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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 558 में से

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पृष्ठ 195
  • १२० § २०६ ] प्रथमोऽध्यायः ८३

§ २०५. आह निर्दिष्टं मतिज्ञानं लक्षणतो विकल्पतश्च; तदनन्तरमुद्दिष्टं यत् श्रुतं तस्येदानीं
लक्षणं विकल्पश्च वक्तव्य इत्यत आह-
श्रुतं मतिपूर्वं द्वयनेकदशद्वादशभेदम् ॥२०॥
§ २०६. श्रुतशब्दोऽयं श्रवणमुपादाय व्युत्पादितोऽपि रूढिवशात् कस्मिंश्चिज्ज्ञानविशेषे
वर्तते। यथा कुशलवनकर्म प्रतीत्य¹ व्युत्पादितोऽपि कुशलशब्दो रूढिवशात्पर्यवदाते² वर्तते। कः ५
पुनरसौ ज्ञानविशेष इति। अत आह 'श्रुतं मतिपूर्वम्' इति। श्रुतस्य प्रमाणत्वं पूरयतीति³ पूर्वं
निमित्तं कारणमित्यनर्थान्तरम्। मतिर्निर्दिष्टा। मतिः पूर्वमस्य मतिपूर्वं मतिकारणमित्यर्थः। यदि
मतिपूर्वं श्रुतं तदपि मत्यात्मकं प्राप्नोति 'कारणसदृशं हि लोके कार्यं दृष्टम्' इति। नैतदैकान्तिकम्।
दण्डादिकारणोऽयं घटो न दण्डाद्यात्मकः। अपि च सति तस्मिंस्तदभावात्। सत्यपि मतिज्ञाने
बाह्यश्रुतज्ञाननिमित्तसंनिधानेऽपि प्रबलश्रुतावरणोदयस्य श्रुताभावः। श्रुतावरणक्षयोपशमप्रकर्षे तु १०
सति श्रुतज्ञानमुत्पद्यत इति मतिज्ञानं निमित्तमात्रं ज्ञेयम्।

निर्देश तो टीकामें किया ही है। इसी प्रकार शेष इन्द्रियाँ भी कदाचित् अप्राप्यकारी होतो हैं यह
भी सिद्ध होता है। प्रायः पृथिवीमें जिस ओर निधि रखी रहती है उस ओर वनस्पतिके मूलका
विकास देखा जाता है। यह तभी बन सकता है जब स्पर्शन इन्द्रिय-द्वारा अप्राप्त अर्थका ग्रहण
बन जाता है। इसी प्रकार रसना, घ्राण और श्रोत्र इन्द्रिय-द्वारा भी उसकी सिद्धि हो जाती है। १५
शेष कथन सुगम है।
§ २०५. लक्षण और भेदोंकी अपेक्षा मतिज्ञानका कथन किया। अब उसके बाद श्रुतज्ञानके
लक्षण और भेद कहने चाहिए; इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
श्रुतज्ञान मतिज्ञान पूर्वक होता है। वह दो प्रकारका, अनेक प्रकारका और बारह प्रकार-
का है ॥२०॥ २०
§ २०६. यह 'श्रुत' शब्द सुनने रूप अर्थकी मुख्यतासे निष्पादित है तो भी रूढ़िसे उसका
वाच्य कोई ज्ञानविशेष है। जैसे 'कुशल' शब्दका व्युत्पत्ति अर्थ कुशाका छेदना है तो भी रूढ़िसे
उसका अर्थ पर्यवदात अर्थात् विमल या मनोज्ञ लिया जाता है। वह ज्ञानविशेष क्या है इस बातको
ध्यानमें रखकर 'श्रुतं मतिपूर्वम्' यह कहा है। जो श्रुतकी प्रमाणताको पूरता है। इस व्युत्पत्तिके
अनुसार पूर्व, निमित्त और कारण ये एकार्थवाची हैं। मतिका व्याख्यान पहले कर आये हैं। वह २५
मति जिसका पूर्व अर्थात् निमित्त है वह मतिपूर्व कहलाता है जिसका अर्थ मतिकारणक होता है।
तात्पर्य यह है कि जो मतिज्ञानके निमित्तसे होता है उसे श्रुतज्ञान कहते हैं। शंका—यदि श्रुतज्ञान
मतिज्ञानपूर्वक होता है तो वह श्रुतज्ञान भी मत्यात्मक ही प्राप्त होता है; क्योंकि लोकमें कारणके
समान ही कार्य देखा जाता है? समाधान—यह कोई एकान्त नियम नहीं है कि कारणके समान
कार्य होता है। यद्यपि घटकी उत्पत्ति दण्डादिकसे होती है तो भी वह दण्डाद्यात्मक नहीं होता। ३०
दूसरे, मतिज्ञानके रहते हुए भी श्रुतज्ञान नहीं होता। यद्यपि मतिज्ञान रहा आता है और श्रुत-
ज्ञानके बाह्य निमित्त भी रहे आते हैं तो भी जिसके श्रुतज्ञानावरणका प्रबल उदय पाया जाता है
उसके श्रुतज्ञान नहीं होता। किन्तु श्रुतज्ञानावरण कर्मका प्रकर्ष क्षयोपशम होनेपर ही श्रुतज्ञान
होता है इसलिए मतिज्ञान श्रुतज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्तमात्र जानना चाहिए।

१. प्रतीत्या व्यु—मु० । २. 'अवदातं तु विमले मनोज्ञा'—'अ० ना० ४, ९६ । ३. पुव्वं पूरणगालणभावओ ३५
णं मई।' वि० मा० गा० १०५।