यग्दर्शनादि गुणोंके समानरूपसे स्थिर रहनेके कारण जितने परिमाणमें उत्पन्न
होता है उतना ही बना रहता है। पर्यायके नाश होते तक या केवलज्ञानके उत्पन्न होने तक
१. 'सेसाण खओवसमियाओ ।' -वि० आ० गा० ५७५ । २. -तति । उन्मुग्धप्र- ता०, ना०, मु० ।
३. -वह्निः परिमितपरि-मु० ।
- १।२३ § २१८ ] प्रथमोऽध्यायः ८९
आ भवक्षयादाकेवलज्ञानोत्पत्तेर्वा । अन्योऽवधिः सम्यग्दर्शनादिगुणवृद्धिहानियोगाद्यत्परिमाण
उत्पन्नस्ततो वर्धते यावदनेन वर्धितव्यं हीयते च यावदनेन हातव्यं वायुवेगप्रेरितजलोर्मिवत् । एवं
षड्विकल्पोऽवधिर्भवति ।
§ २१६. एवं व्याख्यातमवधिज्ञानं तदनन्तरमिदानीं मनःपर्ययज्ञानं वक्तव्यम् । तस्य भेद-
पुरःसरं लक्षणं व्याचिख्यासुरिदमाह— ५
ऋजुविपुलमती मनःपर्ययः ॥२३॥
§ २१७. ऋज्वी निर्वर्तिता प्रगुणा च । कस्मान्निर्वर्तिता । वाक्कायमनःकृतार्थस्य परमनो-
गतस्य विज्ञानात् । ऋज्वी मतिर्यस्य सोऽयं ऋजुमतिः । अनिर्वर्तिता कुटिला च विपुला । कस्माद-
निर्वर्तिता । वाक्कायमनःकृतार्थस्य परकीयमनोगतस्य विज्ञानात् । विपुला मतिर्यस्य सोऽयं विपुल-
मतिः । ऋजुमतिश्च विपुलमतिश्च ऋजुविपुलमती । एकस्य मतिशब्दस्य गतार्थत्वादप्रयोगः । १०
अथवा ऋजुश्च विपुला च ऋजुविपुले । ऋजुविपुले मती ययोस्तौ ऋजुविपुलमती इति । स एष
मनःपर्ययो द्विविधः ऋजुमतिर्विपुलमतिरिति ।
§ २१८. आह, उक्तो भेदः, लक्षणमिदानीं वक्तव्यमित्यत्रोच्यते—वीर्यान्तरायमनःपर्यय-
ज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलाभावष्टम्भादात्मनः परकीयमनःसंबन्धेन लब्धवृत्तिरुपयोगो
मनःपर्ययः । मतिज्ञानप्रसङ्ग इति चेत् उक्तोत्तरं पुरस्तात् । अपेक्षाकारणं मन इति । परकीयमनसि १५
शरीरमें स्थित मसा आदि चिह्नके समान न घटता है और न बढ़ता है। कोई अवधिज्ञान वायुके
वेगसे प्रेरित जलकी तरंगोंके समान सम्यग्दर्शनादि गुणोंकी कभी वृद्धि और कभी हानि होनेसे
जितने परिमाणमें उत्पन्न होता है उससे बढ़ता है जहांतक उसे बढ़ना चाहिए और घटता है जहां-
तक उसे घटना चाहिए । इस प्रकार अवधिज्ञान छह प्रकारका है।
विशेषार्थ—क्षयोपशमनिमित्तक अवधिज्ञानके तीन भेद हैं—देशावधि, परमावधि और सर्वा- २०
वधि । देशावधि तिर्यंचों और मनुष्योंके होता है पर मनुष्योंके संयत अवस्थामें परमावधि और
सर्वावधिका प्राप्त होना भी सम्भव है । मनुष्योंके चौथे और पांचवें गुणस्थानमें देशावधि और आगे
के गुणस्थानोंमें यथासम्भव तीनों होते हैं । भवप्रत्यय अवधिज्ञानका अन्तर्भाव देशावधिमें होता है ।
§ २१६. इस प्रकार अवधिज्ञानका व्याख्यान किया । अब आगे मनःपर्ययज्ञानका व्याख्यान
करना चाहिए । अतः उसके भेदोंके साथ लक्षणका कथन करनेकी इच्छासे आगेका सूत्र कहते हैं— २५
ऋजुमति और विपुलमति मनःपर्ययज्ञान है ॥ २३॥
§ २१७. ऋजुका अर्थ निर्वर्तित और प्रगुण है। शंका- किससे निर्वर्तित ? समाधान-
दूसरेके मनको प्राप्त हुए वचन, काय और मनकृत अर्थके विज्ञानसे निर्वर्तित । जिसकी मति ऋजु
है वह ऋजुमति कहलाता है । विपुलका अर्थ अनिर्वर्तित और कुटिल है । शंका—किससे अनिर्व-
र्तित ? समाधान—दूसरेके मनको प्राप्त हुए वचन, काय और मनकृत अर्थके विज्ञानसे अनिर्वर्तित । ३०
जिसकी मति विपुल है वह विपुलमति कहलाता है । सूत्रमें जो 'ऋजुविपुलमती' पद आया है वह
ऋजुमति और विपुलमति इन पदोंसे समसित होकर बना है। यहाँ एक ही मति शब्द पर्याप्त होने-
से दूसरे मति शब्दका प्रयोग नहीं किया । अथवा ऋजु और विपुल शब्दका कर्मधारय समास
करनेके बाद इनका मति शब्दके साथ बहुव्रीहि समास कर लेना चाहिए । तब भी दूसरे मति
शब्दकी आवश्यकता नहीं रहती । यह मनःपर्ययज्ञान दो प्रकारका है—ऋजुमति और विपुलमति । ३५
§ २१८. शंका—मनःपर्ययज्ञानके भेद तो कह दिये। अब उसका लक्षण कहना चाहिए ।
समाधान—वीर्यान्तराय और मनःपर्यय ज्ञानावरणके क्षयोपशम और अंगोपांग नामकर्मके आल-
म्बनसे आत्मामें जो दूसरेके मनके सम्बन्धसे उपयोग जन्म लेता है उसे मनःपर्ययज्ञान कहते हैं।
१२
९० सर्वार्थसिद्धौ [ १।२४ § २१९ –
व्यवस्थितोऽर्थः अनेन ज्ञायते इत्येतावदत्रापेक्ष्यते¹ । तत्र ऋजुमतिर्मनःपर्ययः कालतो जघन्येन
जीवानामात्मनश्च ²द्वित्रीणि भवग्रहणानि, उत्कर्षेण सप्ताष्टौ गत्यागत्यादिभिः प्ररूपयति । क्षेत्रतो
जघन्येन गव्यूतिपृथक्त्वं, उत्कर्षेण योजनपृथक्त्वस्याभ्यन्तरं, न बहिः । द्वितीयः कालतो जघन्येन
सप्ताष्टौ भवग्रहणानि, उत्कर्षेणासंख्येयानि गत्यागत्यादिभिः प्ररूपयति । क्षेत्रतो जघन्येन योजन-
पृथक्त्वं, उत्कर्षेण मानुषोत्तरशैलस्याभ्यन्तरं, न बहिः ।
§ २१९. उक्तयोरनयोः पुनरपि विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ॥ २४ ॥
§ २२०. तदावरणक्षयोपशमे सति आत्मनः प्रसादो विशुद्धिः । प्रतिपतनं प्रतिपातः ।
न प्रतिपातः अप्रतिपातः । उपशान्तकषायस्य चारित्रमोहोद्रेकात्प्रच्युतसंयमशिखरस्य प्रतिपातो
भवति । क्षीणकषायस्य प्रतिपातकारणाभावादप्रतिपातः । विशुद्धिश्च अप्रतिपातश्च विशुद्धयप्रति-
शंका—यह ज्ञान मनके सम्बन्धसे होता है अतः इसे मतिज्ञान होनेका प्रसंग आता है ? समाधान—
नहीं, क्योंकि इस शंकाका उत्तर दे आये हैं। अर्थात् यहाँ मनकी अपेक्षामात्र है । दूसरेके मनमें
अवस्थित अर्थ को यह जानता है इतनी मात्र यहाँ मनकी अपेक्षा है । इनमेंसे ऋजुमति मनःपर्यय-
ज्ञान कालकी अपेक्षा जघन्यसे जीवोंके और अपने दो तीन भवोंको ग्रहण करता है, उत्कृष्टसे गति
और आगतिकी अपेक्षा सात-आठ भवोंका कथन करता है । क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्यसे गव्यूतिपृथक्त्व
और उत्कृष्टसे योजनपृथक्त्वके भीतरकी बात जानता है । इससे बाहरकी नहीं । विपुलमति
कालकी अपेक्षा जघन्यसे सात-आठ भवोंको ग्रहण करता है, उत्कृष्टसे गति और आगतिकी अपेक्षा
असंख्यात भवोंका कथन करता है । क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्यसे योजनापृथक्त्व और उत्कृष्टसे मानुषो-
त्तर पर्वतके भीतरकी बात जानता है इससे बाहरकी बात नहीं जानता ।
विशेषार्थ—तत्त्वार्थसूत्रके छठवें अध्यायके दसवें सूत्रके राजवार्तिकमें शंका-समाधानके
प्रसंगसे मनःपर्ययज्ञानकी चर्चा की है। वहाँ बतलाया है कि मनःपर्ययज्ञान अपने विषयमें अवधि-
ज्ञानके समान स्वमुखसे प्रवृत्त नहीं होता है । किन्तु दूसरेके मनके सम्बन्धसे ही प्रवृत्त होता है ।
इसलिए जैसे मन अतीत और अनागत विषयोंका विचार तो करता है पर साक्षात्कार नहीं करता
उसी प्रकार मनःपर्ययज्ञानी भी भूत और भविष्यत् विषयोंको जानता तो है पर सीधे तौरसे
साक्षात्कार नहीं करता । इसी प्रकार यह वर्तमान विषयको भी मनोगत होने पर विशेषरूपसे
जानता है।' राजवार्तिकका यह कथन इतना स्पष्ट है जिससे मनःपर्ययज्ञानकी उपयोगात्मक
दशाका स्पष्ट आभास मिल जाता है । इसका आशय यह है कि करता तो है यह मनकी पर्यायोंको
ही विषय किन्तु तद्द्वारा पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है। इसके दो भेद हैं—ऋजुमति और
विपुलमति ।
§ २१९. पहले मनःपर्ययज्ञानके दो भेद कहे हैं उनका और विशेष ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
विशुद्धि और अप्रतिपातकी अपेक्षा इन दोनोंमें अन्तर है ॥२४॥
§ २२०. मनःपर्ययज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होनेपर जो आत्मामें निर्मलता आती है उसे
विशुद्धि कहते हैं । गिरनेका नाम प्रतिपात है और नहीं गिरना अप्रतिपात कहलाता है । उपशान्त-
कषाय जीवका चारित्र मोहनीयके उदयसे संयम शिखर छूट जाता है जिससे प्रतिपात होता है और
क्षीणकषाय जीवका पतनका कारण न होनेसे प्रतिपात नहीं होता । इन दोनोंकी अपेक्षा ऋजुमति
१. -पेक्षते आ० दि० १, दि० २ । २. –द्वित्रीणि मु० ।
- १२५ § २२१ ] प्रथमोऽध्यायः ९१
पातौ । १ताभ्यां विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्याम् । तयोर्विशेषस्तद्विशेषः । तत्र विशुद्ध्या तावत्-ऋजुमते-
विपुलमतिर्द्रव्यक्षेत्रकालभावैर्विशुद्धतरः । कथम् । इह यः कार्मणद्रव्यानन्तभागोऽन्त्यः सर्वावधिना
ज्ञातस्तस्य पुनरनन्तभागीकृतस्यान्त्यो भाग ऋजुमतेर्विषयः । तस्य ऋजुमतिविषयस्यानन्तभागी-
कृतस्यान्त्यो भागो विपुलमतेर्विषयः । अनन्तस्यानन्तभेदत्वात् । द्रव्यक्षेत्रकालतो विशुद्धिरुक्ता ।
भावतो विशुद्धिः सूक्ष्मतरद्रव्यविषयत्वादेव वेदितव्या प्रकृष्टक्षयोपशमविशुद्धियोगात् । अप्रतिपातेनापि ५
विपुलमतिर्विशिष्टः ; स्वामिनां प्रवर्द्धमानचारित्रोदयत्वात् । ऋजुमतिः पुनः प्रतिपाती ; स्वामिनां
कषायोद्रेकाद्धीयमानचारित्रोदयत्वात् ।
§ २२१. यद्यस्य मनःपर्ययस्य प्रत्यात्ममयं विशेषः, अथानयोरवधिमनःपर्यययोः कुतो
विशेष इत्यत आह—
विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ॥२५॥ १०
और विपुलमतिमें भेद है । विशुद्धि यथा—ऋजुमतिसे विपुलमति द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी
अपेक्षा विशुद्धतर है । शंका—कैसे ? समाधान—यहाँ जो कार्मण द्रव्यका अनन्तवाँ अन्तिम भाग
सर्वावधिज्ञानका विषय है उसके भी अनन्त भाग करनेपर जो अन्तिम भाग प्राप्त होता है वह
ऋजुमतिका विषय है । और इस ऋजुमतिके विषयके अनन्त भाग करनेपर जो अन्तिम भाग प्राप्त
होता है वह विपुलमतिका विषय है । अनन्तके अनन्त भेद हैं अतः ये उत्तरोत्तर सूक्ष्म विषय बन १५
जाते हैं । इस प्रकार द्रव्य, क्षेत्र और कालकी अपेक्षा विशुद्धि कही । भावकी अपेक्षा विशुद्धि
उत्तरोत्तर सूक्ष्म द्रव्यको विषय करनेवाला होनेसे ही जान लेनी चाहिए क्योंकि इनका उत्तरोत्तर
प्रकृष्ट क्षयोपशम पाया जाता है, इसलिए ऋजुमतिसे विपुलमतिमें विशुद्धि अधिक होती है ।
अप्रतिपातकी अपेक्षा भी विपुलमति विशिष्ट है; क्योंकि इसके स्वामियोंके प्रवर्धमान चारित्र
पाया जाता है । परन्तु ऋजुमति प्रतिपाती है; क्योंकि इसके स्वामियोंके कषायके उदयसे घटता २०
हुआ चारित्र पाया जाता है ।
विशेषार्थ—यहाँ मनःपर्यय ज्ञानके दोनों भेदोंमें अन्तर दिखलाया गया है । ऋजुमति स्थूल
ज्ञान है और विपुलमति सूक्ष्मज्ञान । इसीसे इसका भेद स्पष्ट हो जाता है । यह विशुद्धिकृत भेद
है । इससे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा पदार्थका ज्ञान करनेमें अन्तर पड़ जाता है । किन्तु
इन दोनों ज्ञानोंके अन्तरका एक कारण और है जो कि प्रतिपात और अप्रतिपात शब्दसे पुकारा २५
जाता है । प्रतिपातका अर्थ है गिरना और अप्रतिपातका अर्थ है नहीं गिरना । ऐसा नियम है कि
विपुलमति मनःपर्ययज्ञान उसीके होता है जो तद्भव मोक्षगामी होते हुए भी क्षपकश्रेणीपर चढ़ता
है किन्तु ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञानके लिए ऐसा कोई नियम नहीं है । वह तद्भव मोक्षगामीके भी
