सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
स्यात् । इन्द्रियमपि यदि प्रमाणं स एव दोषः; अल्पविषयत्वात् चक्षुरादीनां ज्ञेयस्य चापरिमाण-
त्वात् ।
§ १६८. सर्वेन्द्रियसन्निकर्षाभावश्च; चक्षुर्मनसोः प्राप्यकारित्वाभावात् । अप्राप्यकारित्वं च
उत्तरत्र वक्ष्यते ।
§ १६९. यदि ज्ञानं प्रमाणं फलाभावः । अधिगमो हि फलमिष्टं न भावान्तरम् । स चेत्प्रमाणं,
न तस्यान्यत्फलं भवितुमर्हति । फलवता च प्रमाणेन भवितव्यम् । संनिकर्षे इन्द्रिये वा प्रमाणे सति
अधिगमः फलमर्थान्तरभूतं युज्यते इति । तदयुक्तम् । यदि संनिकर्षः प्रमाणं अर्थाधिगमः फलं,
तस्य द्विष्ठत्वात्तत्फलेनाधिगमेनापि द्विष्ठेन भवितव्यमिति अर्थादीनामप्यधिगमः प्राप्नोति ।
आत्मनश्चेतनत्वात्तत्रैव समवाय इति चेत् । न; ज्ञस्वभावाभावे सर्वेषामचेतनत्वात् । ज्ञस्वभावाभ्यु-
पगमे वा आत्मनः स्वमतविरोधः स्यात् ।
§ १७०. ननु चोक्तं ज्ञाने प्रमाणे सति फलाभाव इति । नैष दोषः; अर्थाधिगमे प्रीतिदर्श-
नात् । ज्ञस्वभावस्यात्मनः कर्ममलीमसस्य करणालम्बनादर्थनिश्चये प्रीतिरूपजायते । सा फलमित्यु-
च्यते । उपेक्षा¹ अज्ञाननाशो वा फलम् । रागद्वेषयोरप्रणिधानमुपेक्षा । अन्धकारकल्पाज्ञा²ननाशो वा
फलमित्युच्यते ।
है । यदि इन्द्रियको प्रमाण माना जाता है तो वही दोष आता है, क्योंकि चक्षु आदिका विषय
अल्प है और ज्ञेय अपरिमित हैं ।
§ १६८. दूसरे सब इन्द्रियोंका सन्निकर्ष भी नहीं बनता, क्योंकि चक्षु और मन प्राप्यकारी
नहीं हैं, इसलिए भी सन्निकर्षको प्रमाण नहीं मान सकते । चक्षु और मनके अप्राप्यकारित्वका
कथन आगे करेंगे ।
§ १६९. शंका—यदि ज्ञानको प्रमाण मानते हैं तो फलका अभाव होता है । प्रकृतमें ज्ञान-
को ही फल मानना इष्ट है अन्य पदार्थ को फल मानना इष्ट नहीं । पर यदि उसे प्रमाण मान लिया
जाता है तो उसका कोई दूसरा फल नहीं प्राप्त हो सकता । किन्तु प्रमाणको फलवाला होना
चाहिए । पर सन्निकर्ष या इन्द्रियको प्रमाण मानने पर उससे भिन्न ज्ञानरूप फल बन जाता है ?
समाधान—यह कहना युक्त नहीं, क्योंकि यदि सन्निकर्षको प्रमाण और अर्थके ज्ञानको फल मानते
हैं तो सन्निकर्ष दो में रहनेवाला होनेसे उसके फलस्वरूप ज्ञानको भी दोमें रहनेवाला होना चाहिए
इसलिए घट-पटादि पदार्थोंके भी ज्ञानकी प्राप्ति होती है । शंका—आत्मा चेतन है, अतः उसीमें
ज्ञानका समवाय है ? समाधान—नहीं, क्योंकि आत्माको ज्ञस्वभाव नहीं मानने पर सभी पदार्थ
अचेतन प्राप्त होते हैं । यदि आत्माको ज्ञस्वभाव माना जाता है, तो स्वमतका विरोध होता है ।
§ १७०. पहले पूर्वपक्षीने जो यह कहा है कि ज्ञानको प्रमाण मानने पर फलका अभाव
होता है सो यह कोई दोष नहीं; क्योंकि पदार्थके ज्ञान होने पर प्रीति देखी जाती है । यद्यपि
आत्मा ज्ञस्वभाव है तो भी वह कर्मोसे मलीन है अतः इन्द्रियों के आलम्बनसे पदार्थके निश्चय
करने पर उसके जो प्रीति उत्पन्न होती है वही प्रमाणका फल कहा जाता है । अथवा उपेक्षा या
अज्ञानका नाश प्रमाणका फल है । राग-द्वेषरूप परिणामोंका नहीं होना उपेक्षा है और अन्धकारके
समान अज्ञानका दूर हो जाना अज्ञाननाश है । सो ये भी प्रमाण के फल हैं ।
१. 'अज्ञाननिवृत्तिर्हानोपादानोपेक्षाश्च फलम् ।-प० मु० ५;९ । 'यदा संनिकर्षस्तदा ज्ञानं प्रमितिः । यदा
ज्ञानं तदा हानोपादानोपेक्षाबुद्धयः फलम् ।'-१।१।३ न्या० भा० । २. -ल्पाज्ञानाभावः अज्ञाननाशो मु० ।
- १।१० § १७२ ] प्रथमोऽध्यायः ६९
§ १७१. प्रमिणोति प्रमीयतेऽनेन प्रमितिमात्रं वा प्रमाणम्। किमनेन प्रमीयते। जीवादिरर्थः।
यदि जीवादेरधिगमे प्रमाणं प्रमाणाधिगमे च अन्यत्प्रमाणं परिकल्पयितव्यम् । तथा सत्यनवस्था ।
नानवस्था प्रदीपवत् । यथा घटादीनां प्रकाशने प्रदीपो हेतुः² स्वस्वरूपप्रकाशनेऽपि स एव, न
प्रकाशान्तरं³ मृग्यं तथा प्रमाणमपीति अवश्यं चैतदभ्युपगन्तव्यम् । प्रमेयवत्प्रमाणस्य प्रमाणान्तर-
परिकल्पनायां स्वाधिगमाभावात् स्मृत्यभावः । तदभावाद् व्यवहारलोपः स्यात् ।
§ १७२. वक्ष्यमाणभेदापेक्षया द्विवचननिर्देशः । वक्ष्यते हि "आद्ये परोक्षम्, प्रत्यक्षमन्यद्"
इति स च द्विवचननिर्देशः प्रमाणान्तरसंख्यानिवृत्त्यर्थः ।
§ १७१ प्रमाण शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—प्रमिणोति, प्रमीयतेऽनेन प्रमितिमात्रं वा
प्रमाणम् = जो अच्छी तरह मान करता है, जिसके द्वारा अच्छी तरह मान किया जाता है या
प्रमितिमात्र प्रमाण है । शंका—प्रमाणके द्वारा क्या जाना जाता है? समाधान—जीवादि पदार्थ
जाने जाते हैं। शंका—यदि जीवादि पदार्थोंके ज्ञानमें प्रमाण कारण है तो प्रमाणके ज्ञानमें अन्य
प्रमाणको कारण मानना चाहिए । और ऐसा माननेपर अनवस्था दोष प्राप्त होता है ? समाधान—
जीवादि पदार्थोंके ज्ञानमें प्रमाणको कारण मानने पर अनवस्था दोष नहीं आता, जैसे दीपक ।
जिस प्रकार घटादि पदार्थोंके प्रकाश करनेमें दीपक हेतु है और अपने स्वरूप के प्रकाश करने में
भी वही हेतु है इसके लिए प्रकाशान्तर नहीं ढूंढ़ना पड़ता । उसी प्रकार प्रमाण भी है यह बात
अवश्य मान लेनी चाहिए । अब यदि प्रमेयके समान प्रमाणके लिए अन्य प्रमाण माना जाता है
तो स्वका ज्ञान नहीं होनेसे स्मृतिका अभाव हो जाता है और स्मृतिका अभाव हो जानेसे व्यवहार
का लोप हो जाता है ।
§ १७२. सूत्र में आगे कहे जानेवाले भेदोंकी अपेक्षा द्विवचनका निर्देश किया है। आगे
कहेंगे 'आद्ये परोक्षम्, प्रत्यक्षमन्यत् ।' यह द्विवचनका निर्देश प्रमाणकी अन्य संख्या के निराकरण
करनेके लिए किया है ।
विशेषार्थ—पिछले सूत्रमें पाँच सम्यग्ज्ञानोंकी चर्चा करके इस सूत्रमें उनकी प्रमाणता
बतलायी गयी है। यों तो सम्यग्ज्ञान कहनेसे उनकी प्रमाणता सुतरां सिद्ध है किन्तु दर्शनान्तरोंमें
ज्ञानको मुख्यतया प्रमाण न मान कर सन्निकर्ष व इन्द्रिय आदिको प्रमाण माना गया है इसलिए
यहाँपर सन्निकर्ष आदि प्रमाण नहीं हैं किन्तु ज्ञान ही प्रमाण है यह बतलाया गया है। सर्वार्थसिद्धि
टीकामें मुख्यतया दो मतोंका उल्लेख करके उनकी आलोचना की गयी है। ये दोनों मत नैयायिक
सम्मत हैं । नैयायिकोंने प्रत्यक्ष ज्ञानकी उत्पत्तिमें सन्निकर्ष और इन्द्रिय दोनोंको प्रमाण माना है।
सन्निकर्ष प्रमाण है इस मतका उल्लेख न्यायभाष्यमें और इन्द्रिय प्रमाण है इस मतका उल्लेख
उद्योतकरके न्यायवार्तिकमें पाया जाता है। परन्तु सर्वार्थसिद्धिकारने जब इस दूसरे मतका उल्लेख
किया है, तो यह भी प्रथम मतके समान प्राचीन प्रतीत होता है। बहुत सम्भव है कि इस द्वारा
सर्वार्थसिद्धिकारने सांख्यके 'इन्द्रियवृत्ति प्रमाण है' इस मतका उल्लेख किया हो तो कोई आश्चर्य
नहीं । नैयायिक लोग प्रत्यक्षज्ञानकी उत्पत्ति में सन्निकर्षको असाधारण कारण मानकर उसे प्रमाण
मानते हैं । किन्तु आगे चलकर करणके 'असाधारण कारणको करण कहते हैं' इस लक्षणके
स्थानमें 'व्यापारवाले कारणको करण कहते हैं' यह लक्षण भी प्रचलित हो गया जिससे सन्निकर्षके
साथ उनके यहाँ इन्द्रियाँ भी प्रमाण मानी जाने लगीं। वे जब सन्निकर्षको प्रमाण मानते हैं तब
ज्ञान उसका फल मान लिया जाता है और जब इन्द्रियों को प्रमाण मानते हैं तब भी सन्निकर्षको
इन्द्रियोंका व्यापार मानकर ज्ञान उनका फल मान लिया जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि वे
१. -धिगमे अन्य-मु० । २. हेतुः तत्स्व-मु० । ३. न्तरमस्य मृग्यम् मु० ।
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७० सर्वार्थसिद्धौ [ १।११ § १७३ –
§ १७३. 'उक्तस्य पञ्चविधस्य ज्ञानस्य प्रमाणद्वयान्तःपातित्वे प्रतिपादिते प्रत्यक्षानु-
मानादिप्रमाणद्वयकल्पनान्निवृत्त्यर्थमाह—
आद्ये परोक्षम् ॥११॥
§ १७४. आदिशब्दः प्राथम्यवचनः । आदौ भवमाद्यम् । कथं द्वयोः प्रथमत्वं मुख्योपचार-
कल्पनया । मतिज्ञानं तावन्मुख्यकल्पनया प्रथमम् । श्रुतमपि तस्य प्रत्यासत्त्या प्रथममित्युपचर्यते ।
ज्ञानको प्रमाण ही नहीं मानते। उनके यहाँ ज्ञानको भी प्रमाण माना गया है। जब वे ज्ञानको प्रमाण
मानते हैं तब हानबुद्धि, उपादानबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि उसका फल माना जाता है। किन्तु
नैयायिकोंकी सन्निकर्ष और इन्द्रियको प्रमाण माननेकी बात समीचीन नहीं है यही निर्णय इस
सूत्रकी टीकामें किया गया है। सन्निकर्षको प्रमाण माननेमें जो दोष प्राप्त होते हैं वे इस प्रकार
हैं—१. सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए सर्वज्ञताका अभाव
होता है २. चक्षु और मनसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि ये अप्राप्यकारी हैं । ३. प्रत्येक
इन्द्रियका अलग-अलग विषय मानना उचित नहीं, क्योंकि चक्षुका रूपके साथ सन्निकर्ष पाया
जानेसे जैसे वह रूपज्ञानका जनक है उसी प्रकार उसका रसके साथ भी सन्निकर्ष पाया जाता है
अतः उससे रसका भी ज्ञान होना चाहिए । ४. सन्निकर्ष एकका न होकर इन्द्रिय और अर्थ इन दो
या दोसे अधिकका होता है अतः सन्निकर्षका फल जो ज्ञान है वह भी दोनोंमें होना चाहिए ।
इन्द्रियको प्रमाण माननेमें ये दोष आते हैं—१. सर्वज्ञताका अभाव होता है, क्योंकि इन्द्रियाँ
सब पदार्थोंको एक साथ जाननेमें असमर्थ हैं। २. इन्द्रियोंसे सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थों-
का ज्ञान सम्भव न होनेसे भी सर्वज्ञताका अभाव होता है । ३. अनुमान आदि ज्ञानोंकी उत्पत्ति
नहीं हो सकेगी, क्योंकि इन ज्ञानोंकी उत्पत्ति इन्द्रियोंसे नहीं होती । सन्निकर्ष और इन्द्रियको
प्रमाण माननेपर इसी प्रकार और भी दोष आते हैं। सन्निकर्ष और इन्द्रियको प्रमाण माननेवाले
लोग ज्ञानको प्रमाण मानने पर एक बड़ी भारी आपत्ति यह देते हैं कि यदि ज्ञानको प्रमाण माना
जाता है तो प्रमाण निष्फल हो जाता है। किन्तु उनकी यह आपत्ति भी समीचीन नहीं है, क्योंकि
ज्ञानको प्रमाण माननेपर प्रीति, अज्ञाननाश, त्यागबुद्धि, ग्रहणबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि आदि अनेक
फल बन जाते हैं। उन्होंने भी जब ज्ञानको प्रमाण माना है तब ये ही फल माने हैं। न्यायभाष्यमें
लिखा है कि 'जब ज्ञान प्रमाण होता है तब हानबुद्धि, उपादानबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि उसके फल
प्राप्त होते हैं। इसलिए ज्ञानको ही सर्वत्र प्रमाण मानना चाहिए यही निष्कर्ष निकलता है। इससे
पूर्वोक्त सभी दोषोंका निराकरण हो जाता है। इसके अतिरिक्त इस सूत्रकी टीकामें इन बातोंपर
और प्रकाश डाला गया है—१. प्रमाणकी निरुक्ति । २. जीवादि पदार्थोंके जाननेके लिए जैसे
प्रमाण माना गया है वैसे प्रमाणके जाननेके लिए अन्य प्रमाण अपेक्षित नहीं, इसका खुलासा ।
३. सूत्रमें 'प्रमाणे' इस प्रकार द्विवचन रखनेका कारण । ये विषय सुगम हैं।
§ १७३. पहले कहे गये पाँच प्रकारके ज्ञान दो प्रमाणोंमें आ जाते हैं इस प्रकार सुनिश्चित
हो जाने पर भी वे दो प्रमाण प्रत्यक्ष और अनुमान आदिक भी हो सकते हैं अतः इस कल्पनाको
दूर करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
प्रथम दो ज्ञान परोक्ष प्रमाण हैं ॥११॥
§ १७४. आदि शब्द प्राथम्यवाची है। जो आदिमें हो वह आद्य कहलाता है। शंका—
दो प्रथम कैसे हो सकते हैं ? समाधान—पहला मुख्यकल्पनासे प्रथम है और दूसरा उपचार
१. त्यर्थः । —उपमानाद्यर्थापत्त्यादीनामत्रैवान्तर्भावादुक्त–मु० ।
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- १।११ § १७५ ] प्रथमोऽध्यायः ७१
द्विवचननिर्देशसामर्थ्याद् गौणस्यापि ग्रहणम् । आद्यं च आद्यं च आद्ये मतिश्रुते इत्यर्थः । तदुभयमपि
परोक्षं प्रमाणमित्यभिसंबध्यते । कुतोऽस्य परोक्षत्वम् १ । परायत्तत्वात् "मतिज्ञानं इन्द्रियानिन्द्रिय-
निमित्तम्" इति वक्ष्यते “श्रुतमनिन्द्रियस्य" इति च । अतः पराणीन्द्रियाणि मनश्च प्रकाशोपदेशादि
च बाह्यनिमित्तं प्रतीत्य तदावरणकर्मक्षयोपशमापेक्षस्यात्मनो मतिश्रुतं उत्पद्यमानं परोक्षमित्या-
ख्यायते । अत उपमानागमादीनामत्रैवान्तर्भावः । ५
§ १७५. अभिहितलक्षणात्परोक्षादितरस्य सर्वस्य प्रत्यक्षत्वप्रतिपादनार्थमाह -
कल्पनासे प्रथम है । मतिज्ञान तो मुख्यकल्पनासे प्रथम है और श्रुतज्ञान भी उसके समीपका होनेसे
प्रथम है ऐसा उपचार किया जाता है। सूत्रमें 'आद्ये' इस प्रकार द्विवचनका निर्देश किया है अतः
उसकी सामर्थ्यसे गौणका भी ग्रहण हो जाता है। 'आद्ये' पदका समास 'आद्यं च आद्यं च आद्ये' है।
इससे मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दोनों लिये गये हैं। ये दोनों ज्ञान मिलकर परोक्ष प्रमाण हैं ऐसा १०
यहाँ सम्बन्ध करना चाहिए । शंका - ये दोनों ज्ञान परोक्ष क्यों हैं ? समाधान - क्योंकि ये दोनों
ज्ञान पराधीन हैं। 'मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रियके निमित्तसे होता है' यह आगे कहेंगे और
'अनिन्द्रियका विषय श्रुत है' यह भी आगे कहेंगे । अतः 'पर'से यहाँ इन्द्रिय और मन तथा प्रकाश
और उपदेश आदि बाह्य निमित्त लेने चाहिए। तात्पर्य यह है कि मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञाना-
वरण कर्मके क्षयोपशमकी अपेक्षा रखनेवाले आत्माके इन्द्रिय और मन तथा प्रकाश और उपदेशा- १५
दिक बाह्य निमित्तोंकी अपेक्षा मतिज्ञान और श्रुतज्ञान उत्पन्न होते हैं अतः ये परोक्ष कहलाते हैं।
उपमान और आगमादिक भी ऐसे ही हैं अतः इनका भी इन्हींमें अन्तर्भाव हो जाता है।
विशेषार्थ- पिछले सूत्रमें दो प्रकारके प्रमाणोंका उल्लेख कर आये हैं। वे दो प्रमाण
कौन हैं और उनमें पाँच ज्ञानोंका कैसे विभाग होता है यह बतलाना शेष है, अतः ग्यारहवें
और बारहवें सूत्रों द्वारा यही बतलाया गया है। उसमें भी ग्यारहवें सूत्र द्वारा प्रमाणके पहले २०
भेदकी परोक्ष संज्ञा बतलाकर उसमें मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका अन्तर्भाव किया गया है। दूसरे
लोग जो इन्द्रियोंका अविषय है उसे परोक्ष कहते हैं। किन्तु जैन परम्परामें परोक्षता और प्रत्यक्षता
यह ज्ञानका धर्म मानकर उस प्रकारसे उनकी व्याख्या की गयी है। जैन परम्पराके अनुसार
परकी सहायतासे जो अक्ष अर्थात् आत्माके ज्ञान होता है वह परोक्ष ज्ञान कहलाता है परोक्ष
शब्दका यह अर्थ लिया गया है। मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दोनों ज्ञान ऐसे हैं जो यथासम्भव २५
इन्द्रिय, मन तथा प्रकाश और उपदेश आदिके बिना नहीं हो सकते, अतः ये दोनों परोक्ष माने
गये हैं। दार्शनिक ग्रन्थोंमें इन्द्रिय ज्ञानका सांव्यवहारिक प्रत्यक्षरूपसे उल्लेख देखनेको मिलता है।
सो यह कथन औपचारिक जानना चाहिए। दूसरे लोगोंने अक्षका अर्थ इन्द्रिय करके इन्द्रियज्ञान
को प्रत्यक्ष कहा है। वहाँ इसो अपेक्षासे इन्द्रिय ज्ञानको सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष लिखा गया है ऐसा
यहाँ जानना चाहिए। वस्तुतः आत्माके सिवा अन्य निमित्तसे जितना भी ज्ञान होता है वह सब ३०
परोक्ष ही है। उपमान, आगम आदि और जितने ज्ञान हैं वे भी अन्यकी अपेक्षाके बिना नहीं होते
अतः उनका इन्हीं ज्ञानोंमें अन्तर्भाव हो जानेसे मुख्यतः परोक्ष ज्ञान दो ही ठहरते हैं एक मतिज्ञान
और दूसरा श्रुतज्ञान । यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि ये ज्ञान केवल बाह्य निमित्तसे नहीं
होते हैं। मुख्यतया इनकी उत्पत्तिमें मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम आव-
श्यक है। आत्माकी ऐसी योग्यता हुए बिना ये ज्ञान नहीं होते । ऐसी योग्यताके होने पर बाह्य- ३५
निमित्त सापेक्ष इनकी प्रवृत्ति होती है यह उक्त कथनका सार है।
§ १७५. परोक्षका लक्षण कहा । इससे बाकीके सब ज्ञान प्रत्यक्ष हैं इस बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं -
१. -क्षत्वम् ? परापेक्षत्वात् । मति- आ०, दि० १, दि० २।
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?
Let's zoom in as much as possible:
म
त
स्त
स्या
पि
Wait, that is: म + त + स्त + स्या + पि!
That spells: तस्तस्यापि!
Why would it spell तस्तस्यापि? Could it be a typo in the original book: "ततस्तस्यापि" printed as "तस्तस्यापि"? Or is it "ततस्तस्यापि" with a double-ta ligature (त्त)?
Wait, let's look at 'त्त' in "प्रवृत्त" or "निवृत्ति":
Look at line 4: "निवृत्तिः" -> 'त्ति' has two horizontal strokes for double t.
Does this have that?
Look at the glyph after म:
It has: त, then there is another stroke?
Wait, could it be "ततस्तस्यापि"?
Yes, look at the two vertical parts:
त followed by त, then स joined to त (स्त).
Wait, let's look at the text of Sarvarthasiddhi online for 1.12:
"अक्ष्णोति व्याप्नोति जानातीत्यक्ष आत्मा । तमेव प्राप्तक्षयोपशमं प्रक्षीणवरणं वा प्रतिनियतं प्रत्यक्षम् । अवधिदर्शनं केवलदर्शनमपि अक्षमेव प्रतिनियतमिति तस्यापि ग्रहणं प्राप्नोति ।"
Wait! Online text says: "प्रतिनियतमिति तस्यापि ग्रहणं प्राप्नोति ।"!!
Here is the complete, line-by-line transcription of the text from the image:
- ११२ § १८० ] प्रथमोऽध्यायः ७३
§ १७८. योगिप्रत्यक्षमन्यज्ज्ञानं दिव्यमप्यस्तीति चेत् । न तस्य प्रत्यक्षत्वं; इन्द्रियनिमि-
त्तत्वाभावात्; अक्षेमक्षं प्रति यद्वर्तते तत्प्रत्यक्षमित्यभ्युपगमात् ।
§ १७९. किंच सर्वज्ञत्वाभावः प्रतिज्ञाहानिर्वा । अस्य योगिनो यज्ज्ञानं तत्प्रत्यर्थवशवर्ति वा
स्याद् अनेकार्थग्राहि वा । यदि प्रत्यर्थवशवर्ति, सर्वज्ञत्वमस्य नास्ति योगिनः, ज्ञेयस्यानन्त्यात् । ५
अथानेकार्थग्राहि, या प्रतिज्ञा-
"विजानाति न विज्ञानमेकमर्थद्वयं यथा । एकमर्थं विजानाति न विज्ञानद्वयं तथा ।।"
सा हीयते ।
§ १८०. अथवा "क्षणिकाः सर्वसंस्काराः" इति प्रतिज्ञा हीयते; अनेकक्षण ४ वृत्त्येकविज्ञानाभ्यु-
पगमात् । अनेकार्थग्रहणं हि क्रमेणेति । युगपदेवेति चेत् । योऽस्य जन्मक्षणः स आत्मलाभार्थ एव ।
लब्धात्मलाभं हि किंचित्स्वकार्यं प्रति व्याप्रियते । प्रदीपवदिति चेत् । तस्याप्यनेकक्षणविषयतायां १०
सत्यामेव प्रकाश्यप्रकाशनाभ्युपगमात् । विकल्पतीतत्वात्तस्य शून्यताप्रसङ्गश्च ।
§ १७८. शंका-योगी प्रत्यक्ष नामका एक अन्य दिव्य ज्ञान है ? समाधान-तो भी उसमें
प्रत्यक्षता नहीं बनती, क्योंकि वह इन्द्रियोंके निमित्तसे नहीं होता है। जिसकी प्रवृत्ति प्रत्येक
इन्द्रियसे होती है वह प्रत्यक्ष है ऐसा आपके मतमें स्वीकार भी किया गया है।
§ १७९. दूसरे प्रत्यक्षका उपर्युक्त लक्षण माननेपर सर्वज्ञत्वका अभाव और प्रतिज्ञाहानि ये १५
दो दोष आते हैं। विशेष इस प्रकार है—इस योगीके जो ज्ञान होता है वह प्रत्येक पदार्थको क्रमसे
जानता है या अनेक अर्थोंको युगपत् जानता है। यदि प्रत्येक पदार्थको क्रमसे जानता है तो इस
योगीके सर्वज्ञताका अभाव होता है, क्योंकि ज्ञेय अनन्त हैं। और यदि अनेक अर्थोंको युगपत्
जानता है तो जो यह प्रतिज्ञा है कि 'जिस प्रकार एक विज्ञान दो अर्थोंको नहीं जानता है उसी
प्रकार दो विज्ञान एक अर्थ को नहीं जानते हैं।' वह नहीं रहती । २०
§ १८०. अथवा 'सब पदार्थ क्षणिक हैं' यह प्रतिज्ञा नहीं रहती, क्योंकि आपके मतमें क्षण-
तक रहनेवाला एक विज्ञान स्वीकार किया गया है। अतः अनेक पदार्थोंका ग्रहण क्रमसे ही होता
है। शंका-अनेक पदार्थोंका ग्रहण एक साथ हो जायगा ? समाधान-जो ज्ञानको उत्पत्तिका
समय है उस समय तो वह स्वरूप लाभ ही करता है, क्योंकि कोई भी पदार्थ स्वरूपलाभ करने-
के पश्चात् ही अपने कार्यके प्रति व्यापार करता है। शंका-विज्ञान दीपकके समान है अतः २५
उसमें दोनों बातें एक साथ बन जायेंगी ? समाधान-नहीं, क्योंकि उसके अनेक क्षण तक रहने-
पर ही प्रकाश्यभूत पदार्थोंका प्रकाशन करना स्वीकार किया गया है। यदि ज्ञानको विकल्पातीत
माना जाता है तो शून्यताकी प्राप्ति होती है।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें कौन-कौन ज्ञान प्रत्यक्ष हैं यह बतलाया गया है। प्रसंगसे इसकी
टीकामें इन विशेषताओंपर प्रकाश डाला गया है- ३०
१. अक्ष शब्दका अर्थ । २. प्रत्यक्ष शब्दकी व्युत्पत्ति । ३. अक्ष शब्दका अर्थ इन्द्रिय या मन
करके प्रत्यक्ष शब्दका लक्षण करनेपर क्या दोष आते हैं इनका निर्देश । ४. आगमसे सर्वज्ञता नहीं
बनती किन्तु वह प्रत्यक्षज्ञानपूर्वक ही प्राप्त होती है इसका निर्देश । ५. बौद्धोंके द्वारा माने गये
प्रत्यक्षके लक्षणको स्वीकार करनेपर क्या दोष प्राप्त होते हैं इसकी चर्चा । ६. प्रसंगसे बौद्धोंके
यहाँ सर्वज्ञता कैसे नहीं बनती और प्रतिज्ञाहानि दोष कैसे आता है इसका निर्देश । तीसरी बातको ३५
स्पष्ट करते हुए जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि प्रत्यक्षज्ञानको इन्द्रियनिमित्तक या मन-
निमित्तक माननेपर सर्वज्ञता नहीं बनती। वेद ही भूत, भविष्यत्, वर्तमान, दूरवर्ती, सूक्ष्म इत्यादि
१. निमित्ताभा-मु० । २. 'अक्षमक्षं प्रति वर्तते तत्प्रत्यक्षम् ।'-न्याय बिन्दु० टी० पृ० १४ । ३. 'क्षणिकाः
सर्वसंस्काराः स्थिराणां कुतः क्रिया । भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते ।'....। ४. क्षणवत्र्त्येक-मु० ।
१०
७४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।१३ § १८१ -
§ १८१. अभिहितोभयप्रकारस्य प्रमाणस्य आदिप्रकारविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताभिनिबोध इत्यनर्थान्तरम् ॥१३॥
§ १८२. आदौ उद्दिष्टं यज्ज्ञानं तस्य पर्यायशब्दा एते वेदितव्याः; मतिज्ञानावरणक्षयोप-
शमान्तरङ्गनिमित्तजनितोपयोगविषयत्वादेतेषां श्रुतादिष्वप्रवृत्तेश्च । मननं मतिः, स्मरणं स्मृतिः,
५ संज्ञानं संज्ञा, चिन्तनं चिन्ता, अभिनिबोधनमभिनिबोध इति । यथासंभवं विग्रहान्तरं विज्ञेयम् ।
§ १८३. सत्यपि प्रकृतिभेदे रूढिबलाद्भवतु पर्यायशब्दत्वम् । यथा इन्द्रः२ शक्रः पुरन्दर
इति इन्धनादिक्रियाभेदेऽपि शचीपतेरेकस्यैव संज्ञा३ । समभिरूढनयापेक्षया तेषामर्थान्तरकल्पनायां
मत्यादिष्वपि स क्रमो विद्यत एव । किं तु मतिज्ञानावरणक्षयोपशमनिमित्तोपयोगं ४नातिवर्तन्त
इति अयमत्रार्थो विवक्षितः । ‘इति'शब्दः ५प्रकारार्थः । एवंप्रकारा अस्य पर्यायशब्दा इति ।
१० अभिधेयार्थो वा । मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ता अभिनिबोध इत्येतैर्योऽर्थोऽभिधीयते स एक एव इति ।
अर्थोंका ज्ञान करानेमें समर्थ है । इसीसे सकल पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है । इसलिए इन्द्रियजन्य
ज्ञान और मनोजन्य ज्ञानको प्रत्यक्ष माननेमें कोई आपत्ति नहीं है । ऐसा मीमांसक मानते हैं ।
परन्तु उनका ऐसा मानना समीचीन नहीं है, क्योंकि सर्वज्ञता प्रत्यक्ष ज्ञानके बिना नहीं बन सकती
है । यह बात चौथी विशेषता-द्वारा बतलायी गयी है । बौद्ध भी अक्षका अर्थ इन्द्रिय करके इन्द्रिय-
१५ जन्य ज्ञानको प्रत्यक्ष मानते हैं परन्तु उनका ऐसा मानना क्यों समीचीन नहीं है यह पाँचवीं
विशेषता-द्वारा बतलाया गया है । शेष कथन सुगम है ।
§ १८१. प्रमाणके प्रत्यक्ष और परोक्ष ये दो भेद कहे । अब प्रथम प्रकारके प्रमाणके विशेष-
का ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मति, स्मृति, संज्ञा, चिन्ता और अभिनिबोध ये पर्यायवाची नाम हैं ॥१३॥
२० § १८२. आदिमें जो ज्ञान कहा है उसके ये पर्यायवाची शब्द जानने चाहिए, क्योंकि ये
मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमरूप अन्तरंग निमित्तसे उत्पन्न हुए उपयोगको विषय करते हैं
और इनकी श्रुतादिकमें प्रवृत्ति नहीं होती । ‘मननं मतिः, स्मरणं स्मृतिः, संज्ञानं संज्ञा, चिन्तनं
चिन्ता और अभिनिबोधनमभिनिबोधः’ यह इनकी व्युत्पत्ति है । यथा सम्भव इनका दूसरा विग्रह
जानना चाहिए ।
२५ § १८३. यद्यपि इन शब्दोंकी प्रकृति अलग-अलग है अर्थात् यद्यपि ये शब्द अलग-अलग
धातुसे बने हैं तो भी रूढ़िसे पर्यायवाची हैं । जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर । इनमें यद्यपि इन्दन
आदि क्रियाकी अपेक्षा भेद है तो भी ये सब एक शचीपतिकी वाचक संज्ञाएँ हैं । अब यदि सम-
भिरूढ नयकी अपेक्षा इन शब्दोंका अलग-अलग अर्थ लिया जाता है तो वह क्रम मति आदि
शब्दोंमें भी पाया जाता है । किन्तु ये मति आदि मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमरूप निमित्तसे
३० उत्पन्न हुए उपयोगको उल्लंघन नहीं करते हैं यह अर्थ यहांपर विवक्षित है । प्रकृतमें ‘इति’ शब्द
प्रकारवाची है जिससे यह अर्थ होता है कि इस प्रकार ये मति आदि मतिज्ञानके पर्यायवाची शब्द
हैं । अथवा प्रकृतमें मति शब्द अभिधेयवाची है । जिसके अनुसार यह अर्थ होता है कि मति,
स्मृति, संज्ञा, चिन्ता और अभिनिबोध इनके द्वारा जो अर्थ कहा जाता है वह एक ही है ।
१. आदौ यदुद्दिष्टं ज्ञानं मु० । २. ‘बहवो हि शब्दाः एकार्था भवन्ति । तद्यथा—'इन्द्रः शक्रः पुरुहूतः
३५ पुरन्दरः ।'—पा० म० भा० १।१।२।४५ । ३. संज्ञाः । सम-मु० । ४. नातिवर्तत इति मु० । ५. –कारार्थे ।
एवं—आ०, दि० १, दि० २ । ‘हेतावेवं प्रकारे च व्यवच्छेदे विपर्यये । प्रादुर्भावे समाप्तौ च इति-
शब्दः प्रकीर्तितः ।' — अने० ना० श्लो० ।
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- ११४ § १८६ ] प्रथमोऽध्यायः ७५
§ १८४. अथस्यात्मलाभे किं निमित्तमित्यत आह—
तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥१४॥
§ १८५. इन्द्तीति इन्द्र आत्मा । तस्य ज्ञस्वभावस्य तदावरणक्षयोपशमे सति स्वयमर्थान्
ग्रहीतुमसमर्थस्य यदर्थोपलब्धि¹लिङ्गं तदिन्द्रस्य लिङ्गमिन्द्रि²यमित्युच्यते । अथवा लीनमर्थं गमय-
तीति लिङ्गम् । आत्मनः सूक्ष्मस्यास्तित्वाधिगमे लिङ्गमिन्द्रियम् । यथा इह धूमोऽग्नेः । एवमिदं ५
स्पर्शनादि करणं नासति कर्तर्यात्मनि भवितुमर्हतीति ज्ञातुरस्तित्वं गम्यते । अथवा इन्द्र इति
नामकर्मोच्यते । तेन सृष्टमिन्द्रियमिति³ । तत्स्पर्शनादि उत्तरत्र वक्ष्यते ।
