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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 558 में से

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पृष्ठ 182

७० सर्वार्थसिद्धौ [ १।११ § १७३ –
§ १७३. 'उक्तस्य पञ्चविधस्य ज्ञानस्य प्रमाणद्वयान्तःपातित्वे प्रतिपादिते प्रत्यक्षानु-
मानादिप्रमाणद्वयकल्पनान्निवृत्त्यर्थमाह—
आद्ये परोक्षम् ॥११॥
§ १७४. आदिशब्दः प्राथम्यवचनः । आदौ भवमाद्यम् । कथं द्वयोः प्रथमत्वं मुख्योपचार-
कल्पनया । मतिज्ञानं तावन्मुख्यकल्पनया प्रथमम् । श्रुतमपि तस्य प्रत्यासत्त्या प्रथममित्युपचर्यते ।
ज्ञानको प्रमाण ही नहीं मानते। उनके यहाँ ज्ञानको भी प्रमाण माना गया है। जब वे ज्ञानको प्रमाण
मानते हैं तब हानबुद्धि, उपादानबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि उसका फल माना जाता है। किन्तु
नैयायिकोंकी सन्निकर्ष और इन्द्रियको प्रमाण माननेकी बात समीचीन नहीं है यही निर्णय इस
सूत्रकी टीकामें किया गया है। सन्निकर्षको प्रमाण माननेमें जो दोष प्राप्त होते हैं वे इस प्रकार
हैं—१. सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए सर्वज्ञताका अभाव
होता है २. चक्षु और मनसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि ये अप्राप्यकारी हैं । ३. प्रत्येक
इन्द्रियका अलग-अलग विषय मानना उचित नहीं, क्योंकि चक्षुका रूपके साथ सन्निकर्ष पाया
जानेसे जैसे वह रूपज्ञानका जनक है उसी प्रकार उसका रसके साथ भी सन्निकर्ष पाया जाता है
अतः उससे रसका भी ज्ञान होना चाहिए । ४. सन्निकर्ष एकका न होकर इन्द्रिय और अर्थ इन दो
या दोसे अधिकका होता है अतः सन्निकर्षका फल जो ज्ञान है वह भी दोनोंमें होना चाहिए ।
इन्द्रियको प्रमाण माननेमें ये दोष आते हैं—१. सर्वज्ञताका अभाव होता है, क्योंकि इन्द्रियाँ
सब पदार्थोंको एक साथ जाननेमें असमर्थ हैं। २. इन्द्रियोंसे सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थों-
का ज्ञान सम्भव न होनेसे भी सर्वज्ञताका अभाव होता है । ३. अनुमान आदि ज्ञानोंकी उत्पत्ति
नहीं हो सकेगी, क्योंकि इन ज्ञानोंकी उत्पत्ति इन्द्रियोंसे नहीं होती । सन्निकर्ष और इन्द्रियको
प्रमाण माननेपर इसी प्रकार और भी दोष आते हैं। सन्निकर्ष और इन्द्रियको प्रमाण माननेवाले
लोग ज्ञानको प्रमाण मानने पर एक बड़ी भारी आपत्ति यह देते हैं कि यदि ज्ञानको प्रमाण माना
जाता है तो प्रमाण निष्फल हो जाता है। किन्तु उनकी यह आपत्ति भी समीचीन नहीं है, क्योंकि
ज्ञानको प्रमाण माननेपर प्रीति, अज्ञाननाश, त्यागबुद्धि, ग्रहणबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि आदि अनेक
फल बन जाते हैं। उन्होंने भी जब ज्ञानको प्रमाण माना है तब ये ही फल माने हैं। न्यायभाष्यमें
लिखा है कि 'जब ज्ञान प्रमाण होता है तब हानबुद्धि, उपादानबुद्धि और उपेक्षाबुद्धि उसके फल
प्राप्त होते हैं। इसलिए ज्ञानको ही सर्वत्र प्रमाण मानना चाहिए यही निष्कर्ष निकलता है। इससे
पूर्वोक्त सभी दोषोंका निराकरण हो जाता है। इसके अतिरिक्त इस सूत्रकी टीकामें इन बातोंपर
और प्रकाश डाला गया है—१. प्रमाणकी निरुक्ति । २. जीवादि पदार्थोंके जाननेके लिए जैसे
प्रमाण माना गया है वैसे प्रमाणके जाननेके लिए अन्य प्रमाण अपेक्षित नहीं, इसका खुलासा ।
३. सूत्रमें 'प्रमाणे' इस प्रकार द्विवचन रखनेका कारण । ये विषय सुगम हैं।
§ १७३. पहले कहे गये पाँच प्रकारके ज्ञान दो प्रमाणोंमें आ जाते हैं इस प्रकार सुनिश्चित
हो जाने पर भी वे दो प्रमाण प्रत्यक्ष और अनुमान आदिक भी हो सकते हैं अतः इस कल्पनाको
दूर करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
प्रथम दो ज्ञान परोक्ष प्रमाण हैं ॥११॥
§ १७४. आदि शब्द प्राथम्यवाची है। जो आदिमें हो वह आद्य कहलाता है। शंका—
दो प्रथम कैसे हो सकते हैं ? समाधान—पहला मुख्यकल्पनासे प्रथम है और दूसरा उपचार
१. त्यर्थः । —उपमानाद्यर्थापत्त्यादीनामत्रैवान्तर्भावादुक्त–मु० ।