हो सकता है और अन्यके भी हो सकता है । इसी प्रकार जो क्षपक श्रेणीपर चढ़ता है उसके भी
हो सकता है और जो उसपर नहीं चढ़कर उपशम श्रेणीपर चढ़ता है या नहीं भी चढ़ता है उसके ३०
भी हो सकता है । इसीसे ऋजुमति प्रतिपाती और विपुलमति अप्रतिपाती माना गया है । यह
विशेषता योग्यताजन्य है इसलिए इसका निर्देश अलगसे किया है ।
§ २२१. यदि इस मनःपर्ययज्ञानका अलग-अलग यह भेद है तो अवधिज्ञान और मनःपर्यय
ज्ञानमें किस कारणसे भेद है ? अब इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं--
विशुद्धि, क्षेत्र, स्वामी और विषयकी अपेक्षा अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें भेद है ॥२५॥ ३५
१. ताभ्याम् । तयोः मु० ।
§ २२२. विशुद्धिः प्रसादः। क्षेत्रं यत्रस्थान्भावान्प्रतिपद्यते। स्वामी प्रयोक्ता। विषयो ज्ञेयः।
तत्रावधेर्मनःपर्ययो विशुद्धतरः। कुतः सूक्ष्मविषयत्वात्। क्षेत्रमुक्तम्¹। विषयो वक्ष्यते। स्वामित्वं
प्रत्युच्यते। प्रकृष्टचारित्रगुणोपेतेषु वर्तते² प्रमत्तादिषु क्षीणकषायान्तेषु। तत्र चोत्पद्यमानः प्रवर्द्ध-
मानचारित्रेषु न हीयमानचारित्रेषु। प्रवर्द्धमानचारित्रेषु चोत्पद्यमानः सप्तविधान्यतमर्द्धिप्राप्तेषूप-
जायते नेतरेषु। ऋद्धिप्राप्तेषु केषुचिन्न सर्वेषु। ³इत्यस्यायं स्वामिविशेषो विशिष्टसंयमग्रहणं वा
वाक्ये प्रकृतम्। अवधिः पुनश्चातुर्गतिकेष्विति स्वामिभेदादप्यनयोर्विशेषः।
§ २२३. इदानीं केवलज्ञानलक्षणाभिधानं प्राप्तकालम्। तदुल्लङ्घ्य ज्ञानानां विषयनिबन्धः
परीक्ष्यते। कुतः। तस्य 'मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम्' इत्यत्र वक्ष्यमाणत्वात्।
यद्येवमाद्ययोरेव तावन्मतिश्रुतयोर्विषयनिबन्ध उच्यतामित्यत आह—
मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ॥२६॥
§ २२४. निबन्धनं निबन्धः। कस्य। विषयस्य। तद्विषयग्रहणं कर्तव्यम्। न कर्तव्यम्।
प्रकृतं विषयग्रहणम्। क्व प्रकृतम्। 'विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः' ४इत्यत्र। अतस्तस्यार्थवशादिह-
§ २२२. विशुद्धिका अर्थ निर्मलता है। जितने स्थानमें स्थित भावोंको जानता है वह क्षेत्र
है। स्वामीका अर्थ प्रयोक्ता है। विषय ज्ञेयको कहते हैं। सो इन दोनों ज्ञानोंमें अवधिज्ञानसे मनः-
पर्ययज्ञान विशुद्धतर है क्योंकि मनःपर्ययज्ञानका विषय सूक्ष्म है। क्षेत्रका कथन पहले कर आये हैं।
विषयका कथन आगे करेंगे। यहाँ स्वामीका विचार करते हैं—मनःपर्ययज्ञान प्रमत्तसंयतसे लेकर
क्षीणकषाय गुणस्थान तकके उत्कृष्ट चारित्रगुणसे युक्त जीवोंके ही पाया जाता है। वहाँ उत्पन्न
होता हुआ भी वह वर्द्धमान चारित्रवाले जीवोंके ही उत्पन्न होता है घटते हुए चारित्रवाले जीवोंके
नहीं। वर्धमान चारित्रवाले जीवोंमें उत्पन्न होता हुआ भी सात प्रकारकी ऋद्धियोंमें-से किसी एक
ऋद्धिको प्राप्त हुए जीवोंके ही उत्पन्न होता है अन्यके नहीं। ऋद्धिप्राप्त जीवोंमें भी किन्हींके ही
उत्पन्न होता है सबके नहीं, इस प्रकार सूत्रमें इसका स्वामीविशेष या विशिष्ट संयमका ग्रहण
प्रकृत है। परन्तु अवधिज्ञान चारों गतिके जीवोंके होता है, इसलिए स्वामियोंके भेदसे भी इनमें
अन्तर है।
विशेषार्थ—यों तो अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें मौलिक अन्तर है। अवधिज्ञान सीधे
तौरसे पदार्थोंको जानता है और मनःपर्ययज्ञान मनकी पर्यायरूपसे। फिर भी यहाँ अन्य आधारोंसे
इन दोनों ज्ञानोंमें अन्तर दिखलाया गया है। वे आधार चार हैं—द्रव्य, क्षेत्र, स्वामी और विषय।
§ २२३. अब केवलज्ञानका लक्षण कहनेका अवसर है किन्तु उसका कथन न कर पहले
ज्ञानोंके विषयका विचार करते हैं, क्योंकि केवलज्ञानका लक्षण 'मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्त-
रायक्षयाच्च केवलम्' यहाँ कहेंगे। यदि ऐसा है तो सर्वप्रथम आदिमें आये हुए मतिज्ञान और
श्रुतज्ञानके विषयका कथन करना चाहिए। इसी बातको ध्यान में रखकर आगेका सूत्र कहते हैं—
मतिज्ञान और श्रुतज्ञानकी प्रवृत्ति कुछ पर्यायोंसे युक्त सब द्रव्योंमें होती है ॥२६॥
§ २२४. निबन्ध शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—निबन्धनं निबन्धः = जोड़ना, सम्बन्ध
करना। शंका—किसका सम्बन्ध ? समाधान—विषयका। शंका—तो सूत्रमें विषय पदका ग्रहण
करना चाहिए ? समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि विषय पदका ग्रहण प्रकरण प्राप्त है।
शंका—कहाँ प्रकरणमें आया है ? समाधान—'विषयक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः' इस सूत्रमें आया है।
१. मुक्तं विशेषो ब-मु० । २. -तेऽप्रम- मु०, दि० १, २ । ३. इत्यस्य स्वामिविशेषविशिष्टसंयमग्रहणं वाक्ये
कृतम् । अव-मु० ता०, ना० । ४. -येभ्य इत्यतस्त-दि० १, दि० २, आ०, मु० ।
- १।२८ § २२७ ] प्रथमोऽध्यायः ९३
भक्तिपरिणामो भवतीति विषयस्य' इत्यभिसंबध्यते । 'द्रव्येषु' इति बहुवचननिर्देशः सर्वेषां
जीवधर्माधर्म १कालाकाशपुद्गलानां संग्रहार्थः । तद्विशेषणार्थं 'असर्वपर्याय' ग्रहणम् । तानि द्रव्याणि
मतिश्रुतयोर्विषयभावमापद्यमानानि कतिपयैरेव पर्यायैर्विषयभावमास्कन्दन्ति न सर्वपर्यायैरनन्तैर-
पीति । अत्राह—धर्मास्तिकायादीन्यतीन्द्रियाणि तेषु मतिज्ञानं न प्रवर्तते । अतः सर्वद्रव्येषु मतिज्ञानं
वर्तत इत्ययुक्तम् । नैष दोषः ; अनिन्द्रियाख्यं करणमस्ति तदालम्बनो नोइन्द्रियावरणक्षयोपशम- ५
लब्धिपूर्वक उपयोगोऽवग्रहादिरूपः प्रागेवोपजायते । ततस्तत्पूर्वं श्रुतज्ञानं तद्विषयेषु स्वयोग्येषु
व्याप्रियते ।
§ २२५. अथ मतिश्रुतयोरनन्तरनिर्देशार्हस्यावधेः को विषयनिबन्ध इत्यत आह—
रूपिष्ववधेः ॥२७॥
§ २२६. 'विषयनिबन्धः' इत्यनुवर्तते । 'रूपिषु' इत्यनेन पुद्गलाः पुद्गलद्रव्यसंबन्धाश्च १०
जीवाः परिगृह्यन्ते । रूपिष्वेवावधेर्विषयनिबन्धो २नारूपिष्विति नियमः क्रियते । रूपिष्वपि भवन्न
सर्वपर्यायेषु, स्वयोग्येष्वेवेत्यवधारणार्थमसर्वपर्यायेष्वित्यभिसंबध्यते ।
§ २२७. अथ तदनन्तरनिर्देशभाजो मनःपर्ययस्य को विषयनिबन्ध इत्यत आह—
तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ॥२८॥
वहांसे 'विषय' पदको ग्रहण कर अर्थके अनुसार उसकी विभक्ति बदल ली गयी है, इसलिए १५
यहाँ षष्ठी विभक्तिके अर्थमें उसका ग्रहण हो जाता है । सूत्रमें 'द्रव्येषु' बहुवचनान्त पदका
निर्देश जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन सब द्रव्योंका संग्रह करनेके लिए
किया है । और इन सब द्रव्योंके विशेषण रूपसे 'असर्वपर्यायेषु' पदका ग्रहण किया है । वे सब
द्रव्य मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके विषय भावको प्राप्त होते हुए कुछ पर्यायोंके द्वारा ही विषय-
भावको प्राप्त होते हैं, सब पर्यायोंके द्वारा नहीं और अनन्त पर्यायोंके द्वारा भी नहीं । २०
शंका—धर्मास्तिकाय आदि अतीन्द्रिय हैं । उनमें मतिज्ञानकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती, अतः
'सब द्रव्योंमें मतिज्ञानकी प्रवृत्ति होती है' यह कहना अयुक्त है ? समाधान—यह कोई दोष
नहीं है, क्योंकि अनिन्द्रिय नामका एक करण है । उसके आलम्बनसे नोइन्द्रियावरण कर्मके
क्षयोपशमरूप लब्धिपूर्वक अवग्रह आदिरूप उपयोग पहले ही उत्पन्न हो जाता है, अतः तत्पूर्वक
होनेवाला श्रुतज्ञान अपने योग्य इन विषयोंमें व्यापार करता है । २५
§ २२५. मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके अनन्तर निर्देशके योग्य अवधिज्ञानका विषय क्या है
आगे सूत्र द्वारा इसी बातको बतलाते हैं—
अवधिज्ञानकी प्रवृत्ति रूपी पदार्थोंमें होती है ॥२७॥
§ २२६. पिछले सूत्रसे 'विषयनिबन्धः' पदकी अनुवृत्ति होती है । 'रूपिषु' पद-द्वारा पुद्गलों
और पुद्गलोंमें बद्ध जीवोंका ग्रहण होता है । इस सूत्र-द्वारा 'रूपी पदार्थोंमें ही अवधिज्ञानका ३०
विषय सम्बन्ध है अरूपी पदार्थोंमें नहीं' यह नियम किया गया है । रूपी पदार्थोंमें होता हुआ भी
उनकी सब पर्यायोंमें नहीं होता किन्तु स्वयोग्य पर्यायोंमें ही होता है इस प्रकारका निश्चय करनेके
लिए 'असर्वपर्यायेषु' पदका सम्बन्ध होता है ।
§ २२७. अब इसके अनन्तर निर्देशके योग्य मनःपर्ययज्ञानका विषयसम्बन्ध क्या है इस
बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— ३५
मनःपर्ययज्ञानकी प्रवृत्ति अवधिज्ञानके विषयके अनन्तवें भागमें होती है ॥ २८ ॥
१. धर्माकाश-मु० । २. नारूपेष्विति मु० ।
९४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।२९ § २२८ -
§ २२८. यदेतद्रूपि¹ द्रव्यं सर्वावधिज्ञानविषयत्वेन समर्थितं तस्यानन्तभागीकृतस्यैकस्मिन्भागे
मनःपर्ययः प्रवर्तते ।
§ २२९. अथान्ते यन्निर्द्दिष्टं केवलज्ञानं तस्य को विषयनिबन्ध इत्यत आह—
सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥२९॥
§ २३०. द्रव्याणि च पर्यायाश्च द्रव्यपर्याया इति इतरेतरयोगलक्षणो द्वन्द्वः । तद्विशेषणं
'सर्व'ग्रहणं प्रत्येकमभिसंबध्यते, सर्वेषु द्रव्येषु सर्वेषु पर्यायेष्विति । जीवद्रव्याणि तावदनन्ता-
नन्तानि ततोऽप्यनन्तानन्तानि पुद्गलद्रव्याणि च अणुस्कन्धभेदैर्भिन्नानि, धर्माधर्माकाशानि त्रीणि,
कालश्चासंख्येयस्तेषां पर्यायाश्च त्रिकालभुवः प्रत्येकमनन्तानन्तास्तेषु । द्रव्यं पर्यायजातं वा न
किंचित्केवलज्ञानस्य विषयाभावमतिक्रान्तमस्ति । अपरिमितमाहात्म्यं हि तदिति ज्ञापनार्थं
'सर्वद्रव्यपर्यायेषु' इत्युच्यते ।
§ २३१. आह विषयनिबन्धोऽवधृतो मत्यादीनाम् । इदं तु न निर्ज्ञातमेकस्मिन्नात्मनि स्वनि-
मित्तसंनिधानोपजनितवृत्तीनि ज्ञानानि यौगपद्येन कति भवन्तीत्युच्यते—
§ २२८. जो रूपी द्रव्य सर्वावधिज्ञानका विषय है उसके अनन्त भाग करनेपर उसके एक
भागमें मनःपर्ययज्ञान प्रवृत्त होता है ।
§ २२९. अब अन्तमें जो केवलज्ञान कहा है उसका विषय क्या है यह बतलानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
केवलज्ञानकी प्रवृत्ति सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायोंमें होती है ॥ २९ ॥
§ २३०. सूत्रमें आये हुए द्रव्य और पर्याय इन दोनों पदोंका इतरेतरयोग द्वन्द्वसमास है ।
तथा इन दोनोंके विशेषणरूपसे आये हुए 'सर्व' पदको द्रव्य और पर्याय इन दोनोंके साथ जोड़ लेना
चाहिए । यथा—सब द्रव्योंमें और सब पर्यायोंमें । जीव द्रव्य अनन्तानन्त हैं। पुद्गल द्रव्य इनसे
भी अनन्तानन्तगुणे हैं । जिनके अणु और स्कन्ध ये भेद हैं। धर्म, अधर्म और आकाश ये तीन
हैं और काल असंख्यात हैं। इन सब द्रव्योंकी पृथक्-पृथक् तीनों कालोंमें होनेवाली अनन्तानन्त
