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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 558 में से

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पृष्ठ 181
  • १।१० § १७२ ] प्रथमोऽध्यायः ६९
    § १७१. प्रमिणोति प्रमीयतेऽनेन प्रमितिमात्रं वा प्रमाणम्। किमनेन प्रमीयते। जीवादिरर्थः।
    यदि जीवादेरधिगमे प्रमाणं प्रमाणाधिगमे च अन्यत्प्रमाणं परिकल्पयितव्यम् । तथा सत्यनवस्था ।
    नानवस्था प्रदीपवत् । यथा घटादीनां प्रकाशने प्रदीपो हेतुः² स्वस्वरूपप्रकाशनेऽपि स एव, न
    प्रकाशान्तरं³ मृग्यं तथा प्रमाणमपीति अवश्यं चैतदभ्युपगन्तव्यम् । प्रमेयवत्प्रमाणस्य प्रमाणान्तर-
    परिकल्पनायां स्वाधिगमाभावात् स्मृत्यभावः । तदभावाद् व्यवहारलोपः स्यात् ।
    § १७२. वक्ष्यमाणभेदापेक्षया द्विवचननिर्देशः । वक्ष्यते हि "आद्ये परोक्षम्, प्रत्यक्षमन्यद्"
    इति स च द्विवचननिर्देशः प्रमाणान्तरसंख्यानिवृत्त्यर्थः ।
    § १७१ प्रमाण शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—प्रमिणोति, प्रमीयतेऽनेन प्रमितिमात्रं वा
    प्रमाणम् = जो अच्छी तरह मान करता है, जिसके द्वारा अच्छी तरह मान किया जाता है या
    प्रमितिमात्र प्रमाण है । शंका—प्रमाणके द्वारा क्या जाना जाता है? समाधान—जीवादि पदार्थ
    जाने जाते हैं। शंका—यदि जीवादि पदार्थोंके ज्ञानमें प्रमाण कारण है तो प्रमाणके ज्ञानमें अन्य
    प्रमाणको कारण मानना चाहिए । और ऐसा माननेपर अनवस्था दोष प्राप्त होता है ? समाधान—
    जीवादि पदार्थोंके ज्ञानमें प्रमाणको कारण मानने पर अनवस्था दोष नहीं आता, जैसे दीपक ।
    जिस प्रकार घटादि पदार्थोंके प्रकाश करनेमें दीपक हेतु है और अपने स्वरूप के प्रकाश करने में
    भी वही हेतु है इसके लिए प्रकाशान्तर नहीं ढूंढ़ना पड़ता । उसी प्रकार प्रमाण भी है यह बात
    अवश्य मान लेनी चाहिए । अब यदि प्रमेयके समान प्रमाणके लिए अन्य प्रमाण माना जाता है
    तो स्वका ज्ञान नहीं होनेसे स्मृतिका अभाव हो जाता है और स्मृतिका अभाव हो जानेसे व्यवहार
    का लोप हो जाता है ।
    § १७२. सूत्र में आगे कहे जानेवाले भेदोंकी अपेक्षा द्विवचनका निर्देश किया है। आगे
    कहेंगे 'आद्ये परोक्षम्, प्रत्यक्षमन्यत् ।' यह द्विवचनका निर्देश प्रमाणकी अन्य संख्या के निराकरण
    करनेके लिए किया है ।
    विशेषार्थ—पिछले सूत्रमें पाँच सम्यग्ज्ञानोंकी चर्चा करके इस सूत्रमें उनकी प्रमाणता
    बतलायी गयी है। यों तो सम्यग्ज्ञान कहनेसे उनकी प्रमाणता सुतरां सिद्ध है किन्तु दर्शनान्तरोंमें
    ज्ञानको मुख्यतया प्रमाण न मान कर सन्निकर्ष व इन्द्रिय आदिको प्रमाण माना गया है इसलिए
    यहाँपर सन्निकर्ष आदि प्रमाण नहीं हैं किन्तु ज्ञान ही प्रमाण है यह बतलाया गया है। सर्वार्थसिद्धि
    टीकामें मुख्यतया दो मतोंका उल्लेख करके उनकी आलोचना की गयी है। ये दोनों मत नैयायिक
    सम्मत हैं । नैयायिकोंने प्रत्यक्ष ज्ञानकी उत्पत्तिमें सन्निकर्ष और इन्द्रिय दोनोंको प्रमाण माना है।
    सन्निकर्ष प्रमाण है इस मतका उल्लेख न्यायभाष्यमें और इन्द्रिय प्रमाण है इस मतका उल्लेख
    उद्योतकरके न्यायवार्तिकमें पाया जाता है। परन्तु सर्वार्थसिद्धिकारने जब इस दूसरे मतका उल्लेख
    किया है, तो यह भी प्रथम मतके समान प्राचीन प्रतीत होता है। बहुत सम्भव है कि इस द्वारा
    सर्वार्थसिद्धिकारने सांख्यके 'इन्द्रियवृत्ति प्रमाण है' इस मतका उल्लेख किया हो तो कोई आश्चर्य
    नहीं । नैयायिक लोग प्रत्यक्षज्ञानकी उत्पत्ति में सन्निकर्षको असाधारण कारण मानकर उसे प्रमाण
    मानते हैं । किन्तु आगे चलकर करणके 'असाधारण कारणको करण कहते हैं' इस लक्षणके
    स्थानमें 'व्यापारवाले कारणको करण कहते हैं' यह लक्षण भी प्रचलित हो गया जिससे सन्निकर्षके
    साथ उनके यहाँ इन्द्रियाँ भी प्रमाण मानी जाने लगीं। वे जब सन्निकर्षको प्रमाण मानते हैं तब
    ज्ञान उसका फल मान लिया जाता है और जब इन्द्रियों को प्रमाण मानते हैं तब भी सन्निकर्षको
    इन्द्रियोंका व्यापार मानकर ज्ञान उनका फल मान लिया जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि वे
    १. -धिगमे अन्य-मु० । २. हेतुः तत्स्व-मु० । ३. न्तरमस्य मृग्यम् मु० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri