सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ११९ § २०१ ] प्रथमोऽध्यायः ८१
§ २००. व्यञ्जनमव्यक्तं¹ शब्दादिजातं तस्यावग्रहो भवति² नेहादयः। किमर्थमिदम् ।
नियमार्थम्, अवग्रह एव नेहादय इति । स र्तहि एवकारः कर्तव्यः। न कर्तव्यः। 'सिद्धे
विधिरारभ्यमाणो नियमार्थः ३ इति अन्तरेणैवकारं नियमार्थो भविष्यति। ननु अवग्रहग्रहणमुभयत्र
तुल्यं तत्र किं कृतोऽयं विशेषः। अर्थावग्रहव्यञ्जनावग्रहयोर्व्यक्ताव्यक्तकृतो विशेषः। कथम् । अभि-
नवशरावाद्रीकरणवत् । यथा जलकणद्वित्रा⁴सिक्तः सरावेाऽभिनवो नार्द्रीभवति, स एव पुनःपुनः ५
सिच्यमानः शनैस्तिभ्यति, एवं श्रोत्रादिष्विन्द्रियेषु शब्दादिपरिणताः पुद्गला ५द्वित्रादिषु समयेषु
गृह्यमाणा न व्यक्तीभवन्ति, पुनःपुनरवग्रहे सति व्यक्तीभवन्ति । अतो व्यक्तग्रहणात्प्राग्व्यञ्जनाव-
ग्रहः व्यक्तग्रहणमर्थावग्रहः । ततोऽव्यक्तावग्रहणादीहादयो न भवन्ति ।
§ २०१. सर्वेन्द्रियाणामविशेषेण व्यञ्जनावग्रहप्रसङ्गे यत्रासंभवस्तदर्थप्रतिषेधमाह—
न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥१९॥ १०
§ २००. अव्यक्त शब्दादिके समूहको व्यंजन कहते हैं। इसका अवग्रह ही होता है ईहादिक
नहीं होते। शंका—यह सूत्र किसलिए आया है? समाधान—अवग्रह ही होता है ईहादिक नहीं
होते इस प्रकारका नियम करनेके लिए यह सूत्र आया है। शंका—तो फिर इस सूत्रमें एवकारका
निर्देश करना चाहिए। समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि 'किसी कार्यके सिद्ध रहते हुए यदि
उसका पुनः विधान किया जाता है तो वह नियमके लिए होता है' इस नियमके अनुसार सूत्रमें १५
एवकारके न करने पर भी वह नियमका प्रयोजक हो जाता है। शंका—जब कि अवग्रहका ग्रहण
दोनों जगह समान है तब फिर इनमें अन्तर किंनिमित्तक है? समाधान—इनमें व्यक्त ग्रहण और
अव्यक्त ग्रहणकी अपेक्षा अन्तर है। शंका—कैसे ? समाधान—जैसे माटीका नया सकोरा जलके
दो तीन कणोंसे सींचने पर गीला नहीं होता और पुनः-पुनः सींचने पर वह धीरे-धीरे गीला हो
जाता है इसी प्रकार श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके द्वारा किये गये शब्दादिरूप पुद्गल स्कन्ध दो तीन २०
समयोंमें व्यक्त नहीं होते हैं किन्तु पुनः-पुनः ग्रहण होनेपर वे व्यक्त हो जाते हैं। इससे सिद्ध हुआ
कि व्यक्त ग्रहणसे पहले-पहले व्यंजनावग्रह होता है और व्यक्त ग्रहणका नाम अर्थावग्रह है। यही
कारण है कि अव्यक्त ग्रहणपूर्व ईहादिक नहीं होते।
विशेषार्थ—यहाँ अव्यक्त शब्दादिको व्यंजन कहा है। किन्तु वीरसेन स्वामी इस लक्षण-
से सहमत नहीं हैं उनके मतानुसार प्राप्त अर्थका प्रथम ग्रहण व्यंजन कहलाता है। विचार करने २५
पर ज्ञात होता है कि दृष्टिभेदसे ही ये दो लक्षण कहे गये हैं। तत्त्वतः इनमें कोई भेद नहीं। प्राप्त
अर्थका प्रथम ग्रहण व्यंजन है यह तो पूज्यपाद स्वामी और वीरसेन स्वामी दोनोंको इष्ट है। केवल
पूज्यपाद स्वामीने स्पर्शन, रसना, घ्राण और श्रोत्र इन्द्रियोंके द्वारा विषयके प्राप्त होनेपर प्रथम
ग्रहणके समय उसकी क्या स्थिति रहती है इसका विशेष स्पष्टीकरण करने के लिए शब्दजातके
पहले अव्यक्त विशेषण दिया है। और वीरसेन स्वामो ऐसा विशेषण देना इष्ट नहीं मानते। शेष ३०
कथन सुगम है।
§ २०१. सब इन्द्रियोंके समान रूपसे व्यंजनावग्रहके प्राप्त होनेपर जिन इन्द्रियोंके द्वारा यह
सम्भव नहीं है उसका निषेध करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
चक्षु और मनसे व्यंजनावग्रह नहीं होता ॥ १९ ॥
१. 'तक्कालंम्मि वि णाणं तत्थत्थि तणुं ति तो तमव्वत्तं।' वि० भा० गा० १९६ । २. -ग्रहो भवति । ३५
किम-दि० १, दि० २, आ०, मु० । ३. 'सिद्धे विधिरारभ्यमाणो ज्ञापकार्थो भवति' — पा० म० भा० १,
१, ३ । ४. द्वित्रिसि—मु० । ५. द्वित्र्यादि—मु० ।
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CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri