सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] - १।२० § २११ ] प्रथमोऽध्यायः ८५
§ २१०. भेदशब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते - द्विभेदमनेकभेदं द्वादशभेदमिति । द्विभेदं तावत्—
अङ्गबाह्यमङ्गप्रविष्टमिति । अङ्गबाह्यमनेकविधं दशवैकालिकोत्तराध्ययनादि । अङ्गप्रविष्टं द्वादश-
विधम् । तद्यथा, आचारः सूत्रकृतं स्थानं समवायः व्याख्याप्रज्ञप्तिः ज्ञातृधर्मकथा उपासकाध्ययनं
अन्तकृद्दशं अनुत्तरोपपादिकदशं प्रश्नव्याकरणं विपाकसूत्रं दृष्टिवाद इति । दृष्टिवादः पञ्चविधः—
परिकर्म सूत्रं प्रथमानुयोगः पूर्वगतं चूलिका चेति । तत्र पूर्वगतं चतुर्दशविधम्—उत्पादपूर्वं अग्राय- ५
णीयं वीर्यानुप्रवादं अस्तिनास्तिप्रवादं ज्ञानप्रवादं सत्यप्रवादं आत्मप्रवादं कर्मप्रवादं प्रत्याख्यान-
नामधेयं विद्यानुप्रवादं कल्याणनामधेयं प्राणावायं क्रियाविशालं लोकबिन्दुसारमिति । तदेतत् श्रुतं
द्विभेदमनेकभेदं द्वादशभेदमिति ।
§ २११. किंकृतोऽयं विशेषः । १वक्तृविशेषकृतः । त्रयो वक्तारः—सर्वज्ञस्तीर्थंकर इतरो वा
श्रुतकेवली आरातीयश्चेति । तत्र सर्वज्ञेन परमर्षिणा परमाचिन्त्यकेवलज्ञानविभूतिविशेषेण अर्थत १०
आगम उद्दिष्टः । तस्य प्रत्यक्षदर्शित्वात्प्रक्षीणदोषत्वाच्च प्रामाण्यम् । तस्य साक्षाच्छिष्यैर्बुद्ध्यति-
शयर्द्धियुक्तैर्गणधरैः श्रुतकेवलिभिरनुस्मृतग्रन्थरचनमङ्गपूर्व लक्षणम् । तत्प्रमाणम्; तत्प्रामाण्यात् ।
आरातीयैः पुनराचार्यैः कालदोषात्संक्षिप्तायुर्मतिबल शिष्यानुग्रहार्थं दशवैकालिकाद्युपनिबद्धम् ।
तत्प्रमाणमर्थतस्तदेवेदमिति क्षीरार्णवजलं घटगृहीतमिव ।
श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। या किसी एक जीवने चक्षु आदि इन्द्रियोंके विषयको ग्रहण किया। १५
अनन्तर उसे उससे धूमादि पदार्थविषयक प्रथम श्रुतज्ञान हुआ। यदि उसे धूमादि और अग्नि
आदि द्रव्यके सम्बन्धका ज्ञान है तो वह धूमादिके निमित्तसे अग्नि आदि द्रव्यको जानता है और
तब भी श्रुतज्ञानसे श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। इसलिए मतिज्ञानपूर्वक ही श्रुतज्ञान होता है यह
बात नहीं बनती ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जहांपर श्रुतज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान
होता है वहाँपर प्रथम श्रुतज्ञान उपचारसे मतिज्ञान माना गया है। श्रुतज्ञान भी कहींपर मति- २०
ज्ञानरूपसे उपचारित किया जाता है क्योंकि श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है ऐसा नियम है।
§ २१०. सूत्रमें आये हुए 'भेद' शब्दको दो आदि प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए।
यथा—दो भेद, अनेक भेद और बारह भेद । श्रुतज्ञानके दो भेद अंगबाह्य और अंगप्रविष्ट हैं।
अंगबाह्यके दशवैकालिक और उत्तराध्ययन आदि अनेक भेद हैं। अंगप्रविष्टके बारह भेद हैं।
यथा—आचार, सूत्रकृत्, स्थान, समवाय, व्याख्याप्रज्ञप्ति, ज्ञातृधर्मकथा, उपासकाध्ययन, अन्त- २५
कृद्दश, अनुत्तरोपपादिकदश, प्रश्नव्याकरण, विपाकसूत्र और दृष्टिवाद । दृष्टिवादके पाँच भेद हैं—
परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत और चूलिका । इनमें-से पूर्वगतके चौदह भेद हैं—उत्पादपूर्व,
आग्रायणीय, वीर्यानुवाद, अस्तिनास्तिप्रवाद, ज्ञानप्रवाद, सत्यप्रवाद, आत्मप्रवाद, कर्मप्रवाद,
प्रत्याख्याननामधेय, विद्यानुवाद, कल्याणनामधेय, प्राणावाय, क्रियाविशाल और लोकबिन्दुसार ।
इस प्रकार यह श्रुत दो प्रकारका, अनेक प्रकारका और बारह प्रकारका है । ३०
§ २११. शंका—यह भेद किंकृत है ? समाधान—यह भेद वक्ताविशेषकृत है। वक्ता तीन
प्रकारके हैं—सर्वज्ञ तीर्थंकर या सामान्य केवली तथा श्रुतकेवली और आरातीय । इनमें-से परम
ऋषि सर्वज्ञ उत्कृष्ट और अचिन्त्य केवलज्ञानरूपी विभूतिविशेषसे युक्त हैं। इस कारण उन्होंने अर्थ-
रूपसे आगमका उपदेश दिया । ये सर्वज्ञ प्रत्यक्षदर्शी और दोषमुक्त हैं इसलिए प्रमाण हैं। इनके
साक्षात् शिष्य और बुद्धिके अतिशयरूप ऋद्धिसे युक्त गणधर श्रुतकेवलियोंने अर्थरूप आगमका ३५
स्मरण कर अंग और पूर्वग्रन्थोंकी रचना की। सर्वज्ञदेवकी प्रमाणताके कारण ये भी प्रमाण हैं।
तथा आरातीय आचार्योने कालदोषसे जिनकी आयु, मति और बल घट गया है ऐसे शिष्योंका
१. -क्षेपः । विशेषवक्तृतो विशेषः कृतः । आ०, दि० १, दि० २ ।