सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें§ २०७. आह, श्रुतमनादिनिधनमिष्यते । तस्य मतिपूर्वकत्वे तदभावः; आदिमतोऽन्त-
वत्त्वात् । ततश्च १पुरुषकृतत्वादप्रामाण्यमिति नैष दोषः; द्रव्यादिसामान्यार्पणात् श्रुतमनादि-
निधनमिष्यते । न हि केनचित्पुरुषेण क्वचित्कदाचित्कथंचिदुत्प्रेक्षितमिति । तेषामेव विशेषापेक्षया
आदिरन्तश्च संभवतीति 'मतिपूर्वम्' इत्युच्यते । यथाङ्कुरो बीजपूर्वकः स च संतानापेक्षया
अनादिनिधन इति । न चापौरुषेयत्वं प्रामाण्यकारणम्; चौर्याद्युपदेशस्यास्मर्यमाणकर्तृकस्य
प्रामाण्यप्रसङ्गात् । अनित्यस्य च प्रत्यक्षादेः प्रामाण्ये को विरोधः ।
§ २०८. आह, २प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्तौ युगपज्ज्ञानपरिणामान्मतिपूर्वकत्वं श्रुतस्य नोपपद्यत
इति । तदयुक्तम्; सम्यक्त्वस्य तदपेक्षत्वात् । ३आत्मलाभस्तु क्रमवानिति मतिपूर्वकत्व-
व्याघाताभावः ।
§ २०९. आह, मतिपूर्वं श्रुतमित्येतल्लक्षणमव्यापि श्रुतपूर्वमपि श्रुतमिष्यते । तद्यथा--
शब्दपरिणतपुद्गलस्कन्धादाहितवर्णपदवा४क्यादिभावाच्चक्षुरादिविषयाच्च आद्यश्रुतविषयभावमा-
पन्नादव्यभिचारिणः ५कृतसंगतिर्जनो घटाज्जलधारणादि कार्यं संबन्ध्वन्तरं६ प्रतिपद्यते, धूमा-
देवाग्न्यादिवद्वयं, तदा श्रुतात् श्रुतप्रतिपत्तिरिति । नैष दोषः; तस्यापि मतिपूर्वकत्वमुपचारात् ।
श्रुतमपि क्वचिन्मतिरित्युपचर्यते मतिपूर्वकत्वादिति ।
§ २०७. शंका-श्रुतज्ञानको अनादिनिधन कहा है। ऐसी अवस्था में उसे मतिज्ञानपूर्वक
मान लेने पर उसकी अनादिनिधनता नहीं बनती, क्योंकि जिसका आदि होता है उसका अन्त
अवश्य होता है। और इसलिए वह पुरुषका कार्य होनेसे उसे प्रमाण नहीं माना जा सकता ?
समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि द्रव्य आदि सामान्य नयकी मुख्यतासे श्रुतको अनादि-
निधन कहा है। किसी पुरुषने कहीं और कभी किसी भी प्रकारसे उसे किया नहीं है। हाँ उन्हीं
द्रव्य आदि विशेष नयकी अपेक्षा उसका आदि और अन्त सम्भव है इसलिए 'वह मतिपूर्वक होता
है' ऐसा कहा जाता है। जैसे कि अंकुर बीजपूर्वक होता है, फिर भी वह सन्तानकी अपेक्षा अनादि-
निधन है। दूसरे जो यह कहा है कि पुरुषका कार्य होनेसे वह अप्रमाण है सो अपौरुषेयता
प्रमाणताका कारण नहीं है। यदि अपौरुषेयताको प्रमाणताका कारण माना जाय तो जिसके कर्त्ता-
का स्मरण नहीं होता ऐसे चोरी आदिके उपदेश भी प्रमाण हो जायेंगे । तीसरे प्रत्यक्ष आदि ज्ञान
अनित्य होकर भी यदि प्रमाण माने जाते हैं तो इसमें क्या विरोध है, अर्थात् कुछ भी नहीं ।
§ २०८. शंका-प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके साथ ही ज्ञानकी उत्पत्ति होती है, अतः
श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है यह कथन नहीं बनता ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं है,
क्योंकि ज्ञानमें समीचीनता सम्यग्दर्शनके निमित्तसे प्राप्त होती है। इन दोनोंका आत्मलाभ तो
क्रमसे ही होता है, इसलिए 'श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है' इस कथनका व्याघात नहीं होता ।
§ २०९. शंका—'मतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान होता है' इस लक्षणमें अव्याप्ति दोष आता है,
क्योंकि श्रुतज्ञानपूर्वक भी श्रुतज्ञान होता है ऐसा कहा जाता है। यथा—किसी एक जीवने वर्ण,
पद और वाक्य आदि रूपसे शब्द परिणत पुद्गल स्कन्धोंको कर्ण इन्द्रिय-द्वारा ग्रहण किया ।
अनन्तर उससे घटपदार्थ विषयक प्रथम श्रुतज्ञान हुआ । यदि उसने घटके कार्योंका संकेत कर रखा
है तो उसे उस घटज्ञानके बाद जलधारणादि दूसरे कार्योंका ज्ञान होता है और तब श्रुतज्ञानसे
१. -षकृतत्वा—मु० । २. 'णाणाण्णाणाणि य समकालाइं जओ मइसुयाइं । तो न सुयं मइपुव्वं मइणाणे वा
'सुयन्नाणं'—वि० भा० गा० १०७ । ३. 'इहलद्धिमइसुयाइं समकालाइं न तूवओगो सिं । मइपुव्वं
सुयमिह पुण सुओपजोगो मइप्पभवो । —वि० भा० गा० १०८ । ४. पदव्याख्यादि—आ०, दि० १ ।
५. संगति—मु० । ६. सम्बन्धान्तरं ता०, ना० ।
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