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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 558 में से

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पृष्ठ 180

स्यात् । इन्द्रियमपि यदि प्रमाणं स एव दोषः; अल्पविषयत्वात् चक्षुरादीनां ज्ञेयस्य चापरिमाण-
त्वात् ।
§ १६८. सर्वेन्द्रियसन्निकर्षाभावश्च; चक्षुर्मनसोः प्राप्यकारित्वाभावात् । अप्राप्यकारित्वं च
उत्तरत्र वक्ष्यते ।
§ १६९. यदि ज्ञानं प्रमाणं फलाभावः । अधिगमो हि फलमिष्टं न भावान्तरम् । स चेत्प्रमाणं,
न तस्यान्यत्फलं भवितुमर्हति । फलवता च प्रमाणेन भवितव्यम् । संनिकर्षे इन्द्रिये वा प्रमाणे सति
अधिगमः फलमर्थान्तरभूतं युज्यते इति । तदयुक्तम् । यदि संनिकर्षः प्रमाणं अर्थाधिगमः फलं,
तस्य द्विष्ठत्वात्तत्फलेनाधिगमेनापि द्विष्ठेन भवितव्यमिति अर्थादीनामप्यधिगमः प्राप्नोति ।
आत्मनश्चेतनत्वात्तत्रैव समवाय इति चेत् । न; ज्ञस्वभावाभावे सर्वेषामचेतनत्वात् । ज्ञस्वभावाभ्यु-
पगमे वा आत्मनः स्वमतविरोधः स्यात् ।
§ १७०. ननु चोक्तं ज्ञाने प्रमाणे सति फलाभाव इति । नैष दोषः; अर्थाधिगमे प्रीतिदर्श-
नात् । ज्ञस्वभावस्यात्मनः कर्ममलीमसस्य करणालम्बनादर्थनिश्चये प्रीतिरूपजायते । सा फलमित्यु-
च्यते । उपेक्षा¹ अज्ञाननाशो वा फलम् । रागद्वेषयोरप्रणिधानमुपेक्षा । अन्धकारकल्पाज्ञा²ननाशो वा
फलमित्युच्यते ।
है । यदि इन्द्रियको प्रमाण माना जाता है तो वही दोष आता है, क्योंकि चक्षु आदिका विषय
अल्प है और ज्ञेय अपरिमित हैं ।
§ १६८. दूसरे सब इन्द्रियोंका सन्निकर्ष भी नहीं बनता, क्योंकि चक्षु और मन प्राप्यकारी
नहीं हैं, इसलिए भी सन्निकर्षको प्रमाण नहीं मान सकते । चक्षु और मनके अप्राप्यकारित्वका
कथन आगे करेंगे ।
§ १६९. शंका—यदि ज्ञानको प्रमाण मानते हैं तो फलका अभाव होता है । प्रकृतमें ज्ञान-
को ही फल मानना इष्ट है अन्य पदार्थ को फल मानना इष्ट नहीं । पर यदि उसे प्रमाण मान लिया
जाता है तो उसका कोई दूसरा फल नहीं प्राप्त हो सकता । किन्तु प्रमाणको फलवाला होना
चाहिए । पर सन्निकर्ष या इन्द्रियको प्रमाण मानने पर उससे भिन्न ज्ञानरूप फल बन जाता है ?
समाधान—यह कहना युक्त नहीं, क्योंकि यदि सन्निकर्षको प्रमाण और अर्थके ज्ञानको फल मानते
हैं तो सन्निकर्ष दो में रहनेवाला होनेसे उसके फलस्वरूप ज्ञानको भी दोमें रहनेवाला होना चाहिए
इसलिए घट-पटादि पदार्थोंके भी ज्ञानकी प्राप्ति होती है । शंका—आत्मा चेतन है, अतः उसीमें
ज्ञानका समवाय है ? समाधान—नहीं, क्योंकि आत्माको ज्ञस्वभाव नहीं मानने पर सभी पदार्थ
अचेतन प्राप्त होते हैं । यदि आत्माको ज्ञस्वभाव माना जाता है, तो स्वमतका विरोध होता है ।
§ १७०. पहले पूर्वपक्षीने जो यह कहा है कि ज्ञानको प्रमाण मानने पर फलका अभाव
होता है सो यह कोई दोष नहीं; क्योंकि पदार्थके ज्ञान होने पर प्रीति देखी जाती है । यद्यपि
आत्मा ज्ञस्वभाव है तो भी वह कर्मोसे मलीन है अतः इन्द्रियों के आलम्बनसे पदार्थके निश्चय
करने पर उसके जो प्रीति उत्पन्न होती है वही प्रमाणका फल कहा जाता है । अथवा उपेक्षा या
अज्ञानका नाश प्रमाणका फल है । राग-द्वेषरूप परिणामोंका नहीं होना उपेक्षा है और अन्धकारके
समान अज्ञानका दूर हो जाना अज्ञाननाश है । सो ये भी प्रमाण के फल हैं ।
१. 'अज्ञाननिवृत्तिर्हानोपादानोपेक्षाश्च फलम् ।-प० मु० ५;९ । 'यदा संनिकर्षस्तदा ज्ञानं प्रमितिः । यदा
ज्ञानं तदा हानोपादानोपेक्षाबुद्धयः फलम् ।'-१।१।३ न्या० भा० । २. -ल्पाज्ञानाभावः अज्ञाननाशो मु० ।