पर्यायें हैं। इन सबमें केवलज्ञानकी प्रवृत्ति होती है । ऐसा न कोई द्रव्य है और न पर्यायसमूह है
जो केवलज्ञानके विषयके परे हो। केवलज्ञानका माहात्म्य अपरिमित है इसी बातका ज्ञान करानेके
लिए सूत्रमें 'सर्वद्रव्यपर्यायेषु' पद कहा है ।
विशेषार्थ—यहाँ चार सूत्रोंमें पाँचों ज्ञानोंके विषयका निर्देश किया गया है। मतिज्ञान
और श्रुतज्ञान पाँचों इन्द्रियों और मनकी सहायतासे प्रवृत्त होते हैं यह तो स्पष्ट ही है इसलिए
इनका विषय मूर्तिक पदार्थ ही हो सकता है पर मन विकल्प-द्वारा रूपी और अरूपी सभी पदार्थों-
को जानता है इसीसे इन दोनों ज्ञानोंका विषय छहों द्रव्य और उनकी कुछ पर्यायोंको बतलाया है ।
अवधिज्ञान यद्यपि बाह्य सहायताके बिना प्रवृत्त होता है पर वह क्षायोपशमिक होनेसे उसका
विषय मूर्तिक पदार्थ ही हो सकता है। इसी कारणसे अवधिज्ञानका विषय रूपी पदार्थ कहा है ।
मनःपर्यय ज्ञान भी क्षायोपशमिक होता है, इसलिए उसका विषय यद्यपि रूपी पदार्थ ही है पर
यह रूपी पदार्थको मनकी पर्यायों-द्वारा ही ग्रहण करता है इससे इसका विषय अवधिज्ञानके
विषयके अनन्तवें भागप्रमाण कहा है तथा केवलज्ञान निरावरण होता है इसलिए उसका विषय
सब द्रव्य और उनकी सब पर्यायें हैं ऐसा कहा है ।
§ २३१. मत्यादिकके विषयसम्बन्धका निश्चय किया, किन्तु यह न जान सके कि एक
१. यद्रूपि-दि० १, दि० २ । २. भेदेन मि-मु० ।
- १३० ६ २३२ ] प्रथमोऽध्यायः ९५
एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्ना चतुर्भ्यः ॥३०॥
§ २३२. एकशब्दः संख्यावाची, आदिशब्दोऽवयववचनः । एक आदिर्येषां तानि इमान्येका-
दीनि । भाज्यानि विभक्तव्यानि । यौगपद्येनैकस्मिन्नात्मनि । आ कुतः । आ चतुर्भ्यः । तद्यथा-
एकं तावत्केवलज्ञानं, न तेन सहान्यानि क्षायोपशमिकानि युगपदवतिष्ठन्ते । द्वे मतिश्रुते । त्रीणि
मतिश्रुतावधिज्ञानानि, मतिश्रुतमनःपर्ययज्ञानानि वा । चत्वारि मतिश्रुतावधिमनःपर्ययज्ञानानि । ५
न पञ्च सन्ति, केवलस्यासहायत्वात् ।
आत्मामें एक साथ अपने-अपने निमित्तोंके मिलनेपर कितने ज्ञान उत्पन्न हो सकते हैं, इसी बातका
ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
एक आत्मामें एक साथ एकसे लेकर चार तक ज्ञान भजनासे होते हैं ॥ ३० ॥
§ २३२. 'एक' शब्द संख्यावाची है और 'आदि' शब्द अवयववाची है । जिनका आदि एक १०
है वे एकादि कहलाते हैं। 'भाज्यानि' का अर्थ 'विभाग करना चाहिए' होता है। तात्पर्य यह है
कि एक आत्मामें एक साथ एक ज्ञानसे लेकर चार ज्ञान तक हो सकते हैं। यथा-यदि एक ज्ञान
होता है तो केवलज्ञान होता है। उसके साथ दूसरे क्षायोपशमिक ज्ञान एक साथ नहीं रह सकते ।
दो होते हैं तो मतिज्ञान और श्रुतज्ञान होते हैं। तीन होते हैं तो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधि-
ज्ञान या मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और मनःपर्ययज्ञान होते हैं। तथा चार होते हैं तो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, १५
अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान होते हैं। एक साथ पाँच ज्ञान नहीं होते, क्योंकि केवलज्ञान
असहाय है।
विशेषार्थ-यहाँ एक साथ एक आत्मामें कमसे कम कितने और अधिकसे अधिक कितने
ज्ञान हो सकते हैं इस बातका निर्देश किया है। यह तो स्पष्ट है कि ज्ञान एक है अतः उसकी पर्याय
भी एक कालमें एक ही हो सकती है फिर भी यहाँ एक आत्मामें एक साथ कई ज्ञान होनेका निर्देश २०
किया है सो उसका कारण अन्य है। बात यह है कि जब ज्ञान निरावरण होता है तब तो उसमें
किसी प्रकारका भेद नहीं किया जा सकता है, अतएव ऐसो अवस्थामें एक केवलज्ञान पर्यायका ही
प्रकाश माना गया है। किन्तु संसार अवस्थामें जब ज्ञान सावरण होता है तब निमित्त भेदसे उसी
ज्ञानको कई भागोंमें विभक्त कर दिया जाता है। सावरण अवस्थामें जितने भो ज्ञान प्रकट होते हैं
वे सब क्षायोपशमिक ही होते हैं और क्षयोपशम एक साथ कई प्रकारका हो सकता है, इसलिए २५
सावरण अवस्थामें दो, तीन या चार ज्ञानकी सत्ता युगपत् मानो गयी है। पर इसका यह अर्थ
नहीं कि जब दो, तीन या चार ज्ञानकी सत्ता रहती है तब वे सब ज्ञान एक साथ उपयोगरूप हो
सकते हैं। उपयोग तो एक कालमें एक ही ज्ञानका होता है अन्य ज्ञान उस समय लब्धिरूपसे रहते
हैं। आशय यह है कि ऐसा कोई क्षण नहीं जब ज्ञानको कोई पर्याय प्रकट न हो। मतिज्ञान,
श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये सब ज्ञानकी पर्यायें हैं इसलिए इनमेंसे ३०
एक कालमें एक ही पर्यायका उदय रहता है। निरावरण अवस्थामें मात्र केवलज्ञान पर्यायका उदय
रहता है और सावरण अवस्थामें प्रारम्भकी चार पर्यायोंमेंसे एक कालमें किसी एक पर्यायका
उदय रहता है फिर भी तब युगपत् दो, तीन और चार ज्ञानोंकी सत्ताके माननेका कारण एकमात्र
निमित्तभेद है। जब मति और श्रुत इन दो पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता है तब
युगपत् दो ज्ञानोंका सद्भाव कहा जाता है। जब मति, श्रुत और अवधि या मति, श्रुत और ३५
मनःपर्यय इन तीन पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता है तब युगपत् तीन ज्ञानोंका
सद्भाव कहा जाता है और जब मति आदि चार पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता
है तब युगपत् चार ज्ञानोंका सद्भाव माना जाता है। यही कारण है कि प्रकृत सूत्रमें एक साथ
एक आत्माके एक, दो, तीन या चार ज्ञान हो सकते हैं यह कहा है।
९६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३१ § २३३ -
§ २३३. अथ यथोक्तानि मत्यादीनि ज्ञानव्यपदेशमेव लभन्ते उतान्यथापीत्यत आह—
मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च१ ॥ ३१ ॥
§ २३४. विपर्ययो मिथ्येत्यर्थः । कुतः । सम्यगधिकारात् । 'च'शब्दः समुच्चयार्थः ।
विपर्ययश्च सम्यक्चेति । कुतः पुनरेषां विपर्ययः । मिथ्यादर्शनेन सहैकार्थसमवायात् सरजस्क-
कटुकालाबुगतदुग्धवत् । ननु च तत्राधारदोषाद् दुग्धस्य रसविपर्ययो भवति । न च तथा मत्यज्ञा-
नादीनां विषयग्रहणे विपर्ययः । तथा हि, सम्यग्दृष्टिर्यथा चक्षुरादिभी रूपादीनुपलभते तथा
मिथ्यादृष्टिरपि२ मत्यज्ञानेन । यथा च सम्यग्दृष्टिः श्रुतेन रूपादीन् जानाति निरूपयति च तथा
मिथ्यादृष्टिरपि श्रुताज्ञानेन । यथा चावधिज्ञानेन सम्यग्दृष्टिः रूपिणोऽर्थानवगच्छति तथा मिथ्या-
दृष्टिर्विभङ्गज्ञानेनेति ।
§ २३५. अत्रोच्यते—
३सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥ ३२ ॥
§ २३६. सद्दिद्यमानमसदविद्यमानमित्यर्थः । तयोरविशेषेण यदृच्छया उपलब्धेर्विपर्ययो
भवति । कदाचिद्रूपादि संदप्यसदिति प्रतिपद्यते, असदपि सदिति, कदाचित्सत्सदेव, असदप्यसदेवेति
मिथ्यादर्शनोदयादध्यवस्यति । यथा पित्तोदयाकुलितबुद्धिर्मातरं भार्येति, भार्यामपि मातेति मन्यते ।
§ २३३. अब यथोक्त मत्यादिक ज्ञान व्यपदेशको ही प्राप्त होते हैं या अन्यथा भी होते हैं इस
बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मति, श्रुत और अवधि ये तीन विपर्यय भी हैं ॥ ३१ ॥
§ २३४. विपर्ययका अर्थ मिथ्या है, क्योंकि सम्यग्दर्शनका अधिकार है । 'च' शब्द समु-
च्चयरूप अर्थमें आया है । इससे यह अर्थ होता है कि मति, श्रुत और अवधि विपर्यय भी हैं और
समीचीन भी । शंका—ये विपर्यय क्यों हैं ? —समाधान—क्योंकि मिथ्यादर्शनके साथ एक आत्मामें
इनका समवाय पाया जाता है । जिस प्रकार रज सहित कड़वी तूंबड़ीमें रखा हुआ दूध कड़वा हो
जाता है उसी प्रकार मिथ्यादर्शनके निमित्तसे ये विपर्यय होते हैं । कड़वी तूंबड़ीमें आधारके दोषसे
दूधका रस मीठेसे कड़वा हो जाता है, यह स्पष्ट है किन्तु उस प्रकार मत्यादि ज्ञानोंकी विषयके
ग्रहण करनेमें विपरीतता नहीं मालूम होती । खुलासा इस प्रकार है—जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि चक्षु
आदिके द्वारा रूपादिक पदार्थोंको ग्रहण करता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि भी । जिस प्रकार
सम्यग्दृष्टि श्रुतके द्वारा रूपादि पदार्थोंको जानता है और उनका निरूपण करता है उसी प्रकार
मिथ्यादृष्टि भो श्रुतज्ञानके द्वारा रूपादिक पदार्थोंको जानता है और उनका निरूपण करता है ।
जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि अवधिज्ञानके द्वारा रूपी पदार्थोंको जानता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि भी
विभंग ज्ञानके द्वारा रूपी पदार्थोंको जानता है ।
§ २३५. यह एक प्रश्न है जिसका समाधान करनेके लिए अगला सूत्र कहते हैं ।
वास्तविक और अवास्तविकके अन्तरके बिना यदृच्छोपलब्धि ( जब जैसा जी में आया
उस रूप ग्रहण होने ) के कारण उन्मत्तकी तरह ज्ञान भी अज्ञान ही है ॥ ३२ ॥
§ २३६. प्रकृतमें 'सत्' का अर्थ विद्यमान और 'असत्' का अर्थ अविद्यमान है । इनकी
विशेषता न करके इच्छानुसार ग्रहण करनेसे विपर्यय होता है । कदाचित् रूपादिक विद्यमान हैं तो
१. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् । पा० यो० सू० १, ८ । २. -रपि । यथा दि० १, दि० २, आ० ।
३. 'सदसदविसेसणाओ भवहेजउदिच्छिओवलम्भाओ । नाणफलाभावाओ मिच्छदिट्ठिस्स अण्णाणं ।'-वि० भा०
गा० ११५ ।
Here is the line-by-line transcription of the Sanskrit text, Hindi translation/commentary, and footnotes from the image:
– १३२ § २३९ ] प्रथमोऽध्यायः ९७
यदृच्छया$^१$ यदापि मातरं मातैवेति भार्यामपि भार्यैवेति च तदापि न तत्सम्यग्ज्ञानम् । एवं
मत्यादीनामपि रूपादिषु विपर्ययो वेदितव्यः। तथा हि, कश्चिन्मिथ्यादर्शनपरिणाम आत्मन्यवस्थितो
रूपाद्युपलब्धौ सत्यामपि कारणविपर्यास भेदाभेदविपर्यास स्वरूपविपर्यास च जनयति ।
§ २३७. कारणविपर्यासस्तावद्—रूपादीनामेकं कारणममूर्त्तं नित्यमिति केचित्प्रकल्पयन्ति ।$^३$
अपरे पृथिव्यादिजातिभिन्नाः परमाणवश्चतुस्त्रिद्व्येकगुणास्तुल्यजातीयानां कार्याणामारम्भका ५
इति । $^४$अन्ये वर्णयन्ति—पृथिव्यादीनि चत्वारि भूतानि, भौतिकधर्मा वर्णगन्धरसस्पर्शाः, एतेषां
समुदायो रूपपरमाणुरष्टक इत्यादि । $^५$इतरे $^६$वर्णयन्ति—पृथिव्यप्तेजोवायवः काठिन्यादिद्रवत्वा-
द्युष्णत्वादीरणत्वादिगुणा$^७$ जातिभिन्नाः परमाणवः कार्यस्यारम्भकाः ।
§ २३८. भेदाभेदविपर्यासः 'कारणात्कार्यमर्थान्तरभूतमेवेति $^८$अनर्थान्तरभूतमेवेति च १०
परिकल्पना ।
§ २३९. स्वरूपविपर्यासौ रूपादयो निर्विकल्पाः$^१$$^०$ सन्ति न सन्त्येव$^१$$^१$ वा। तदाकारपरिणतं
विज्ञानमेव$^१$$^२$। न च तदालम्बनं वस्तु बाह्यमिति । एवमन्यानपि परिकल्पनाभेदान् दृष्टेष्टविरुद्धा-
भी उन्हें अविद्यमान मानता है। और कदाचित् अविद्यमान वस्तुको भी विद्यमान कहता है। कदा-
चित् सत्को सत् और असत्को असत् ही मानता है। यह सब निश्चय मिथ्यादर्शनके उदयसे होता
है। जैसे पित्तके उदयसे आकुलित बुद्धिवाला मनुष्य माताको भार्या और भार्याको माता मानता १५
है। जब अपनी इच्छाकी लहरके अनुसार माताको माता और भार्या भार्याको ही मानता है
तब भी वह ज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है। इसी प्रकार मत्यादिकका भी रूपादिकमें विपर्यय जानना
चाहिए। खुलासा इस प्रकार है- आत्मामें स्थित कोई मिथ्यादर्शनरूप परिणाम रूपादिककी
उपलब्धि होनेपर भी कारणविपर्यास, भेदाभेदविपर्यास और स्वरूपविपर्यासको उत्पन्न करता
रहता है। २०
§ २३७. कारणविपर्यास यथा-कोई मानते हैं कि रूपादिकका एक कारण है जो अमूर्त्त
और नित्य है। कोई मानते हैं कि पृथिवी जातिके परमाणु अलग हैं जो चार गुणवाले हैं। जल
जातिके परमाणु अलग हैं जो तीन गुणवाले हैं। अग्नि जातिके परमाणु अलग हैं जो दो गुणवाले हैं
और वायु जातिके परमाणु अलग हैं जो एक गुणवाले हैं। तथा ये परमाणु अपने समान जातीय
कार्यको ही उत्पन्न करते हैं। कोई कहते हैं कि पृथिवी आदि चार भूत हैं और इन भूतोंके वर्ण, २५
गन्ध, रस और स्पर्श ये भौतिक धर्म हैं। इन सबके समुदायको एक रूप परमाणु या अष्टक कहते
हैं। कोई कहते हैं कि पृथिवी, जल, अग्नि और वायु ये क्रमसे काठिन्यादि, द्रवत्वादि, उष्णत्वादि
और ईरणत्वादि गुणवाले अलग-अलग जातिके परमाणु होकर कार्यको उत्पन्न करते हैं।
§ २३८. भेदाभेदविपर्यास यथा - कारणसे कार्यको सर्वथा भिन्न या सर्वथा अभिन्न मानना।
§ २३९. स्वरूपविपर्यास यथा-रूपादिक निर्विकल्प हैं, या रूपादिक हैं ही नहीं, या ३०
रूपादिकके आकाररूपसे परिणत हुआ विज्ञान ही है उसका आलम्बनभूत और कोई बाह्य पदार्थ
नहीं है। इसी प्रकार मिथ्यादर्शनके उदयसे ये जीव प्रत्यक्ष और अनुमानके विरुद्ध नाना प्रकारकी
कल्पनाएँ करते हैं और उनमें श्रद्धान उत्पन्न करते हैं। इसलिए इनका यह ज्ञान मत्यज्ञान,
श्रुताज्ञान या विभंग ज्ञान होता है। किन्तु सम्यग्दर्शन तत्त्वार्थ के ज्ञानमें श्रद्धान उत्पन्न करता है
अतः इस प्रकारका ज्ञान मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और और अवधिज्ञान होता है। ३५
१. -च्छया मातरं मु०, ता०, ना० । २. सांख्याः । ३. नैयायिकाः । ४. बौद्धाः । ५. लौकायतिकः ।
६. -तरे कल्पयन्ति पथि- आ०, दि० १ । ७. -णत्त्वादिगमनादिगुणा आ०, दि० १, दि० २ । ८. नैयायिकाः ।
९. सांख्याः । १०. बौद्धाः । ११. नैयायिकाः । १२. योगाचाराः ।
१३
९८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २४० -
न्मिथ्यादर्शनोदयात्कल्पयन्ति तत्र च श्रद्धानमुत्पादयन्ति । ततस्तन्मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं १विभङ्गज्ञानं
च भवति । सम्यग्दर्शनं पुनस्तत्त्वार्थाधिगमे श्रद्धानमुत्पादयति । ततस्तन्मतिज्ञानं श्रुतज्ञान-
मवधिज्ञानं च भवति ।
§ २४०. आह प्रमाणं द्विप्रकारं वर्णितम् । प्रमाणैकदेशाश्च नयास्तदनन्तरोद्देशभाजो निर्दे-
ष्टव्या इत्यत आह—
नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूढैवंभूता नयाः ॥ ३३ ॥
§ २४१. एतेषां सामान्यविशेषलक्षणं वक्तव्यम् । सामान्यलक्षणं तावद्वस्तुन्यनेकान्तात्मन्य-
विरोधेन हेत्वर्पणात्साध्यविशेषस्य याथात्म्यप्रापणप्रवणः२ प्रयोगो नयः । स द्वेधा द्रव्यार्थिकः
पर्यायार्थिकश्चेति । द्रव्यं सामान्यमुत्सर्गः अनुवृत्तिरित्यर्थः । तद्विषयो द्रव्यार्थिकः । पर्यायो विशेषो-
ऽपवादो व्यावृत्तिरित्यर्थः । तद्विषयः पर्यायार्थिकः । तयोर्भेदा नैगमादयः ।
§ २४२. तेषां विशेषलक्षणमुच्यते—अनभिनिर्वृत्तार्थसंकल्पमात्रग्राही नैगमः । कंचित्पुरुषं
परिगृहीतपरशुं गच्छन्तमवलोक्य कश्चित्पृच्छति किमर्थं भवान्गच्छतीति । स आह प्रस्थमानेतु-
मिति । नासौ तदा प्रस्थपर्यायः संनिहितः । तदभिनिर्वृत्तये संकल्पमात्रे प्रस्थव्यवहारः । तथा
विशेषार्थ—यहाँपर प्रारम्भके तीन ज्ञान विपर्यय होते हैं यह बतलाकर वे विपर्यय क्यों होते
हैं यह बतलाया गया है । संसारी जीवकी श्रद्धा विपरीत और समीचीनके भेदसे दो प्रकारकी होती
है । विपरीत श्रद्धावाले जीवको विश्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता । वह जगत्में कितने पदार्थ हैं
उनका स्वरूप क्या है यह नहीं जानता । आत्मा और परमात्माके स्वरूप बोधसे तो वह सर्वथा
वंचित रहता है । वह घटको घट और पटको पट ही कहता है पर जिन तत्त्वोंसे इनका निर्माण
होता है उनका इसे यथार्थ बोध नहीं होने पाता । यही कारण है कि जीवकी श्रद्धाके अनुसार ज्ञान
भी समीचीन ज्ञान और मिथ्या ज्ञान इन दो भागोंमें विभक्त हो जाता है । यथार्थ श्रद्धाके होनेपर
जो ज्ञान होते हैं उन्हें समीचीन ज्ञान कहते हैं और यथार्थ श्रद्धाके अभावमें होनेवाले ज्ञानोंका नाम
ही मिथ्या ज्ञान है । ऐसे मिथ्या ज्ञान तीन माने गये हैं—कुमति ज्ञान, कुश्रुत ज्ञान और विभंग
ज्ञान । ये ही तीन ज्ञान मिथ्या होते हैं अन्य नहीं, क्योंकि ये ज्ञान विपरीत श्रद्धावालेके भी पाये
जाते हैं । विपरीत श्रद्धा क्यों होती है इसका निर्देश मूल टीकामें किया ही है ।
§ २४०. दो प्रकारके प्रमाणका वर्णन किया । प्रमाणके एकदेशको नय कहते हैं । इनका
कथन प्रमाणके अनन्तर करना चाहिए, अतः आगेका सूत्र कहते हैं—
नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ये सात नय हैं ॥३३॥
२४१. इनका सामान्य और विशेष लक्षण कहना चाहिए । सामान्य लक्षण—अनेकान्तात्मक
वस्तुमें विरोधके बिना हेतुकी मुख्यतासे साध्यविशेषकी यथार्थताके प्राप्त करानेमें समर्थ प्रयोगको
नय कहते हैं । इसके दो भेद हैं-द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक । द्रव्यका अर्थ सामान्य, उत्सर्ग और
अनुवृत्ति है और इसको विषय करनेवाला नय द्रव्यार्थिक नय कहलाता है । तथा पर्यायका अर्थ
विशेष, अपवाद और व्यावृत्ति है और इसको विषय करनेवाला नय पर्यायार्थिक नय कहलाता है ।
इन दोनों नयोंके उत्तर भेद नैगमादिक हैं ।
§ २४२. अब इनका विशेष लक्षण कहते हैं—अनिष्पन्न अर्थमें संकल्पमात्रको ग्रहण करने-
वाला नय नैगम है । यथा–हाथमें फरसा लेकर जाते हुए किसी पुरुषको देखकर कोई अन्य पुरुष
पूछता है आप किस कामके लिए जा रहे हैं । वह कहता है प्रस्थ लानेके लिए जा रहा हूँ । उस
समय वह प्रस्थ पर्याय संनिहित नहीं है, केवल उसके बनानेका संकल्प होनेसे उसमें प्रस्थ व्यवहार
१. -ज्ञानमवध्यज्ञा-मु० । २. -वणप्रयो-मु० ।
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- १३३ § २४४ ] प्रथमोऽध्यायः ९९
एधोदकाद्याहरणे व्यापिप्रमाणं कश्चित्पृच्छति किं करोति भवानिति । स आह ओदनं पचामीति ।
न तदौदनपर्यायः संनिहितः, तदर्थे व्यापारे स प्रयुज्यते । एवं प्रकारो लोकसंव्यवहारः अनभिनि-
वृत्ताऽर्थसंकल्पमात्रविषयो नैगमस्य गोचरः ।
§ २४३. स्वजात्यविरोघेनैकध्यमुपानीय पर्यायानाक्रान्तभेदानविशेषेण समस्तग्रहणात्संग्रहः ।
सत्, द्रव्यं, घट इत्यादि । सदित्युक्ते सदिति वाग्विज्ञानानुवृत्तिलिङ्गाऽनुमितसत्ताधारभूतानाम- ५
विशेषेण सर्वेषां संग्रहः । द्रव्यमित्युक्तेऽपि द्रवति गच्छति तांस्तान्पर्यायानित्युपलक्षितानां जीवाजीव-
तद्भेदप्रभेदानां संग्रहः । तथा घट इत्युक्तेऽपि घटबुद्ध्यभिधानानुगमलिङ्गाऽनुमितसकलार्थसंग्रहः ।
एवं प्रकारोऽन्योऽपि संग्रहनयस्य १विषयः ।
§ २४४. संग्रहनयाक्षिप्तानामर्थानां विधिपूर्वक्रमवहरणं व्यवहारः । को विधिः । यः संग्रह-
गृहीतोऽर्थस्तदानुपूर्येणैव व्यवहारः प्रवर्तत इत्ययं विधिः । तद्यथा—सर्वसंग्रहेण २यत्तत्त्वं गृहीतं १०
तच्चानपेक्षितविशेषं नालं संव्यवहारायेति व्यवहारनय आश्रीयते । यत्सत्तद् द्रव्यं गुणो वेति ।
द्रव्येणापि संग्रहाक्षिप्तेन जीवाजीवविशेषानपेक्षेण न शक्यः संव्यवहार इति जीवद्रव्यममजीवद्रव्य-
मिति वा व्यवहार आश्रीयते । जीवाजीवावपि ३ च संग्रहाक्षिप्तौ नालं संव्यवहारायेति प्रत्येकं
देवनारकादिर्घटादिश्च व्यवहारेणाश्रीयते । एवमयं नयस्तावद्वर्तते यावत्पुनर्नास्ति विभागः ।
किया गया है। तथा ईंधन और जल आदिके लानेमें लगे हुए किसी पुरुषसे कोई पूछता है कि १५
आप क्या कर रहे हैं। उसने कहा भात पका रहा हूँ। उस समय भात पर्याय सन्निहित नहीं है,
केवल भातके लिए किये गये व्यापारमें भातका प्रयोग किया गया है। इस प्रकारका जितना लोक-
व्यवहार अनिष्पन्न अर्थके आलम्बनसे संकल्पमात्रको विषय करता है वह सब नैगम नयका
विषय है।
§ २४३. भेदसहित सब पर्यायोंको अपनी जातिके अविरोध-द्वारा एक मानकर सामान्यसे २०
सबको ग्रहण करनेवाला नय संग्रहनय है। यथा- सत्, द्रव्य और घट आदि। 'सत्' ऐसा कहनेपर
सत् इस प्रकारके वचन और विज्ञानकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सत्ताके आधारभूत सब पदार्थों
का सामान्य रूपसे संग्रह हो जाता है। 'द्रव्य' ऐसा कहनेपर भी 'उन-उन पर्यायोंको द्रवता है
अर्थात् प्राप्त होता है' इस प्रकार इस व्युत्पत्तिसे युक्त जीव, अजीव और उनके सब भेद-प्रभेदोंका
संग्रह हो जाता है। तथा 'घट' ऐसा कहनेपर भी घट इस प्रकारकी बुद्धि और घट इस प्रकारके २५
शब्दकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सब घट पदार्थोंका संग्रह हो जाता है। इस प्रकार अन्य भी
संग्रह नयका विषय है।
§ २४४. संग्रह नयके द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थोंका विधिपूर्वक अवहरण अर्थात् भेद करना
व्यवहार नय है। शंका--विधि क्या है ? समाधान--जो संग्रह नयके द्वारा गृहीत अर्थ है उसीके
आनुपूर्वी क्रमसे व्यवहार प्रवृत्त होता है, यह विधि है। यथा--सर्वसंग्रह नयके द्वारा जो वस्तु ३०
ग्रहण की गयी है वह अपने उत्तर भेदोंके बिना व्यवहार करानेमें असमर्थ है, इसलिए व्यवहार
नयका आश्रय लिया जाता है। यथा--जो सत् है वह या तो द्रव्य है या गुण । इसी प्रकार संग्रह
नयका विषय जो द्रव्य है वह जीव अजीवकी अपेक्षा किये बिना व्यवहार करानेमें असमर्थ है
इसलिए जीव द्रव्य है और अजीव द्रव्य है इस प्रकारके व्यवहारका आश्रय लिया जाता है। जीव
द्रव्य और अजीव द्रव्य भी जब तक संग्रह नयके विषय रहते हैं तब तक वे व्यवहार करानेमें ३५
असमर्थ हैं इसलिए व्यवहारसे जीव द्रव्यके देव, नारकी आदि रूप और अजीव द्रव्यके घटादिरूप
भेदोंका आश्रय लिया जाता है। इस प्रकार इस नयकी प्रवृत्ति वहीं तक होती है जहाँ तक वस्तुमें
फिर कोई विभाग करना सम्भव नहीं रहता।
१. संग्रहनयः ॥२॥ संग्र-मु० । २. यत्संग्र-मु०, दि० १; दि०२, आ० । ३. जीवावपि संग्र-मु० ।
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