§ १८६. अनिन्द्रियं मनः अन्तःकरणमित्यनर्थान्तरम् । कथं पुनरिन्द्रियप्रतिषेधेन इन्द्रलिङ्गे
विशेषार्थ—इस सूत्रमें मतिज्ञानके पर्यायवाची नाम दिये गये हैं। षट्खण्डागमके प्रकृति
अनुयोगद्वारमें भी मतिज्ञानके ये ही पर्यायवाची नाम आये हैं । अन्तर केवल यह है कि वहाँ मति- १०
ज्ञान नाम न देकर आभिनिबोधिकज्ञान नाम दिया है और फिर इसके संज्ञा, स्मृति, मति और
चिन्ता ये चार पर्यायवाची नाम दिये हैं। इससे जो लोग प्रकृतमें मतिका अर्थ वर्तमान ज्ञान,
स्मृतिका अर्थ स्मरणज्ञान, संज्ञाका अर्थ प्रत्यभिज्ञान, चिन्ताका अर्थ तर्क और अभिनिबोधका
अर्थ अनुमान करते हैं उनके मतका खण्डन हो जाता है। वास्तवमें यहाँ इन नामोंका विविध ज्ञानों
की अपेक्षासे संग्रह नहीं किया गया है किन्तु मतिज्ञानके पर्यायवाची नामोंकी अपेक्षासे ही संग्रह १५
किया गया है। सूत्रकारने इसी अर्थमें इनका अनर्थान्तररूपसे निर्देश किया है। इस सूत्रकी टीकामें
इन विशेषताओंपर प्रकाश डाला गया है। १. मति आदि शब्दोंके पर्यायवाची होनेमें हेतु ।
२. मति आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति । ३. मति आदि शब्दोंमें प्रकृति भेद होनेपर भी उनके पर्याय-
वाचित्वका दृष्टान्त-द्वारा समर्थन । ४. समभिरूढनयकी अपेक्षा इनमें अर्थ भेद होनेपर भी प्रकृतमें
ये पर्यायवाची क्यों हैं इनमें पुनः युक्ति । ५. सूत्रमें आये हुए 'इति' शब्दकी सार्थकता । २०
§ १८४. मतिज्ञानके स्वरूप लाभमें क्या निमित्त है अब यह बतलाने के लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
वह ( मतिज्ञान ) इन्द्रिय और मनरूप निमित्तसे होता हैं ॥ १४ ॥
§ १८५. इन्द्र शब्दका व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'इन्दतीति इन्द्रः' जो आज्ञा और ऐश्वर्यवाला
है वह इन्द्र । इन्द्र शब्दका अर्थ आत्मा है । वह यद्यपि ज्ञस्वभाव है तो भी मतिज्ञानावरण कर्मके २५
क्षयोपशमके रहते हुए स्वयं पदार्थों को जानने में असमर्थ है अतः उसको पदार्थके जानने में जो लिंग
( निमित्त ) होता है वह इन्द्रका लिंग इन्द्रिय कही जाती है। अथवा जो लीन अर्थात् गूढ़ पदार्थ-
का ज्ञान कराता है उसे लिंग कहते हैं। इसके अनुसार इन्द्रिय शब्दका यह अर्थ हुआ कि जो सूक्ष्म
आत्माके अस्तित्वका ज्ञान करानेमें लिंग अर्थात् कारण है उसे इन्द्रिय कहते हैं। जैसे लोकमें धूम
अग्निका ज्ञान करानेमें कारण होता है। इसी प्रकार ये स्पर्शनादिक करण कर्त्ता आत्माके अभाव में ३०
नहीं हो सकते हैं अतः उनसे ज्ञाताका अस्तित्व जाना जाता है। अथवा इन्द्र शब्द नामकर्मका
वाची है। अतः यह अर्थ हुआ कि उससे रची गयी इन्द्रिय है। वे इन्द्रियाँ स्पर्शनादिक हैं जिनका
कथन आगे करेंगे । अनिन्द्रिय, मन और अन्तःकरण ये एकार्थवाची नाम हैं।
§ १८६. शंका—अनिन्द्रिय शब्द इन्द्रियका निषेधपरक है अतः इन्द्रके लिंग मनमें अनिन्द्रिय
१. –लब्धिनिमित्तं लिङ्गं सु० । २. 'भोगसाधनानीन्द्रियाणि ।' -न्या० भा० १।१।९ । ३. 'भगवा हि ३५
सम्मासंबुद्धो परमिस्सरियभावतो इन्दो, कुसलाकुसलं च कम्मं, कम्मेसु कस्सचि इस्सरियाभावतो । तेनेत्थ
कम्मसञ्जनितानि ताव इंद्रियानि कुसलाकुसलं कम्मं उल्लिंगेन्ति, तेन च सिट्ठानीति इन्दलिंगट्ठेन इन्दसिट्ठट्ठेन
च इंद्रियानि ।'....वि० म० पृ० ३४३ ।
एव मनसि अनिन्द्रियशब्दस्य वृत्तिः । ईषदर्थस्य नञः प्रयोगात् । ईषद्विन्द्रियमनिन्द्रियमिति । यथा
अनु¹दरा कन्या इति । कथमीषदर्थः । इमानीन्द्रियाणि² प्रतिनियतदेशविषयाणि कालान्तरावस्था-
यीनि च । न तथा मनः इन्द्रस्य लिङ्गमपि सत्प्रतिनियतदेशविषयं कालान्तरावस्थायि च ।
§ १८७. तदन्तःकरणमिति चोच्यते । गुणदोषविचारस्मरणादिव्यापारे इन्द्रियानपेक्षत्वा-
च्चक्षुरादिवद् बहिरनुपलब्धेश्च अन्तर्गतं³ करणमन्तःकरणमित्युच्यते ।
§ १८८. तदिति किमर्थम् । मतिज्ञाननिर्देशार्थम् । ननु च तदनन्तरं 'अनन्तरस्य विधिर्वा
भवति प्रतिषेधो वा' इति तस्यैव ग्रहणं भवति । इहार्थमुत्तरार्थं च तदित्युच्यते । यन्मत्यादिपर्याय-
शब्दवाच्यं ज्ञानं तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तं तदेवावग्रहेहावायाधारणा इति । इतरथा हि प्रथमं
मत्यादिशब्दवाच्यं ज्ञानमित्युक्त्वा इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तं श्रुतम् । तदेवावग्रहेहावायाधारणा इत्य-
निष्टमभिसंबध्येत ।
शब्दका व्यापार कैसे हो सकता है ? समाधान—यहाँ नञ्का प्रयोग 'ईषद्' अर्थमें किया है ईषत्
इन्द्रिय अनिन्द्रिय । यथा अनुदरा कन्या । इस प्रयोगमें जो अनुदरा शब्द है उससे उदरका अभाव
रूप अर्थ न लेकर ईषद् अर्थ लिया गया है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए । शंका—अनिन्द्रिय
में नञ्का निषेध रूप अर्थ न लेकर 'ईषद्' अर्थ क्यों लिया गया है ? समाधान—ये इन्द्रियाँ
नियत देशमें स्थित पदार्थों को विषय करती हैं और कालान्तरमें अवस्थित रहती हैं। किन्तु
मन इन्द्रका लिंग होता हुआ भी प्रतिनियत देशमें स्थित पदार्थको विषय नहीं करता और
कालान्तरमें अवस्थित नहीं रहता ।
§ १८७. यह अन्तःकरण कहा जाता है । इसे गुग और दोषोंके विचार और स्मरण करने
आदि कार्योंमें इन्द्रियोंकी अपेक्षा नहीं लेनी पड़ती तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंके समान इसकी
बाहर उपलब्धि भी नहीं होती इसलिए यह अन्तर्गत करण होनेसे अन्तःकरण कहलाता है ।
इसलिए अनिन्द्रिय में नञ्का निषेध रूप अर्थ न लेकर ईषद् अर्थ लिया गया है ।
§ १८८. शंका—सूत्रमें 'तत्' पद किसलिए दिया है ? समाधान—सूत्रमें 'तत्' पद मति-
ज्ञानका निर्देश करनेके लिए दिया है । शंका—मतिज्ञानका निर्देश अनन्तर किया ही है और ऐसा
नियम है कि 'विधान या निषेध अनन्तरवर्ती पदार्थका हो होता है' अतः यदि सूत्रमें 'तत्' पद
न दिया जाय तो भी मतिज्ञानका ग्रहण प्राप्त होता है ? समाधान—इस सूत्रके लिए और अगले
सूत्रके लिए 'तत्' पदका निर्देश किया है। मति आदि पर्यायवाची शब्दोंके द्वारा जो ज्ञान कहा
गया है वह इन्द्रिय और अनिन्द्रियके निमित्तसे होता है और उसीके अवग्रह, ईहा, अवाय और
धारणा ये चार भेद हैं, इसलिए पूर्वोक्त दोष नहीं प्राप्त होता । यदि 'तत्' पद न दिया जाय तो
मति आदि पर्यायवाची नाम प्रथम ज्ञानके हो जायेंगे और इन्द्रिय-अनिन्द्रियके निमित्त होनेवाला
ज्ञान श्रुतज्ञान कहलायेगा और इसीके अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार भेद प्राप्त होंगे
इस प्रकार अनिष्ट अर्थके सम्बन्धकी प्राप्ति होगी अतः इस अनिष्ट अर्थके सम्बन्धके निराकरण
करनेके लिए सूत्रमें 'तत्' पदका निर्देश करना आवश्यक है ।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें मतिज्ञानकी उत्पत्तिके निमित्तोंकी चर्चा करते हुए वे इन्द्रिय और
मनके भेदसे दो प्रकारके बतलाये हैं । यद्यपि इस ज्ञानकी उत्पत्तिमें अर्थ और आलोक आदि भी
१. 'अनुदरा कन्येति ।' पा० म० भा० ६।३।२।४२ । २. 'इन्द्रस्य वै सतो मनस इन्द्रियेभ्यः पृथगुपदेशो
धर्मभेदात् । भौतिकानीन्द्रियाणि नियतविषयाणि, सगुणानां चैषामिन्द्रियभाव इति । मनस्त्वभौतिकं
सर्वविषयं च....।' न्या० भा० १।१।४ । 'सर्वविषयमन्तःकरणं मनः ।'—न्या० भा० १।१।९ । ३. —र्गतं
करणमित्यु मु० ।
- ११५ § १९० ] प्रथमोऽध्यायः ७७
§ १८९. एवं निर्ज्ञातोत्पत्तिनिमित्तमनिर्णीतभेदमिति तद्भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
अवग्रहेहावायधारणाः ॥१५॥
§ १९०. विषयविषयिसंनिपातसमनन्तरमाद्यं¹ ग्रहणमवग्रहः । विषयविषयिसंनिपाते सति
दर्शनं भवति । तदनन्तरमर्थ²ग्रहणमवग्रहः । यथा—चक्षुषा शुक्लं रूपमिति ग्रहणमवग्रहः । अवग्रह-
गृहीतेऽर्थे तद्विशेषाकाङ्क्षणमीहा । यथा—शुक्लं रूपं किं बलाका पताका³ वेति । विशेषनिर्ज्ञानाद्या- ५
थात्म्यावगमनमवायः । उत्पतननिपतनपक्षविक्षेपादिविर्बलाकैवेयं न पताकेति । अवेतस्य कालान्त-
रेऽविस्मरणकारणं धारणा⁶ । यथा—सैवेयं वलाका पूर्वाह्णे यामहमद्राक्षमिति । ⁷एषामवग्रहादीना-
मुपन्यासक्रम उत्पत्तिक्रमकृतः ।
निमित्त होते हैं पर वे अव्यभिचारी कारण न होनेसे उनका यहाँ निर्देश नहीं किया है । इसकी
टीकामें इन्द्रिय-अनिन्द्रिय शब्दका क्या अर्थ है इस पर प्रकाश डालते हुए इन्द्रियोंको जो प्रतिनियत १०
देशको विषय करनेवाला और कालान्तरमें अवस्थित रहनेवाला तथा मनको अनियत देशको
विषय करनेवाला और कालान्तरमें अवस्थित नहीं रहनेवाला बतलाया है सो इसका तात्पर्य यह
है कि जिस प्रकार इन्द्रियाँ देश और काल दोनोंकी अपेक्षा नियत विषयको ग्रहण करती हैं वैसा
मन नहीं है । इस प्रकार मनका विषय नियत नहीं है । उसकी इन्द्रियगम्य और अतीन्द्रिय सब
विषयोंमें प्रवृत्ति होती है । इसका दूसरा नाम अन्तःकरण क्यों है इसका स्पष्टार्थ टीका में किया १५
ही है । शेष कथन सुगम है ।
§ १८९. इस प्रकार मतिज्ञानकी उत्पत्तिके निमित्त जान लिये, किन्तु अभी उसके भेदोंका
निर्णय नहीं किया अतः उसके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए अगला सूत्र कहते हैं—
अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये मतिज्ञानके चार भेद हैं ॥१५॥
§ १९०. विषय और विषयीके सम्बन्धके बाद होनेवाले प्रथम ग्रहणको अवग्रह कहते हैं । २०
विषय और विषयीका सन्निपात होनेपर दर्शन होता है उसके पश्चात् जो पदार्थका ग्रहण होता
है वह अवग्रह कहलाता है । जैसे चक्षु इन्द्रियके द्वारा 'यह शुक्ल रूप है' ऐसा ग्रहण करना
अवग्रह है । अवग्रहके द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थोंमें उसके विशेषके जाननेकी इच्छा ईहा कह-
लाती है । जैसे, जो शुक्ल रूप देखा है 'वह क्या वकपंक्ति है' इस प्रकार विशेष जाननेकी इच्छा
या 'वह क्या पताका है' इस प्रकार जाननेकी इच्छा ईहा है । विशेषके निर्णय-द्वारा जो यथार्थ २५
ज्ञान होता है उसे अवाय कहते हैं । जैसे उत्पतन, निपतन और पक्षविक्षेप आदिके द्वारा 'यह
वकपंक्ति ही है ध्वजा नहीं है' ऐसा निश्चय होना अवाय है । जानी हुई वस्तुका जिस कारण
कालान्तरमें विस्मरण नहीं होता उसे धारणा कहते हैं । जैसे यह वही वकपंक्ति है जिसे प्रातःकाल
मैंने देखा था ऐसा जानना धारणा है । सूत्रमें इन अवग्रहादिकका उपन्यासक्रम इनके उत्पत्ति-
क्रमकी अपेक्षा किया है । तात्पर्य यह है कि जिस क्रमसे ये ज्ञान उत्पन्न होते हैं उसी क्रमसे इनका ३०
सूत्रमें निर्देश किया है ।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें मतिज्ञानके चार भेद किये हैं सो ये भेद मतिज्ञानकी उपयोग रूप
अवस्थाकी प्रधानतासे किये गये हैं । इससे इसका क्षयोपशम भी इतने प्रकारका मान लिया गया
है । पदार्थको जानते समय किस क्रमसे वह उसे जानता है यह इन भेदों-द्वारा बतलाया गया है
१. -माद्यग्रह-मु० । २. -मर्थस्य ग्रह-मु० । ३. पताकेति । मु० । ४. उत्पतनपक्ष आ०, दि० १, दि० २ । ३५
५. अथैतस्य मु० । ६. 'तयणंतरं तयत्थाविच्चवणं जो य वासणाजोगो । कालंतेरे य जं पुणरणुसरणं धारणा
सा उ ।' —वि० भा० गा० २९१ । ७. ईहिज्जइ नागहियं नज्जइ नाणीहियं न यावायं । धारिज्जइ जं वत्थुं
तेण कमोऽवग्गहाईओ ॥' —वि० भा० गा० २९६ ।
§ १९१. उक्तानामवग्रहादीनां प्रभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
बहुबहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥१६॥
§ १९२. अवग्रहादयः क्रियाविशेषाः प्रकृताः । तदपेक्षोऽयं कर्मनिर्देशः । बहूवादीनां सेतराणा-
मिति । बहुशब्दस्य संख्यावैपुल्यवाचिनो ग्रहणमविशेषात् । संख्यावाची¹ यथा, एको द्वौ बहव
इति । वैपुल्यवाची यथा, ²बहुरोदनो बहुः सूप इति । विधशब्दः प्रकारवाची । क्षिप्रग्रहणमचिर-
प्रतिपत्त्यर्थम् । अनिःसृतग्रहणं असकलपुद्गलोद्गमार्थम् । अनुक्तमभिप्रायेण ग्रहणम् । ध्रुवं ³निरन्तरं
यथार्थग्रहणम् । सेतरग्रहणं प्रतिपक्षसंग्रहार्थम् ।
§ १९३. बहूनामवग्रहः अल्पस्यावग्रहः बहुविधस्यावग्रहः एकविधस्यावग्रहः क्षिप्रमवग्रहः
चिरेणावग्रहः अनिःसृतस्यावग्रहः निःसृतस्यावग्रहः अनुक्तस्यावग्रहः उक्तस्यावग्रहः ध्रुवस्या
- ११६ § १९६ ] प्रथमोऽध्यायः ७९
§ १९४. बहुबहुविधयोः कः प्रतिविशेषः; यावता बहुष्वपि बहुत्वमस्ति बहुविधेष्वपि बहुत्व-
मस्ति; एकप्रकारनानाप्रकारकृतो विशेषः । उक्तनिःसृतयोः कः प्रतिविशेषः; यावता सकलनिः-
सरणान्निःसृतम् । उक्तमप्येवंविधमेव । अयमस्ति विशेषः, अन्योपदेशपूर्वकं ग्रहणमुक्तम् । स्वत एव
ग्रहणं निःसृतम् ।
§ १९५. अपरेषां क्षिप्रनिःसृत इति पाठः । त एवं वर्णयन्ति श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दमवगृह्यमाणं ५
मयूरस्य वा कुररस्य वेति कश्चित्प्रतिपद्यते । अपरः स्वरूपमेवाश्रित्य२ इति ।
§ १९६. ध्रुवावग्रहस्य धारणायाश्च कः प्रतिविशेषः । उच्यते, क्षयोपशमप्राप्तिकाले विशुद्ध-
परिणामसंतत्या प्राप्तात्क्षयोपशमात्प्रथमसमये यथावग्रहस्तथैव द्वितीयादिष्वपि समयेषु नोनो३ नाभ्य-
धिक इति ध्रुवावग्रह इत्युच्यते । यदा पुनर्विशुद्धपरिणामस्य संक्लेशपरिणामस्य च मिश्रणात्क्षयो-
पशमो भवति तत उत्पद्यमानोऽवग्रहः कदाचित् बहूनां कदाचिदल्पस्य कदाचिद् बहुविधस्य कदा- १०
चिदेकविधस्य वेति न्यूनाधिकभावादध्रुवावग्रह इत्युच्यते । धारणा पुनर्गृहीतार्थाविस्मरणकारण-
मिति महदनयोरन्तरम् ।
§ १९४. शंका—बहु और बहुविधमें क्या अन्तर है । क्योंकि बहु और बहुविध इन दोनोंमें
बहुतपना पाया जाता है ? समाधान—इनमें एक प्रकार और नाना प्रकारकी अपेक्षा अन्तर है ।
अर्थात् बहुमें प्रकार भेद इष्ट नहीं और बहुविधमें प्रकार भेद इष्ट है । शंका—उक्त और निःसृतमें १५
क्या अन्तर है—क्योंकि वस्तुका पूरा प्रकट होना निःसृत है और उक्त भी इसी प्रकार है ?
समाधान—इन दोनोंमें अन्तर यह है—अन्यके उपदेशपूर्वक वस्तुका ग्रहण करना उक्त है और
स्वतः ग्रहण करना निःसृत है ।
§ १९५. कुछ आचार्योंके मतसे 'क्षिप्रा निःसृतके' स्थानमें 'क्षिप्रनिःसृत' ऐसा पाठ है । वे
ऐसा व्याख्यान करते हैं कि श्रोत्र इन्द्रियके द्वारा शब्दको ग्रहण करते समय वह मयूरका है अथवा २०
कुररका है ऐसा कोई जानता है । दूसरा स्वरूपके आश्रयसे ही जानता है ।
§ १९६. शंका—ध्रुवावग्रह और धारणामें क्या अन्तर है ? समाधान—क्षयोपशमकी
प्राप्तिके समय विशुद्ध परिणामोंकी परम्पराके कारण प्राप्त हुए क्षयोपशमसे प्रथम समयमें जैसा
अवग्रह होता है वैसा ही द्वितीयादिक समयोंमें भी होता है, न न्यून होता है और न अधिक । यह
ध्रुवावग्रह है । किन्तु जब विशुद्ध परिणाम और संक्लेश परिणामोंके मिश्रणसे क्षयोपशम होकर २५
उससे अवग्रह होता है तब वह कदाचित् बहुतका होता है, कदाचित् अल्पका होता है, कदाचित्
बहुविधका होता है और कदाचित् एकविधका होता है । तात्पर्य यह कि उसमें न्यूनाधिक भाव
होता रहता है इसलिए वह अध्रुवावग्रह कहलाता है किन्तु धारणा तो गृहीत अर्थके नहीं भूलनेके
कारणभूत ज्ञानको कहते हैं, अतः ध्रुवावग्रह और धारणामें बड़ा अन्तर है ।
विशेषार्थ—ये अवग्रह आदि मतिज्ञान-द्वारा जानने रूप क्रियाके भेद हैं और बहु आदि उनके ३०
कर्म हैं इसलिए इस सूत्रमें इनका इसी रूपसे निर्देश किया गया है । मतिज्ञान-द्वारा पदार्थोंका बहु
आदि रूप इतने प्रकारसे अवग्रहण, ईहन, अवाय और धारण होता है यह इसका तात्पर्य है । इन बहु
आदिके स्वरूपका तथा उसके अन्तरका व्याख्यान टीकामें किया ही है । मालूम होता है कि पूज्यपाद
स्वामीके समय इस सूत्रके दो पाठ प्रचलित थे और उनका दो प्रकारसे व्याख्यान भी किया जाता
था जिनका उल्लेख पूज्यपाद स्वामीने स्वयं किया है । एक पाठ जो उस समय अधिक मान्य था
या पूज्यपाद स्वामी जिसे मूल पाठ मानते रहे उसका उल्लेख तो उन्होंने व्याख्यानरूपसे किया ३५
१. बहुषु बहुविधे ।'–मु० । २. –मेवानिःसृत- आ०, दि० १, दि० २, मु० । ३. नोनाभ्य –ता०,
न०, मु० ।
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८० सर्वार्थसिद्धौ [ १।१७ § १९७ –
§ १९७. यद्यवग्रहादयो बह्वादीनां कर्मणामाक्षेप्तारः, बह्वादीनि पुनर्विशेषणानि कस्येत्यत
आह—
अर्थस्य ॥१७॥
§ १९८. चक्षुरादिविषयोऽर्थः । तस्य बह्वादिविशेषणविशिष्टस्य अवग्रहादयो भवन्तीत्य-
भिसंबन्धः क्रियते । किमर्थमिदमुच्यते यावता बह्वादिरर्थ एव । सत्यमेवं किन्तु प्रवादिकल्पना-
निवृत्त्यर्थं 'अर्थस्य' इत्युच्यते । केचित्प्रवादिनो मन्यन्ते रूपादयो गुणा एव इन्द्रियैः संनिकृष्यन्ते
तेनैतेषामेव ग्रहणमिति । तदयुक्तम्; न हि ते रूपादयो गुणा अमूर्ता इन्द्रियसन्निकर्षमापद्यन्ते । न १
तर्हि इदानीमिदं भवति रूपं मया दृष्टं गन्धो वा घ्रात इति । भवति च । कथम् । इयर्ति पर्यायांस्तै-
र्वाऽर्थत इत्यर्थो द्रव्यं तस्मिन्निन्द्र
- ११९ § २०१ ] प्रथमोऽध्यायः ८१
§ २००. व्यञ्जनमव्यक्तं¹ शब्दादिजातं तस्यावग्रहो भवति² नेहादयः। किमर्थमिदम् ।
नियमार्थम्, अवग्रह एव नेहादय इति । स र्तहि एवकारः कर्तव्यः। न कर्तव्यः। 'सिद्धे
विधिरारभ्यमाणो नियमार्थः ३ इति अन्तरेणैवकारं नियमार्थो भविष्यति। ननु अवग्रहग्रहणमुभयत्र
तुल्यं तत्र किं कृतोऽयं विशेषः। अर्थावग्रहव्यञ्जनावग्रहयोर्व्यक्ताव्यक्तकृतो विशेषः। कथम् । अभि-
नवशरावाद्रीकरणवत् । यथा जलकणद्वित्रा⁴सिक्तः सरावेाऽभिनवो नार्द्रीभवति, स एव पुनःपुनः ५
सिच्यमानः शनैस्तिभ्यति, एवं श्रोत्रादिष्विन्द्रियेषु शब्दादिपरिणताः पुद्गला ५द्वित्रादिषु समयेषु
गृह्यमाणा न व्यक्तीभवन्ति, पुनःपुनरवग्रहे सति व्यक्तीभवन्ति । अतो व्यक्तग्रहणात्प्राग्व्यञ्जनाव-
ग्रहः व्यक्तग्रहणमर्थावग्रहः । ततोऽव्यक्तावग्रहणादीहादयो न भवन्ति ।
§ २०१. सर्वेन्द्रियाणामविशेषेण व्यञ्जनावग्रहप्रसङ्गे यत्रासंभवस्तदर्थप्रतिषेधमाह—
न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥१९॥ १०
§ २००. अव्यक्त शब्दादिके समूहको व्यंजन कहते हैं। इसका अवग्रह ही होता है ईहादिक
नहीं होते। शंका—यह सूत्र किसलिए आया है? समाधान—अवग्रह ही होता है ईहादिक नहीं
होते इस प्रकारका नियम करनेके लिए यह सूत्र आया है। शंका—तो फिर इस सूत्रमें एवकारका
निर्देश करना चाहिए। समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि 'किसी कार्यके सिद्ध रहते हुए यदि
उसका पुनः विधान किया जाता है तो वह नियमके लिए होता है' इस नियमके अनुसार सूत्रमें १५
एवकारके न करने पर भी वह नियमका प्रयोजक हो जाता है। शंका—जब कि अवग्रहका ग्रहण
दोनों जगह समान है तब फिर इनमें अन्तर किंनिमित्तक है? समाधान—इनमें व्यक्त ग्रहण और
अव्यक्त ग्रहणकी अपेक्षा अन्तर है। शंका—कैसे ? समाधान—जैसे माटीका नया सकोरा जलके
दो तीन कणोंसे सींचने पर गीला नहीं होता और पुनः-पुनः सींचने पर वह धीरे-धीरे गीला हो
जाता है इसी प्रकार श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके द्वारा किये गये शब्दादिरूप पुद्गल स्कन्ध दो तीन २०
समयोंमें व्यक्त नहीं होते हैं किन्तु पुनः-पुनः ग्रहण होनेपर वे व्यक्त हो जाते हैं। इससे सिद्ध हुआ
कि व्यक्त ग्रहणसे पहले-पहले व्यंजनावग्रह होता है और व्यक्त ग्रहणका नाम अर्थावग्रह है। यही
कारण है कि अव्यक्त ग्रहणपूर्व ईहादिक नहीं होते।
विशेषार्थ—यहाँ अव्यक्त शब्दादिको व्यंजन कहा है। किन्तु वीरसेन स्वामी इस लक्षण-
से सहमत नहीं हैं उनके मतानुसार प्राप्त अर्थका प्रथम ग्रहण व्यंजन कहलाता है। विचार करने २५
पर ज्ञात होता है कि दृष्टिभेदसे ही ये दो लक्षण कहे गये हैं। तत्त्वतः इनमें कोई भेद नहीं। प्राप्त
अर्थका प्रथम ग्रहण व्यंजन है यह तो पूज्यपाद स्वामी और वीरसेन स्वामी दोनोंको इष्ट है। केवल
पूज्यपाद स्वामीने स्पर्शन, रसना, घ्राण और श्रोत्र इन्द्रियोंके द्वारा विषयके प्राप्त होनेपर प्रथम
ग्रहणके समय उसकी क्या स्थिति रहती है इसका विशेष स्पष्टीकरण करने के लिए शब्दजातके
पहले अव्यक्त विशेषण दिया है। और वीरसेन स्वामो ऐसा विशेषण देना इष्ट नहीं मानते। शेष ३०
कथन सुगम है।
§ २०१. सब इन्द्रियोंके समान रूपसे व्यंजनावग्रहके प्राप्त होनेपर जिन इन्द्रियोंके द्वारा यह
सम्भव नहीं है उसका निषेध करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
चक्षु और मनसे व्यंजनावग्रह नहीं होता ॥ १९ ॥
१. 'तक्कालंम्मि वि णाणं तत्थत्थि तणुं ति तो तमव्वत्तं।' वि० भा० गा० १९६ । २. -ग्रहो भवति । ३५
किम-दि० १, दि० २, आ०, मु० । ३. 'सिद्धे विधिरारभ्यमाणो ज्ञापकार्थो भवति' — पा० म० भा० १,
१, ३ । ४. द्वित्रिसि—मु० । ५. द्वित्र्यादि—मु० ।
११
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८२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।१९ § २०२ -
§ २०२. चक्षुषा अनिन्द्रियेण च व्यञ्जनावग्रहो न भवति । कुतः । 'अप्राप्यकारित्वात् ।
यतोऽप्राप्तमर्थमविदिक्कं युक्तं संनिकर्षविषयेऽवस्थितं बाह्यप्रकाशाभिव्यक्तमुपलभते चक्षुः मनश्चा-
प्राप्तमित्यनयोर्व्यञ्जनावग्रहो नास्ति ।
५ § २०३. चक्षुषोऽप्राप्यकारित्वं कथमध्यवसीयते । आगतो युक्तितश्च । आगमतस्तावँत्-
"पुट्ठं सुणेदि सद्दं अपुट्ठं चेव पस्सदे रूअं ।
गंधं रसं च फासं पुट्ठमपुट्ठं वियाणादि ।।"
§ २०४. युक्तितश्च - अप्राप्यकारि चक्षुः; स्पृष्टानवग्रहात् । यदि प्राप्यकारि स्यात् त्वगि-
न्द्रियवत् स्पृष्टमंजनं गृह्णीयात् न तु गृह्णात्यतो मनोवदप्राप्यकारीत्यवसेयम् । ततश्चक्षुर्मनसी
वर्जयित्वा शेषाणामिन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रहः । सर्वेषामिन्द्रियानिन्द्रियाणामर्थावग्रह इति सिद्धम् ।
१० § २०२. चक्षु और मनसे व्यंजनावग्रह नहीं होता है । शंका- क्यों ? समाधान - क्योंकि
चक्षु और मन अप्राप्यकारी हैं। चूंकि नेत्र अप्राप्त, योग्य दिशामें अवस्थित, युक्त, सन्निकर्षके
योग्य देशमें अवस्थित और बाह्य प्रकाश आदिसे व्यक्त हुए पदार्थको ग्रहण करता है और मन भी
अप्राप्त अर्थको ग्रहण करता है अतः इन दोनोंके द्वारा व्यंजनावग्रह नहीं होता ।
§ २०३. शंका- चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है यह कैसे जाना जाता है ? समाधान- आगम
१५ और युक्तिसे जाना जाता है । आगमसे यथा- 'श्रोत्र स्पृष्ट शब्दको सुनता है और अस्पृष्ट शब्दको
भी सुनता है, नेत्र अस्पृष्ट रूपको ही देखता है। तथा घ्राण, रसना और स्पर्शन इन्द्रियाँ क्रमसे
स्पृष्ट और अस्पृष्ट गन्ध, रस और स्पर्शको जानती हैं।"
§ २०४. युक्तिसे यथा - चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है, क्योंकि वह स्पृष्ट पदार्थको नहीं ग्रहण
करती । यदि चक्षु इन्द्रिय प्राप्यकारी होती तो वह त्वचा इन्द्रियके समान स्पृष्ट हुए अंजनको ग्रहण
२० करती । किन्तु वह स्पृष्ट अंजनको नहीं ग्रहण करती है इससे मालूम होता है कि मनके समान चक्षु
इन्द्रिय अप्राप्यकारी है। अतः सिद्ध हुआ कि चक्षु और मनको छोड़कर शेष इन्द्रियोंके व्यंजनाव-
ग्रह होता है। तथा सब इन्द्रिय और मनके अर्थावग्रह होता है।
विशेषार्थ- पहले अवग्रहके दो भेद बतला आये हैं- अर्थावग्रह और व्यंजनावग्रह । इनमें-
से अर्थावग्रह तो पाँचों इन्द्रियों और मन इन छहोंसे होता है किन्तु व्यंजनावग्रह चक्षु और मन इन
२५ दोसे नहीं होता यह इस सूत्रका भाव है। चक्षु और मनसे व्यंजनावग्रह क्यों नहीं होता, इसका
निर्देश करते हुए जो टीकामें लिखा है उसका भाव यह है कि ये दोनों अप्राप्यकारी हैं अर्थात् ये
दोनों विषयको स्पृष्ट करके नहीं जानते हैं इसलिए इन द्वारा व्यंजनावग्रह नहीं होता । इससे यह
अपने आप फलित हो जाता है कि व्यंजनावग्रह प्राप्त अर्थका ही होता है और अर्थावग्रह प्राप्त तथा
अप्राप्त दोनों प्रकारके पदार्थोंका होता है। यहाँ यह कहा जा सकता है कि यदि अप्राप्त अर्थका
३० अर्थावग्रह होता है तो होओ इसमें बाधा नहीं, पर प्राप्त अर्थका अर्थावग्रह कैसे हो सकता है ? सो
इस शंकाका यह समाधान है कि प्राप्त अर्थका सर्व प्रथम ग्रहणके समय तो व्यंजनावग्रह ही होता
है किन्तु बादमें उसका भी अर्थावग्रह हो जाता है । नेत्र प्राप्त अर्थको क्यों नहीं जानता इसका
१. अप्राप्तिका - आ०, दि० १, दि० २ । २. युक्तस्स - मु०, ता०, ना० । ३. विशेषेऽव-मु०,
ता०, ना० । ४. प्राप्तमतो नानयोर्व्य - मु०, ता०, ना० । ५. ग्रहोऽस्ति - मु० । ६. कथमप्यवसी - मु० ।
३५ ७. तावत्- पुट्ठं सुणोदि सद्दं अपुट्ठं पुण पस्सदे ख्वं । फासं रसं च गंधं बद्धं पुट्ठं वियाणादि ।। युक्ति - मु० ।
आ० नि० गा० ५। .८ "जह पत्तं गेण्हेज्ज उ तग्गयमंजण-।" वि० भा० गा० २१२ । ९. 'लोयणमपत्त-
विसयं मणोव्व ।'- वि० भा० गा० २०९ ।
- १२० § २०६ ] प्रथमोऽध्यायः ८३
§ २०५. आह निर्दिष्टं मतिज्ञानं लक्षणतो विकल्पतश्च; तदनन्तरमुद्दिष्टं यत् श्रुतं तस्येदानीं
लक्षणं विकल्पश्च वक्तव्य इत्यत आह-
श्रुतं मतिपूर्वं द्वयनेकदशद्वादशभेदम् ॥२०॥
§ २०६. श्रुतशब्दोऽयं श्रवणमुपादाय व्युत्पादितोऽपि रूढिवशात् कस्मिंश्चिज्ज्ञानविशेषे
वर्तते। यथा कुशलवनकर्म प्रतीत्य¹ व्युत्पादितोऽपि कुशलशब्दो रूढिवशात्पर्यवदाते² वर्तते। कः ५
पुनरसौ ज्ञानविशेष इति। अत आह 'श्रुतं मतिपूर्वम्' इति। श्रुतस्य प्रमाणत्वं पूरयतीति³ पूर्वं
निमित्तं कारणमित्यनर्थान्तरम्। मतिर्निर्दिष्टा। मतिः पूर्वमस्य मतिपूर्वं मतिकारणमित्यर्थः। यदि
मतिपूर्वं श्रुतं तदपि मत्यात्मकं प्राप्नोति 'कारणसदृशं हि लोके कार्यं दृष्टम्' इति। नैतदैकान्तिकम्।
दण्डादिकारणोऽयं घटो न दण्डाद्यात्मकः। अपि च सति तस्मिंस्तदभावात्। सत्यपि मतिज्ञाने
बाह्यश्रुतज्ञाननिमित्तसंनिधानेऽपि प्रबलश्रुतावरणोदयस्य श्रुताभावः। श्रुतावरणक्षयोपशमप्रकर्षे तु १०
सति श्रुतज्ञानमुत्पद्यत इति मतिज्ञानं निमित्तमात्रं ज्ञेयम्।
निर्देश तो टीकामें किया ही है। इसी प्रकार शेष इन्द्रियाँ भी कदाचित् अप्राप्यकारी होतो हैं यह
भी सिद्ध होता है। प्रायः पृथिवीमें जिस ओर निधि रखी रहती है उस ओर वनस्पतिके मूलका
विकास देखा जाता है। यह तभी बन सकता है जब स्पर्शन इन्द्रिय-द्वारा अप्राप्त अर्थका ग्रहण
बन जाता है। इसी प्रकार रसना, घ्राण और श्रोत्र इन्द्रिय-द्वारा भी उसकी सिद्धि हो जाती है। १५
शेष कथन सुगम है।
§ २०५. लक्षण और भेदोंकी अपेक्षा मतिज्ञानका कथन किया। अब उसके बाद श्रुतज्ञानके
लक्षण और भेद कहने चाहिए; इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
श्रुतज्ञान मतिज्ञान पूर्वक होता है। वह दो प्रकारका, अनेक प्रकारका और बारह प्रकार-
का है ॥२०॥ २०
§ २०६. यह 'श्रुत' शब्द सुनने रूप अर्थकी मुख्यतासे निष्पादित है तो भी रूढ़िसे उसका
वाच्य कोई ज्ञानविशेष है। जैसे 'कुशल' शब्दका व्युत्पत्ति अर्थ कुशाका छेदना है तो भी रूढ़िसे
उसका अर्थ पर्यवदात अर्थात् विमल या मनोज्ञ लिया जाता है। वह ज्ञानविशेष क्या है इस बातको
ध्यानमें रखकर 'श्रुतं मतिपूर्वम्' यह कहा है। जो श्रुतकी प्रमाणताको पूरता है। इस व्युत्पत्तिके
अनुसार पूर्व, निमित्त और कारण ये एकार्थवाची हैं। मतिका व्याख्यान पहले कर आये हैं। वह २५
मति जिसका पूर्व अर्थात् निमित्त है वह मतिपूर्व कहलाता है जिसका अर्थ मतिकारणक होता है।
तात्पर्य यह है कि जो मतिज्ञानके निमित्तसे होता है उसे श्रुतज्ञान कहते हैं। शंका—यदि श्रुतज्ञान
मतिज्ञानपूर्वक होता है तो वह श्रुतज्ञान भी मत्यात्मक ही प्राप्त होता है; क्योंकि लोकमें कारणके
समान ही कार्य देखा जाता है? समाधान—यह कोई एकान्त नियम नहीं है कि कारणके समान
कार्य होता है। यद्यपि घटकी उत्पत्ति दण्डादिकसे होती है तो भी वह दण्डाद्यात्मक नहीं होता। ३०
दूसरे, मतिज्ञानके रहते हुए भी श्रुतज्ञान नहीं होता। यद्यपि मतिज्ञान रहा आता है और श्रुत-
ज्ञानके बाह्य निमित्त भी रहे आते हैं तो भी जिसके श्रुतज्ञानावरणका प्रबल उदय पाया जाता है
उसके श्रुतज्ञान नहीं होता। किन्तु श्रुतज्ञानावरण कर्मका प्रकर्ष क्षयोपशम होनेपर ही श्रुतज्ञान
होता है इसलिए मतिज्ञान श्रुतज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्तमात्र जानना चाहिए।
१. प्रतीत्या व्यु—मु० । २. 'अवदातं तु विमले मनोज्ञा'—'अ० ना० ४, ९६ । ३. पुव्वं पूरणगालणभावओ ३५
णं मई।' वि० मा० गा० १०५।
§ २०७. आह, श्रुतमनादिनिधनमिष्यते । तस्य मतिपूर्वकत्वे तदभावः; आदिमतोऽन्त-
वत्त्वात् । ततश्च १पुरुषकृतत्वादप्रामाण्यमिति नैष दोषः; द्रव्यादिसामान्यार्पणात् श्रुतमनादि-
निधनमिष्यते । न हि केनचित्पुरुषेण क्वचित्कदाचित्कथंचिदुत्प्रेक्षितमिति । तेषामेव विशेषापेक्षया
आदिरन्तश्च संभवतीति 'मतिपूर्वम्' इत्युच्यते । यथाङ्कुरो बीजपूर्वकः स च संतानापेक्षया
अनादिनिधन इति । न चापौरुषेयत्वं प्रामाण्यकारणम्; चौर्याद्युपदेशस्यास्मर्यमाणकर्तृकस्य
प्रामाण्यप्रसङ्गात् । अनित्यस्य च प्रत्यक्षादेः प्रामाण्ये को विरोधः ।
§ २०८. आह, २प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्तौ युगपज्ज्ञानपरिणामान्मतिपूर्वकत्वं श्रुतस्य नोपपद्यत
इति । तदयुक्तम्; सम्यक्त्वस्य तदपेक्षत्वात् । ३आत्मलाभस्तु क्रमवानिति मतिपूर्वकत्व-
व्याघाताभावः ।
§ २०९. आह, मतिपूर्वं श्रुतमित्येतल्लक्षणमव्यापि श्रुतपूर्वमपि श्रुतमिष्यते । तद्यथा--
शब्दपरिणतपुद्गलस्कन्धादाहितवर्णपदवा४क्यादिभावाच्चक्षुरादिविषयाच्च आद्यश्रुतविषयभावमा-
पन्नादव्यभिचारिणः ५कृतसंगतिर्जनो घटाज्जलधारणादि कार्यं संबन्ध्वन्तरं६ प्रतिपद्यते, धूमा-
देवाग्न्यादिवद्वयं, तदा श्रुतात् श्रुतप्रतिपत्तिरिति । नैष दोषः; तस्यापि मतिपूर्वकत्वमुपचारात् ।
श्रुतमपि क्वचिन्मतिरित्युपचर्यते मतिपूर्वकत्वादिति ।
§ २०७. शंका-श्रुतज्ञानको अनादिनिधन कहा है। ऐसी अवस्था में उसे मतिज्ञानपूर्वक
मान लेने पर उसकी अनादिनिधनता नहीं बनती, क्योंकि जिसका आदि होता है उसका अन्त
अवश्य होता है। और इसलिए वह पुरुषका कार्य होनेसे उसे प्रमाण नहीं माना जा सकता ?
समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि द्रव्य आदि सामान्य नयकी मुख्यतासे श्रुतको अनादि-
निधन कहा है। किसी पुरुषने कहीं और कभी किसी भी प्रकारसे उसे किया नहीं है। हाँ उन्हीं
द्रव्य आदि विशेष नयकी अपेक्षा उसका आदि और अन्त सम्भव है इसलिए 'वह मतिपूर्वक होता
है' ऐसा कहा जाता है। जैसे कि अंकुर बीजपूर्वक होता है, फिर भी वह सन्तानकी अपेक्षा अनादि-
निधन है। दूसरे जो यह कहा है कि पुरुषका कार्य होनेसे वह अप्रमाण है सो अपौरुषेयता
प्रमाणताका कारण नहीं है। यदि अपौरुषेयताको प्रमाणताका कारण माना जाय तो जिसके कर्त्ता-
का स्मरण नहीं होता ऐसे चोरी आदिके उपदेश भी प्रमाण हो जायेंगे । तीसरे प्रत्यक्ष आदि ज्ञान
अनित्य होकर भी यदि प्रमाण माने जाते हैं तो इसमें क्या विरोध है, अर्थात् कुछ भी नहीं ।
§ २०८. शंका-प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके साथ ही ज्ञानकी उत्पत्ति होती है, अतः
श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है यह कथन नहीं बनता ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं है,
क्योंकि ज्ञानमें समीचीनता सम्यग्दर्शनके निमित्तसे प्राप्त होती है। इन दोनोंका आत्मलाभ तो
क्रमसे ही होता है, इसलिए 'श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है' इस कथनका व्याघात नहीं होता ।
§ २०९. शंका—'मतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान होता है' इस लक्षणमें अव्याप्ति दोष आता है,
क्योंकि श्रुतज्ञानपूर्वक भी श्रुतज्ञान होता है ऐसा कहा जाता है। यथा—किसी एक जीवने वर्ण,
पद और वाक्य आदि रूपसे शब्द परिणत पुद्गल स्कन्धोंको कर्ण इन्द्रिय-द्वारा ग्रहण किया ।
अनन्तर उससे घटपदार्थ विषयक प्रथम श्रुतज्ञान हुआ । यदि उसने घटके कार्योंका संकेत कर रखा
है तो उसे उस घटज्ञानके बाद जलधारणादि दूसरे कार्योंका ज्ञान होता है और तब श्रुतज्ञानसे
१. -षकृतत्वा—मु० । २. 'णाणाण्णाणाणि य समकालाइं जओ मइसुयाइं । तो न सुयं मइपुव्वं मइणाणे वा
'सुयन्नाणं'—वि० भा० गा० १०७ । ३. 'इहलद्धिमइसुयाइं समकालाइं न तूवओगो सिं । मइपुव्वं
सुयमिह पुण सुओपजोगो मइप्पभवो । —वि० भा० गा० १०८ । ४. पदव्याख्यादि—आ०, दि० १ ।
५. संगति—मु० । ६. सम्बन्धान्तरं ता०, ना० ।
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[Header] - १।२० § २११ ] प्रथमोऽध्यायः ८५
§ २१०. भेदशब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते - द्विभेदमनेकभेदं द्वादशभेदमिति । द्विभेदं तावत्—
अङ्गबाह्यमङ्गप्रविष्टमिति । अङ्गबाह्यमनेकविधं दशवैकालिकोत्तराध्ययनादि । अङ्गप्रविष्टं द्वादश-
विधम् । तद्यथा, आचारः सूत्रकृतं स्थानं समवायः व्याख्याप्रज्ञप्तिः ज्ञातृधर्मकथा उपासकाध्ययनं
अन्तकृद्दशं अनुत्तरोपपादिकदशं प्रश्नव्याकरणं विपाकसूत्रं दृष्टिवाद इति । दृष्टिवादः पञ्चविधः—
परिकर्म सूत्रं प्रथमानुयोगः पूर्वगतं चूलिका चेति । तत्र पूर्वगतं चतुर्दशविधम्—उत्पादपूर्वं अग्राय- ५
णीयं वीर्यानुप्रवादं अस्तिनास्तिप्रवादं ज्ञानप्रवादं सत्यप्रवादं आत्मप्रवादं कर्मप्रवादं प्रत्याख्यान-
नामधेयं विद्यानुप्रवादं कल्याणनामधेयं प्राणावायं क्रियाविशालं लोकबिन्दुसारमिति । तदेतत् श्रुतं
द्विभेदमनेकभेदं द्वादशभेदमिति ।
§ २११. किंकृतोऽयं विशेषः । १वक्तृविशेषकृतः । त्रयो वक्तारः—सर्वज्ञस्तीर्थंकर इतरो वा
श्रुतकेवली आरातीयश्चेति । तत्र सर्वज्ञेन परमर्षिणा परमाचिन्त्यकेवलज्ञानविभूतिविशेषेण अर्थत १०
आगम उद्दिष्टः । तस्य प्रत्यक्षदर्शित्वात्प्रक्षीणदोषत्वाच्च प्रामाण्यम् । तस्य साक्षाच्छिष्यैर्बुद्ध्यति-
शयर्द्धियुक्तैर्गणधरैः श्रुतकेवलिभिरनुस्मृतग्रन्थरचनमङ्गपूर्व लक्षणम् । तत्प्रमाणम्; तत्प्रामाण्यात् ।
आरातीयैः पुनराचार्यैः कालदोषात्संक्षिप्तायुर्मतिबल शिष्यानुग्रहार्थं दशवैकालिकाद्युपनिबद्धम् ।
तत्प्रमाणमर्थतस्तदेवेदमिति क्षीरार्णवजलं घटगृहीतमिव ।
श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। या किसी एक जीवने चक्षु आदि इन्द्रियोंके विषयको ग्रहण किया। १५
अनन्तर उसे उससे धूमादि पदार्थविषयक प्रथम श्रुतज्ञान हुआ। यदि उसे धूमादि और अग्नि
आदि द्रव्यके सम्बन्धका ज्ञान है तो वह धूमादिके निमित्तसे अग्नि आदि द्रव्यको जानता है और
तब भी श्रुतज्ञानसे श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। इसलिए मतिज्ञानपूर्वक ही श्रुतज्ञान होता है यह
बात नहीं बनती ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जहांपर श्रुतज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान
होता है वहाँपर प्रथम श्रुतज्ञान उपचारसे मतिज्ञान माना गया है। श्रुतज्ञान भी कहींपर मति- २०
ज्ञानरूपसे उपचारित किया जाता है क्योंकि श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है ऐसा नियम है।
§ २१०. सूत्रमें आये हुए 'भेद' शब्दको दो आदि प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए।
यथा—दो भेद, अनेक भेद और बारह भेद । श्रुतज्ञानके दो भेद अंगबाह्य और अंगप्रविष्ट हैं।
अंगबाह्यके दशवैकालिक और उत्तराध्ययन आदि अनेक भेद हैं। अंगप्रविष्टके बारह भेद हैं।
यथा—आचार, सूत्रकृत्, स्थान, समवाय, व्याख्याप्रज्ञप्ति, ज्ञातृधर्मकथा, उपासकाध्ययन, अन्त- २५
कृद्दश, अनुत्तरोपपादिकदश, प्रश्नव्याकरण, विपाकसूत्र और दृष्टिवाद । दृष्टिवादके पाँच भेद हैं—
परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत और चूलिका । इनमें-से पूर्वगतके चौदह भेद हैं—उत्पादपूर्व,
आग्रायणीय, वीर्यानुवाद, अस्तिनास्तिप्रवाद, ज्ञानप्रवाद, सत्यप्रवाद, आत्मप्रवाद, कर्मप्रवाद,
प्रत्याख्याननामधेय, विद्यानुवाद, कल्याणनामधेय, प्राणावाय, क्रियाविशाल और लोकबिन्दुसार ।
इस प्रकार यह श्रुत दो प्रकारका, अनेक प्रकारका और बारह प्रकारका है । ३०
§ २११. शंका—यह भेद किंकृत है ? समाधान—यह भेद वक्ताविशेषकृत है। वक्ता तीन
प्रकारके हैं—सर्वज्ञ तीर्थंकर या सामान्य केवली तथा श्रुतकेवली और आरातीय । इनमें-से परम
ऋषि सर्वज्ञ उत्कृष्ट और अचिन्त्य केवलज्ञानरूपी विभूतिविशेषसे युक्त हैं। इस कारण उन्होंने अर्थ-
रूपसे आगमका उपदेश दिया । ये सर्वज्ञ प्रत्यक्षदर्शी और दोषमुक्त हैं इसलिए प्रमाण हैं। इनके
साक्षात् शिष्य और बुद्धिके अतिशयरूप ऋद्धिसे युक्त गणधर श्रुतकेवलियोंने अर्थरूप आगमका ३५
स्मरण कर अंग और पूर्वग्रन्थोंकी रचना की। सर्वज्ञदेवकी प्रमाणताके कारण ये भी प्रमाण हैं।
तथा आरातीय आचार्योने कालदोषसे जिनकी आयु, मति और बल घट गया है ऐसे शिष्योंका
१. -क्षेपः । विशेषवक्तृतो विशेषः कृतः । आ०, दि० १, दि० २ ।
८६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।२१ § २१२ -
§ २१२. व्याख्यातं परोक्षम् । प्रत्यक्षमिदानीं वक्तव्यम् । तद् द्वेधा-देशप्रत्यक्षं १सर्वप्रत्यक्षं
च । देशप्रत्यक्षमवधिमनःपर्ययज्ञाने । सर्वप्रत्यक्षं केवलम् । यद्येवमिदमेव तावदवधिज्ञानं त्रिःप्रका-
रस्य प्रत्यक्षस्याद्यं व्याख्यायतामित्यत्रोच्यते-द्विविधोऽवधिर्भवप्रत्ययः क्षयोपशमनिमित्तश्चेति । तत्र
भवप्रत्यय उच्यते-
५ भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम् ॥२१॥
उपकार करनेके लिए दशवैकालिक आदि ग्रन्थ रचे । जिस प्रकार क्षीरसागरका जल घटमें भर
लिया जाता है उसी प्रकार ये ग्रन्थ भी अर्थरूपसे वे ही हैं, इसलिए प्रमाण हैं ।
विशेषार्थ-मतिज्ञान श्रुतज्ञानका कारण किस रूपमें है, मतिज्ञान और श्रुतज्ञानमें अन्तर
क्या है, श्रुत अनादिनिधन और सादि कैसे है, श्रुतके भेद कितने और कौन-कौन हैं, श्रुतमें प्रमा-
१० णता कैसे आती है इत्यादि बातोंका विशेष विचार तो मूलमें किया ही है। यहाँ केवल विचार-
णीय विषय यह है कि श्रुतज्ञानका निरूपण करते समय सूत्रकारने केवल द्रव्य आगम श्रुतका ही
निरूपण क्यों किया ? अनुमान आदि ऐसे बहुत-से ज्ञान हैं जिनका अन्तर्भाव श्रुतज्ञानमें किया जाता
है फिर उनका निर्देश यहाँ क्यों नहीं किया ? क्या श्रुतज्ञान द्रव्य आगम श्रुतके ज्ञान तक ही
सीमित है और अनुमान आदिका अन्तर्भाव सूत्रकारके मतानुसार मतिज्ञानमें होता है ? ये ऐसे
१५ विचारणीय प्रश्न हैं जिनका प्रकृतमें समाधान करना आवश्यक है । बात यह है कि जैन परम्परामें
द्रव्य आगम श्रुतकी प्रधानता सदासे चली आ रही है, इसलिए सूत्रकारने श्रुतज्ञानके निरूपणके
समय उसका प्रमुखतासे निर्देश किया है। पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि श्रुतज्ञान द्रव्य आगम
श्रुतके ज्ञान तक ही सीमित है। मतिके सिवा अनुमान आदि शेष सब परोक्ष ज्ञानोंका अन्तर्भाव
श्रुतज्ञानमें ही होता है क्योंकि इन ज्ञानोंमें हेतु आदिका प्रत्यक्ष ज्ञान आदि होने पर ही इन ज्ञानों-
२० की प्रवृत्ति होती है। उदाहरणार्थ नेत्र इन्द्रियसे धूमका ज्ञान होता है। अनन्तर व्याप्तिका स्मरण
होता है तब जाकर 'यहाँ अग्नि होनी चाहिए' यह अनुमान होता है। कहीं-कहीं मतिज्ञानमें भी
इनके अन्तर्भावका निर्देश मिलता है पर वह कारणरूपसे ही जानना चाहिए । मतिज्ञान श्रुतज्ञान-
की उत्पत्तिमें निमित्त है, इसलिए कारणमें कार्यका उपचार करके कहीं-कहीं अनुमान आदिका भी
मतिज्ञान रूपसे निर्देश किया जाता है। एक बात और विचारणीय है और वह यह कि यह श्रुत-
२५ ज्ञानका प्रकरण है द्रव्यश्रुतका नहीं, इसलिए यहाँ सूत्रकारने श्रुतज्ञानके भेद न दिखलाकर द्रव्य-
श्रुतके भेद क्यों दिखलाये ? उत्तर यह है कि श्रुतज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमका और द्रव्यश्रुतका
अन्योन्य सम्बन्ध है। क्षयोपशमके अनुसार होनेवाले श्रुतज्ञानको ध्यानमें रखकर ही द्रव्यश्रुतका
विभाग किया गया है। यही कारण है कि यहाँ श्रुतज्ञानका प्रकरण होते हुए भी द्रव्यश्रुतके भेद
गिनाये गये हैं। इस बातकी विशेष जानकारीके लिए गोम्मटसार जीवकाण्डमें निर्दिष्ट ज्ञान-
३० मार्गणा द्रष्टव्य है ।
§ २१२. परोक्ष प्रमाणका व्याख्यान किया । अब प्रत्यक्ष प्रमाणका व्याख्यान करना है ।
वह दो प्रकारका है-देशप्रत्यक्ष और सर्वप्रत्यक्ष । देशप्रत्यक्ष अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानके भेद-
से दो प्रकारका है। सर्वप्रत्यक्ष केवलज्ञान है । यदि ऐसा है तो तीन प्रकारके प्रत्यक्षके आदिमें कहे
गये अवधिज्ञानका व्याख्यान करना चाहिए, इसलिए कहते हैं-अवधिज्ञान दो प्रकारका है-
३५ भवप्रत्यय और क्षयोपशमनिमित्तक । उनमें-से सर्वप्रथम भवप्रत्यय अवधिज्ञानका अगले सूत्र द्वारा
कथन करते हैं-
भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव और नारकियोंके होता है ॥२१॥
१. -न्यक्षं सकलप्र-मु० ।
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§ २१३. भव इत्युच्यते । को भवः । आयुर्नामकर्मोदयनिमित्त आत्मनः पर्यायो भवः ।
प्रत्ययः कारणं निमित्तमित्यनर्थान्तरम् । भवः प्रत्ययोऽस्य भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणां वेदितव्यः ।
यद्येवं तत्र क्षयोपशमनिमित्तत्वं न प्राप्नोति । नैष दोष; तदाश्रयात्तत्सिद्धेः । भवं प्रतीत्य क्षयो-
पशमः संजायत¹ इति कृत्वा भवः प्रधानकारणमित्युपदिश्यते । यथा पतत्रिणो गमनमाकाशे भव-
निमित्तम्, न शिक्षागुणविशेषः तथा देवनारकाणां व्रतनियमाद्यभावेऽपि जायत 'इति भवप्रत्ययः'
²इत्युच्यते । इतरथा हि भवः साधारण इति कृत्वा सर्वेषामविशेषः स्यात् । इष्यते च तत्रावधेः
प्रकर्षाप्रकर्षवृत्तिः । 'देवनारकाणाम्' इत्यविशेषाभिधानेऽपि सम्यग्दृष्टीनामेव ग्रहणम् । कुतः ।
अवधिग्रहणात् । मिथ्यादृष्टीनां च विभङ्ग इत्युच्यते । प्रकर्षाप्रकर्षवृत्तिश्च आगमतो विज्ञेया ।
§ २१४. यदि भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्, अथ क्षयोपशमहेतुकः केषामित्यत आह—
§ २१३. भवका स्वरूप कहते हैं । शंका—भव किसे कहते हैं ? समाधान—आयु नामकर्म-
के उदयका निमित्त पाकर जो जीवकी पर्याय होती है उसे भव कहते हैं ? प्रत्यय, कारण और
निमित्त ये एकार्थवाची नाम हैं । जिस अवधिज्ञानके होनेमें भव निमित्त है वह भवप्रत्यय अवधि-
ज्ञान है । वह देव और नारकियोंके जानना चाहिए । शंका—यदि ऐसा है तो इनके अवधिज्ञानके
होनेमें क्षयोपशमकी निमित्तता नहीं बनती ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि भवके
आश्रयसे क्षयोपशमकी सिद्धि हो जाती है । भवका आलम्बन लेकर क्षयोपशम हो जाता है ऐसा
समझकर भव प्रधान कारण है ऐसा उपदेश दिया जाता है । जैसे पक्षियोंका आकाशमें गमन करना
भवनिमित्तक होता है, शिक्षा गुणकी अपेक्षासे नहीं होता वैसे ही देव और नारकियोंके व्रत निय-
मादिकके अभावमें भी अवधिज्ञान होता है, इसलिए उसे भवनिमित्तक कहते हैं । यदि ऐसा न
माना जाय तो भव तो सबके साधारण रूपसे पाया जाता है, अतः सबके एक-सा अवधिज्ञान प्राप्त
होगा । परन्तु वहाँपर अवधिज्ञान न्यूनाधिक कहा ही जाता है, इससे ज्ञात होता है कि यद्यपि
वहाँपर अवधिज्ञान होता तो क्षयोपशमसे ही है पर वह क्षयोपशम भवके निमित्तसे प्राप्त होता है
अतः उसे 'भवप्रत्यय' कहते हैं । सूत्रमें 'देवनारकाणाम्' ऐसा सामान्य वचन होने पर भी इससे
सम्यग्दृष्टियोंका ही ग्रहण होता हैं, क्योंकि सूत्रमें 'अवधि' पदका ग्रहण किया है । मिथ्यादृष्टियोंका
वह विभंगज्ञान कहलाता है । अवधिज्ञान देव और नारकियोंमें न्यूनाधिक किसके कितना पाया
जाता है यह आगमसे जान लेना चाहिए ।
विशेषार्थ—अवधिज्ञान वह मर्यादित ज्ञान है जो इन्द्रिय और मनकी सहायताके बिना
मूर्तिक पदार्थोंको स्पष्ट जानता है । मनःपर्ययज्ञानका भी यही स्वरूप कहा जाता है पर इससे
मनःपर्ययज्ञानमें मौलिक भेद है । वह मनकी पर्यायों-द्वारा ही मूर्तिक पदार्थोंको जानता है, सीधे
तौरसे मूर्तिक पदार्थोंको नहीं जानता । यह अवधिज्ञान देव और नारकियोंके उस पर्यायके प्राप्त
होने पर अनायास होता है । इसके लिए उन्हें प्रयत्न विशेष नहीं करना पड़ता । तथा तिर्यञ्चों
और मनुष्योंके सम्यग्दर्शन आदि गुणोंके निमित्तसे होता है । इससे इसके भवप्रत्यय और क्षयोप-
शमनिमित्तक ये दो भेद किये गये हैं। यहाँ भवप्रत्यय अवधिज्ञान मुख्यतः देव और नारकियोंके
बतलाया है, पर तीर्थंकर आदिके भी इस अवधिज्ञानकी प्राप्ति देखी जाती है इतना यहाँ विशेष
जानना चाहिए । देव और नारकियोंमें भी उन्हींके भवके प्रथम समयसे अवधिज्ञान होता है जो
सम्यग्दृष्टि होते हैं । मिथ्यादृष्टियोंके इसकी उत्पत्ति पर्याप्त होनेपर ही होती है और उसका नाम
विभंगज्ञान है। इस ज्ञानकी विशेष जानकारी जीवकाण्ड, धवला वेदनाखण्ड आदिसे करनी चाहिए ।
§ २१४. यदि भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव और नारकियोंके होता है तो क्षयोपशमहेतुक
अवधिज्ञान किसके होता है । आगे इसी बातको बतलाते हैं—
१. -शमः संजात इति आ०, दि० १, दि० २ । २. -त्यय इष्यते । इत—आ०, दि० १, दि० २ ।