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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 558 में से

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पृष्ठ 194

८२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।१९ § २०२ -
§ २०२. चक्षुषा अनिन्द्रियेण च व्यञ्जनावग्रहो न भवति । कुतः । 'अप्राप्यकारित्वात् ।
यतोऽप्राप्तमर्थमविदिक्कं युक्तं संनिकर्षविषयेऽवस्थितं बाह्यप्रकाशाभिव्यक्तमुपलभते चक्षुः मनश्चा-
प्राप्तमित्यनयोर्व्यञ्जनावग्रहो नास्ति ।
५ § २०३. चक्षुषोऽप्राप्यकारित्वं कथमध्यवसीयते । आगतो युक्तितश्च । आगमतस्तावँत्-
"पुट्ठं सुणेदि सद्दं अपुट्ठं चेव पस्सदे रूअं ।
गंधं रसं च फासं पुट्ठमपुट्ठं वियाणादि ।।"
§ २०४. युक्तितश्च - अप्राप्यकारि चक्षुः; स्पृष्टानवग्रहात् । यदि प्राप्यकारि स्यात् त्वगि-
न्द्रियवत् स्पृष्टमंजनं गृह्णीयात् न तु गृह्णात्यतो मनोवदप्राप्यकारीत्यवसेयम् । ततश्चक्षुर्मनसी
वर्जयित्वा शेषाणामिन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रहः । सर्वेषामिन्द्रियानिन्द्रियाणामर्थावग्रह इति सिद्धम् ।
१० § २०२. चक्षु और मनसे व्यंजनावग्रह नहीं होता है । शंका- क्यों ? समाधान - क्योंकि
चक्षु और मन अप्राप्यकारी हैं। चूंकि नेत्र अप्राप्त, योग्य दिशामें अवस्थित, युक्त, सन्निकर्षके
योग्य देशमें अवस्थित और बाह्य प्रकाश आदिसे व्यक्त हुए पदार्थको ग्रहण करता है और मन भी
अप्राप्त अर्थको ग्रहण करता है अतः इन दोनोंके द्वारा व्यंजनावग्रह नहीं होता ।
§ २०३. शंका- चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है यह कैसे जाना जाता है ? समाधान- आगम
१५ और युक्तिसे जाना जाता है । आगमसे यथा- 'श्रोत्र स्पृष्ट शब्दको सुनता है और अस्पृष्ट शब्दको
भी सुनता है, नेत्र अस्पृष्ट रूपको ही देखता है। तथा घ्राण, रसना और स्पर्शन इन्द्रियाँ क्रमसे
स्पृष्ट और अस्पृष्ट गन्ध, रस और स्पर्शको जानती हैं।"
§ २०४. युक्तिसे यथा - चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है, क्योंकि वह स्पृष्ट पदार्थको नहीं ग्रहण
करती । यदि चक्षु इन्द्रिय प्राप्यकारी होती तो वह त्वचा इन्द्रियके समान स्पृष्ट हुए अंजनको ग्रहण
२० करती । किन्तु वह स्पृष्ट अंजनको नहीं ग्रहण करती है इससे मालूम होता है कि मनके समान चक्षु
इन्द्रिय अप्राप्यकारी है। अतः सिद्ध हुआ कि चक्षु और मनको छोड़कर शेष इन्द्रियोंके व्यंजनाव-
ग्रह होता है। तथा सब इन्द्रिय और मनके अर्थावग्रह होता है।
विशेषार्थ- पहले अवग्रहके दो भेद बतला आये हैं- अर्थावग्रह और व्यंजनावग्रह । इनमें-
से अर्थावग्रह तो पाँचों इन्द्रियों और मन इन छहोंसे होता है किन्तु व्यंजनावग्रह चक्षु और मन इन
२५ दोसे नहीं होता यह इस सूत्रका भाव है। चक्षु और मनसे व्यंजनावग्रह क्यों नहीं होता, इसका
निर्देश करते हुए जो टीकामें लिखा है उसका भाव यह है कि ये दोनों अप्राप्यकारी हैं अर्थात् ये
दोनों विषयको स्पृष्ट करके नहीं जानते हैं इसलिए इन द्वारा व्यंजनावग्रह नहीं होता । इससे यह
अपने आप फलित हो जाता है कि व्यंजनावग्रह प्राप्त अर्थका ही होता है और अर्थावग्रह प्राप्त तथा
अप्राप्त दोनों प्रकारके पदार्थोंका होता है। यहाँ यह कहा जा सकता है कि यदि अप्राप्त अर्थका
३० अर्थावग्रह होता है तो होओ इसमें बाधा नहीं, पर प्राप्त अर्थका अर्थावग्रह कैसे हो सकता है ? सो
इस शंकाका यह समाधान है कि प्राप्त अर्थका सर्व प्रथम ग्रहणके समय तो व्यंजनावग्रह ही होता
है किन्तु बादमें उसका भी अर्थावग्रह हो जाता है । नेत्र प्राप्त अर्थको क्यों नहीं जानता इसका
१. अप्राप्तिका - आ०, दि० १, दि० २ । २. युक्तस्स - मु०, ता०, ना० । ३. विशेषेऽव-मु०,
ता०, ना० । ४. प्राप्तमतो नानयोर्व्य - मु०, ता०, ना० । ५. ग्रहोऽस्ति - मु० । ६. कथमप्यवसी - मु० ।
३५ ७. तावत्- पुट्ठं सुणोदि सद्दं अपुट्ठं पुण पस्सदे ख्वं । फासं रसं च गंधं बद्धं पुट्ठं वियाणादि ।। युक्ति - मु० ।
आ० नि० गा० ५। .८ "जह पत्तं गेण्हेज्ज उ तग्गयमंजण-।" वि० भा० गा० २१२ । ९. 'लोयणमपत्त-
विसयं मणोव्व ।'- वि० भा० गा० २०९ ।