सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ११६ § १९६ ] प्रथमोऽध्यायः ७९
§ १९४. बहुबहुविधयोः कः प्रतिविशेषः; यावता बहुष्वपि बहुत्वमस्ति बहुविधेष्वपि बहुत्व-
मस्ति; एकप्रकारनानाप्रकारकृतो विशेषः । उक्तनिःसृतयोः कः प्रतिविशेषः; यावता सकलनिः-
सरणान्निःसृतम् । उक्तमप्येवंविधमेव । अयमस्ति विशेषः, अन्योपदेशपूर्वकं ग्रहणमुक्तम् । स्वत एव
ग्रहणं निःसृतम् ।
§ १९५. अपरेषां क्षिप्रनिःसृत इति पाठः । त एवं वर्णयन्ति श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दमवगृह्यमाणं ५
मयूरस्य वा कुररस्य वेति कश्चित्प्रतिपद्यते । अपरः स्वरूपमेवाश्रित्य२ इति ।
§ १९६. ध्रुवावग्रहस्य धारणायाश्च कः प्रतिविशेषः । उच्यते, क्षयोपशमप्राप्तिकाले विशुद्ध-
परिणामसंतत्या प्राप्तात्क्षयोपशमात्प्रथमसमये यथावग्रहस्तथैव द्वितीयादिष्वपि समयेषु नोनो३ नाभ्य-
धिक इति ध्रुवावग्रह इत्युच्यते । यदा पुनर्विशुद्धपरिणामस्य संक्लेशपरिणामस्य च मिश्रणात्क्षयो-
पशमो भवति तत उत्पद्यमानोऽवग्रहः कदाचित् बहूनां कदाचिदल्पस्य कदाचिद् बहुविधस्य कदा- १०
चिदेकविधस्य वेति न्यूनाधिकभावादध्रुवावग्रह इत्युच्यते । धारणा पुनर्गृहीतार्थाविस्मरणकारण-
मिति महदनयोरन्तरम् ।
§ १९४. शंका—बहु और बहुविधमें क्या अन्तर है । क्योंकि बहु और बहुविध इन दोनोंमें
बहुतपना पाया जाता है ? समाधान—इनमें एक प्रकार और नाना प्रकारकी अपेक्षा अन्तर है ।
अर्थात् बहुमें प्रकार भेद इष्ट नहीं और बहुविधमें प्रकार भेद इष्ट है । शंका—उक्त और निःसृतमें १५
क्या अन्तर है—क्योंकि वस्तुका पूरा प्रकट होना निःसृत है और उक्त भी इसी प्रकार है ?
समाधान—इन दोनोंमें अन्तर यह है—अन्यके उपदेशपूर्वक वस्तुका ग्रहण करना उक्त है और
स्वतः ग्रहण करना निःसृत है ।
§ १९५. कुछ आचार्योंके मतसे 'क्षिप्रा निःसृतके' स्थानमें 'क्षिप्रनिःसृत' ऐसा पाठ है । वे
ऐसा व्याख्यान करते हैं कि श्रोत्र इन्द्रियके द्वारा शब्दको ग्रहण करते समय वह मयूरका है अथवा २०
कुररका है ऐसा कोई जानता है । दूसरा स्वरूपके आश्रयसे ही जानता है ।
§ १९६. शंका—ध्रुवावग्रह और धारणामें क्या अन्तर है ? समाधान—क्षयोपशमकी
प्राप्तिके समय विशुद्ध परिणामोंकी परम्पराके कारण प्राप्त हुए क्षयोपशमसे प्रथम समयमें जैसा
अवग्रह होता है वैसा ही द्वितीयादिक समयोंमें भी होता है, न न्यून होता है और न अधिक । यह
ध्रुवावग्रह है । किन्तु जब विशुद्ध परिणाम और संक्लेश परिणामोंके मिश्रणसे क्षयोपशम होकर २५
उससे अवग्रह होता है तब वह कदाचित् बहुतका होता है, कदाचित् अल्पका होता है, कदाचित्
बहुविधका होता है और कदाचित् एकविधका होता है । तात्पर्य यह कि उसमें न्यूनाधिक भाव
होता रहता है इसलिए वह अध्रुवावग्रह कहलाता है किन्तु धारणा तो गृहीत अर्थके नहीं भूलनेके
कारणभूत ज्ञानको कहते हैं, अतः ध्रुवावग्रह और धारणामें बड़ा अन्तर है ।
विशेषार्थ—ये अवग्रह आदि मतिज्ञान-द्वारा जानने रूप क्रियाके भेद हैं और बहु आदि उनके ३०
कर्म हैं इसलिए इस सूत्रमें इनका इसी रूपसे निर्देश किया गया है । मतिज्ञान-द्वारा पदार्थोंका बहु
आदि रूप इतने प्रकारसे अवग्रहण, ईहन, अवाय और धारण होता है यह इसका तात्पर्य है । इन बहु
आदिके स्वरूपका तथा उसके अन्तरका व्याख्यान टीकामें किया ही है । मालूम होता है कि पूज्यपाद
स्वामीके समय इस सूत्रके दो पाठ प्रचलित थे और उनका दो प्रकारसे व्याख्यान भी किया जाता
था जिनका उल्लेख पूज्यपाद स्वामीने स्वयं किया है । एक पाठ जो उस समय अधिक मान्य था
या पूज्यपाद स्वामी जिसे मूल पाठ मानते रहे उसका उल्लेख तो उन्होंने व्याख्यानरूपसे किया ३५
१. बहुषु बहुविधे ।'–मु० । २. –मेवानिःसृत- आ०, दि० १, दि० २, मु० । ३. नोनाभ्य –ता०,
न०, मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri