सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 183, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 183
Here is the complete and accurate transcription of the text from the image:
- १।११ § १७५ ] प्रथमोऽध्यायः ७१
द्विवचननिर्देशसामर्थ्याद् गौणस्यापि ग्रहणम् । आद्यं च आद्यं च आद्ये मतिश्रुते इत्यर्थः । तदुभयमपि
परोक्षं प्रमाणमित्यभिसंबध्यते । कुतोऽस्य परोक्षत्वम् १ । परायत्तत्वात् "मतिज्ञानं इन्द्रियानिन्द्रिय-
निमित्तम्" इति वक्ष्यते “श्रुतमनिन्द्रियस्य" इति च । अतः पराणीन्द्रियाणि मनश्च प्रकाशोपदेशादि
च बाह्यनिमित्तं प्रतीत्य तदावरणकर्मक्षयोपशमापेक्षस्यात्मनो मतिश्रुतं उत्पद्यमानं परोक्षमित्या-
ख्यायते । अत उपमानागमादीनामत्रैवान्तर्भावः । ५
§ १७५. अभिहितलक्षणात्परोक्षादितरस्य सर्वस्य प्रत्यक्षत्वप्रतिपादनार्थमाह -
कल्पनासे प्रथम है । मतिज्ञान तो मुख्यकल्पनासे प्रथम है और श्रुतज्ञान भी उसके समीपका होनेसे
प्रथम है ऐसा उपचार किया जाता है। सूत्रमें 'आद्ये' इस प्रकार द्विवचनका निर्देश किया है अतः
उसकी सामर्थ्यसे गौणका भी ग्रहण हो जाता है। 'आद्ये' पदका समास 'आद्यं च आद्यं च आद्ये' है।
इससे मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दोनों लिये गये हैं। ये दोनों ज्ञान मिलकर परोक्ष प्रमाण हैं ऐसा १०
यहाँ सम्बन्ध करना चाहिए । शंका - ये दोनों ज्ञान परोक्ष क्यों हैं ? समाधान - क्योंकि ये दोनों
ज्ञान पराधीन हैं। 'मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रियके निमित्तसे होता है' यह आगे कहेंगे और
'अनिन्द्रियका विषय श्रुत है' यह भी आगे कहेंगे । अतः 'पर'से यहाँ इन्द्रिय और मन तथा प्रकाश
और उपदेश आदि बाह्य निमित्त लेने चाहिए। तात्पर्य यह है कि मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञाना-
वरण कर्मके क्षयोपशमकी अपेक्षा रखनेवाले आत्माके इन्द्रिय और मन तथा प्रकाश और उपदेशा- १५
दिक बाह्य निमित्तोंकी अपेक्षा मतिज्ञान और श्रुतज्ञान उत्पन्न होते हैं अतः ये परोक्ष कहलाते हैं।
उपमान और आगमादिक भी ऐसे ही हैं अतः इनका भी इन्हींमें अन्तर्भाव हो जाता है।
विशेषार्थ- पिछले सूत्रमें दो प्रकारके प्रमाणोंका उल्लेख कर आये हैं। वे दो प्रमाण
कौन हैं और उनमें पाँच ज्ञानोंका कैसे विभाग होता है यह बतलाना शेष है, अतः ग्यारहवें
और बारहवें सूत्रों द्वारा यही बतलाया गया है। उसमें भी ग्यारहवें सूत्र द्वारा प्रमाणके पहले २०
भेदकी परोक्ष संज्ञा बतलाकर उसमें मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका अन्तर्भाव किया गया है। दूसरे
लोग जो इन्द्रियोंका अविषय है उसे परोक्ष कहते हैं। किन्तु जैन परम्परामें परोक्षता और प्रत्यक्षता
यह ज्ञानका धर्म मानकर उस प्रकारसे उनकी व्याख्या की गयी है। जैन परम्पराके अनुसार
परकी सहायतासे जो अक्ष अर्थात् आत्माके ज्ञान होता है वह परोक्ष ज्ञान कहलाता है परोक्ष
शब्दका यह अर्थ लिया गया है। मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दोनों ज्ञान ऐसे हैं जो यथासम्भव २५
इन्द्रिय, मन तथा प्रकाश और उपदेश आदिके बिना नहीं हो सकते, अतः ये दोनों परोक्ष माने
गये हैं। दार्शनिक ग्रन्थोंमें इन्द्रिय ज्ञानका सांव्यवहारिक प्रत्यक्षरूपसे उल्लेख देखनेको मिलता है।
सो यह कथन औपचारिक जानना चाहिए। दूसरे लोगोंने अक्षका अर्थ इन्द्रिय करके इन्द्रियज्ञान
को प्रत्यक्ष कहा है। वहाँ इसो अपेक्षासे इन्द्रिय ज्ञानको सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष लिखा गया है ऐसा
यहाँ जानना चाहिए। वस्तुतः आत्माके सिवा अन्य निमित्तसे जितना भी ज्ञान होता है वह सब ३०
परोक्ष ही है। उपमान, आगम आदि और जितने ज्ञान हैं वे भी अन्यकी अपेक्षाके बिना नहीं होते
अतः उनका इन्हीं ज्ञानोंमें अन्तर्भाव हो जानेसे मुख्यतः परोक्ष ज्ञान दो ही ठहरते हैं एक मतिज्ञान
और दूसरा श्रुतज्ञान । यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि ये ज्ञान केवल बाह्य निमित्तसे नहीं
होते हैं। मुख्यतया इनकी उत्पत्तिमें मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम आव-
श्यक है। आत्माकी ऐसी योग्यता हुए बिना ये ज्ञान नहीं होते । ऐसी योग्यताके होने पर बाह्य- ३५
निमित्त सापेक्ष इनकी प्रवृत्ति होती है यह उक्त कथनका सार है।
§ १७५. परोक्षका लक्षण कहा । इससे बाकीके सब ज्ञान प्रत्यक्ष हैं इस बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं -
१. -क्षत्वम् ? परापेक्षत्वात् । मति- आ०, दि० १, दि० २।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri